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१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

यूरोपियन सिपाही रखने की आवश्यकता सरकार को नहीं पड़ी। मेरठ का समाचार जब आया तब इस अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान
पर सिपाहियों की 6वीं रेजिमेंट और सिखों की फिरोजपुर रेजिमेंट की कोई दो सौ लोगों की टुकड़ी-इतनी ही सेना थी।
जल्दी ही अवध से घुड़सवार लाए गए और वह किला, उसकी प्रचुर शस्त्र सामग्री सहित उन नेटिव सिपाहियों के अधिकार में
ही दिया गया, इन सिपाहियों पर जो अंग्रेज अधिकारी थे उन्हें अपने सिपाही राजनिष्ठा की जीवित मूर्तियां लगते थे।
विशेषकर 6वीं रेजिमेंट ने तो राजनिष्ठा की हद कर दी थी, इसमें बिलकुल भी शंका नहीं। उन्होंने दिल्ली का समाचार मिलने
के बाद एक दिन सरकार को संदेश भेजा कि हमें उस अवसर की राह देख रहे हैं। इस अप्रतिम राजनिष्ठा की हर तरफ
तारीफ होने लगी। स्वयं गवर्नर जनरल की ओर से इस अद्वितीय ईमानदारी और राजनिष्ठा के लिए 6वीं रेजिमेंट अंदर से
पूरी-की-पूरी विद्रोही हो गई है। यह समाचार सुनते ही राजनिष्ठा का प्रदर्शन करने के लिए 6वीं रेजिमेंट ने दो क्रांतिदूतों को
पकड़कर अधिकारियों को सौंप दिया। अब शंका की बात ही कहां रही! परंतु सरकार को अभी भी हमारी राजनिष्ठा पर शंका
हो तो हमारे हृदय कितने निर्मल हैं-देखना चाहे तो अंग्रेज अधिकारी भी 6वीं रेजिमेंट में आएं-और देखें, कहां-कहां,
राजनिष्ठा का सागर लहरा रहा है। इतना ही नहीं अपितु अंग्रेज अधिकारियों के पास दौड़ते हुए पहुंचकर सिपाहियों ने
आलिंगन दिए और प्रेम का प्रदर्शन करते हुए उनके दोनों गाल चूमें।⁷⁷
˙˙ और उसी रात को 6वीं रेजिमेंट के सारे-के-सारे सिपाही 'मारो फिरंगी को' कहते हुए तलवार तान उठे!
क्रांति-योजना का बनारस की तरह समय पूर्व ही विध्वंस न हो और सिपाहियों को निःशस्त्र न किया जा सके, इसलिए
सिपाहियों के गुप्त प्रयास जब चल रहे थे, तभी अंग्रेजों ने अपने काफी कुछ परिवार किले में ले जाकर उनका संरक्षण करने
कुछ सिखों और घुड़सवारों के दल वहां तैनात कर दिए थे। बनारस का समाचार 5जून को इलाहाबाद आ धमका। उस दिन
शहर में ऐसी अपूर्व गड़बड़ी प्रारंभ हुई कि अंग्रेजों ने कुछ तोपें बनारस की ओर के पुल निशाना साधकर रख दीं और किले
के दरवाजे बंद कर लिये। रात के समय सिपाहियों ने जिन्हें कुछ समय पूर्व ही चूमा था, वे सारे अंग्रेज अधिकारी
नाचते-कूदते खाना खाने मैस में गए ही थे कि तभी कुछ दूरी पर संकटसूचक बिगुल बजने लगा। वह बिगुल शायद
राजनिष्ठ 6वीं रेजिमेंट के विद्रोही हो उठने का
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⁷⁷ 'नैरेटिव्स' में सर सी. कॉलिन ने लिखा है-"Sepoys hung themselves about the necks of their European officers and kissed
them on both cheeks."

भयानक समाचार बजा रहा था!
बनारस के पुल पर सुरक्षा के लिए रखी गई तोपें किले में पहुंचाने का आदेश उस दिन शाम को ही हो गया था। परंतु अंग्रेज
आदेश दें और सिपाही पालन करें, यह आज तक का राजनिष्ठ नियम उस शाम को एकाएक बदला-बदला दिखाई देने
लगा। क्योंकि सिपाहियों ने एक दूसरा आदेश जारी किया कि तोपें किले की ओर न ले जाकर कैंट की ओर ले जाई जाएं।
यह विचित्र ढंग देखकर उन उद्दंड सिपाहियों को दंड देने के लिए अवध के घुड़सवार बुलाए गए। ले. कर्नल अलेक्जेंडर
नामक युवा अंग्रेज अधिकारी अपने नेटिव घुड़सवारों को तैयार कर लेफ्टिनेंट हार्वड के साथ तुरंत उन सिपाहियों पर दौड़
पड़ा। इस समय चंद्र प्रकाश से दिशाएं प्रकाशित हो रही थी। घुड़सवार पलटन को उन उद्धत सिपाहियों पर हमला करने का
अंग्रेजी अधिकारियों ने आदेश दिया और अब अपने पीछे हजारों दौड़ते घोडे आकर मुट्ठी भर सिपाहियों को लतिया
डालेंगे, ऐसे विश्वास से अंग्रेज अधिकारी स्वयं आगे बढ़ टूट पड़े। पर आश्चर्य! पीछे सारे घुड़सवार अपने स्वदेश बंधुओं पर
शस्त्र उठाने से मना कर जहां-के-तहां खड़े रहे। यह देखते ही सिपाही जय-जयकार कर उठे। कर्नल अलेक्जेंडर सीने में
गोली लगने से नीचे गिरा। उसके शरीर के टुकड़े किए गए और वे सारे भारतीय सिपाही एक-दूसरे के गले लगते तोपों के
साथ कैंट की ओर चल दिए। इस समय पहले ही दौड़कर आए दो घुड़सवार ने कैंट पर यह समाचार अपने भाइयों को बता
भी दिया था। फिर क्या था, परेड मैदान पर जो घटना घटित हुई वह अभूतपूर्व ही थी। अंग्रेज अधिकारी के मुंह से आदेश
निकलता और उसे गोली लगती। प्लैकेट मरा, अडज्युटंट इन्नेस मरा। क्वार्टर मास्टर हावस मरा, पिंगले मरा, मैनरो मरा, बर्च
मरा, लेफ्टिनेंट इन्नेस मरा। परेड मैदान से वह क्रोधित सैन्य समूह अब आग लगाते इधर-उधर फैल गया था। मैस हाउस में
खाने-पीने के लिए बहुत अंग्रेज लोग आएं हैं, यह ज्ञात होते ही उस मैस हाउस पर हमला किया गया और वहां के सारे
अंग्रेज गिन-गिनकर काटे गए। पहले ही कहा था कि इलाहाबाद में मुख्य बात किला हथियाना थी। उस किले में अंग्रेज
महिला-बच्चे, भरपूर गोला-बारूद को पूरी तरह सिख सिपाहियों के हाथों सुरक्षा के लिए सौंपा गया था और ये सिख सिपाही
भारतीय लोगों की तरह ही विद्रोह करेंगे और किले में से फिरंगी भगाए जाने की खुशखबरी देनेवाली तोप जल्दी ही छूटेगी,
यह उत्सुकता सारे सिपाहियों को थी।
परंतु किले के सिखों ने सच्ची राजनिष्ठा दिखाई। उन्होंने किले से फिरंगी झंडा उखाड़ फेंकने से तो मना किया ही, साथ ही
किले के नेटिव सिपाहियों को निःशस्त्र करके बाहर भगा देने के लिए अंग्रेजी अधिकारियों की पूरी सहायता की। इस समय
सिख लोग अपनी तरफ किस तरह बने रहे, अंग्रेजों को इस बात का आश्चर्य अभी भी है।⁷⁸
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⁷⁸ स्वयं नील कहता है-”How the plan has not taken, by the Sikhs] is a wonder!”

