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१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

लिये गए हैं और नाक भी साफ कर दी गई है।“ ऐसा 23 जून की यह उपर्युक्त रिपोर्ट कहती है। ऐसे राष्ट्रीय और शास्त्रीय
बहिष्कार के कारण अंग्रेजों की कठिनाइयों की सीमा नहीं रही। इलाहाबाद का किला तो ले लिया। परंतु वहां से आगे-पीछे
कदम बढ़ाना अंग्रेजों को असंभव हो गया। उन्हें बैला नहीं मिलते, उन्हें गाड़ियां नहीं मिलती, उन्हें दवाइयां भी नहीं मिल रही
थीं। बीमार सोल्जरों को डोलियां नहीं मिलती-डोली उठानेवाले कहार नहीं मिलते थे। इस कारण जगह-जगह पड़े बीमार
लोगों की कर्कश कराहें इतनी भयानक होती कि उन्हें सुनकर ही अंग्रेज महिलाएं चटपट मरने लगीं। वे दिन धूप के थे और
जून माह में विद्रोह करके हम अंग्रेजों को अपने देश के सूर्यताप से मार डालेंगे, विद्रोहियों का यह जो दांव था, उसका
अनुभव होने लगा। सिर पर गीला कपड़ा बार-बार रखने में ही सारे अंग्रेज निमग्न थे। उस पर अन्न न मिलना। अनाज का
एक दाना भी कोई अंग्रेजों को बेचने के लिए तैयार नहीं था-“ आज तक हमें नितांत ही अल्प भोजन पर अपने दिन गुजारने
पड़े हैं। वस्तुतः कल मुझे अपने नाश्ते में जितना भोजन मिला था उससे तो एक श्वान का भी अपना पेट नहीं भर पाता।”
ऐसा इलाहाबाद का एक अंग्रेज अधिकारी लिखता है। अपने कुत्ते को भी जो खाना मैंने न खिलाया होता, वह खाना कलम"
स्वयं खा रहा था। गरमी और भुखमरी से अंग्रेजों में हैजा शुरू हो गया और उसमें भी अंग्रेज सोल्जरों ने दारू पीकर धुत्त पड़े
रहने का सिलसिला चालू रखा। सारा अनुशासन बिगड़ गया। नील के आदेश को भी वे शराबी ऐसे ठुकरा देते कि अब मैंने
उनमें से एक-दो को फांसी देने का निश्चय किया है, ऐसा उसने केनिंग को सूचित किया। इन अनंत संकटों से घिरी अंग्रेजी
सेना जहां-की-तहां बंधी रह गई। कानपुर से तुरंत सहायता भेजने के संदेश-पर-संदेश आते रहे, फिर भी जनरल नील जैसे
साहसी योद्धा को इलाहाबाद में जुलाई की पहली तारीख देखनी पड़ी।
जनरल नील और उसकी फ्युजिलियर सेना मद्रास की ओर से आई हुई थी-यह बात महत्त्वपूर्ण है। यदि इस समय मद्रास की
ओर विद्रोह की गप भी उड़ जाती तो अंग्रेजों को उसका तनाव सहना एक दिन भी असंभव हो जाता। परंतु इलाहाबाद के
कृतनिश्चयी हिंदुस्थानी लोगों ने यद्यपि अंग्रेजी योद्धाओं को मानो कमरे में बंद करके मार डालने का इतना सफल प्रयास
किया था, फिर भी अंग्रेजों को उससे डरने की वास्तविक आवश्यकता नहीं थी; क्योंकि मद्रास, बंबई, राजपुताना, पंजाब, नेपाल
आदि सारा हिंदुस्थान अभी तक मृत-सा निश्चल पड़ा था, जब उसमें से कुछ भाग चैतन्य हुआ तो वह पिशाच बनकर
विद्रोहियों पर ही टूट पड़ा। इलाहाबाद और बनारस में अंग्रेजों के साथ हजारों सिख सिपाही थे ही। फिर क्यों घबड़ाया जाए!
दूसरे कुछ भी करें, पर इलाहाबाद के पंडों और मुल्लाओं ने, तालूकदार और किसानों ने, छात्रों और शिक्षकों ने दुकानदारों
और ग्राहकों ने अनंत बाधाएं सामने खड़ी होते हुए भी सबको एक छाने के
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नीचे ला सके, ऐसा कोई करामती नेता न होते हुए भी और पराजय से लोगों में हताशा और अंधाधुंधी मची होते हुए भी,
गुलामी के प्रति जो दीर्घ द्वेष प्रदर्शित किया और स्वराज्य एवं स्वतंत्रता के उच्च ध्येय के लिए जो स्वार्थ-त्याग किया इससे
उन सब देशभक्तों के लिए इतिहास हमेशा-हमेशा गौरव गान ही करेगा।
क्योंकि उन सब देशभक्तों को अंग्रेजी दासता के विरूद्ध उठ खड़े होने के लिए बहुत भारी मूल्य चुकाना पड़ा था।⁸¹ बनारस
और इलाहाबाद प्रांत में जनरल नील ने जो क्रूर व्यवहार किया उसका जंगली इतिहास में भी कोई सही उदाहरण मिलना
कठिन है। यह मैं आलंकारिक भाषा में नहीं लिख रहा, अंग्रेजों के ही वर्णन पढ़कर मेरी आत्मा यह कहती है। नील ने वृद्धों
को जलाया, नील ने अर्भकों को जलाया, नील ने पलने में सो रहे मुन्ने को उसके पालने में और गोद में दूध पीते मुन्ने को
उसकी मां की गोद में ही भून डाला। सैकड़ों स्त्रियों को, कुमारियों को, माताओं और पुत्रियों को-जिनकी संख्या भी न गिनी
जा सके-जिंदा जला दिया। परमेश्वर और मनुष्य जाति के सामने मैं यह कथन कर रहा हूं। इसमें का एक अक्षर भी मिटाने
की किसी में हिम्मत है तो वह सामने आकर
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⁸¹ एक ब्रिटिश अधिकारी ने अपने प्रयाग के क्रियाकलापों के संबंध में यह विवरण प्रस्तुत किया था-‘हां, यह प्रवास तो मुझे बहुत ही रूचिकर प्रतीत
हुआ। जब सिख सैनिकों के साथ फ्युजिलियर्स सिपह्री नगर पर आक्रमण करने गए तो हम अपनी बंदूकों सहित जहाजों पर सवार हुए। जहाज चल
रहा था और हम अपने दाएं-बाएं तटों पर गोलियों की बौछार करते आगे बढ़ रहे थे। जब हम एक खराब स्थान पर आए तो गोली वर्षा करते हुए ही
तट पर उतर पड़े। मेरी दुनाली बंदूक से बरसती गोलियों का आहार अनेक 'काले' लोग बन रहे थे। मैं प्रतिशोध लेने की भावना से उन्मादग्रस्त-सा हो
गया था। दाएं-बाएं और आसपास के स्थलों पर जब हमने अग्नि वर्षा की तो पवन के प्रवाह से भड़की अग्नि ज्वालाओं ने आकाश तक अपनी सैकड़ों
जिह्वाएं फैला दीं। अब राजद्रोही दुष्टों से पूरा-पूरा प्रतिकार लिया जा रहा था। यह देखकर हम हर्ष और आनंद से सुधबुध भी खो बैठे। प्रतिदिन
विद्रोहियों के ग्रामों को अग्नि की भेंट चढ़ाने के लिए हमारी टोलियां निकलती थीं और हम पूर्णतः प्रतिशोध ले रहे थे। मक्कारों ने सरकार और
अफसरों के साथ अपराधपूर्ण व्यवहार किया था, उनकी जांच हेतु जिस समिति का गठन किया गया था, मैं उसका अध्यक्ष था। प्रतिदिन ही हम
आठ-दस व्यक्तियों को तो निश्चित रूप से ही फंसाते थे। अब इन लोगों के प्राण हमारे चुंगल में थे। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि हमने किसी
के भी प्रति तनिक सी भी उदारता का प्रदर्शन नहीं किया। पैरवी की प्रक्रिया तो बड़ी ही सामान्य सी थी। दंडित अपराधी को अपने गले में फंदा
डालकर, एक गाड़ी पर चढ़ाकर वृक्ष से बांध दिया जाता था। गाड़ी को आगे बढ़ाया कि उसकी देह वृक्ष से झूल गई।"-चार्ल्स बाल कृत-'इंडियन
म्यूटिनी, खंड 1, पृष्ठ 257 और ऐसा कितने दिन तक चलता रहा-"तीन मास तक आठ शव ढोनेवाली गाड़ियां सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक उन शवों
को एकत्रित करने के लिए चक्कर लगाती थीं, जो राजमार्गों और बाजारों में लटकाए जाते थे। इस प्रकार लगभग छह हजार व्यक्तियों को सामान्य
सुनवाई के उपरांत प्राणदंड देकर उन्हें चिर निद्रा में सुलाया गया था।" -के कृत-'इंडियन म्यूटिनी खंड 2, पृष्ठ 203

