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सर्वकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पृष्ठ 185, कुल 418 में से

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पृष्ठ 185

काल की दाढ़ बनकर सबको चबाता इक्कीस दिनों तक तांडव करता रहा।
अंग्रेजों की चारदीवारी के अंदर ऐसा कहर हो रहा था, तभी चारदीवारी के बाहर रखी गई उनकी तोपों ने अच्छी लड़ाई चला
रखी थी। तोपखाने के प्रमुख अधिकारी अंशे, कैप्टन थॉमसन आदि अंग्रेज बहादुरों ने साहस और पराक्रम की सीमा लाँघी।
लखनऊ या इलाहाबाद से जल्दी ही सहायता आएगी, ऐसी अंग्रेजों को बहुत आशा था। विद्रोहियों के मजबूत बंदोबस्त से
कहीं भी पत्राचार भेजा करना असंभव हो गया था। फिर भी एक-दो बार व्हीलर द्वारा पंछियों के पंखों में दबाकर भेजा फ्रेंच,
लैटिन एवं अंग्रेजी भाषा में लिखा एक पत्र नेटिव जासूस ने लखनऊ पहुंचाया था। उसमें ˙ ˙ 'सहायता, सहायता, सहायता!
सहायता भेजो नही तो मरते हैं। सहायता आ गई तो हम फिर से लखनऊ को मुक्त करेंगे, ऐसा लिखा था। पर विद्रोहियों की
व्यवस्था इतनी कड़ी थी कि अंग्रेजों की ओर से आया काला या गोरा दूत कदाचित् ही लौट पाता और कोई लौटा तो उसकी
नाक, कान कटा हुआ होता। विद्रोहियों के शिविर में गद्दारी कराने अंग्रेज लौटकर संदेश देने, कसम खाने के लिए कोई न
बचा। उदाहरणार्थ एक जासूस की स्वयं ही लिखी बात देखें-‘मिल्स शेफर्ड की पत्नी और कन्या जब मर गई तब उसने
विद्रोहियों का समाचार लाने और कानपुर में गद्दारी कराना स्वीकार किया। एक नेटिव रसोइए का वेश धारण कर बाहर
आया। कुछ दूर आया ही था कि उसे पकड़कर नाना साहब के सामने लाया गया। उससे अंग्रेजों की स्थिति के संबंध में
बहुत से प्रश्न पूछे गए। पहले से पढ़ाए अनुसार वह झूठे और बढ़ा-चढ़ाकर उत्तर देने लगा। परंतु उसी के पहले पकड़ी हुई
दो महिलाओं ने अंग्रेजों की वास्तविकता दुर्दशा का समाचार दिया है, यह देखते ही वह घबरा गया। पहले उसे कोठरी में
रखा गया फिर 12 जुलाई को न्यायालय में छानबीन करके तीन वर्ष के सश्रम कारावास का दंड दिया गया," इस दंड से
नाना साहब ने उस युद्ध के गर्जन-तर्जन में भी न्याय करने की कितनी दक्षता रखी थी-यह दिखता है। अंग्रेजों के जासूसों
की ऐसी फजीहत हो रही थी, पर विद्रोहियों के जासूस अपने काम बढ़िया कर रहे थे एक दिन एक नेटिव भिश्ती अंग्रेजी
चारदीवारी के पास के एक टीले पर खड़ा होकर चिल्लाया, "अपने मन में बसी हुई प्रीत के कारण मृत्यु के भय की भी परवाह
न करते हुए एक खुशी का समाचार देने आया हूं, गंगा पार साहब लोगों की एक सेना तोपों के साथ आई हुई है और वह
कल तुम्हारी मुक्ति के लिए आनेवाली है। इस कारण इन हरामखोर विद्रोहियों के शिविर में बड़ी घबराहट और आपाधापी मची
हुई है और हम जैसे सारे राजनिष्ठ लोग अंग्रेजों से मिलने को तैयार हैं।" यह सुनकर अंग्रेजों को लगा कि उनके द्वारा भेजे
गए दूत की विजय के कारण विद्रोहियों में फूट पड़ गई होगी और इसी समय लखनऊ से यूरोपियन भी आ गए होंगे। दूसरे
दिन वही भिश्ती
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