एकाध घंटे में इलाहाबाद का यह विस्तृत किला क्रांतिकारियों के हाथ में पड़ जाता, पर सिखों ने वह आधा घंटा अपने स्वदेश
बंधुओं और अपनी मातृभूमि के शरीर को चूर-चूर करने में ही खर्च कर दिया। किले के अंदर स्थित भारतीय सिपाहियों ने
बार-बार प्रयास करने में ही खर्च कर दिया। किले के अंदर स्थित भारतीय सिपाहियों ने बार-बार प्रयास किया, पर उनका
साथ न देकर अंग्रेज अधिकारियों के आदेशों पर उन्हें निःशस्त्र कर सिख सिपाहियों ने किले के बाहर भगा दिया और इस
तरह किला अंग्रेजों के कब्जे में बना रहा।
परंतु उन चार सौ सिखों से ही वह इलाहाबाद शहर नहीं भरा था। सिपाहियों के विद्रोह का समय होते-न-होते इलाहाबाद
शहर विद्रोह कर उठा। इधर परेड की ओर भयानक गर्जनाएं हो रही थीं, तभी उसकी प्रतिध्वनि शहर के उस घनघोर कंठ से
निकलने लगी। पहले शहर की नाकेबंदी कर यूरोपियन घरों का सत्यानाश किया गया और फिर सिपाही और नागरिकों ने
इकट्ठे होकर कारागृह को खोल दिया। उस कारागृह के कैदियों के मन में अंग्रेजों के प्रति इतना द्वेष भरा हुआ था जितना
किसी के मन में नहीं होगा। कारागृह से छूटते ही कर्कश आवाज और चीत्कार करते पहले वे यूरोपियनों की बस्ती का ओर
दौड़े। विशेषकर तारयंत्र और रेलों पर क्रांतिकारियों का बड़ा गुस्सा था। रेल के दफ्तर, पटरी, तार, खंभे, इंजन सारा कुछ
क्रांतिकारियों के हाथ लग ही गए। वे एक-एक झटके में जो भी गोरा मिलता उसका सफाया कर देते। जो गोरे भी पिटने
लगे। विद्रोह करने को जो तैयार नहीं थे उन सबके घरों पर हमले हुए और जिन्होंने 'हम दिल्ली के बादशाह के प्रति
राजनिष्ठ रहेंगे और फिरंगियों से लड़ेंगे-ऐसी शपथ ली, केवल उन्हें ही प्राणदान मिला। 7 जून के प्रातः क्रांतिकारियों ने
इलाहाबाद का खजाना कब्जे में लिया। इस खजाने में कोई 30 लाख रूपए थे। फिर दोपहर के समय एक बड़ा सा हरा झंडा
ले जाकर शहर की मुख्य कोतवाली पर लगाया गया और उसे सारे नागरिकों ने सलाम किा। जिस दिन शहर और किला इस
विद्रोह की ज्वाला में सुलग रहा था उसी दिन सारा इलाहाबाद प्रांत मानों एक व्यक्ति-सा उठ खड़ा हुआ। इधर कहीं मानो
फिरंगियों का राज था ही नहीं, एसो लगने लगा। हर गांव ने हरा या जरी का झंडा फहराया और आसपास के गोरे
अधिकारियों को भगा दिया, अधिकतर को मार ही डाला जिससे वहां फिरंगियों की गुलामी जड़-मूल से उखाड़ फेंकने जैसी
स्थिति हो गई। अरे रे, सौ वर्ष तक जिसके जड़-मूल गहरे बैठाने के लिए प्रयास किए गए उस गुलामी की जड़ें इतनी
उथली होती हैं! वास्तव में केवल तलवार से जोती हुई भूमि में कुछ भी पैदा नहीं होता-यह सच है और उसमें गुलामी जैसा
नकली बीज तो कभी जमता नहीं। रे विश्व, तू अब भी यह पाठ सीख सकेगा क्या?
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इलाहाबाद प्रांत में अधिकतर तालुकेदार मुसलमान थे, पर उनकी प्रजा हिंदू थी। ऐसी दोनों परस्पर विरोधी जातियों में एकता
होगी और अपने विरूद्ध सामान्य जनता में विद्रोह जन्म लेगा, यह अंग्रेजों के लिए असंभव लगता था। परंतु जून के पहले
हफ्ते में ऐसी कितनी ही असंभवताएं संभव हो गई थी। इलाहाबाद का विद्रोह सुनने के लिए न रुकते हुए उस प्रांत के
सारे-के-सारे गांव एक ही समय में स्वतंत्र हो गए। मुसलमान और हिंदू-हमस ब स्वदेश माता के एक ही दूध से पोषित हैं,
दोनों इसी प्रतिक्रिया से विद्रोह कर उठे और वे सबके सब फिरंगियों के शासन पर प्रहार करने को तत्पर हो गए। नौकरी में
लगे मजबूत सिपाही ही नहीं, पेंशनभोगी बूढ़े सैनिक भी स्वयंसेवक हो गए। वे अपनी सफेद मूंछों पर ताव भरते तरूणों की
सेना तैयार करते और जो अति बुढ़ापे के कारण कुछ भी प्रत्यक्ष कृति करने में असमर्थ थे, अपने बिस्तर पर पड़े-पड़े लड़ाई
के दांव-घात समझाते और संकट की बातों पर सलाह देते।⁷⁹ पेंशनभोगी सिपाहियों को भी जिस उद्देश्य से बुढ़ापे में यौवन
की उमंग आने लगती है उस स्वराज्य और स्वधर्म की दिव्य चेतना की हवा अन्यत्र भी लोगों में भर गई थी, इसमें कोई शंका
नहीं। दुकानदार, मारवाड़ी, बनिया इनको भी उस लोक-क्षोभ से इतना साहस भर गया था कि उनके द्वेष के संबंध में जनरल
नील ने अपनी रिपोर्ट में विशेष रूप से उल्लेख किया है-‘‘अनेक प्रमुख व्यापारियों एवं अन्य लोगों ने भी हमारे प्रति प्रचंड
द्वेष-भावना अभिव्यक्त की। इतना ही नहीं, उनमें से अनेक ने तो हमारे विरूद्ध सक्रिय युद्ध में भी भाग लिया।‘‘
(नील का द्वितीय पत्र)
पर इतना हो जाने के बाद भी किसान हमारी ओर होंगे, यह बात अंग्रेज बड़ी बड़ाई से कर रहे थे। परंतु इलाहाबाद ने यह
भ्रम भी तोड़कर उसकी ठिकारियों बना दी। हिंदुस्थान में आज तक किसी भी आंदोलन में इतनी अगुवाई किसानों ने नहीं की
जितनी इस सन् 1857 क्रांति-युद्ध में की। अपने पुराने लालुकेदारों (अंग्रेज द्वारा नियुक्त नहीं) के झंडों के नीचे अपने हाथों के
हल जहां-के-तहां फेंककर ये किसान हवा की भांति स्वतंत्रता युद्ध के लिए दौड़ पड़े। उन्होंने कंपनी से अपना आड़ा-टेढ़ा
परंतु स्वराज्य अधिक अच्छा है, यह पक्की तरह से दिख गया थां इसलिए उन्होंने नियत समय पर आज तक के अपमान का
भयानक प्रतिशोध लेना प्रारंभ किया। जहां-तहां स्वराज्य की जय-जयकार होती, गुलामी के मुंह पर गली-कूंचों में बच्चे भी
थूकने लगे। सचमुच
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⁷⁹ ‘‘कल तक जो सिपाही हमारे हाथ सहलाते थे, वे ही आज उन पेंशन प्राप्त वृद्धों के साथ, जो रणभूमि में जाने के सर्वथा अयोग्य थे, अन्य लोगों को
कायरता और क्रूरता के कार्य करने में नितांत तत्परता सहित बढ़ावा दे रहे थे। ’’
-के कृत-‘इंडियन म्यूटिनी’, खंड 2, पृष्ठ 193 तथा रेड पैंफलेट भी देखें

लड़कों ने थूका। क्योंकि बारह-चौदह वर्ष के बच्चों ने स्वराज्य के हरे जरीदार झंडे लगाए और ताशे बजाते हुए उन झंडों को
उठाए उन्होंने जुलूस भी निकाले। ऐसे ही एक जुलूस को पकड़कर अंग्रेजों ने उसमें सम्मिलित तरुणों को फांसी पर
लटकाया। यह दंड दिए जाने पर एक अंग्रेज अधिकारी भी इतना लज्जित हुआ कि वह अश्रुपूरित नेत्र लेकर मुख्य कमांडर से
उन बच्चों को छोड़ देने का निवेदन करने लगा। परंतु उसका कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ा और स्वतंत्रता के झंडे को लेकर
चलनेवाले उन तरूण लड़कों को दिन-दहाड़े फांसी दी गई। इन तरूण देवदूतों पर किया गया जुल्म उन जालिमों के सिर
पर आघात करने से कैसे चूक सकता है? सारी सृष्टि भूकंप-जैसी डोलने लगी। किसान और तालुकेदार, हिंदू और मुसलमान,
वृद्ध और तरूण, पुरुष और महिला-सारे-के-सारे राजनीतिक दास्य का उच्छेद करने के लिए 'हर-हर' कर उठा। “केवल
गंगा पार के लोग ही नहीं अपितु गंगा और यमुना के मध्य में स्थित भूखंड की जनता भी उठा, किसान भी सन्नद्ध हुए और
दोनों धर्मों का एक भी अनुयायी ऐसा नहीं रह गया जो हम (अंग्रेजों) पर प्रहार करने के लिए बेचैन न हो उठा हो।” ⁸⁰ इस
बहुजन समाज के प्रचंड प्रयासों को सफलता मिले और श्रीमती भारतभूमि स्वराज्य-संपन्न हो जाए-इसके लिए प्रयाग के पंडे
और मुल्ला अपना पवित्र आशीर्वाद उस क्रांति के माथे पर बरसाने लगे।
हिंदुस्थान के इतिहास में इतनी उत्क्षोभक, विद्युत वेगी, भयानक एवं सर्वत्र व्याप्त राज्य क्रांति दूसरी दिखना बहुत कठिन है।
लोक-शक्तियां जिसमें भड़भड़ाकर जाग उठीं और अपने देश की स्वतंत्रता के लिए एकाएक गर्जना करते मेघों की तरह रक्त
की मूसलधार वर्षा करने लगीं। यह सन् 1857 जैसी प्रचंड राज्य क्रांति हिंदुस्थान के इतिहास में अभूतपूर्व बात थी। उसमें भी
हिंदू और मुसलमान अपने भाई-भाई होने का रिश्ता पहचानकर हिंदुस्थान के लिए इकट्ठा होकर लड़ने लगे, यह दृश्य बहुत
ही अपूर्व एवं आश्चर्यकारी था। यह अपरिचित प्रचंड तूफान उत्पन्न करने के बाद उसपर नियंत्रण रख पाने में हिंदुस्थान धोखा
खा गया, इसमें कौन सा आश्चर्य! आश्चर्य है तो यह कि जिसपर कोई दोषारोपण न किया जा सके, ऐसा तूफान हिंदुस्थान ने
निर्मित किया! क्योंकि राज्य क्रांति पर नियंत्रण रखना तो किसी भी राष्ट्र के लिए संभव नहीं हुआ। अधिक क्या कहें, यदि
फ्रेंच राज्य क्रांति से तुलना कर देखें तो अत्याचार, अंधाधुंधी, आपाधापी, अव्यवस्था, अंधस्वार्थता, लूटपाट आदि क्रांति जैसे
अनिवार्य प्रलय में अनिवार्य तथा घटित हुई-ऐसा दिखता है। हिंद-भू का वह पहला प्रयत्न नहीं, प्रयोग था और इसीलिए उस
प्रयोग में जहां इलाहाबाद में इतनी विजय प्राप्त हुई वहीं त्रुटियां, धोखे या अंधाधुंधी भी हुई। इसमें आश्चर्य का कोई कारण
नहीं है। जमींदारों के आनुवंशिक झगड़े, गुलामी के कारण प्राप्त दरिद्रता आदि और शताब्दियों पुराने हिंदू-मुसलमानों का
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⁸⁰ के कृत-‘इंडियन म्यूटिनी’, खंड 2, पृष्ठ 195।