एक क्षण के लिए तो खड़ा रहे। इन सबका अपराध क्या था? तो वह अपने देश की स्वतंत्रता के लिए सारे कष्ट भोगने को
तैयार हो गए थे। फिर भी, अभी कानपुर का कत्लेआम नहीं हुआ था। कानपुर के कत्लेआम के प्रतिशोध में नील ने यह
कत्लेआम नहीं किया था, उलटे नील के कत्लों के प्रतिशोध में कानपुर का कत्लेआम हुआ था।
सन् 1857 में सारे हिंदुस्थान में जितने अंग्रेज पुरुष, महिला और बच्चे कत्ल नहीं हुए उतने अकेले नील ने केवल इलाहाबाद
में किए थे। ऐसे सैकड़ों नील हजारों गांवों में उस वर्ष नेटिवों को सरेआम कत्ल कर रहे थे। अंग्रेजों के एक-एक आदमी के
लिए हिंदुस्थान का एक-एक गांव जीवित जलाया गया है।
इसके लिए अंग्रेज इतिहासकार क्या कह रहे हैं? वे पहले तो यह घटना पूरी तरह छोड़ देते हैं और वह भी कह-सुनकर
यदि थोड़ी-बहुत बातें लिखीं तो उससे नील कितना साहसी, कट्टर और बहादुर था, यह सिद्ध करते हैं। ऐसी प्रासंगिक
क्रूरता से व्यक्त होता है, ऐसा कुछ लोगों को कहना है। मानव जाति के लिए नील के हृदय में कितनी ममता भरी हुई थी,
इस मानवी कल्याण के लिए सके द्वारा दिखाई गई क्रूरता से व्यक्त होता है, ऐसा कुछ लोगों का कहना है। पार्लियामेंट की
रिपोर्ट में भी यह कहा गया है। अंग्रेजों के इस प्रतिशोध के कारण ही कानपुर का कत्लेआम हुआ, यह आशंका 'के' व्यक्त
करता है। पर वह कहता है, नेटिवों की उद्धतता के कारण ब्रिटिशों का सिंह रूप प्रकट होना स्वाभाविक ही था। इस क्रूरता
के लिए नील क विरूद्ध 'के' ने एक अक्षर भी नहीं लिखा है, उलटे इस महत्त्वपूर्ण प्रश्न पर चर्चा करने का साहस न करते
हुए वह उसे ईश्वर को सौंप देता है। परंतु नाना के संबंध में लिखते समय उसकी लेखनी अश्लीलता को भी लज्जित करती
है। चार्ल्स बाल नील की अपरिमित स्तुति करता है। स्वयं नील कहता है-"परमात्मा साक्षी है कि मैंने कुछ अधिक क्रूरता
प्रदर्शित की है; किंतु इन संपूर्ण परिस्थितियों पर सामूहिक दृष्टि से विचार करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि यह सभी कुछ
क्षम्य है। मैंने जो कुछ भी किया, अपने देश के लिए, उसके कल्याण के लिए किया है। मैंने यह कार्य अपनी साम्राज्य सत्ता
का आतंक बैठाने तथा उसे पुनः स्थिरता प्रदान करने के लिए किया है।" "स्वदेश के लिए मैं यह अघोर अत्याचार कर रहा
हूं, इसलिए परमेश्वर मुझे क्षमा करें", जनरल नील का उपर्युक्त वाक्य देकर जो अंग्रेज इतिहासकार उसकी स्तुति करते हैं वे
ही श्रीमंत नाना के और सिपाहियों के जोश को नरकगामी कहते हैं। इंग्लैंड के स्वदेशाभिमान की व्याख्या भी विचित्र है!
होम नामक इतिहासकार कहता है-"बूढ़े लोगों को और गोद में दूध पीते अर्भकों को लिये बेसहारा महिलाओं को भी इस
भयानक प्रतिशोध में बलि चढ़ाया गया,
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पर वह सुख के लिए नहीं-यह पवित्र कर्तव्य था, इसलिए किया गया, जनरल नील के सम्मान में यहां यह कहना होगा।''⁸²
उपर्युक्त उद्धरण में निष्पक्ष इतिहास और सच्चे परमेश्वर को (नील के परमेश्वर को नहीं) यदि किसी के द्वारा की गई आम
हत्याएं किसी को यथार्थ और न्यायपूर्ण लगती हों तो वह अंग्रेजों द्वारा की गई हत्याएं न होकर विप्लवकारियों द्वार की गई
हत्याएं हैं। स्वतंत्रता के लिए की गई हत्याएं क्षम्य हैं या नहीं, इस प्रश्न का निर्णय परमेश्वर पर छोड़ दें-परमेश्वर मुझे क्षमा
करे। क्योंकि मैं जो कर रहा हूं वह अपने देश का प्राकृतिक स्वराज्य प्राप्त करने के लिए है-यह वाक्य नील की अपेक्षा नाना
साहब के मुंह से अधिक शोभा देता। स्वदेश के लिए विप्लवी लड़ रहे थे, अंग्रेज नहीं। इसीलिए क्रूर हत्याएं करते हुए यदि
कोई पवित्र कर्तव्य कर रहा था तो वह स्वधर्म और स्वराज्य इस महान् उपलब्धि के लिए झगड़नेवाले और सौ वर्ष के
अत्याचारों से पीड़ित मातृभूमि का प्रतिशोध लेने का तत्पर क्षुब्ध देशवासी ही थे।
परंतु अब इस तत्त्वज्ञान का उपयोग ही क्या? नील ने इलाहाबाद में भयानक क्रूरता के जो बीज बोए उसकी फसल उधर
कानपुर के खेतों में लहलहा उठी है। ऐसे समय में उस फसल की कटाई के लिए जल्दी से कानपुर की ओर जाना ही उचित
है।
1857 का स्वातंत्र्य समर – 175
⁸² "वृद्ध व्यक्तियों ने तो हमें कोई हानि नहीं पहुंचाई थी। असहाय अबलाओं के आंचल से अबोध शिशुओं को भी हमारे प्रतिशोध की लपट उतनी ही
प्रखरता से निगल गई थी जितनी तीव्रता से उसने घोर अपराधियों को चाटा था। किंतु उस परम श्रद्धेय नील के संबंध में यह तथ्य स्मरण रखना होगा
कि ऐसे कठोर दंड देने में उसे तनिक सी भी सुखानुभूति नहीं होती थी, अपितु वह तो अपने कठोर दायित्व का पालन मात्र ही कर रहा था।''
-होम्स कृत-'सेपॉस वार', पृष्ठ 229-30

प्रकरण-8
कानपुर और झाँसी
दासता के नरक में पड़े अपने पितरों का उद्धार करने के पवित्र हेतु से अत्यंत वेग से बह रहे क्रांति भागीरथी के रक्त-प्रवाह
को उत्तरी हिंदुस्थान के विस्तृत मैदान पर धमा-चौकड़ी करते छोड़कर अब कुछ देर हमें उस क्रांति भागीरथी के मुख्य स्रोत
हरिद्वार में क्या चल रहा है-उसे देखना चाहिए। श्रीमंत नाना साहब के बाड़े में मेरठ के विस्फोट के समय जितने कार्यकर्ता
इकट्ठे हुए थे उतने उस समय लखनऊ के राजमंदिर में, बरेली प्रांत में या स्वयं दिल्ली के दीवान-ए-खास में भी मिलने
कठिन थे। इस ब्रह्मवर्त के महल में सन् 1857 की क्रांति का गर्भ संभव हुआ और वहीं वह गर्भ विकसित हो रहा था। वहीं
उस विचार-गर्भ के द्रवीभूत रस का संगठन होने लगा और फिर पूर्ण गर्भ का उद्भव भी यदि यथाकाल ब्रह्मवर्त में ही होता
तो निश्चय ही वह अल्पायु जीन होता। परंतु जब बीच में ही समय पूर्व मेरठ की गड़बड़ाहट से वह क्रांति गर्भ निकलकर
बाहर आ गिरा तब उस कच्चे गर्भ का परित्याग न करते हुए उस कठिन परिस्थिति में ही उसकी उचित अभिवृद्धि करने के
लिए इधर ब्रह्मवर्त क महल में क्रांति की तैयारी जोर-शोर से चल रही थी।
उस महल में नाना साहब के भाई श्री बाबा साहब व श्री बाला साहब और उनके भतीजे श्री राव साहब अपने मालिक के
क्रांति के उदात्त हेतु को सफल करने के लिए अपना तन-मन-धन अर्पण करने को तैयार थे। वैसे ही नाना के गुरु जिन्होंने
खिदमतगार की अत्यंत कनिष्ठ स्थिति से अपनी दक्षता और चतुराई से अपने को राज्यमान्य के पद
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तक पहुंचाया था, जिन्होंने यूरोप खंड की राजनीति एवं संग्राम भूमि का अध्ययन कर अपनी स्वदेश भूमि को गुलामी से मुक्त
करने के धर्मयुद्ध में उसका किस तरह उपयोग किया जाए-यह बड़ी चतुराई से प्रत्यक्ष अवलोकन किया था, जिन्होंने इस
क्रांति का विस्तृत नक्शा सबसे पहले अपने मनःपटल पर बनाया था और जिन्होंने स्वयं मुसलमान होते हुए भी अपनी भारत
माता की स्वतंत्रता के लिए एक हिंदू राजा के अभ्युदय के लिए अपना जीवन अर्पण कर ‘परैस्तु विग्रहे प्राप्ते वयं पंचशतोत्तरम्’
(संकट पड़ने पर हम एक सौ पांच हैं)-महाभारत के इस उपदेश की सार्थकता स्वाचरण से की थी, वे देशभक्त अजीमुल्ला
खान भी फिरंगियों की गुलामी छोड़ने के लिए वहां हाथ में तिलांजलि लेकर खड़े थे। उसी महल में झाँसी की बिजली भी
अपनी तेजपुंजता से उस गहरे अंधियारे में लगातार चमक मार रही थी।
परंतु ऐसे इतिहास-प्रसिद्ध राजमहल के शस्त्रागार में कसौटी के पत्थर पर तलवार को धार लगाने में कौन सा योद्धा तल्लीन
है-यह तो देखें जरा!
प्रिय पाठक! शस्त्रागार में शमशीर को पानी चढ़ाने में तल्लीन वह सतेज मराठा तात्या टोपे है। शिव छत्रपति के अखाड़े का
अंतिम जवां मर्द मराठा है यह। जवां मर्दी जिनमें होती है ऐसे बहुत लोग होते हैं, परंतु इस अंतिम मराठा है यह। जवां मर्दी
जिनमें होती है ऐसे बहुत लोग होते हैं, परंतु इस अंतिम मराठा की जवां मर्दी अपनी स्वतंत्रता के लिए अपनी हिंद देवी की
म्यान से बाहर निकाली हुई तलवार थी। तलवार मर गई, परंतु उसका ‘वार’ नहीं मरा-वह कभी मरनेवाला भी नहीं है। तात्या
टोपे जैसी तलवार, जिसे काल द्वारा जीर्ण और शत्रु द्वारा विदीर्ण की हुई म्यान में से स्वेच्छा मात्र से निकाला जा सकता है,
उस हिंद-भू की अक्षय कोख को नमस्कार करें।
हिंदभूमि की इसी आदरणीय कोख से सन् 1814 के आसपास वीरवर तात्या टोपे का जन्म हुआ।83 उनके पिता का नाम
पांडुरंग भट था। पांडुरंग भट को कुल आठ पुत्र थे और दूसरे पुत्र का नाम रघुनाथ था। यही रघुनाथ हिंदुस्थान के इतिहास
के तारामंडल में ‘तात्या’ नाम से चमकता स्वतंत्रता का दिव्य तारा था।
पांडुरंग राव टोपे देशस्थ ब्राह्मण थे और अंतिम बाजीराव के पास ब्रह्मवर्त में वे दानाध्यक्ष के पद पर थे। उस ब्रह्मवर्त को एक
समय कितना अलभ्य लाभ हुआ था! उसके आंगन में नाना साहब, झाँसी की छबीली, तात्या टोपे आदि की समकालीन स्नेह
लीला हुई थी। बचपन से ही श्रीमंत नाना की तात्या से बड़ी प्रीति थी। जिस महान् कार्य में उन्हें वीर चरित्र की भूमिका
करनी थी उस महान् कृत्य की शिक्षा बाल वय से ही इन दोनों विभूतियों को सृष्टि देवी की ओर से एक ही शाला में दी जा
रही थी। ‘रामायण’, ‘महाभारत’ के पारायण जिन्होंने एक साथ किए, मराठों की जवां मर्दी का इतिहास जिन्होंने एक साथ पढ़ा
और उस वीर रस को पीकर उनके बाल-बाहू एक साथ ही
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83 सन् 1849 में श्री तात्या टोपे अपनी जबानी कहते हैं-‘‘मेरा नाम तात्या टोपे हैं। मेरे पिताजी का नाम पांडुरंग है और मैं यवला परगना पालोडात,
जिला नगर का निवासी हूं। मैं बिठूर में रहता हूं और मेरी आयु लगभग पैंतालीस वर्ष है और मैं नाना साहब की सेना में तैनात हूं।’’

