सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पृष्ठ 34, कुल 418 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 34

उसके कारण विद्रोह उपजा। कारतूसों का डर या अवध का राज्य हड़पना गौण औ आकस्मिक कारण थे। इन्हीं को प्रधान
कारण मानने से सन् 1857 की क्रांति का वास्तविक स्वरूप कभी भी ज्ञात नहीं हो पाएगा।
इन निमित्त कारणों को ही मूल कारण मान लें तो उसका अर्थ यह होगा कि यदि ये विशिष्ट कारण घटित या अवध का
अधिग्रहण न किया गया होता तो सन् 1857 की क्रांति घटित न होती। परंतु इस प्रकार के विचार से अधिक भ्रामक और
मूर्खतापूर्ण अन्य कोई मान्यता मिलना असंभव है। कारण, उस डर के मूल में छिपा तत्त्व यदि किसी और घटना द्वारा प्रकट
हो जाता तो भी यह क्रांतियुद्ध होता ही, भले ही अवध का राज्य हड़पा न गया होता। फ्रांस देश की राज्य क्रांति का प्रधान
कारण जैसे अनाज के बढ़े हुए मूल्य या बास्तील या राजा का पेरिस छोड़कर जाना या दावतों का रंग नहीं था वैसे ही
उपर्युक्त आकस्मिक एवं विशिष्ट घटनाएं इस प्रचंड क्रांति के प्रधान कारण न होकर केवल निमित्तभूत कारण हैं। जैसे
सीता-हरण रामायण का केवल निमित्त है और मुख्य या प्रधान कारण उसके मूल में छिपे तत्त्व ही हैं।
वे तत्त्व कौन से थे? हजारों शूरों की तलवारों को उनकी म्यानों से खींचकर रणांगण में चमचमानेवाले वे तत्त्व कौन से हैं?
निस्तेज हुए मुकुटों को सतेज करनेवाले और टूटे पड़े ध्वजों को फिर से खड़ा करनेवाले वे तत्त्व कौन से थे जिनपर हजारों
व्यक्तियों ने अपने उष्ण रक्त का अभिषेक करना वर्षानुवर्ष अखंड प्रेम से चालू रखा है, ऐसे तत्त्व कौन से थे? मौलवी जिनका
उपदेश करते थे, ब्राह्मण जिन्हें 'विजयी भवः' कहकर आशीर्वाद देते थे, दिल्ली की मस्जिद से और काशी के मंदिरों से
जिनकी यशःप्राप्ति के लिए परमेश्वर की ओर दिव्य प्रार्थनाएं भेजी जाती थी, जिनकी सहायता के लिए श्रीमंत हनुमानजी ने
स्वयं कानपुर के रण-मैदान पर हुंकार भी और जिनके लिए झांसी की महालक्ष्मी ने शुंभ-निशुंभ के रक्त से भीगी अपनी
पुराण-प्रसिद्ध तलवार फिर से चलाई, ऐसे वे तत्त्व कौन से थे?
सन् 1857 की क्रांति के प्रधान कारण जो दिव्य तत्त्व थे-स्वधर्म व स्वराज्य। अपने प्राणप्रिय धर्म पर भयंकर, विघातक एवं
कपटपूर्ण हमला हुआ है, यह यथार्थ दिखते ही स्वधर्म-रक्षणार्थ जो 'दीन-दीन' की गर्जना शुरू हुई उस गर्जना में और अपनी
प्रकृति दत्त स्वतंत्रता के कपटपूर्ण छीने जाने पर और अपने पैरों में पड़ी राजनीतिक गुलामी की जंजीरें देखते ही स्वराज्य
प्राप्त करने की पवित्र इच्छा उत्पन्न होने के कारण इस दास्य श्रृंखला पर जो प्रचंड आघात किए गए उन्हीं में इस क्रांतियुद्ध
की जड़ें हैं। स्वधर्म-प्रीति एवं स्वराज्य-प्रीति के तत्त्व हिंदुस्थान के इतिहास में जितनी स्पष्टता से
1857 का स्वातंत्र्य समर - 38