वैर एकाएक नामशेष करने के प्रयास में स्वाभाविक रूप से एकाएक उठी भ्रांतियों के कारण विद्रोह के पहले झटके में ही
इधर-उधर अनियंत्रण आरंभ न होना बहुत कठिन था। सृष्टि के पहले प्रलय होना चाहिए। उसे रोक पाना ईश्वर के लिए भी
असंभव था। जिन्हें राज्य क्रांतियां चाहिए उन्हें ऐसे संकट रास्ते में मिलेंगे ही।
पर लूटपाट और आगजनी का पहला हफ्ता गुजर जाने के बाद अंधाधुंधी के सारे संकट दूर हो इलाहाबाद में क्रांति होती हैं
वहां-वहां क्रांति क्षण के बाद पहली समस्या नेता की होती है। परंतु यह बाधा इलाहाबाद में जल्द ही टल गई; क्योंकि मौलवी
लियाकत अली नामक एक कट्टर स्वतंत्रता-भक्त जल्दी ही उस क्रांति का नेता बन गया। इस पुरूष की जो संक्षिप्त
जानकारी मिलती है वह यह कि यह जुलाहों का प्रमुख धर्मगुरू था। क्रांति के पहले उसने विद्यालयों में अध्यापन कार्य किया
था। इसकी धर्मशील पवित्रता से इसपर लोगों की श्रद्धा हो गई थी। विद्रोह के बाद जनता द्वारा इलाहाबाद स्वतंत्र करते ही
कुछ दिनों में चौबीस परगना के जमींदारों ने इस मौलवी को इलाहाबाद में लाकर प्रांत का मुख्य अधिकारी नियुक्त किया और
बड़े समारोह के साथ दिल्ली के बादशाह के प्रतिनिधि के रूप में उसे नाम की डाँड़ी पीट दी गई। इस मौलवी ने अपना
मुख्यालय खुसरो बाग में बनाया। इस बाग के चारों ओर एक मजबूत दीवार थी। फिर उसने सारे प्रांत के विद्रोहियों को
संगठित करना प्रारंभ किया। उसने जल्दी ही सारे सरकारी काम और षड्यंत्र व्यवस्था से प्रारंभ करवाएं। “मैं दिल्ली के
बादशाह का सूबेदार हूं", केवल वह कहता ही नहीं रहा, ऐसा इलाहाबाद के सारे समाचार और घटनाओं की सरकारी रिपोर्ट
अंत तक दिल्ली के बादशाह को भेजता भी रहा।
मौलवी लियाकत अली को इलाहाबाद का किला अपने अधीन करने का काम सबसे पहले करना था। उसके अधीन जो सेना
इकट्ठी हो गई थी उसे किले पर हमला करने के लिए सज्जित करने के प्रयास और प्रबंध उसने चालू किए थें उसी समय
जनरल नील के बनारस से इलाहाबाद की ओर घूम जाने का सामचार आ पहुंचा। यदि उन चार सौ सिखों को सुबुद्धि आई
होती तो तोपें, शस्त्र, गोला-बारूद सहित वह प्रचंड किला एक भी गोली चलाए बिना विद्रोहियों के हाथ पड़ जाता। जनरल
नील के हृदय में वह बात लगातार चुभ रही थी, इसलिए उसने रात को दिन बनाते हुए सेना के साथ इलाहाबाद की ओर
कूच किया। 11 जून को नील इलाहाबाद आया। उसके अपने तक किला और उसमें रह रहे अंग्रेजों का सिख लोग संरक्षण
करेंगे, इसकी नील को बिल्कुल आशा न थी, अतः जब उसने किले पर अंग्रेजी झंडा फहराते देखा तो उसे बहुत प्रसन्नता
हुई। उसने अपने साथ की यूरोपियन सेना को तत्काल किले की सुरक्षा के लिए लगाकर उन राजनिष्ठ सिखों को किले के
बाहर निकाल लड़ाई के काम में लगा दिया। नील का
1857 का स्वातंत्र्य समर – 170