फड़क उठे थे—वही दो सिंह शावक अपनी देशमाता के लिए इकट्ठा लड़ें। किसी एक सदी में ऐसी एक ही शाला खुलती है
जिसमें नाना, राव और छबीली जैसे बालक साथ-साथ शिक्षा लेते हैं, साथ-साथ मुस्कराते और साथ-साथ खेलते हैं; किसी
एक सदी में ऐसी एक ही परीक्षा होती हैं कि जिसमें ये सारे महानुभव बालक संग्राम पत्रिका पर अद्भुत वीर चरित्र एकमत से
लिखते हैं, ऐसी असाधारण शाला का और ऐसी असाधारण परीक्षा का सम्मान ब्रह्मवर्त के राजमहल को प्राप्त हुआ था।
अप्रैल के अंत में क्रांति पक्ष के संगठन को एकमत करने के लिए हिंदुस्थान के प्रमुख शहरों में स्वयं प्रवास करने के बाद
अजीमुल्ला खान और नाना साहब संकेत समय की प्रतीक्षा करते हुए बहुत सावधानी से रूके हुए थे। तभी 18 मई को मेरठ
के विप्लव और दिल्ली स्वतंत्र हो जाने का समाचार कानपुर आ पहुंचा। इस असमय हुए विप्लव के कारण ब्रह्मवर्त के
राजमहल में किसी भी तरह की बेचैनी दिखाई नहीं दी। राज्य क्रांतियां सहस्रशः अलग-अलग भागों में चलती हैं—इसलिए
उनमें से कुछ भाग जल्दी से तो कुछ मंद गति से, कुछ पूर्व संकेत के अनुसार तो कुछ आकस्मिक तेज से ही गतिमान हो
जाते हैं। ब्रह्मवर्त के राजमहल के ध्यान में यह बात तत्काल आ गई और उसने मेरठ के विद्रोह का पूरा लाभ लेने का निश्चय
किया। परंतु वह लाभ लेने के लिए तत्काल दिल्ली के पीछे-पीछे विद्रोह करें या जून के पहले हफ्ते में पूर्व संकेतों के
अनुसार विद्रोह करें? इन दोनों में से दूसरा ही रास्ता ठीक समझ उसके अनुसार मई के उत्तरार्ध में ब्रह्मवर्त के अंतर्बाह्य
दांव-घात चलने लगे। ब्रह्मवर्त से कानपुर बिलकुल पास है। इस शहर में बहुत दिनों से अंग्रेजी सेना का महत्त्वपूर्ण शिविर
था। सन् 1857 के मई माह में वहां पर पहली 53वीं एवं 56वीं पैदल सिपाहियो की पलटन और घुड़सवार सिपाहियों की
दूसरी पलटन—ऐसी कोई तीन हजार नेटिव सेना थी। वहां का तोपखाना अंग्रेजों के कब्जें में था और उसपर कोई साठ अंग्रेज
और अन्य सौ-सवा सौ सोल्जर—इतने गोरे रहते थे। सारी सेना का कमांडर सर हो व्हीलर था। व्हीलर आयु से वृद्ध और
सिपाहियों में बहुत लोकप्रिय अधिकारी था। इस वृद्ध अधिकारी ने सिख युद्ध में और अफगानिस्तान की मुहिम में अच्छी सेवा
की थी। कानपुर की नेटिव सेना इस अधिकारी से बहुत खुश है, यह अंग्रेज सरकार को पूरी तरह ज्ञात होने के कारण
कानपुर के सिपाहियों की पंक्तियों में कुछ पक रहा है, इसकी आशंका किसी में मन को छू तक न सकी।
15 मई को कानपुर शहर में इधर-उधर एक विशेष हलचल दिखने लगी। मेरठ के विप्लव का समाचार पहुंच जाने से
सिपाहियों की पंक्तियों में पहले की स्तब्धता हटकर चंचलता आई थी। परंतु सिपाहियों को ज्ञात वह समाचार अंग्रेज
अधिकारियों को 18 मई तक ज्ञात नहीं हुआ था। दिल्ली के समाचार देनेवाले तारयंत्र तोड़-फोड़ डाले गए थे, इसलिए सर
हो व्हीलर ने समाचार ज्ञात करने के लिए कुछ दूत भेजे। उन्हें रास्ते में दिल्ली से आ रहा एक सिपाही मिला। परंतु फिरंगी
को समाचार देने से उसने साफ मना किया। सन् 1857 में दूर-दूर के समाचार नेटिव लोगों को तत्काल कैसे ज्ञात हो
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जाते थे और तारयंत्र कान से लगाए अंग्रेज उस संबंध में कैसे अज्ञानी रहते थे, यह अंग्रेज अधिकारियों के लिए बड़ा कूट
प्रश्न था।84 कानपुर के नेटिव सिपाहियों को मेरठ में हुए विद्रोह का समाचार विद्रोह होने के बाद तार से सूचित करने की
आवश्यकता नहीं थी। क्योंकि वह विद्रोह से एक दिन पूर्व ही जीवित तारों से ज्ञात हो चुका था। कानपुर के अंग्रेज
अधिकारियों को जब यह समाचार विदित हुआ तब कानपुर शहर और सिपाहियों की पंक्तियों में क्या कुछ पक रहा है, इसका
आभास उन्हें होने लगा। परंतु अद्भुत समाचार के कारण उत्पन्न चंचलता जनमानस से जल्दी ही निकल जाएगी इस आशा
से सर हो व्हीलर काफी कुछ निश्चित थे। इधर कानपुर शहर और सिपाहियों में अंग्रेजी शासन की समाप्ति का समय पास आ
गया है-यह हर कोई अनुभव करने लगा। हिंदू और मुसलमानों की होनेवाली बड़ी-बड़ी सभाएं, सिपाहियों की होने वाली गुप्त
बैठकें, विद्यार्थियों और उनके शिक्षकों में चलनेवाले संवाद और बाजार व दुकानों-दुकानों में चर्चाओं आदि से लोकक्षोभ की
चिनगारियां उड़ने लगी थी। फिरंगियों को मार डालने की बातें लोग राह चलते करने लगे थे और सिपाही अपने स्वदेशी
सूबेदार के आदेशों को छोड़ दूसरों के आदेश टालने लगे। बाजार में एक अंग्रेज महिला कुछ वस्तुएं खरीदने हमेशा की ऐंठ में
जा रही थी कि कोई राहगीर भौंहें चढ़ाए उसके पास आया और बोला, "अब यह ऐंठ बहुत हो गई। हिंदुस्थान के बाजार में
एक अंग्रेज महिला कुछ वस्तुएं खरीदने हमेशा की ऐंठ में जा रही थी कि कोई राहगीर भौंहें चढ़ाए उसके पास आया और
बोला, "अब यह ऐंठ बहुत हो गई। हिंदुस्थान के बाजार से अब आपकी जल्दी ही विदाई होने वाली है-समझीं?" अंग्रेजों को
ऐसे कड़वे बोल सुनने का यह पहला ही अवसर था। अब ऐसे अवसर पर शांत बैठे रहने के कोई लाभ नहीं है, यह सोच
कमांडर सर हो व्हीलर ने विद्रोह के पहले ही सुरक्षा की तैयारी आरंभ कर दी।
सबसे पहले संकट के समय आश्रय मिल सके, ऐसा एक स्थान तैयार रहे, इस हेतु गंगा के दक्षिण और सिपाहियों की
पंक्तियों के पास ही एक स्थान उसने चुना। उस स्थान को मजबूती देने के लिए चारदीवारों और तोपें रखने के लिए स्थान
बनवाकर सर व्हीलर ने अनाज भरने का आदेश भी दिया। ऐसी अफवाह है कि नेटिव कांट्रेक्टर ने अनाज आदि रसद व्हीलर
की नजर बचाकर ओदश से बहुत कम भरी थी। इस चारदीवारी से घिरे स्थान का उपयोग कर सिपाही विद्रोह करें तो भी
अधिक नहीं करना पड़ेगा-ऐसा भरोसा व्हीलर और अन्य अंग्रेज अधिकारियों को था। क्योंकि अन्य स्थानों की तरह ही कानपुर
के सिपाही भी जगह-जगह मारकाट न कर दिल्ली की ओर ही निकल जाएंगे और उनके दिल्ली की ओर बढ़ते ही गंगा
उतरकर इलाहाबाद में अंग्रेजी सेना से
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84 1. वस्तुतः इस विद्रोह की एक उल्लेखनीय बात यह है कि अत्यंत निश्चित तथा नितांत वेग सहित सुदूर स्थित स्थानों के समाचार भारतीय सैनिकों
तथा अन्य लोगों को किस प्रकार हो जाते थे। सामान्य संदेश प्रेषण का प्रमुख माध्यम हरकारे ही थे, जो एक स्थान से दूसरे स्थान पर असाधारण फुरती
सहित संदेश पहुंचाते थे।" देखें-'मिलिट्री नैरेटिव्स', पृष्ठ 23
2. नानकचंद की डायरी।

