१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलड़कों ने थूका। क्योंकि बारह-चौदह वर्ष के बच्चों ने स्वराज्य के हरे जरीदार झंडे लगाए और ताशे बजाते हुए उन झंडों को
उठाए उन्होंने जुलूस भी निकाले। ऐसे ही एक जुलूस को पकड़कर अंग्रेजों ने उसमें सम्मिलित तरुणों को फांसी पर
लटकाया। यह दंड दिए जाने पर एक अंग्रेज अधिकारी भी इतना लज्जित हुआ कि वह अश्रुपूरित नेत्र लेकर मुख्य कमांडर से
उन बच्चों को छोड़ देने का निवेदन करने लगा। परंतु उसका कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ा और स्वतंत्रता के झंडे को लेकर
चलनेवाले उन तरूण लड़कों को दिन-दहाड़े फांसी दी गई। इन तरूण देवदूतों पर किया गया जुल्म उन जालिमों के सिर
पर आघात करने से कैसे चूक सकता है? सारी सृष्टि भूकंप-जैसी डोलने लगी। किसान और तालुकेदार, हिंदू और मुसलमान,
वृद्ध और तरूण, पुरुष और महिला-सारे-के-सारे राजनीतिक दास्य का उच्छेद करने के लिए 'हर-हर' कर उठा। “केवल
गंगा पार के लोग ही नहीं अपितु गंगा और यमुना के मध्य में स्थित भूखंड की जनता भी उठा, किसान भी सन्नद्ध हुए और
दोनों धर्मों का एक भी अनुयायी ऐसा नहीं रह गया जो हम (अंग्रेजों) पर प्रहार करने के लिए बेचैन न हो उठा हो।” ⁸⁰ इस
बहुजन समाज के प्रचंड प्रयासों को सफलता मिले और श्रीमती भारतभूमि स्वराज्य-संपन्न हो जाए-इसके लिए प्रयाग के पंडे
और मुल्ला अपना पवित्र आशीर्वाद उस क्रांति के माथे पर बरसाने लगे।
हिंदुस्थान के इतिहास में इतनी उत्क्षोभक, विद्युत वेगी, भयानक एवं सर्वत्र व्याप्त राज्य क्रांति दूसरी दिखना बहुत कठिन है।
लोक-शक्तियां जिसमें भड़भड़ाकर जाग उठीं और अपने देश की स्वतंत्रता के लिए एकाएक गर्जना करते मेघों की तरह रक्त
की मूसलधार वर्षा करने लगीं। यह सन् 1857 जैसी प्रचंड राज्य क्रांति हिंदुस्थान के इतिहास में अभूतपूर्व बात थी। उसमें भी
हिंदू और मुसलमान अपने भाई-भाई होने का रिश्ता पहचानकर हिंदुस्थान के लिए इकट्ठा होकर लड़ने लगे, यह दृश्य बहुत
ही अपूर्व एवं आश्चर्यकारी था। यह अपरिचित प्रचंड तूफान उत्पन्न करने के बाद उसपर नियंत्रण रख पाने में हिंदुस्थान धोखा
खा गया, इसमें कौन सा आश्चर्य! आश्चर्य है तो यह कि जिसपर कोई दोषारोपण न किया जा सके, ऐसा तूफान हिंदुस्थान ने
निर्मित किया! क्योंकि राज्य क्रांति पर नियंत्रण रखना तो किसी भी राष्ट्र के लिए संभव नहीं हुआ। अधिक क्या कहें, यदि
फ्रेंच राज्य क्रांति से तुलना कर देखें तो अत्याचार, अंधाधुंधी, आपाधापी, अव्यवस्था, अंधस्वार्थता, लूटपाट आदि क्रांति जैसे
अनिवार्य प्रलय में अनिवार्य तथा घटित हुई-ऐसा दिखता है। हिंद-भू का वह पहला प्रयत्न नहीं, प्रयोग था और इसीलिए उस
प्रयोग में जहां इलाहाबाद में इतनी विजय प्राप्त हुई वहीं त्रुटियां, धोखे या अंधाधुंधी भी हुई। इसमें आश्चर्य का कोई कारण
नहीं है। जमींदारों के आनुवंशिक झगड़े, गुलामी के कारण प्राप्त दरिद्रता आदि और शताब्दियों पुराने हिंदू-मुसलमानों का
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⁸⁰ के कृत-‘इंडियन म्यूटिनी’, खंड 2, पृष्ठ 195।