यद्यपि सिखों पर बिलकुल विश्वास नहीं था, फिर भी सिखों को उसपर पूरा विश्वास था। क्योंकि उन्होंने उस अपमान के बाद
भी विद्रोहियों से मिलने से मना किया और नील के साथ पास-पड़ोस के गांवो को बेचिराग करने के लिए वे तत्काल तैयार
हो गए। 17 जून को अंग्रेजी सेना शहर में घुसने लगी। उस समय की घटनाओं के संबंध में अपने बादशाह को भेजी रिपोर्ट
में मौलवी कहता है-‘‘जो देशद्रोही, पापी उन फिरंगियों से मिल गए हैं उनमें से कुछ ने शहर में ऐसी गप उड़ा दी है कि
सारा शहर अंग्रेज लोग तोपों से उड़ाने वाले हैं और ये सबको सच लगे, इसके लिए उन्होंने ऐसी घोषणा कर दी है कि हम
अपने घर छोड़कर जान बचाने भाग रहे हैं। इस कारण सारा शहर डरकर मेरे सुरक्षा आश्वासन पर ध्यान न देते हुए वीरान
हो रहा है।’’ मौलवी की यह अभागी रिपोर्ट तैयार होकर दिल्ली की ओर चली ही थी कि खुसरो बाग पर अंग्रेजों का आक्रमण
होने लगा। उस दिन का आक्रमण विद्रोहियों ने नाकाम कर दिया। परंतु किला उनके पास होने से एक खंडहर बाग में
बैठकर इलाहाबाद संभाले रहना शुद्ध पागलपन ही था, यह जानकर मौलवी अपने अनुयायियों के साथ 17 जून की रात को
कानपुर की ओर निकल गया। दिनांक 18 जून को अंग्रेजों ने इलाहाबाद शहर में अपने सिख राजनिष्ठों के साथ प्रवेश किया।
बनारस की तरह ही इलाहाबाद फिर से अंग्रेजों के हाथ लग गया। परंतु इससे विद्रोहियों का धीरज तिल भर भी कम नहीं
हुआ। मुख्य किले में अंग्रेज सुरक्षित हैं, यह देखकर उस प्रांत के कट्टर लोगों को अधिक ही जोश चढ़ने लगा और हर गांव
अपनी-अपनी गढ़ी को किला बना उसे लड़ाने की तैयारी में लग गया। ऐसे कृत निश्चयी लोगों को घूस देकर फांसने के
दिन नहीं रहे थे। वह युद्ध सिद्धांत के लिए लड़ा जा रहा था। इसलिए छोटे-छोटे नेता पकड़कर लाने के लिए नील ने
हजारों रुपए के पुरस्कार घोषित किए, फिर भी कंगाल किसान तक वह काम करने को तैयार नहीं थे। लोगों की इन अपूर्व
निष्ठा के लिए उस समय के अंग्रेज अधिकारियों ने अपने पत्रों में भी बड़ा आश्चर्य व्यक्त किया है। एक गांव के संबंध में एक
अधिकारी लिखता है-‘‘मजिस्ट्रेट ने किसानों में सुपरिचित एक क्रांतिकारी नेता का सिर काटकर उपस्थित करने पर एक
हजार रूपए का पुरस्कार देने की घोषणा की। किंतु हम (गोरों) से भारतवासियों को इतना अधिक द्वेष था कि एक भी व्यक्ति
ने उसे बंदी बनाने के लिए आगे आने तक की चेष्टा नहीं की।’’—चार्ल्स बाल, खंड 1। नेता पकड़कर देना ही नहीं, पैसा
लेकर अंग्रेजों को माल बेचना तक बहुत बड़ा पाप माना जाता था। यदि किसी ने यह अपराध किया तो उसे समाज की ओर
से भयानक दंड तत्काल दिया जाता। ‘‘कोई भी ऐसा व्यक्ति जो यूरोपियन के लिए कुछ भी करता था, उसे ये हत्यारे मार ही
डालते थे।˙ ˙ ˙ एक निर्धन पाव रोटीवाले ने हमारे लिए पाव रोटी भेज दी थी तो बाद में देखा गया कि उसके दोनों हाथ ही
काट
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लिये गए हैं और नाक भी साफ कर दी गई है।“ ऐसा 23 जून की यह उपर्युक्त रिपोर्ट कहती है। ऐसे राष्ट्रीय और शास्त्रीय
बहिष्कार के कारण अंग्रेजों की कठिनाइयों की सीमा नहीं रही। इलाहाबाद का किला तो ले लिया। परंतु वहां से आगे-पीछे
कदम बढ़ाना अंग्रेजों को असंभव हो गया। उन्हें बैला नहीं मिलते, उन्हें गाड़ियां नहीं मिलती, उन्हें दवाइयां भी नहीं मिल रही
थीं। बीमार सोल्जरों को डोलियां नहीं मिलती-डोली उठानेवाले कहार नहीं मिलते थे। इस कारण जगह-जगह पड़े बीमार
लोगों की कर्कश कराहें इतनी भयानक होती कि उन्हें सुनकर ही अंग्रेज महिलाएं चटपट मरने लगीं। वे दिन धूप के थे और
जून माह में विद्रोह करके हम अंग्रेजों को अपने देश के सूर्यताप से मार डालेंगे, विद्रोहियों का यह जो दांव था, उसका
अनुभव होने लगा। सिर पर गीला कपड़ा बार-बार रखने में ही सारे अंग्रेज निमग्न थे। उस पर अन्न न मिलना। अनाज का
एक दाना भी कोई अंग्रेजों को बेचने के लिए तैयार नहीं था-“ आज तक हमें नितांत ही अल्प भोजन पर अपने दिन गुजारने
पड़े हैं। वस्तुतः कल मुझे अपने नाश्ते में जितना भोजन मिला था उससे तो एक श्वान का भी अपना पेट नहीं भर पाता।”
ऐसा इलाहाबाद का एक अंग्रेज अधिकारी लिखता है। अपने कुत्ते को भी जो खाना मैंने न खिलाया होता, वह खाना कलम"
स्वयं खा रहा था। गरमी और भुखमरी से अंग्रेजों में हैजा शुरू हो गया और उसमें भी अंग्रेज सोल्जरों ने दारू पीकर धुत्त पड़े
रहने का सिलसिला चालू रखा। सारा अनुशासन बिगड़ गया। नील के आदेश को भी वे शराबी ऐसे ठुकरा देते कि अब मैंने
उनमें से एक-दो को फांसी देने का निश्चय किया है, ऐसा उसने केनिंग को सूचित किया। इन अनंत संकटों से घिरी अंग्रेजी
सेना जहां-की-तहां बंधी रह गई। कानपुर से तुरंत सहायता भेजने के संदेश-पर-संदेश आते रहे, फिर भी जनरल नील जैसे
साहसी योद्धा को इलाहाबाद में जुलाई की पहली तारीख देखनी पड़ी।
जनरल नील और उसकी फ्युजिलियर सेना मद्रास की ओर से आई हुई थी-यह बात महत्त्वपूर्ण है। यदि इस समय मद्रास की
ओर विद्रोह की गप भी उड़ जाती तो अंग्रेजों को उसका तनाव सहना एक दिन भी असंभव हो जाता। परंतु इलाहाबाद के
कृतनिश्चयी हिंदुस्थानी लोगों ने यद्यपि अंग्रेजी योद्धाओं को मानो कमरे में बंद करके मार डालने का इतना सफल प्रयास
किया था, फिर भी अंग्रेजों को उससे डरने की वास्तविक आवश्यकता नहीं थी; क्योंकि मद्रास, बंबई, राजपुताना, पंजाब, नेपाल
आदि सारा हिंदुस्थान अभी तक मृत-सा निश्चल पड़ा था, जब उसमें से कुछ भाग चैतन्य हुआ तो वह पिशाच बनकर
विद्रोहियों पर ही टूट पड़ा। इलाहाबाद और बनारस में अंग्रेजों के साथ हजारों सिख सिपाही थे ही। फिर क्यों घबड़ाया जाए!
दूसरे कुछ भी करें, पर इलाहाबाद के पंडों और मुल्लाओं ने, तालूकदार और किसानों ने, छात्रों और शिक्षकों ने दुकानदारों
और ग्राहकों ने अनंत बाधाएं सामने खड़ी होते हुए भी सबको एक छाने के
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नीचे ला सके, ऐसा कोई करामती नेता न होते हुए भी और पराजय से लोगों में हताशा और अंधाधुंधी मची होते हुए भी,
गुलामी के प्रति जो दीर्घ द्वेष प्रदर्शित किया और स्वराज्य एवं स्वतंत्रता के उच्च ध्येय के लिए जो स्वार्थ-त्याग किया इससे
उन सब देशभक्तों के लिए इतिहास हमेशा-हमेशा गौरव गान ही करेगा।
क्योंकि उन सब देशभक्तों को अंग्रेजी दासता के विरूद्ध उठ खड़े होने के लिए बहुत भारी मूल्य चुकाना पड़ा था।⁸¹ बनारस
और इलाहाबाद प्रांत में जनरल नील ने जो क्रूर व्यवहार किया उसका जंगली इतिहास में भी कोई सही उदाहरण मिलना
कठिन है। यह मैं आलंकारिक भाषा में नहीं लिख रहा, अंग्रेजों के ही वर्णन पढ़कर मेरी आत्मा यह कहती है। नील ने वृद्धों
को जलाया, नील ने अर्भकों को जलाया, नील ने पलने में सो रहे मुन्ने को उसके पालने में और गोद में दूध पीते मुन्ने को
उसकी मां की गोद में ही भून डाला। सैकड़ों स्त्रियों को, कुमारियों को, माताओं और पुत्रियों को-जिनकी संख्या भी न गिनी
जा सके-जिंदा जला दिया। परमेश्वर और मनुष्य जाति के सामने मैं यह कथन कर रहा हूं। इसमें का एक अक्षर भी मिटाने
की किसी में हिम्मत है तो वह सामने आकर
1857 का स्वातंत्र्य समर – 173
⁸¹ एक ब्रिटिश अधिकारी ने अपने प्रयाग के क्रियाकलापों के संबंध में यह विवरण प्रस्तुत किया था-‘हां, यह प्रवास तो मुझे बहुत ही रूचिकर प्रतीत
हुआ। जब सिख सैनिकों के साथ फ्युजिलियर्स सिपह्री नगर पर आक्रमण करने गए तो हम अपनी बंदूकों सहित जहाजों पर सवार हुए। जहाज चल
रहा था और हम अपने दाएं-बाएं तटों पर गोलियों की बौछार करते आगे बढ़ रहे थे। जब हम एक खराब स्थान पर आए तो गोली वर्षा करते हुए ही
तट पर उतर पड़े। मेरी दुनाली बंदूक से बरसती गोलियों का आहार अनेक 'काले' लोग बन रहे थे। मैं प्रतिशोध लेने की भावना से उन्मादग्रस्त-सा हो
गया था। दाएं-बाएं और आसपास के स्थलों पर जब हमने अग्नि वर्षा की तो पवन के प्रवाह से भड़की अग्नि ज्वालाओं ने आकाश तक अपनी सैकड़ों
जिह्वाएं फैला दीं। अब राजद्रोही दुष्टों से पूरा-पूरा प्रतिकार लिया जा रहा था। यह देखकर हम हर्ष और आनंद से सुधबुध भी खो बैठे। प्रतिदिन
विद्रोहियों के ग्रामों को अग्नि की भेंट चढ़ाने के लिए हमारी टोलियां निकलती थीं और हम पूर्णतः प्रतिशोध ले रहे थे। मक्कारों ने सरकार और
अफसरों के साथ अपराधपूर्ण व्यवहार किया था, उनकी जांच हेतु जिस समिति का गठन किया गया था, मैं उसका अध्यक्ष था। प्रतिदिन ही हम
आठ-दस व्यक्तियों को तो निश्चित रूप से ही फंसाते थे। अब इन लोगों के प्राण हमारे चुंगल में थे। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि हमने किसी
के भी प्रति तनिक सी भी उदारता का प्रदर्शन नहीं किया। पैरवी की प्रक्रिया तो बड़ी ही सामान्य सी थी। दंडित अपराधी को अपने गले में फंदा
डालकर, एक गाड़ी पर चढ़ाकर वृक्ष से बांध दिया जाता था। गाड़ी को आगे बढ़ाया कि उसकी देह वृक्ष से झूल गई।"-चार्ल्स बाल कृत-'इंडियन
म्यूटिनी, खंड 1, पृष्ठ 257 और ऐसा कितने दिन तक चलता रहा-"तीन मास तक आठ शव ढोनेवाली गाड़ियां सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक उन शवों
को एकत्रित करने के लिए चक्कर लगाती थीं, जो राजमार्गों और बाजारों में लटकाए जाते थे। इस प्रकार लगभग छह हजार व्यक्तियों को सामान्य
सुनवाई के उपरांत प्राणदंड देकर उन्हें चिर निद्रा में सुलाया गया था।" -के कृत-'इंडियन म्यूटिनी खंड 2, पृष्ठ 203

एक क्षण के लिए तो खड़ा रहे। इन सबका अपराध क्या था? तो वह अपने देश की स्वतंत्रता के लिए सारे कष्ट भोगने को
तैयार हो गए थे। फिर भी, अभी कानपुर का कत्लेआम नहीं हुआ था। कानपुर के कत्लेआम के प्रतिशोध में नील ने यह
कत्लेआम नहीं किया था, उलटे नील के कत्लों के प्रतिशोध में कानपुर का कत्लेआम हुआ था।
सन् 1857 में सारे हिंदुस्थान में जितने अंग्रेज पुरुष, महिला और बच्चे कत्ल नहीं हुए उतने अकेले नील ने केवल इलाहाबाद
में किए थे। ऐसे सैकड़ों नील हजारों गांवों में उस वर्ष नेटिवों को सरेआम कत्ल कर रहे थे। अंग्रेजों के एक-एक आदमी के
लिए हिंदुस्थान का एक-एक गांव जीवित जलाया गया है।
इसके लिए अंग्रेज इतिहासकार क्या कह रहे हैं? वे पहले तो यह घटना पूरी तरह छोड़ देते हैं और वह भी कह-सुनकर
यदि थोड़ी-बहुत बातें लिखीं तो उससे नील कितना साहसी, कट्टर और बहादुर था, यह सिद्ध करते हैं। ऐसी प्रासंगिक
क्रूरता से व्यक्त होता है, ऐसा कुछ लोगों को कहना है। मानव जाति के लिए नील के हृदय में कितनी ममता भरी हुई थी,
इस मानवी कल्याण के लिए सके द्वारा दिखाई गई क्रूरता से व्यक्त होता है, ऐसा कुछ लोगों का कहना है। पार्लियामेंट की
रिपोर्ट में भी यह कहा गया है। अंग्रेजों के इस प्रतिशोध के कारण ही कानपुर का कत्लेआम हुआ, यह आशंका 'के' व्यक्त
करता है। पर वह कहता है, नेटिवों की उद्धतता के कारण ब्रिटिशों का सिंह रूप प्रकट होना स्वाभाविक ही था। इस क्रूरता
के लिए नील क विरूद्ध 'के' ने एक अक्षर भी नहीं लिखा है, उलटे इस महत्त्वपूर्ण प्रश्न पर चर्चा करने का साहस न करते
हुए वह उसे ईश्वर को सौंप देता है। परंतु नाना के संबंध में लिखते समय उसकी लेखनी अश्लीलता को भी लज्जित करती
है। चार्ल्स बाल नील की अपरिमित स्तुति करता है। स्वयं नील कहता है-"परमात्मा साक्षी है कि मैंने कुछ अधिक क्रूरता
प्रदर्शित की है; किंतु इन संपूर्ण परिस्थितियों पर सामूहिक दृष्टि से विचार करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि यह सभी कुछ
क्षम्य है। मैंने जो कुछ भी किया, अपने देश के लिए, उसके कल्याण के लिए किया है। मैंने यह कार्य अपनी साम्राज्य सत्ता
का आतंक बैठाने तथा उसे पुनः स्थिरता प्रदान करने के लिए किया है।" "स्वदेश के लिए मैं यह अघोर अत्याचार कर रहा
हूं, इसलिए परमेश्वर मुझे क्षमा करें", जनरल नील का उपर्युक्त वाक्य देकर जो अंग्रेज इतिहासकार उसकी स्तुति करते हैं वे
ही श्रीमंत नाना के और सिपाहियों के जोश को नरकगामी कहते हैं। इंग्लैंड के स्वदेशाभिमान की व्याख्या भी विचित्र है!
होम नामक इतिहासकार कहता है-"बूढ़े लोगों को और गोद में दूध पीते अर्भकों को लिये बेसहारा महिलाओं को भी इस
भयानक प्रतिशोध में बलि चढ़ाया गया,
1857 का स्वातंत्र्य समर - 174