मिलने का सुअवसर उन्हें मिल जाएगा, यह उनकी पक्की धारणा थी। कानपुर के अंग्रेज लोगों की सुरक्षा के लिए चारदीवारी
का मजबूत स्थान बनाकर ही व्हीलर चुप नहीं बैठा और उसने लखनऊ में सर हेनरी लॉरेंस ही सहायता के लिए चिल्ला रहा
था। फिर भी उसने चौरासी गोरे सोल्जर, लेफ्टिनेंट ॲशे के नेतृत्व में गोरा तोपखाना और कुछ घुड़सवार-इतनी सेना कानपुर
की ओर तुरंत भेजी।
अंग्रेज लोगों की सुरक्षा के लिए सर व्हीलर ने ये दो उपाय किए, यह कोई विशेष बात नहीं थी। परंतु अंग्रेजी के हिंदुस्थानी
शासन पर आया यह संकट टालने के लिए उसने जिस तीसरी युक्ति की योजना की थी, उसके जैसी अब अद्भुत
लगनेवाली, परंतु उस समय की क्रांति रचना के कौशल की यथार्थ कल्पना देनेवाली ऐसी दूसरी विलक्षण बात इस इतिहास में
नहीं लिखी गई उसकी प्रार्थना थी। मेरठ का आकस्मिक समाचार सुनते ही लश्कर के छोटे सिपाहियों और बाजार के
साधारण लोगों में तत्काल चंचलता और क्षोभ उत्पन्न हो गया था। परंतु ब्रह्मवर्त का समुद्र पहले जितना शांत, गंभीर और
सहनशील दिखाई देता था उतना ह ीवह आज भी था। उसके हृदय में घुमड़ते प्रचंड बादलों का संकेत उसके जलपृष्ठ पर
रत्ती भर दिखना असंभव था। कानपुर की सेना की चंचलता से सर व्हीलर चौंका था, फिर भी उसे इसकी तिल भर शंका नहीं
हुई कि ब्रह्मवर्त का राजा अपने विरुद्ध है। जिसके मस्तक का मुकुट अभी क्षण भर पहले पैरों से कुचला है, एक क्षण पहले ही
जिस नाना की पूछ को जान-बूझकर मसला है, उसी नाना को अंग्रेजों ने अपनी सुरक्षा की विनती कर कानपुर बुलाया। नाना
सहनशील हिंदू है, वह मन में द्वेष पालनेवाला जहरीला नाग नहीं, ऐसा अंग्रेजों को लगता था तो कोई एकदम गलता भी नहीं
था। क्योंकि आज तक अंग्रेजों को लगता था तो कोई एकदम गलत भी नहीं था। क्योंकि आज तक अंग्रेजों के पैरों तले
कुचले, निर्जीव, निरुपद्रवी और नपुंसक केंचुए क्या हिंदुस्थान में कम थे? उन्हीं केंचुओं जैसा केंचुआ नाना भी होगा, इस भ्रम
में पड़कर ही सर व्हीलर ने ब्रह्मवर्त की बांबी में बैठे नाग को और चाहिए ही क्या था! उसने दो तोपें, तीन सौ निजी सिपाही,
पैदल और घुड़सवारों के साथ दिनांक 22 मई को कानपुर में प्रवेश किया। कानपुर में अंग्रेजी सैनिक और असैनिक
अधिकारियों की बहुत बड़ी बस्ती थी-उसी के बीचोबीच जाकर नाना ने अपना शिविर बनाया। कानपुर में विप्लव होते ही
पहला हमला खजाने पर होगा, तो उसकी सुरक्षा की क्या व्यवस्था हो? अच्छा तो खजाना दे दो नाना के कब्जे में।
बारूदखाना और शस्त्रागार की सुरक्षा? इन्हें नी नाना की निगरानी में रहने दो। जल्दी ही इस निगरानी में नाना के दो सौ
सिपाहियों का पहरा बैठ गया। कलेक्टर हिल बर्डन ने नाना और तात्या को धन्यवाद एि; और सारी अंग्रेज महिलाएं
1857 का स्वातंत्र्य समर - 180

और बच्चे चाहें तो ब्रह्मवर्त के राजमहल में जाकर रहें, यहां तक बातें होने लगीं। इसी का नाम है मराठी कावा (दाँव)! अंग्रेजों
की सुरक्षा करने और स्वदेश-स्वतंत्रता के लिए युद्धरत अपने सगे भाइयों से लड़ने सेना-तोपखाने के साथ नाना को कानपुर
बुलाया गया। अंग्रेजी बस्ती में उनका शिविर लगा। अंग्रेज उन्हें लाखों रूपयों का खजाना सौंप दे और इस तरह सहायता देने
के लिए धन्यवाद दे-इसी सबका नाम है मराठी दाँ! और ये सारे बातें उस प्रचंड विस्फोट के एक हफ्ते पहले की हैं। इससे
यह स्पष्ट होता है कि सन् 1857 में अंग्रेज सरकार को अंधकार में टटोलते रखकर एकाएक कैसे गड्ढे में गिराया गया।
स्वतंत्रता की अनिवार्य इच्छा-यही साध्य और उसकी प्राप्ति हेतु संग्राम-यह साधन। इन दो बातों का स्पष्ट ज्ञान सारे समाज
को दिया हुआ था। परंतु उसका नेता कौन हो? विद्रोह का पक्का दिन कौन सा हो? क्रांति के मुख्य केंद्र कहां होंगे? ये सब
बातें इतनी चतुराई से गुप्त रखी गई थीं कि उसकी भनक अंग्रेजों को तो खैर क्या होती, उस जनसमूह को भी पक्की पता
नहीं थी। मुख्य गुप्त केंद्र के नेता और उनके विश्वसनीय सहयोगियों को ही पूरे नाम आदि की जानकारी थी। पीछे कहा था
कि हर रेजिमेंट में एक समिति बनाई गई थी, उसका भेद भी यही था। काशी में पकड़े गए पत्र में एक नेता की ओर से इतने
ही हस्ताक्षर थे। इस क्रांति रचना के अनुरूप ऐसा ही व्यवहार उसके उत्तरदायी नेताओं की ओर से रखा गया था। दिल्ली के
बादशाह, झाँसी की रानी या नाना साहब की योजना के बारे में विद्रोह होने के पहले दिन तक अंग्रेजों को तिनके के बराबर
भी भनक नहीं मिली। परंतु इस सब में ब्रह्मवर्त के बाड़े की विशेष करामात! इतिहासकार 'के' कहता है-'मराठा
राज्य-संस्थापक शिवाजी के चरित्र का अध्ययन नाना ने यों ही नहीं किया था।
कानपुर में गुप्त मंडली का जो, जाल बिछा था उसका मुख्य केंद्र सूबेदार टीका सिंह के घर में स्थापित था। बैठक करने का
दूसरा स्थान शम्सुद्दीन खान सिपाही के घर में था।85 इन गुप्त बैठकों में होनेवाली मंत्रणा में नाना की ओर से ज्वाला प्रसाद
और महमूद अली नामक ब्रह्मवर्त के राजमहल के विश्वसनीय नौकर उपस्थित रहते थे। सूबेदार टीका सिंह और ज्वाला प्रसाद
की सहायता, उत्कट स्वातंत्र्य इच्छा और निष्कलंक सच्चाई के कारण सारी सभा पर उनका प्रभाव था और इस सभा के
निर्णयों के अनुसार सेना एकमत से व्यवहार करे, यह निश्चित था। इस कारण सूबेदार टीका सिंह का जो मत होता वही सारी
सेना का होता था। ऐसे नेता और नाना की भेंट होना, आमने-सामने
1857 का स्वातंत्र्य समर - 181
85 कानपुर में विद्रोह शांत हो जाने पर एकत्रित साक्ष्य तथा नानकचंद नामक एक वकील की डायरी-इन दो आधारों पर G. D. Trevelyan द्वारा
लिखित 'Cawnpore' नामक पुस्तक से उपर्युक्त सारी जानकारी ली गई है । इन सबूतों से भी उस समय की परिस्थितियों की कल्पना करना बहुत
कठिन नहीं है।

