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सर्वकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

पृष्ठ 516, कुल 540 में से

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पृष्ठ 516

४३४ | अभिज्ञानशाकुन्तलम्

एक पात्र मध्यम श्रेणी का हो तथा दूसरा निम्न श्रेणी का। इसमें प्राकृत तथा संस्कृत दोनों भाषाओं का प्रयोग होता है—

वृत्तवर्तिष्यमाणानां कथांशानां निदर्शकः ।
संक्षिप्तार्थस्तु विष्कम्भ आदावङ्कस्य दर्शितः ॥
मध्येन मध्यमाभ्यां वा पात्राभ्यां संप्रयोजितः ।
शुद्धः स्यात् स तु सङ्कीर्णो नीचमध्यप्रकल्पितः ॥

प्रवेशक—प्रवेशक भी विष्कम्भक के समान अतीत या भावी कथांशों का सूचक है। इसमें प्रयुक्त शक्ति उदात्त नहीं होती। इसकी भाषा सदा प्राकृत होती है और इसमें नीच पात्रों का प्रयोग होता है। प्रवेशक की योजना हमेशा दो अङ्कों के बीच में ही होती है यह भी शेष अर्थों का सूचक है—

प्रवेशकोऽनुदात्तोक्त्या नीचपात्रप्रयोजितः ।
अङ्कद्वयान्तर्विज्ञेयः शेषं विष्कम्भके यथा ॥

अङ्कावतार—कभी-कभी पात्रों द्वारा एक अङ्क के अन्त में अगले अङ्क के अभिनय का आभास मिलता है, जिसे अङ्कावतार कहते हैं—

अङ्कावतारस्त्वङ्कान्ते पातोऽङ्कस्याविभागतः ।

जिस अङ्क में अङ्कावतार होता है, उस में प्रवेशक तथा विष्कम्भक नहीं होते।

स्वगत—कभी-कभी रंगमञ्च का पात्र अपने मन की गुप्त बातों को प्रकाश में लाने के लिए दूसरी ओर मुँह फेरकर इस तरह बात करता है जिसको दर्शक तो सुन लेते हैं, पर रंगमञ्च के अन्य पात्र नहीं सुन पाते। स्वगत का प्रयोग कथा-वस्तु के उस भाग के लिए होता है जो किसी भी पात्र को नहीं सुनाया जाता। इससे पात्र विशेष के मानसिक भावों की झलक मिलती है। इस प्रकार स्वगत मन ही मन बोलना कहलाता है—

अश्राव्यं खलु यद्वस्तु तदिह स्वगतं मतम् ।

प्रकाश—प्रकाश सर्वश्राव्य नाटकीय कथावस्तु का वह भाग है, जिसका रंगमञ्च के सभी पात्रों को सुनाना अभीष्ट है। प्रकाश का वास्तविक अर्थ है प्रगट रूप में सुनाने के लिए जो बात कही जाय। धनञ्जय ने दशरूपक में प्रकाश और स्वगत का लक्षण इस प्रकार किया है—

सर्वश्राव्यं प्रकाशं स्यादश्राव्यं स्वगतं मतम् ।

जनान्तिक—जनान्तिक एक नाटकीय पारिभाषिक शब्द है, जो नियत व्यक्तियों को ही सुनाने के लिए प्रयुक्त होता है। इसका प्रयोग वहाँ होता है जहाँ पर कोई पात्र रंगमञ्च पर स्थित अन्य पात्रों से किसी बात को छिपाने के लिए एक ओर होकर किसी पात्र से शनैः शनैः बात करता है। इसकी परिभाषा दशरूपक में धनञ्जय ने इस प्रकार दी है—

त्रिपताकाकरेणान्यानपवार्यान्तरा कथाम् ।
अन्योऽन्यं मन्त्रणं यत् स्याज्जनान्ते तज्जनान्तिकम् ॥