पर वह सुख के लिए नहीं-यह पवित्र कर्तव्य था, इसलिए किया गया, जनरल नील के सम्मान में यहां यह कहना होगा।''⁸²
उपर्युक्त उद्धरण में निष्पक्ष इतिहास और सच्चे परमेश्वर को (नील के परमेश्वर को नहीं) यदि किसी के द्वारा की गई आम
हत्याएं किसी को यथार्थ और न्यायपूर्ण लगती हों तो वह अंग्रेजों द्वारा की गई हत्याएं न होकर विप्लवकारियों द्वार की गई
हत्याएं हैं। स्वतंत्रता के लिए की गई हत्याएं क्षम्य हैं या नहीं, इस प्रश्न का निर्णय परमेश्वर पर छोड़ दें-परमेश्वर मुझे क्षमा
करे। क्योंकि मैं जो कर रहा हूं वह अपने देश का प्राकृतिक स्वराज्य प्राप्त करने के लिए है-यह वाक्य नील की अपेक्षा नाना
साहब के मुंह से अधिक शोभा देता। स्वदेश के लिए विप्लवी लड़ रहे थे, अंग्रेज नहीं। इसीलिए क्रूर हत्याएं करते हुए यदि
कोई पवित्र कर्तव्य कर रहा था तो वह स्वधर्म और स्वराज्य इस महान् उपलब्धि के लिए झगड़नेवाले और सौ वर्ष के
अत्याचारों से पीड़ित मातृभूमि का प्रतिशोध लेने का तत्पर क्षुब्ध देशवासी ही थे।
परंतु अब इस तत्त्वज्ञान का उपयोग ही क्या? नील ने इलाहाबाद में भयानक क्रूरता के जो बीज बोए उसकी फसल उधर
कानपुर के खेतों में लहलहा उठी है। ऐसे समय में उस फसल की कटाई के लिए जल्दी से कानपुर की ओर जाना ही उचित
है।
1857 का स्वातंत्र्य समर – 175
⁸² "वृद्ध व्यक्तियों ने तो हमें कोई हानि नहीं पहुंचाई थी। असहाय अबलाओं के आंचल से अबोध शिशुओं को भी हमारे प्रतिशोध की लपट उतनी ही
प्रखरता से निगल गई थी जितनी तीव्रता से उसने घोर अपराधियों को चाटा था। किंतु उस परम श्रद्धेय नील के संबंध में यह तथ्य स्मरण रखना होगा
कि ऐसे कठोर दंड देने में उसे तनिक सी भी सुखानुभूति नहीं होती थी, अपितु वह तो अपने कठोर दायित्व का पालन मात्र ही कर रहा था।''
-होम्स कृत-'सेपॉस वार', पृष्ठ 229-30

प्रकरण-8
कानपुर और झाँसी
दासता के नरक में पड़े अपने पितरों का उद्धार करने के पवित्र हेतु से अत्यंत वेग से बह रहे क्रांति भागीरथी के रक्त-प्रवाह
को उत्तरी हिंदुस्थान के विस्तृत मैदान पर धमा-चौकड़ी करते छोड़कर अब कुछ देर हमें उस क्रांति भागीरथी के मुख्य स्रोत
हरिद्वार में क्या चल रहा है-उसे देखना चाहिए। श्रीमंत नाना साहब के बाड़े में मेरठ के विस्फोट के समय जितने कार्यकर्ता
इकट्ठे हुए थे उतने उस समय लखनऊ के राजमंदिर में, बरेली प्रांत में या स्वयं दिल्ली के दीवान-ए-खास में भी मिलने
कठिन थे। इस ब्रह्मवर्त के महल में सन् 1857 की क्रांति का गर्भ संभव हुआ और वहीं वह गर्भ विकसित हो रहा था। वहीं
उस विचार-गर्भ के द्रवीभूत रस का संगठन होने लगा और फिर पूर्ण गर्भ का उद्भव भी यदि यथाकाल ब्रह्मवर्त में ही होता
तो निश्चय ही वह अल्पायु जीन होता। परंतु जब बीच में ही समय पूर्व मेरठ की गड़बड़ाहट से वह क्रांति गर्भ निकलकर
बाहर आ गिरा तब उस कच्चे गर्भ का परित्याग न करते हुए उस कठिन परिस्थिति में ही उसकी उचित अभिवृद्धि करने के
लिए इधर ब्रह्मवर्त क महल में क्रांति की तैयारी जोर-शोर से चल रही थी।
उस महल में नाना साहब के भाई श्री बाबा साहब व श्री बाला साहब और उनके भतीजे श्री राव साहब अपने मालिक के
क्रांति के उदात्त हेतु को सफल करने के लिए अपना तन-मन-धन अर्पण करने को तैयार थे। वैसे ही नाना के गुरु जिन्होंने
खिदमतगार की अत्यंत कनिष्ठ स्थिति से अपनी दक्षता और चतुराई से अपने को राज्यमान्य के पद
1857 का स्वातंत्र्य समर - 176

तक पहुंचाया था, जिन्होंने यूरोप खंड की राजनीति एवं संग्राम भूमि का अध्ययन कर अपनी स्वदेश भूमि को गुलामी से मुक्त
करने के धर्मयुद्ध में उसका किस तरह उपयोग किया जाए-यह बड़ी चतुराई से प्रत्यक्ष अवलोकन किया था, जिन्होंने इस
क्रांति का विस्तृत नक्शा सबसे पहले अपने मनःपटल पर बनाया था और जिन्होंने स्वयं मुसलमान होते हुए भी अपनी भारत
माता की स्वतंत्रता के लिए एक हिंदू राजा के अभ्युदय के लिए अपना जीवन अर्पण कर ‘परैस्तु विग्रहे प्राप्ते वयं पंचशतोत्तरम्’
(संकट पड़ने पर हम एक सौ पांच हैं)-महाभारत के इस उपदेश की सार्थकता स्वाचरण से की थी, वे देशभक्त अजीमुल्ला
खान भी फिरंगियों की गुलामी छोड़ने के लिए वहां हाथ में तिलांजलि लेकर खड़े थे। उसी महल में झाँसी की बिजली भी
अपनी तेजपुंजता से उस गहरे अंधियारे में लगातार चमक मार रही थी।
परंतु ऐसे इतिहास-प्रसिद्ध राजमहल के शस्त्रागार में कसौटी के पत्थर पर तलवार को धार लगाने में कौन सा योद्धा तल्लीन
है-यह तो देखें जरा!
प्रिय पाठक! शस्त्रागार में शमशीर को पानी चढ़ाने में तल्लीन वह सतेज मराठा तात्या टोपे है। शिव छत्रपति के अखाड़े का
अंतिम जवां मर्द मराठा है यह। जवां मर्दी जिनमें होती है ऐसे बहुत लोग होते हैं, परंतु इस अंतिम मराठा है यह। जवां मर्दी
जिनमें होती है ऐसे बहुत लोग होते हैं, परंतु इस अंतिम मराठा की जवां मर्दी अपनी स्वतंत्रता के लिए अपनी हिंद देवी की
म्यान से बाहर निकाली हुई तलवार थी। तलवार मर गई, परंतु उसका ‘वार’ नहीं मरा-वह कभी मरनेवाला भी नहीं है। तात्या
टोपे जैसी तलवार, जिसे काल द्वारा जीर्ण और शत्रु द्वारा विदीर्ण की हुई म्यान में से स्वेच्छा मात्र से निकाला जा सकता है,
उस हिंद-भू की अक्षय कोख को नमस्कार करें।
हिंदभूमि की इसी आदरणीय कोख से सन् 1814 के आसपास वीरवर तात्या टोपे का जन्म हुआ।83 उनके पिता का नाम
पांडुरंग भट था। पांडुरंग भट को कुल आठ पुत्र थे और दूसरे पुत्र का नाम रघुनाथ था। यही रघुनाथ हिंदुस्थान के इतिहास
के तारामंडल में ‘तात्या’ नाम से चमकता स्वतंत्रता का दिव्य तारा था।
पांडुरंग राव टोपे देशस्थ ब्राह्मण थे और अंतिम बाजीराव के पास ब्रह्मवर्त में वे दानाध्यक्ष के पद पर थे। उस ब्रह्मवर्त को एक
समय कितना अलभ्य लाभ हुआ था! उसके आंगन में नाना साहब, झाँसी की छबीली, तात्या टोपे आदि की समकालीन स्नेह
लीला हुई थी। बचपन से ही श्रीमंत नाना की तात्या से बड़ी प्रीति थी। जिस महान् कार्य में उन्हें वीर चरित्र की भूमिका
करनी थी उस महान् कृत्य की शिक्षा बाल वय से ही इन दोनों विभूतियों को सृष्टि देवी की ओर से एक ही शाला में दी जा
रही थी। ‘रामायण’, ‘महाभारत’ के पारायण जिन्होंने एक साथ किए, मराठों की जवां मर्दी का इतिहास जिन्होंने एक साथ पढ़ा
और उस वीर रस को पीकर उनके बाल-बाहू एक साथ ही
1857 का स्वातंत्र्य समर - 177
83 सन् 1849 में श्री तात्या टोपे अपनी जबानी कहते हैं-‘‘मेरा नाम तात्या टोपे हैं। मेरे पिताजी का नाम पांडुरंग है और मैं यवला परगना पालोडात,
जिला नगर का निवासी हूं। मैं बिठूर में रहता हूं और मेरी आयु लगभग पैंतालीस वर्ष है और मैं नाना साहब की सेना में तैनात हूं।’’