सारी बातें होना अति आवश्यक था। उसमें भी मेरठ के आकस्मिक विद्रोह से अस्त-व्यस्त हुए कार्यक्रम को फिर से एक बार
सही करना अनिवार्य था, इसलिए नाना की और सूबेदार टीका सिंह की भेंट निश्चित हुई। पहली भेंट में सूबेदार और नाना
की मंत्रणा बहुत देर तक हुई। "सेना के हिंदू और मुसलमान-ये दोनों ही स्वराज्य और स्वधर्म के लिए एकमत से विद्रोह
करने को सज्जित हो गए हैं और हमव ह करने के लिए तैयार हैं।" सूबेदार के ऐसा विश्वास दिलाने पर अन्य फुटकर बातें
निश्चित करने को दूसरी अधिक सावधान और सावकाश भेंट की बात निश्चित कर सूबेदार वापस लौटे। जून की पहली
तारीख को संध्या समय श्रीमंत नाना अपने बंधु बाला साहब और मंत्री अजीमुल्ला खान के साथ गंगा किनारे आए। सूबेदार
टीका सिंह अपनी केंद्र मंडली के साथ वहां आए हुए थे ही।ये सारे लोग एक नाव में बैठकर में बैठकर गंगा के सुधा धवल
जलाशय में घुस गए। अपने स्वदेश-संरक्षण के लिए घनघोर संग्राम करने की प्रतिज्ञा उस गंगाजल को हथ में लेकर करने
के बाद कोई दो-तीन घंटे तक उनकी चर्चा चलती रही। भावी कार्यक्रम का पक्का निर्णय हो जाने पर वे सब लोग लौट
आए। उनकी वहां क्या चर्चा हुई, यह गंगा नदी के पाट को ही ज्ञात होगा। इतना सच है कि दूसरे दिन शम्सुद्दीन ने
अपनी प्रियतमा को यह स्वतंत्रता का समाचार यूंह ी नहीं सुनाया था। क्योंकि स्वराज्य के लिए शम्सुद्दीन की आत्मा जितनी
फड़फड़ा रही थी उतनी ही इस सुंदरी की भी। अजीजन सिपाहियों की अतिप्रिय संग्राम के बाजार में देशप्रेम के पुरस्कार के
रूप में बांटना शुरू कर दिया था। अपने सुंदर मुख और भृकुटी की एक-एक सिकुड़न से उसने अनेक भगोड़ों को फिर से
रण में भेजा है, यह किस्सा शीघ्र ही आगे आएगा।
क्रांति पक्ष की योजनाएं इधर इस ऊंचाई तक पहुंच रही थी और उधर अंग्रेज लोगों को हर नए पल इतनी घबराहट हो रही
थी कि क्या पूछने? लखनऊ से सहायता आने और श्रीमंत नाना साहब की सुरक्षा में खजाना एवं गोला-बारूद पहुंच जाने के
बाद सर व्हीलर के मन को थोड़ा धीरज बंधा था। पर अंग्रेज बस्ती को बिल्कुल धीरज नहीं था। 24 मई को मुसलमानों की
ईद थी। उस दिन सब ओर विद्रोह होगा-ऐसा डर हर शहरी अंग्रेज को था। परंतु ऐसे सहज ध्यान में आ जानेवाले दिन
सार्वजनिक विद्रोह होगा, ऐसा सहज में लग सकता है उस दिन शांति बनाए रखना और जिस दिन विद्रोह होने की बिल्कुल
भी संभावना न हो उस दिन उछल पड़ना-ये दांव-घात ही तो विद्रोह की सफलता के मुख्य कारण थे, इसीलिए कानपुर में
ईद के महोत्सव में किंचित् भी गड़बड़ी नहीं होने दी गई। उस दिन सुबह आंग्रेज इतना घबराया हुआ था
1857 का स्वातंत्र्य समर — 182

कि सर व्हीलर ने लखनऊ को तार भेजा-“आज विद्रोह किसी भी तरह नहीं रुक सकता। परंतु इस महोत्सव के दिन शाम
को जब सारे मुसलमानों ने परंपरा के अनुसार साहब लोगों से ईद मिलन किया तब सर व्हीलर को फिर से एक बार बहुत
संतोष हुआ। परंपरा के अनुसार रानी के जन्मदिन पर उसे तोपों की सलामी दी जाती थी, परंतु कदाचित् उस आवाज से
सिपाहियों में बेकार ही गड़बड़ी होगी, इसलिए वह सलामी नहीं दी गई। अंग्रेजों की महारानी में बेकार ही गड़बड़ी होगी,
इसलिए वह सलामी नहीं दी गई। अंग्रेजों की महारानी को उसके जन्मदिन पर स्वयं उसकी सेना में ही सलामी देने की
शक्ति न हो, इसके लिए बहुत से अंग्रेज अधिकारियों को बड़ा दुःख हुआ। पर क्या करते बेचारे! विद्रोह होने पर सुरक्षा के
लिए जो चारदीवारी का स्थान बनाया गया था-जैसा पीछे कहा है-उस स्थान क ओर ध्यान दें तो अंग्रेजों के कैसी दयनीय
स्थिति हो गई थी, यह तत्काल समझ में आ जाता है। 'भेड़िया आया रे भेड़िया', ऐसी गप यदि कोई उड़ा सकता तो अंग्रेजों
के परिवार अस्त-व्यस्त दौड़-भाग करने लगते। एक अंग्रेज अधिकारी लिखता है-

“मैं जब वहां था तो मैंने देखा कि बघियों, गाड़ियों, डोलियों आदि सवारियों की भीड़ सहसा ही लग जाती थी और उनमें
लेखकों, व्यापारियों, महिलाओं-जो बालकों को छाती से चिपकाए होती थी-बालकों, धायों और अधिकारियों आदि सभी को
पहुंचा दिया जाता था। सार रूप में कहा जाए तो यह कहना उपयुक्त होगा कि ज्यों कि किसी प्रकार के उपद्रव की आशंका
होती अथवा समाचार प्राप्त होता तो वहां हमारा अभिनंदन करनेवाला भी कोई न होता; क्योंकि उपर्युक्त दृश्यों से हम भारतीयों
को यह स्पष्टतः दिखा चुके थे कि हम कितने कायर हैं और हमारी दशा कितनी दयनीय हैं।‘’

अंग्रेजों द्वारा अपने व्यवहार से दर्शाया गया यह डरपोकपन, उपर्युक्त अधिकारी कहता है वैसे वास्तव में नेटिवों ने पहचान
लिया था। परंतु वह कोई आज की की नई बात नहीं। जब चारदीवारी बनाने का काम प्रारंभ हुआ, तभी अजीमुल्ला खान ने
एक लेफ्टिनेंट से मुसकराते हुए यही तो कहा था। उस लेफ्टिनेंट से अजीमुल्ला खान ने अपनी हमेशा जैसी मधुर वाणी में
पूछा, “सच में अभी मुझे ठीक के सूझता नहीं है।” आंखें मटकाते उस चतुर अजीमुल्ला खाने ने कहा, “रख लीजिए-‘निराशा
का किला’।”

मई के अंत में एक दिन एक शरारती तरूण अंग्रेज ने शराब के नशे में एक सिपाही पर गोली चला दी। यह गोली चूक गई
और उस सिपाही ने सोल्जर को निरपराध मान छोड़ दिया गया और कहा गया कि शराब के नशे में बंदूक गलती से चल
गई।

1857 का स्वातंत्र्य समर – 183

यह हमेशा का निर्णय था, पर अब स्थिति हमेशा की नहीं थी। 86 यह अपमानजनक समाचार फैलते ही सारी सेना गुर्राने
लगी-‘ठीक है! हमारी बंदूकें भी अब जल्दी ही गलती से`चल जाएंगी।´’ यह वाक्य सिपाहियों के बीच एक उत्क्षोभक नरसिंह
मंत्र ही हो गया था। एक-दूसरे को मिलते ही 'अब बंदूक गलती से चलेगी ना!' ऐसी व्यंग्यात्मक सलामी सेना में दी जाने
लगी। फिर भी मेरठ की तरह जल्दी न कर संकेत समय आने तक उन्होंने सारा गुस्सा मन-ही-मन पी जाने का निश्चय
किया था।
इस भयानकता को और भयानक करने के लिए ही शायद उसी समय एक अंग्रेज और उसकी पत्नी-दोनों के शव गंगा प्रवाह
में बहते-बहते कानपुर आ गए। ऊपर किसी शहर के विद्रोहियों के लिए कृत्य का साक्ष्य कानपुर से क्या-क्या भयंकर संवाद
करेगा? गंगा को अभी ऐसे कितने ही शव बहाने हैं।
'भेड़िया आया रे भेड़िया'-ऐसी अफवाह उड़ाकर अब तक अंग्रेजों का इतनी बार चकित किया गया था कि अब यदि भेड़िया
आया तो भी वे सचमुच सोते रहनेवाले थे। जून क पहली तारीख को स्वयं सर हो व्हीलर लॉर्ड केनिंग को लिखता है-“क्षोभ
और डर रहा नहीं। कानपुर सुरक्षित है। इतना ही नहीं, मैं लखनऊ को जल्दी ही सहायता भेजे देता हूं।´´ इलाहाबाद से आई
हुई गोरी फौज वास्तव में लखनऊ की ओर जाने लगी और वह भी कब? 3 जून को। जिस षड्यंत्र में तीन हजार सिपाही
और वेश्या सहित कानपुर का सारा शहर लगा हुआ था उस षड्यंत्र में तीन हजार सिपाही और वेश्या सहित कानपुर का
सारा शहर लगा हुआ था उस षड्यंत्र का समाचार अंग्रेजों और उनकी सहायता करनेवाले नानकचंद जैसे कुल्हाड़ी के बेंटे से
भी इतनी मुहरबंद रहे-यह कितना बड़ा आश्चर्य था!
यह मुहर 4 जून की रात को टूटी। सार्वजनिक कार्यक्रम के अनुरूप रात के अंधेरे में कुछ बंदूकें चलीं और निश्चित भवनों को
आग लगी। रक्तपात, नाश और मृत्यु की दौड़ शुरू हो जाने की वह करतल ध्वनि थी। सबसे पहले टीका सिंह का घोड़ा
कर्कश रीति से हिनहिनाया और उसी के साथ हजारों घोड़ें एक क्षण में टापों की आवाज करते सरपट दौड़ते निकले। कुछ
अंग्रेजी पगड़ियों और घरों को आग लगाने निकले, कुछ अन्य रेजिमेंटों को बुलाने गए और कुछ लश्करी निशानों और झंडों
को कब्जें में लेने निकले। ये झंडे जिसके कब्जे में थे, वह वृद्ध सूबेदार मेजर नेटिव होते हुए भी विद्रोहियों के विरूद्ध
जाता-सा दिखाई दिया, अतः एक तलवार का वार उसके सिर पर पड़ा और
1857 का स्वातंत्र्य समर - 184
86 ट्रेवेलियन ने लिखा है-“निम्न स्तर के यूरोपियनों की क्रूरता तथा सैनिक अधिकारियों द्वारा न्याय के नाम पर की जानेवाली धींगामस्ती से सिपाही
भलीभांति परिचित थे। किसी अन्य अवसर पर तो संभवतः उन्हें इस प्रकार के न्याय पर किसी प्रकार का आश्चर्य न होता; किंतु अब तो उनका रक्त
खौल उठा था, उनका आत्माभिमान जाग्रत् हो चुका था, जिससे किसी एंग्लो-सेक्सन वंशज को ऐसा अधिकार एवं सैनिक न्यायलय की विवेचना शक्ति
की प्रखरता को मान्यता देने के लिए वे तत्पर नहीं थे।”
-'कानपुर', पृष्ठ 93

तुरंत उसका धड़ नीचे गिर गया। "पहली पैदल रेजिमेंट के सूबेदार को सूबेदार टीका सिंह का सलाम है और वह पूछता है,
घुड़सवार फिरंगियों के विरूद्ध चल पड़े हैं फिर पैदल को देर क्यों?" दो घुड़सवारों के यह सुनाते ही पहली पैदल रेजिमेंट
'दीन और देश' कहते बाहर निकली। यह देखते ही उसका अधिकारी कर्नल एवर्ट कहने लगा-'हां-हां, मेरे प्रिय बच्चों, (बाबा
लोगों) यह क्या? यह तुम्हारे राजनिष्ठ शील को शोभा नहीं देता। ठहरो बच्चों, ठहरो!! कहां का ठहरो और क्या! कुछ ही देर
में वह सारी रेजिमेंट सैनिक अनुशासन में घुड़सवारों से जाकर मिल गई और फिर सारी सेना नवाबगंज की नाना की छावनी
की ओर युद्ध गीत गाते हुए निकली!
नवाबगंज खजाने पर नाना के सिपाही तैयार थे। उन्होंने सामने से आते स्वदेश बंधुओं को बाहुओं में जकड़ लिया और तभी
वह लाखों रूपयों स भरा खजाना और लाखों शस्त्रास्त्र से भरा बारूदखाना क्रांतिकारियों के हाथ आ गया। नवाबगंज में रात
को यह हो रहा था, तभी उधर जो दो रेजिमेंट बाकी थीं-कम-से-कम उन्हें कब्जे में रखने के लिए अंग्रेजों ने तत्काल परेड
पर बुलाया। अंग्रेजों के हाथ में तोपखाना होने से वे दोनों रेजिमेंट उस सारी रात परेड पर अपने यूरोपियन अधिकारियों के
साथ सशस्त्र खड़ी रहीं।
सूर्योदय होते ही यूरोपियन अधिकारियों को विश्वास हो गया कि ये सिपाही तो कम-से-कम विद्रोही नहीं हैं। इसलिए उन्हें
फिर से लाइन में जाने की अनुमति दी गई। और यूरोपियन अधिकारी भी जाने लगे। अब सही अवसर आ गया है, यह जान
उनमें से एक ने आगे बढ़ चिल्लाकर कहा, "ईश्वर सत्य की ओर है। भाइयो, उठो, चलो!" यह आदेश होते ही इधर-उधर
तलवारें बजने लगीं और अंतिम समय आया जान अंग्रेजी तोपें भी चलने लगीं। परंतु सिपाही अब उनकी मार के बाहर निकल
गए थे। इस समय अंग्रेज अधिकारियों को काट डालना संभव होते हुए भी सिपाहियों ने उन्हें नहीं छेड़ा और वे अवसर मिलते
ही अपने देशबंधुओं की ओर निकल गए। और इस तरह 5 जून को कानपुर के तीन हजार सिपाही अंग्रेजी गुलामी को
फेंककर नवाबगंज में नाना की छावनी के पास जाकर जमा हो गए। यह समाचार सुन सर व्हीलर को एक तरह का संतोष
हुआ कि एक भी अंग्रेज मरा नहीं। अब रीति के अनुसार सिपाही दिल्ली की ओर निकल जाएं तो समझो, कानपुर के ऊपर से
जान का संकट टल गया।
अन्य स्थलों की तरह यदि योग्य और कर्मठ नेताओं की कानपुर में भी कमी होती तो सर व्हीलर के अनुमान के अनुसार
सिपाही दिल्ली की ओर निकल जाते। परंतु उस समय नवाबगंज में सिरमौर नेताओं की कोई कमी नहीं थी। वहां श्रीमंत नाना
साहब थे, वहां श्री बाबा साहब, बाला साहब और राव साहब पेशवा थे। वहां तात्या टोपे थे। वहां अजीमुल्ला खान थे। इतनी
अलग-अलग शक्तियां सौभाग्य से एक स्थान पर होने पर सिपाहियों को नेताओं की खोज में दिल्ली की ओर जाने का कोई
कारण नहीं था।
1857 का स्वातंत्र्य समर – 185

विद्रोह की शुरूआत में ही सारी सेना दिल्ली में ही जमा हो जाए तो वास्तविक कार्यक्रम सिद्ध नहीं होना था। स्थान-स्थान
पर अंग्रेजी की खिंचाई करने में ही भला था। उसमें भी कानपुर, पंजाब, कलकत्ता और दिल्ली प्रांत के बीच की कड़ी होने से
उसपर आघात कर अंग्रेजी यातायात को तोड़ना अति आवश्यक था। ये सारी बातें सिपाहियों को उनके सूबेदारों एवं नाना के
मंत्रियों के समझाने पर कानपुर की ओर ही वापस लौटने की योजना सर्वसम्मति से बनी। उन तीन हजार सिपाहियों ने श्रीमंत
नाना साहब को अपना राजा चुना और उनके प्रत्यक्ष दर्शन की तीव्र इच्छा प्रदर्शित की। श्रीमंत नाना साहब को देखते ही
उनके नाम से सब ओर जयघोष होने लगा और उन सभी ने उस स्वयं वृणीत महाराजा के भक्तिभाव से मुजरे किए। श्रेष्ठ का
चयन होते ही नाना की सहमति से अपने लश्करी अधिकारी चुनने का काम शुरू हुआ।
लश्कर के सारे नए नियम प्रचारित किए गए। कानपुर के क्रांति केंद्र के प्राण सूबेदार टीका सिंह को उसके जनरल का पद
दिया गया। वैसे ही जमादार दलगंजन सिंह को 53वीं रेजिमेंट का कर्नल और सूबेदार गंगादीन को 56वीं रेजिमेंट का कर्नल
नियुक्त किया गया। फिर हाथी की पीठ पर एक बड़ा भारी स्वातंत्र्य ध्वज खड़ा कर उसका जंगी जुलूस निकाला गया और
उस दिन से श्रीमंत नाना साहब पेशवा का शासन आरंभ हो जाने की घोषणा कर दी गई।
परंतु यह चुनाव होते ही श्रीमंत नाना ने एक क्षण भी गंवाया नहीं और विप्लवी सिपाही दिल्ली की ओर न जाकर बीच में ही
रूक गए हैं, यह समाचार सुनते ही जनरल व्हीलर सहित सारे अंग्रेज लोग अपनी उस चारदीवारी के किले में जाकर और
तोपें तानकार बैठ गए। उनके पुरूष, महिला, बच्चे मिलकर संख्या कोई 1,000 थी। वह किला जीतना सबसे पहला कर्तव्य था,
अतः श्रीमंत नाना ने सारी सेना को उधर चलने का आदेश दिया। विप्लवी उनपर हमला करेंगे, यह विश्वास अंग्रेजों को न
था। परंतु 6 जून की भोर में एक चिट्ठी सर व्हीलर को मिली। वह चिट्ठी श्रीमंत नाना ने ही भेजी थी और वह ऐसी
थी- "हम जल्दी ही आक्रमण करने वाले हैं, आपको उसकी अग्रिम सूचना जानबूझकर भेजी है।" हम जल्दी ही आक्रमण करने
वाले हैं, आपको उसकी अग्रिम सूचना जानबूझकर भेजी है।" यह लड़ाई का आह्वान पाते ही सर व्हीलर ने सारे अधिकारियों
और सोल्जरों को सज्जित कर स्थान-स्थान पर नियुक्त किया। तोपों पर गोलंदाज बत्ती के साथ बैठ गए और लड़ाई की
यथासंभव तैयारी कर ली गई।
लड़ाई प्रारंभ करने से पहले श्रीमंत नाना ने अंग्रेजों को, किसी भी प्रकार की विशेष आवश्यकता न होते हुए भी, अग्रिम
लिखित सूचना दी थी। यह बात अति महत्त्व की है। अंग्रेज यदि नाना के स्थान पर होते तो इतनी उदारता उन्होंने निश्चित
ही न दिखाई होती। श्रीमंत नाना के नाम पर अमानुषता का दाग लगाना चाहनेवाले लोगों को उनके हृदय की यह सहज
वीरता देख लज्जा से सिर झुका लेना चाहिए। कानपुर विद्रोह के
1857 का स्वातंत्र्य समर - 186