फड़क उठे थे—वही दो सिंह शावक अपनी देशमाता के लिए इकट्ठा लड़ें। किसी एक सदी में ऐसी एक ही शाला खुलती है
जिसमें नाना, राव और छबीली जैसे बालक साथ-साथ शिक्षा लेते हैं, साथ-साथ मुस्कराते और साथ-साथ खेलते हैं; किसी
एक सदी में ऐसी एक ही परीक्षा होती हैं कि जिसमें ये सारे महानुभव बालक संग्राम पत्रिका पर अद्भुत वीर चरित्र एकमत से
लिखते हैं, ऐसी असाधारण शाला का और ऐसी असाधारण परीक्षा का सम्मान ब्रह्मवर्त के राजमहल को प्राप्त हुआ था।
अप्रैल के अंत में क्रांति पक्ष के संगठन को एकमत करने के लिए हिंदुस्थान के प्रमुख शहरों में स्वयं प्रवास करने के बाद
अजीमुल्ला खान और नाना साहब संकेत समय की प्रतीक्षा करते हुए बहुत सावधानी से रूके हुए थे। तभी 18 मई को मेरठ
के विप्लव और दिल्ली स्वतंत्र हो जाने का समाचार कानपुर आ पहुंचा। इस असमय हुए विप्लव के कारण ब्रह्मवर्त के
राजमहल में किसी भी तरह की बेचैनी दिखाई नहीं दी। राज्य क्रांतियां सहस्रशः अलग-अलग भागों में चलती हैं—इसलिए
उनमें से कुछ भाग जल्दी से तो कुछ मंद गति से, कुछ पूर्व संकेत के अनुसार तो कुछ आकस्मिक तेज से ही गतिमान हो
जाते हैं। ब्रह्मवर्त के राजमहल के ध्यान में यह बात तत्काल आ गई और उसने मेरठ के विद्रोह का पूरा लाभ लेने का निश्चय
किया। परंतु वह लाभ लेने के लिए तत्काल दिल्ली के पीछे-पीछे विद्रोह करें या जून के पहले हफ्ते में पूर्व संकेतों के
अनुसार विद्रोह करें? इन दोनों में से दूसरा ही रास्ता ठीक समझ उसके अनुसार मई के उत्तरार्ध में ब्रह्मवर्त के अंतर्बाह्य
दांव-घात चलने लगे। ब्रह्मवर्त से कानपुर बिलकुल पास है। इस शहर में बहुत दिनों से अंग्रेजी सेना का महत्त्वपूर्ण शिविर
था। सन् 1857 के मई माह में वहां पर पहली 53वीं एवं 56वीं पैदल सिपाहियो की पलटन और घुड़सवार सिपाहियों की
दूसरी पलटन—ऐसी कोई तीन हजार नेटिव सेना थी। वहां का तोपखाना अंग्रेजों के कब्जें में था और उसपर कोई साठ अंग्रेज
और अन्य सौ-सवा सौ सोल्जर—इतने गोरे रहते थे। सारी सेना का कमांडर सर हो व्हीलर था। व्हीलर आयु से वृद्ध और
सिपाहियों में बहुत लोकप्रिय अधिकारी था। इस वृद्ध अधिकारी ने सिख युद्ध में और अफगानिस्तान की मुहिम में अच्छी सेवा
की थी। कानपुर की नेटिव सेना इस अधिकारी से बहुत खुश है, यह अंग्रेज सरकार को पूरी तरह ज्ञात होने के कारण
कानपुर के सिपाहियों की पंक्तियों में कुछ पक रहा है, इसकी आशंका किसी में मन को छू तक न सकी।
15 मई को कानपुर शहर में इधर-उधर एक विशेष हलचल दिखने लगी। मेरठ के विप्लव का समाचार पहुंच जाने से
सिपाहियों की पंक्तियों में पहले की स्तब्धता हटकर चंचलता आई थी। परंतु सिपाहियों को ज्ञात वह समाचार अंग्रेज
अधिकारियों को 18 मई तक ज्ञात नहीं हुआ था। दिल्ली के समाचार देनेवाले तारयंत्र तोड़-फोड़ डाले गए थे, इसलिए सर
हो व्हीलर ने समाचार ज्ञात करने के लिए कुछ दूत भेजे। उन्हें रास्ते में दिल्ली से आ रहा एक सिपाही मिला। परंतु फिरंगी
को समाचार देने से उसने साफ मना किया। सन् 1857 में दूर-दूर के समाचार नेटिव लोगों को तत्काल कैसे ज्ञात हो
1857 का स्वातंत्र्य समर – 178

जाते थे और तारयंत्र कान से लगाए अंग्रेज उस संबंध में कैसे अज्ञानी रहते थे, यह अंग्रेज अधिकारियों के लिए बड़ा कूट
प्रश्न था।84 कानपुर के नेटिव सिपाहियों को मेरठ में हुए विद्रोह का समाचार विद्रोह होने के बाद तार से सूचित करने की
आवश्यकता नहीं थी। क्योंकि वह विद्रोह से एक दिन पूर्व ही जीवित तारों से ज्ञात हो चुका था। कानपुर के अंग्रेज
अधिकारियों को जब यह समाचार विदित हुआ तब कानपुर शहर और सिपाहियों की पंक्तियों में क्या कुछ पक रहा है, इसका
आभास उन्हें होने लगा। परंतु अद्भुत समाचार के कारण उत्पन्न चंचलता जनमानस से जल्दी ही निकल जाएगी इस आशा
से सर हो व्हीलर काफी कुछ निश्चित थे। इधर कानपुर शहर और सिपाहियों में अंग्रेजी शासन की समाप्ति का समय पास आ
गया है-यह हर कोई अनुभव करने लगा। हिंदू और मुसलमानों की होनेवाली बड़ी-बड़ी सभाएं, सिपाहियों की होने वाली गुप्त
बैठकें, विद्यार्थियों और उनके शिक्षकों में चलनेवाले संवाद और बाजार व दुकानों-दुकानों में चर्चाओं आदि से लोकक्षोभ की
चिनगारियां उड़ने लगी थी। फिरंगियों को मार डालने की बातें लोग राह चलते करने लगे थे और सिपाही अपने स्वदेशी
सूबेदार के आदेशों को छोड़ दूसरों के आदेश टालने लगे। बाजार में एक अंग्रेज महिला कुछ वस्तुएं खरीदने हमेशा की ऐंठ में
जा रही थी कि कोई राहगीर भौंहें चढ़ाए उसके पास आया और बोला, "अब यह ऐंठ बहुत हो गई। हिंदुस्थान के बाजार में
एक अंग्रेज महिला कुछ वस्तुएं खरीदने हमेशा की ऐंठ में जा रही थी कि कोई राहगीर भौंहें चढ़ाए उसके पास आया और
बोला, "अब यह ऐंठ बहुत हो गई। हिंदुस्थान के बाजार से अब आपकी जल्दी ही विदाई होने वाली है-समझीं?" अंग्रेजों को
ऐसे कड़वे बोल सुनने का यह पहला ही अवसर था। अब ऐसे अवसर पर शांत बैठे रहने के कोई लाभ नहीं है, यह सोच
कमांडर सर हो व्हीलर ने विद्रोह के पहले ही सुरक्षा की तैयारी आरंभ कर दी।
सबसे पहले संकट के समय आश्रय मिल सके, ऐसा एक स्थान तैयार रहे, इस हेतु गंगा के दक्षिण और सिपाहियों की
पंक्तियों के पास ही एक स्थान उसने चुना। उस स्थान को मजबूती देने के लिए चारदीवारों और तोपें रखने के लिए स्थान
बनवाकर सर व्हीलर ने अनाज भरने का आदेश भी दिया। ऐसी अफवाह है कि नेटिव कांट्रेक्टर ने अनाज आदि रसद व्हीलर
की नजर बचाकर ओदश से बहुत कम भरी थी। इस चारदीवारी से घिरे स्थान का उपयोग कर सिपाही विद्रोह करें तो भी
अधिक नहीं करना पड़ेगा-ऐसा भरोसा व्हीलर और अन्य अंग्रेज अधिकारियों को था। क्योंकि अन्य स्थानों की तरह ही कानपुर
के सिपाही भी जगह-जगह मारकाट न कर दिल्ली की ओर ही निकल जाएंगे और उनके दिल्ली की ओर बढ़ते ही गंगा
उतरकर इलाहाबाद में अंग्रेजी सेना से
1857 का स्वातंत्र्य समर - 179
84 1. वस्तुतः इस विद्रोह की एक उल्लेखनीय बात यह है कि अत्यंत निश्चित तथा नितांत वेग सहित सुदूर स्थित स्थानों के समाचार भारतीय सैनिकों
तथा अन्य लोगों को किस प्रकार हो जाते थे। सामान्य संदेश प्रेषण का प्रमुख माध्यम हरकारे ही थे, जो एक स्थान से दूसरे स्थान पर असाधारण फुरती
सहित संदेश पहुंचाते थे।" देखें-'मिलिट्री नैरेटिव्स', पृष्ठ 23
2. नानकचंद की डायरी।