प्रारंभ में अंग्रेज अधिकारियों को दिया जीवनदान और आक्रमण करने के बारह घंटे पूर्व दी गई लिखित सूचना-प्रारंभ की ये
दो बातें ही ध्यान में रखकर फिर अंतिम लड़ाई का अध्ययन किया जाए तो कानपुर की खरी स्थिति स्पष्ट हो जाती है।
अंग्रेजों को लड़ाई की सूचना भिजवाते ही सूबेदार टीका सिंह-अब जनरल टीका सिंह-बारूदखाने की ओर गए और वहां
सेवरा होने तक शस्त्रास्त्र की व्यवस्था देखी। वे उसे आक्रमण के स्थान पर भेजने में लगे रहे। उस शस्त्रागार से तोपें और
बारूद नदी और जमीन से अंग्रेजों की चारदीवारी तक ले जाया गया औरवहां लश्करी कौशल से उसकी रचना भी की गई।
इसी समय कानपुर शहर में दंगा हो गया था। बाजार का हर छोटा-बड़ा कारीगर-हम्माल से लेकर सेठ-महाजन तक-हाथ
में जो मिले उसे लेकर यूरोपियन लोगों को खोजते फिर रहे थे। कचहरी, कोर्ट और उसके अंदर के सारे अंग्रेजी नए-पुराने
दफ्तर जला दिए गए और चारदीवारी में जो यूरोपियन नहीं पहुंचे थे उन्हें एक साथ मार डाला गया। इस तरह दोपहर के
बारह बज गए। एक बजने तक अंग्रेजों की चारदीवारी को घेरा जाने लगा और शाम तक तोपों की गर्जना के साथ वह
भयानक युद्ध निश्चित से प्रारंभ हुआ।
अंग्रेजों के साथ आठ तोपें थीं और उन्होंने विपुल गोला-बारूद चारदीवारी के अंदर पहले से ही गाड़ रखा था। विद्रोहियों के
हाथ में पूरा बारूदखाना, शस्त्रागार और बड़ी-बड़ी तोपें लग जाने से उन्हें भी सामग्री की कोई कमी नहीं थी। जनरल टीका
सिंह ने पहले से तोपखाने की व्यवस्था अति उत्तम रखी थी। उनकी तोपों की भारी मार से अंग्रेजों की चारदीवारी के अंद के
भवन धड़ाधड़ गिर रहे थे। 7 जून को जब विद्रोहियों की ओर से लगातार गोले बरसने लगे तब उस भयंकर परिस्थिति का
कभी भी अनुभव न होने से महिलाएं और बच्चे जोर-जोर से आक्रोश करते यहां-वहां दौड़ने लगे। परंतु परिचय से मृत्यु की
उग्रता भी कम हो गई और जैसे पंछियों के इधर-उधर उड़ने से कुछ डर नहीं लगता वैसे ही तोप के लाल-लाल गोले सिर
के ऊपर तेजी से जाते देख अद्भुतता या भयानकता कुछ भी लगना बंद हो गया।
आक्रमण के दो दिन बाद ही अंग्रेजों को पानी की कमी पड़ने लगी। उस चारदीवारी के अंदर एक कुआं उपयोग में लाने
लायक था। पर विद्रोहियों की उस कुएं पर अंग्रेजी सोल्जर से अधिक आंख थी। धूप और गरमी की तपन भी इतनी प्रखर थी
कि सोल्जर खड़े-खड़े लू के कारण ही मर जाते। सबके हृदय पत्थर की तरह कड़े हो गए। स्त्री-पुरुषों के बीच का सर्व
भेदाभेद और जन लज्जा छूट गई। मरे हुओं को गाड़ने की बात तो छोड़ो, कौन मरा या कौन जीवित है, इसकी भी खबर
रखना कठिन हो गया; क्योंकि जीवित लोगों की सूची में नाम लिखते-लिखते उसे काटने की बारी आ जाती। ऐसे अवसर का
यथार्थ वर्णन करने का एक ही उपाय था और वह था एक घंटे की अवधि
1857 का स्वातंत्र्य समर - 187

का चित्र जैसा है बनाना-कैप्टन थॉमस स्वयं के अनुभव लिखता है-"आर्मस्ट्रांग घायल होकर गिरा, उसका हाल देखने
लेफ्टिनेंट प्रोल वहां गया। वह दो-चार संतोष की बात कहे इतने में सामने से आती बंदूक की गोली उसकी जांघ में लगी
और वह नीचे गिरा। उसका एक हाथ अपने कंधे पर रख और उसकी कमर में हाथ डालकर मैं उसे सर्जन के पास ले जाने
को उठाकर एक-दो कदम चला, इतने में गूं-गूं करती एक गोली मेरे कंधे में लगी और मैं और प्रोल दोनों भूमि पर
मरणासन्न होकर गिर गए। यह देखते ही गिलबर्ट बक्स हमारी ओर दौड़ा। परंतु उसके साथ ही दौड़ती आ रही शत्रु की एक
गोली उसक शरीर में घुसी और वह मृत्यु के मुंह में जा गिरा।" यह एक घंटे का इतिहास उन इक्कीस दिनों के इतिहास की
ठीक कल्पना दे सकता है। जनरल सर हो व्हीलर का लड़का घायल हो गया, इसलिए कमरे में उसकी खटिया के पास
उसकी दो बहनें और मां उसका उपचार कर रही थीं। परंतु औषधि पेट में जाने के पहले ही धड़ाम की ध्वनि के साथ आए
तोप के गोले ने उस लड़के का सिर उड़ा दिया। मजिस्ट्रेट हिलर्स्टन की पत्नी का डर से गर्भपात हो गया। उससे वह
बरामदे में खड़ा बातें कर ही रहा था कि तभी बीस पौंड का गोला उसके सिर पर पड़ा और उसकी चटनी बना गया।
दो-चार दिन बाद वही दीवार जिससे टिककर वह नूतन विधवा खड़ी थी, गिर जाने से वह भी उसके नीचे अपने पति की
देह जैसी चटनी हो मर गई। चारदीवारी के पास की खंदक में सात गोरी महिलाएं बैठी थीं। एक बम ऊपर से गिरा और
उसमें सातों मर गईं। इतना ही नहीं, जिसने विद्रोह के पहले सिपाही पर अकारण गोली चलाई थी और जो छूट गया था वह
गोरा सोल्जर भी मर गया। अर्थात् सिपाहियों की बंदूकें भी गलती से चल ही गईं। और जब चल गई तब ऐसी चलीं कि फिर
यावच्चंद्र दिवाकरौ, उनके वह भयानक आघात दारू के नशे में भी अंग्रेज लोग भूलेंगे नहीं!
इस भयंकर घेरे में अंग्रेजों से ईमानदारी बनाए रखना जिन्हें अपना कर्तव्य लगता था, ऐसे कितने ही नेटिव उस चारदीवारी के
केवल राजनिष्ठा से मृत्यु दाढ़ों में हाथ डाले खड़े थे। अंग्रेजों के एक बच्चे को दूध पिलाती एक नेटिव दाई के दोनों हाथ
गोले ने उड़ा दिए। अपने मालिक को गरमागरम खाना मिले, इसके लिए गोलियों की बरसात में भी नेटिव बटलर यहां से
वहां दौड़ते मरते जा रहे थे। अंग्रेजों को पानी पिलाते नेटिव भिश्ती अपने प्राण दांव पर लगाए थे। पानी इतना कम था कि
अच्छे चमड़ा ही चबाते रहते थे। हैजा, बीमारी और त्रिदोष ने भी अंग्रेजों से प्रतिशोध लेने में कमी नहीं की। सर जॉर्ज पार्कर,
कर्नल विलियम, लेफ्टिनेंट रूनी एक के बाद दूसरा सड़कर-सड़कर मर गए। जो बीमारी या गोली से नहीं मरे वे इस जीवित
श्मशान की भयानकता से गल गए। और इस अनर्थ से भी भयंकर अनर्थ करने के लिए अब अकाल का तांडव शुरू हुआ।
कहर ऐसा हुआ मानो सौ साल किए अन्याय का खरा प्रतिशोध कानपुर की चारदीवारी के अंदर
1857 का स्वातंत्र्य समर – 188

काल की दाढ़ बनकर सबको चबाता इक्कीस दिनों तक तांडव करता रहा।
अंग्रेजों की चारदीवारी के अंदर ऐसा कहर हो रहा था, तभी चारदीवारी के बाहर रखी गई उनकी तोपों ने अच्छी लड़ाई चला
रखी थी। तोपखाने के प्रमुख अधिकारी अंशे, कैप्टन थॉमसन आदि अंग्रेज बहादुरों ने साहस और पराक्रम की सीमा लाँघी।
लखनऊ या इलाहाबाद से जल्दी ही सहायता आएगी, ऐसी अंग्रेजों को बहुत आशा था। विद्रोहियों के मजबूत बंदोबस्त से
कहीं भी पत्राचार भेजा करना असंभव हो गया था। फिर भी एक-दो बार व्हीलर द्वारा पंछियों के पंखों में दबाकर भेजा फ्रेंच,
लैटिन एवं अंग्रेजी भाषा में लिखा एक पत्र नेटिव जासूस ने लखनऊ पहुंचाया था। उसमें ˙ ˙ 'सहायता, सहायता, सहायता!
सहायता भेजो नही तो मरते हैं। सहायता आ गई तो हम फिर से लखनऊ को मुक्त करेंगे, ऐसा लिखा था। पर विद्रोहियों की
व्यवस्था इतनी कड़ी थी कि अंग्रेजों की ओर से आया काला या गोरा दूत कदाचित् ही लौट पाता और कोई लौटा तो उसकी
नाक, कान कटा हुआ होता। विद्रोहियों के शिविर में गद्दारी कराने अंग्रेज लौटकर संदेश देने, कसम खाने के लिए कोई न
बचा। उदाहरणार्थ एक जासूस की स्वयं ही लिखी बात देखें-‘मिल्स शेफर्ड की पत्नी और कन्या जब मर गई तब उसने
विद्रोहियों का समाचार लाने और कानपुर में गद्दारी कराना स्वीकार किया। एक नेटिव रसोइए का वेश धारण कर बाहर
आया। कुछ दूर आया ही था कि उसे पकड़कर नाना साहब के सामने लाया गया। उससे अंग्रेजों की स्थिति के संबंध में
बहुत से प्रश्न पूछे गए। पहले से पढ़ाए अनुसार वह झूठे और बढ़ा-चढ़ाकर उत्तर देने लगा। परंतु उसी के पहले पकड़ी हुई
दो महिलाओं ने अंग्रेजों की वास्तविकता दुर्दशा का समाचार दिया है, यह देखते ही वह घबरा गया। पहले उसे कोठरी में
रखा गया फिर 12 जुलाई को न्यायालय में छानबीन करके तीन वर्ष के सश्रम कारावास का दंड दिया गया," इस दंड से
नाना साहब ने उस युद्ध के गर्जन-तर्जन में भी न्याय करने की कितनी दक्षता रखी थी-यह दिखता है। अंग्रेजों के जासूसों
की ऐसी फजीहत हो रही थी, पर विद्रोहियों के जासूस अपने काम बढ़िया कर रहे थे एक दिन एक नेटिव भिश्ती अंग्रेजी
चारदीवारी के पास के एक टीले पर खड़ा होकर चिल्लाया, "अपने मन में बसी हुई प्रीत के कारण मृत्यु के भय की भी परवाह
न करते हुए एक खुशी का समाचार देने आया हूं, गंगा पार साहब लोगों की एक सेना तोपों के साथ आई हुई है और वह
कल तुम्हारी मुक्ति के लिए आनेवाली है। इस कारण इन हरामखोर विद्रोहियों के शिविर में बड़ी घबराहट और आपाधापी मची
हुई है और हम जैसे सारे राजनिष्ठ लोग अंग्रेजों से मिलने को तैयार हैं।" यह सुनकर अंग्रेजों को लगा कि उनके द्वारा भेजे
गए दूत की विजय के कारण विद्रोहियों में फूट पड़ गई होगी और इसी समय लखनऊ से यूरोपियन भी आ गए होंगे। दूसरे
दिन वही भिश्ती
1857 का स्वातंत्र्य समर – 189

ऊपर आया और चिल्लाया, "साहब लोगों की जय! गंगा में आई बाढ के कारण यूरोपियन सेना को आने में देर हो गई थी,
परंतु अब सब ठीक-ठाक होकर वे निकल पड़े हैं। इस दिन के अंत तक साहब लोगों की जय-जयकार होगी।" वह दिन
गया, परंतु अंग्रेजों की दृष्टि में यूरोपियन सेना भी नहीं आई और वह राजनिष्ठ भिश्ती भी नहीं दिखा। अजीमुल्ला खान द्वारा
चाही संख्या में अंग्रेजी सेना की दुर्दशा कर देने के कारण फिर से अपनी जान खतरे में डालने की उस भिश्ती को कोई
आश्यकता नहीं थी। शत्रु की ओर के जासूसों द्वारा बार-बार किए जाते ऐसे छल के कारण अंग्रेज उदास हो जाते।
6 जून को आक्रमण की अग्रिम सूचना अंग्रेजों को देने के बाद उदास हो जाते। अपना शिविर उस युद्ध स्थल के बहुत पास
ही लगा लिया था। चारदीवारी के पास ही उनका तंबू खड़ा हुआ था और उसके पस ही जनरल टीका सिंह का तंबू भी तना
हुआ था। कानपुर स्वतंत्र हो जाने का समाचार सुनकर उस सारे प्रांत में सब ओर क्रांति की एक लहर उठ रही थी। रोज
नए-नए जमींदार और रियासतदार अपने-अपने आदमियों को लेकर नाना साहब के साथ होने लगे। मीर नवाब नामक
रियासतदार जिस दिन संयुक्त धर्मध्वज का जुलूस लेकर दो हजार सैनिकों के साथ नाना से आकर मिले, उस दिन नागरिकों
ने आनंद उत्सव मनाया। कानपुर के हलवाइयों ने उन स्वदेश-रक्षकों में मिठाई बांटी। श्रीमंत के झंडे तले लगभग चार हजार
सेना एकत्रित हो गई थी। परंतु उसमें से तोपखाने के अधिकारी अपना काम बहुत मुस्तैदी से पूरा कर रहे थे। इस तोपखाने
पर एक जगह एक हरा झंडा लहरा रहा था और वहां नन्हें नवाब अपने विशाल तंबू में दिन रात बैठे हुए थे। इस नवाब के
घर पर विद्रोह के प्रारंभ में जप्ती ले जाई गई थी। परंतु उसमें से तोपखाने के अधिकारी अपना काम बहुत मुस्तैदी से पूरा
कर रहे थे। इस तोपखाने पर एक जगह एक हरा झंडा लहरा रहा था और वहां नन्हें नवाब अपने विशाल तंबू में दिन-रात
बैठे हुए थे। इस नवाब के घर पर विद्रोह के प्रारंभ में जप्ती ले जाई गई थी। परंतु जल्दी ही बात सुलट गई और आज इस
धर्मरक्षक समर में इस नवाब को हर ओर से धन्यवाद दिए जा रहे हैं। उनके अधीन तोपखाने पर उस प्रांत के सारे वृद्ध पेंशनर
गोलंदाज इकट्ठा हो गए थे। अंग्रेजों की चारदीवारी के भवनों को आग लगाने के लिए विद्रोहियों के प्रयास चल रहे थे, तब
इस नवाब के अधीन लड़ रहे एक नौसिखिया गोलंदाज ने एक नया ज्वालाग्रही सम्मिश्रण खोज निकाला और उसका प्रयोग
इतना सफल रहा कि अंग्रेजों के बहुत काम की बैरकें तुरंत ही भस्म हो गई। इस तोपखाने की बैटरी पर स्वराज्य प्राप्त
करने के लिए इतनी प्रतियोगिता थी कि पुरुषों के साथ स्त्रियां और तरुणों के साथ वृद्ध लोग भी जुटे हुए थे। उस उदात्त
चैतन्य के अवसर पर लोक शक्तियां कितनी बेचैन थीं- यह उस समय के एक वाक्य से समझ में आ जाएगा। एक नेटिव
ईसाई कहता है-'मुसलमान क रूप धरकर एक ऊंचाई पर मैं बैठा था, तब देखा-लड़ते वीरों को पानी पहुंचाने के लिए
भाग-दौड़ कर रहे हैं। इतने में एक मेरे पास आया और बोला-उधर अपने देशबंधु लड़ रहे हैं। इतनें में एक मेरे पास आया
और बोला-उधर अपने देशबंधु लड़ रहे हैं और तेरे तरुण मुसलमान यहां मक्खियां मारते बैठे, यह लज्जाजनक है। चल उधर,
तोपखाने पर स्वयं सेवा करने।
1857 का स्वातंत्र्य समर - 190

उसने मुझे यह भी कहा कि करीम अली नाम के काने पेंशनर सूबेदार के युवा लड़के ने आज बड़ा पराक्रम किया। उसने
खोजकर अंग्रेजों के भवनों को आग लगा दी। उसके इस शौर्य के लिए उसे नब्बे रूपए और एक दुशाला इनाम दिया गया।‘‘
स्वदेश के लिए लड़ना छोड़ बैठकर मक्खियां मारना, यह केवल तरूणों के लिए ही अति लज्जाजनक माना जा रहा था, ऐसा
नहीं, क्योंकि कानपुर की महिलाओं ने अपना जनाना स्वरूप छोड़ समर भूमि में प्रवेश किया था। परंतु उन सारे युवा पुरूषों
और मर्दाना स्त्रियों को एक बिजली अपनी चमकार से लज्जित कर रही थी। यह बिजली और कोई नहीं-पीछे जिसका
परिचय दिया वह वेश्या अजीजन थी। उसने अपने माशूक वेश को लश्करी पेशे में ढाल लिया था। गाल पर लाली चढ़ी थी।
होंठों पर हास्य था और वह घोड़े पर सवार थी। वह सशस्त्र भी थी और तोपखाने के सिपाही उसकी मुद्रा की ओर देखकर
अपनी थकान भूल जाते। नानकचंद अपनी डायरी में लिखता है-‘‘सशस्त्र होकर अजीजन बिजली-सी दमक रही थी।
कभी-कभी थके और घायल सिपाहियों को वह मिठाई बांटती रास्ते में खड़ी रहती।‘‘
इधर ऐसी लड़ाई चल रही थी, उधर श्रीमंत नाना राज्य व्यवस्था की रचना करने में यथासंभव जुटे थे। राज्य क्रांति जैसे
अशाश्वत और अद्भूत अवसर पर व्यवस्था और अनुशासन बनाए रखना बहुत कठिन होते हुए भी नाना ने प्रथमतः शहर के
लोगों का यथान्याय संरक्षण देने के लिए राज्य व्यवस्था करना प्रारंभ किया। कानपुर शहर के प्रमुख नागरिकों को इकट्ठा
बुलाकर उनके बहुमत से चुने गए होला सिंह नामक व्यक्ति को मुख्य मजिस्ट्रेट के अधिकार दिए गए। होला सिंह
अनुशासनहीनता सिपाहियों के या लुटते ग्रामीणों के अत्याचारों से नागरिकों का संरक्षण करे, यह नाना का कड़ा आदेश था।
लश्कर को अन्न का संभरण करने का काम ‘मुल्ला’ नामक नागरिकों को सौंपा गया था।
नागरिक और सैनिक मुकदमों का न्याय करने के लिए स्थापित किए गए न्यायासन पर ज्वाला प्रसाद, अजीमुल्ला खान और
अन्य मंत्रिमंडल की नियुक्ति कर उसका अध्यक्ष श्री बाबा साहब को बना दिया गया। इस न्यायासन के सामने प्रस्तुत जो
थोड़े-बहुत कागज प्राप्त हुए हैं उनसे बिना कारण छल या अंधाधुंधी करनेवालों को कड़ा दंड देकर प्रजा में शांति करने के
लिए क्या व्यवस्था की जाती थी यह समझ में आता है। चोरी की-यह सिद्ध हो जाने पर उसका दाहिना हाथ काट डाला
गया। गाय का वध किए जाने पर एक मुसलमान कसाई को भी ऐसा ही कठोर दंड दिया गया। गांव में उठाईगिरी जैसे
मामूली अपराध करते घूमनेवाले को गधे पर बैठाकर घुमाया जाता। फ्रांस की राज्य क्रांति में स्थापित की गई ‘The
committee of public safety’ की तरह इस न्यायलय का अधिकार धीरे-धीरे सभी विभागों पर चलने लगा। बारूद की
कमी होने पर उसकी पूर्ति करना, सेना को कपड़े की रसद पहुंचाना। अंग्रेजों के पकड़े गए जासूसों की
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