मिलने का सुअवसर उन्हें मिल जाएगा, यह उनकी पक्की धारणा थी। कानपुर के अंग्रेज लोगों की सुरक्षा के लिए चारदीवारी
का मजबूत स्थान बनाकर ही व्हीलर चुप नहीं बैठा और उसने लखनऊ में सर हेनरी लॉरेंस ही सहायता के लिए चिल्ला रहा
था। फिर भी उसने चौरासी गोरे सोल्जर, लेफ्टिनेंट ॲशे के नेतृत्व में गोरा तोपखाना और कुछ घुड़सवार-इतनी सेना कानपुर
की ओर तुरंत भेजी।
अंग्रेज लोगों की सुरक्षा के लिए सर व्हीलर ने ये दो उपाय किए, यह कोई विशेष बात नहीं थी। परंतु अंग्रेजी के हिंदुस्थानी
शासन पर आया यह संकट टालने के लिए उसने जिस तीसरी युक्ति की योजना की थी, उसके जैसी अब अद्भुत
लगनेवाली, परंतु उस समय की क्रांति रचना के कौशल की यथार्थ कल्पना देनेवाली ऐसी दूसरी विलक्षण बात इस इतिहास में
नहीं लिखी गई उसकी प्रार्थना थी। मेरठ का आकस्मिक समाचार सुनते ही लश्कर के छोटे सिपाहियों और बाजार के
साधारण लोगों में तत्काल चंचलता और क्षोभ उत्पन्न हो गया था। परंतु ब्रह्मवर्त का समुद्र पहले जितना शांत, गंभीर और
सहनशील दिखाई देता था उतना ह ीवह आज भी था। उसके हृदय में घुमड़ते प्रचंड बादलों का संकेत उसके जलपृष्ठ पर
रत्ती भर दिखना असंभव था। कानपुर की सेना की चंचलता से सर व्हीलर चौंका था, फिर भी उसे इसकी तिल भर शंका नहीं
हुई कि ब्रह्मवर्त का राजा अपने विरुद्ध है। जिसके मस्तक का मुकुट अभी क्षण भर पहले पैरों से कुचला है, एक क्षण पहले ही
जिस नाना की पूछ को जान-बूझकर मसला है, उसी नाना को अंग्रेजों ने अपनी सुरक्षा की विनती कर कानपुर बुलाया। नाना
सहनशील हिंदू है, वह मन में द्वेष पालनेवाला जहरीला नाग नहीं, ऐसा अंग्रेजों को लगता था तो कोई एकदम गलता भी नहीं
था। क्योंकि आज तक अंग्रेजों को लगता था तो कोई एकदम गलत भी नहीं था। क्योंकि आज तक अंग्रेजों के पैरों तले
कुचले, निर्जीव, निरुपद्रवी और नपुंसक केंचुए क्या हिंदुस्थान में कम थे? उन्हीं केंचुओं जैसा केंचुआ नाना भी होगा, इस भ्रम
में पड़कर ही सर व्हीलर ने ब्रह्मवर्त की बांबी में बैठे नाग को और चाहिए ही क्या था! उसने दो तोपें, तीन सौ निजी सिपाही,
पैदल और घुड़सवारों के साथ दिनांक 22 मई को कानपुर में प्रवेश किया। कानपुर में अंग्रेजी सैनिक और असैनिक
अधिकारियों की बहुत बड़ी बस्ती थी-उसी के बीचोबीच जाकर नाना ने अपना शिविर बनाया। कानपुर में विप्लव होते ही
पहला हमला खजाने पर होगा, तो उसकी सुरक्षा की क्या व्यवस्था हो? अच्छा तो खजाना दे दो नाना के कब्जे में।
बारूदखाना और शस्त्रागार की सुरक्षा? इन्हें नी नाना की निगरानी में रहने दो। जल्दी ही इस निगरानी में नाना के दो सौ
सिपाहियों का पहरा बैठ गया। कलेक्टर हिल बर्डन ने नाना और तात्या को धन्यवाद एि; और सारी अंग्रेज महिलाएं
1857 का स्वातंत्र्य समर - 180

और बच्चे चाहें तो ब्रह्मवर्त के राजमहल में जाकर रहें, यहां तक बातें होने लगीं। इसी का नाम है मराठी कावा (दाँव)! अंग्रेजों
की सुरक्षा करने और स्वदेश-स्वतंत्रता के लिए युद्धरत अपने सगे भाइयों से लड़ने सेना-तोपखाने के साथ नाना को कानपुर
बुलाया गया। अंग्रेजी बस्ती में उनका शिविर लगा। अंग्रेज उन्हें लाखों रूपयों का खजाना सौंप दे और इस तरह सहायता देने
के लिए धन्यवाद दे-इसी सबका नाम है मराठी दाँ! और ये सारे बातें उस प्रचंड विस्फोट के एक हफ्ते पहले की हैं। इससे
यह स्पष्ट होता है कि सन् 1857 में अंग्रेज सरकार को अंधकार में टटोलते रखकर एकाएक कैसे गड्ढे में गिराया गया।
स्वतंत्रता की अनिवार्य इच्छा-यही साध्य और उसकी प्राप्ति हेतु संग्राम-यह साधन। इन दो बातों का स्पष्ट ज्ञान सारे समाज
को दिया हुआ था। परंतु उसका नेता कौन हो? विद्रोह का पक्का दिन कौन सा हो? क्रांति के मुख्य केंद्र कहां होंगे? ये सब
बातें इतनी चतुराई से गुप्त रखी गई थीं कि उसकी भनक अंग्रेजों को तो खैर क्या होती, उस जनसमूह को भी पक्की पता
नहीं थी। मुख्य गुप्त केंद्र के नेता और उनके विश्वसनीय सहयोगियों को ही पूरे नाम आदि की जानकारी थी। पीछे कहा था
कि हर रेजिमेंट में एक समिति बनाई गई थी, उसका भेद भी यही था। काशी में पकड़े गए पत्र में एक नेता की ओर से इतने
ही हस्ताक्षर थे। इस क्रांति रचना के अनुरूप ऐसा ही व्यवहार उसके उत्तरदायी नेताओं की ओर से रखा गया था। दिल्ली के
बादशाह, झाँसी की रानी या नाना साहब की योजना के बारे में विद्रोह होने के पहले दिन तक अंग्रेजों को तिनके के बराबर
भी भनक नहीं मिली। परंतु इस सब में ब्रह्मवर्त के बाड़े की विशेष करामात! इतिहासकार 'के' कहता है-'मराठा
राज्य-संस्थापक शिवाजी के चरित्र का अध्ययन नाना ने यों ही नहीं किया था।
कानपुर में गुप्त मंडली का जो, जाल बिछा था उसका मुख्य केंद्र सूबेदार टीका सिंह के घर में स्थापित था। बैठक करने का
दूसरा स्थान शम्सुद्दीन खान सिपाही के घर में था।85 इन गुप्त बैठकों में होनेवाली मंत्रणा में नाना की ओर से ज्वाला प्रसाद
और महमूद अली नामक ब्रह्मवर्त के राजमहल के विश्वसनीय नौकर उपस्थित रहते थे। सूबेदार टीका सिंह और ज्वाला प्रसाद
की सहायता, उत्कट स्वातंत्र्य इच्छा और निष्कलंक सच्चाई के कारण सारी सभा पर उनका प्रभाव था और इस सभा के
निर्णयों के अनुसार सेना एकमत से व्यवहार करे, यह निश्चित था। इस कारण सूबेदार टीका सिंह का जो मत होता वही सारी
सेना का होता था। ऐसे नेता और नाना की भेंट होना, आमने-सामने
1857 का स्वातंत्र्य समर - 181
85 कानपुर में विद्रोह शांत हो जाने पर एकत्रित साक्ष्य तथा नानकचंद नामक एक वकील की डायरी-इन दो आधारों पर G. D. Trevelyan द्वारा
लिखित 'Cawnpore' नामक पुस्तक से उपर्युक्त सारी जानकारी ली गई है । इन सबूतों से भी उस समय की परिस्थितियों की कल्पना करना बहुत
कठिन नहीं है।

सारी बातें होना अति आवश्यक था। उसमें भी मेरठ के आकस्मिक विद्रोह से अस्त-व्यस्त हुए कार्यक्रम को फिर से एक बार
सही करना अनिवार्य था, इसलिए नाना की और सूबेदार टीका सिंह की भेंट निश्चित हुई। पहली भेंट में सूबेदार और नाना
की मंत्रणा बहुत देर तक हुई। "सेना के हिंदू और मुसलमान-ये दोनों ही स्वराज्य और स्वधर्म के लिए एकमत से विद्रोह
करने को सज्जित हो गए हैं और हमव ह करने के लिए तैयार हैं।" सूबेदार के ऐसा विश्वास दिलाने पर अन्य फुटकर बातें
निश्चित करने को दूसरी अधिक सावधान और सावकाश भेंट की बात निश्चित कर सूबेदार वापस लौटे। जून की पहली
तारीख को संध्या समय श्रीमंत नाना अपने बंधु बाला साहब और मंत्री अजीमुल्ला खान के साथ गंगा किनारे आए। सूबेदार
टीका सिंह अपनी केंद्र मंडली के साथ वहां आए हुए थे ही।ये सारे लोग एक नाव में बैठकर में बैठकर गंगा के सुधा धवल
जलाशय में घुस गए। अपने स्वदेश-संरक्षण के लिए घनघोर संग्राम करने की प्रतिज्ञा उस गंगाजल को हथ में लेकर करने
के बाद कोई दो-तीन घंटे तक उनकी चर्चा चलती रही। भावी कार्यक्रम का पक्का निर्णय हो जाने पर वे सब लोग लौट
आए। उनकी वहां क्या चर्चा हुई, यह गंगा नदी के पाट को ही ज्ञात होगा। इतना सच है कि दूसरे दिन शम्सुद्दीन ने
अपनी प्रियतमा को यह स्वतंत्रता का समाचार यूंह ी नहीं सुनाया था। क्योंकि स्वराज्य के लिए शम्सुद्दीन की आत्मा जितनी
फड़फड़ा रही थी उतनी ही इस सुंदरी की भी। अजीजन सिपाहियों की अतिप्रिय संग्राम के बाजार में देशप्रेम के पुरस्कार के
रूप में बांटना शुरू कर दिया था। अपने सुंदर मुख और भृकुटी की एक-एक सिकुड़न से उसने अनेक भगोड़ों को फिर से
रण में भेजा है, यह किस्सा शीघ्र ही आगे आएगा।
क्रांति पक्ष की योजनाएं इधर इस ऊंचाई तक पहुंच रही थी और उधर अंग्रेज लोगों को हर नए पल इतनी घबराहट हो रही
थी कि क्या पूछने? लखनऊ से सहायता आने और श्रीमंत नाना साहब की सुरक्षा में खजाना एवं गोला-बारूद पहुंच जाने के
बाद सर व्हीलर के मन को थोड़ा धीरज बंधा था। पर अंग्रेज बस्ती को बिल्कुल धीरज नहीं था। 24 मई को मुसलमानों की
ईद थी। उस दिन सब ओर विद्रोह होगा-ऐसा डर हर शहरी अंग्रेज को था। परंतु ऐसे सहज ध्यान में आ जानेवाले दिन
सार्वजनिक विद्रोह होगा, ऐसा सहज में लग सकता है उस दिन शांति बनाए रखना और जिस दिन विद्रोह होने की बिल्कुल
भी संभावना न हो उस दिन उछल पड़ना-ये दांव-घात ही तो विद्रोह की सफलता के मुख्य कारण थे, इसीलिए कानपुर में
ईद के महोत्सव में किंचित् भी गड़बड़ी नहीं होने दी गई। उस दिन सुबह आंग्रेज इतना घबराया हुआ था
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कि सर व्हीलर ने लखनऊ को तार भेजा-“आज विद्रोह किसी भी तरह नहीं रुक सकता। परंतु इस महोत्सव के दिन शाम
को जब सारे मुसलमानों ने परंपरा के अनुसार साहब लोगों से ईद मिलन किया तब सर व्हीलर को फिर से एक बार बहुत
संतोष हुआ। परंपरा के अनुसार रानी के जन्मदिन पर उसे तोपों की सलामी दी जाती थी, परंतु कदाचित् उस आवाज से
सिपाहियों में बेकार ही गड़बड़ी होगी, इसलिए वह सलामी नहीं दी गई। अंग्रेजों की महारानी में बेकार ही गड़बड़ी होगी,
इसलिए वह सलामी नहीं दी गई। अंग्रेजों की महारानी को उसके जन्मदिन पर स्वयं उसकी सेना में ही सलामी देने की
शक्ति न हो, इसके लिए बहुत से अंग्रेज अधिकारियों को बड़ा दुःख हुआ। पर क्या करते बेचारे! विद्रोह होने पर सुरक्षा के
लिए जो चारदीवारी का स्थान बनाया गया था-जैसा पीछे कहा है-उस स्थान क ओर ध्यान दें तो अंग्रेजों के कैसी दयनीय
स्थिति हो गई थी, यह तत्काल समझ में आ जाता है। 'भेड़िया आया रे भेड़िया', ऐसी गप यदि कोई उड़ा सकता तो अंग्रेजों
के परिवार अस्त-व्यस्त दौड़-भाग करने लगते। एक अंग्रेज अधिकारी लिखता है-

“मैं जब वहां था तो मैंने देखा कि बघियों, गाड़ियों, डोलियों आदि सवारियों की भीड़ सहसा ही लग जाती थी और उनमें
लेखकों, व्यापारियों, महिलाओं-जो बालकों को छाती से चिपकाए होती थी-बालकों, धायों और अधिकारियों आदि सभी को
पहुंचा दिया जाता था। सार रूप में कहा जाए तो यह कहना उपयुक्त होगा कि ज्यों कि किसी प्रकार के उपद्रव की आशंका
होती अथवा समाचार प्राप्त होता तो वहां हमारा अभिनंदन करनेवाला भी कोई न होता; क्योंकि उपर्युक्त दृश्यों से हम भारतीयों
को यह स्पष्टतः दिखा चुके थे कि हम कितने कायर हैं और हमारी दशा कितनी दयनीय हैं।‘’

अंग्रेजों द्वारा अपने व्यवहार से दर्शाया गया यह डरपोकपन, उपर्युक्त अधिकारी कहता है वैसे वास्तव में नेटिवों ने पहचान
लिया था। परंतु वह कोई आज की की नई बात नहीं। जब चारदीवारी बनाने का काम प्रारंभ हुआ, तभी अजीमुल्ला खान ने
एक लेफ्टिनेंट से मुसकराते हुए यही तो कहा था। उस लेफ्टिनेंट से अजीमुल्ला खान ने अपनी हमेशा जैसी मधुर वाणी में
पूछा, “सच में अभी मुझे ठीक के सूझता नहीं है।” आंखें मटकाते उस चतुर अजीमुल्ला खाने ने कहा, “रख लीजिए-‘निराशा
का किला’।”

मई के अंत में एक दिन एक शरारती तरूण अंग्रेज ने शराब के नशे में एक सिपाही पर गोली चला दी। यह गोली चूक गई
और उस सिपाही ने सोल्जर को निरपराध मान छोड़ दिया गया और कहा गया कि शराब के नशे में बंदूक गलती से चल
गई।

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यह हमेशा का निर्णय था, पर अब स्थिति हमेशा की नहीं थी। 86 यह अपमानजनक समाचार फैलते ही सारी सेना गुर्राने
लगी-‘ठीक है! हमारी बंदूकें भी अब जल्दी ही गलती से`चल जाएंगी।´’ यह वाक्य सिपाहियों के बीच एक उत्क्षोभक नरसिंह
मंत्र ही हो गया था। एक-दूसरे को मिलते ही 'अब बंदूक गलती से चलेगी ना!' ऐसी व्यंग्यात्मक सलामी सेना में दी जाने
लगी। फिर भी मेरठ की तरह जल्दी न कर संकेत समय आने तक उन्होंने सारा गुस्सा मन-ही-मन पी जाने का निश्चय
किया था।
इस भयानकता को और भयानक करने के लिए ही शायद उसी समय एक अंग्रेज और उसकी पत्नी-दोनों के शव गंगा प्रवाह
में बहते-बहते कानपुर आ गए। ऊपर किसी शहर के विद्रोहियों के लिए कृत्य का साक्ष्य कानपुर से क्या-क्या भयंकर संवाद
करेगा? गंगा को अभी ऐसे कितने ही शव बहाने हैं।
'भेड़िया आया रे भेड़िया'-ऐसी अफवाह उड़ाकर अब तक अंग्रेजों का इतनी बार चकित किया गया था कि अब यदि भेड़िया
आया तो भी वे सचमुच सोते रहनेवाले थे। जून क पहली तारीख को स्वयं सर हो व्हीलर लॉर्ड केनिंग को लिखता है-“क्षोभ
और डर रहा नहीं। कानपुर सुरक्षित है। इतना ही नहीं, मैं लखनऊ को जल्दी ही सहायता भेजे देता हूं।´´ इलाहाबाद से आई
हुई गोरी फौज वास्तव में लखनऊ की ओर जाने लगी और वह भी कब? 3 जून को। जिस षड्यंत्र में तीन हजार सिपाही
और वेश्या सहित कानपुर का सारा शहर लगा हुआ था उस षड्यंत्र में तीन हजार सिपाही और वेश्या सहित कानपुर का
सारा शहर लगा हुआ था उस षड्यंत्र का समाचार अंग्रेजों और उनकी सहायता करनेवाले नानकचंद जैसे कुल्हाड़ी के बेंटे से
भी इतनी मुहरबंद रहे-यह कितना बड़ा आश्चर्य था!
यह मुहर 4 जून की रात को टूटी। सार्वजनिक कार्यक्रम के अनुरूप रात के अंधेरे में कुछ बंदूकें चलीं और निश्चित भवनों को
आग लगी। रक्तपात, नाश और मृत्यु की दौड़ शुरू हो जाने की वह करतल ध्वनि थी। सबसे पहले टीका सिंह का घोड़ा
कर्कश रीति से हिनहिनाया और उसी के साथ हजारों घोड़ें एक क्षण में टापों की आवाज करते सरपट दौड़ते निकले। कुछ
अंग्रेजी पगड़ियों और घरों को आग लगाने निकले, कुछ अन्य रेजिमेंटों को बुलाने गए और कुछ लश्करी निशानों और झंडों
को कब्जें में लेने निकले। ये झंडे जिसके कब्जे में थे, वह वृद्ध सूबेदार मेजर नेटिव होते हुए भी विद्रोहियों के विरूद्ध
जाता-सा दिखाई दिया, अतः एक तलवार का वार उसके सिर पर पड़ा और
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86 ट्रेवेलियन ने लिखा है-“निम्न स्तर के यूरोपियनों की क्रूरता तथा सैनिक अधिकारियों द्वारा न्याय के नाम पर की जानेवाली धींगामस्ती से सिपाही
भलीभांति परिचित थे। किसी अन्य अवसर पर तो संभवतः उन्हें इस प्रकार के न्याय पर किसी प्रकार का आश्चर्य न होता; किंतु अब तो उनका रक्त
खौल उठा था, उनका आत्माभिमान जाग्रत् हो चुका था, जिससे किसी एंग्लो-सेक्सन वंशज को ऐसा अधिकार एवं सैनिक न्यायलय की विवेचना शक्ति
की प्रखरता को मान्यता देने के लिए वे तत्पर नहीं थे।”
-'कानपुर', पृष्ठ 93