१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजाना चाहिए था। पर सिपाही अपने हाथ से अपने कारतूस बना लें, ऐसी अनुमति मिलने पर भी उसका उपयोग न कर या
सेना की नौकरी छोड़ सारी किटकिट से परे न हटकर सेना के सिपाहियों ने ही नहीं बल्कि सेना से जिनका दूर का भी संबंध
नहीं था-ऐसे लाखों लोगों ने, राजा-महाराजाओं ने अपने प्राण रणभूमि पर क्यों अर्पित किए? फौजी और सामान्य जन, राजा
और रंक, हिंदू और मुसलमान-इन सबको एक साथ आवेशित करनेवाली बातें क्षुद्र नहीं होती, उसके मूल में होते हैं तात्त्विक
कारण।
कारतूसों का डर ही विद्रोह का प्रमुख कारण है-इस कथन में जितनी अर्थयार्थता है उतनी ही इस तर्क में भी कि उस विद्रोह
का उद्गम केवल अवध का राज छीनने में था। अवध के राज्य के हित-अहित से जिनका कुछ भी संबंध नहीं था, ऐसे कितने
ही लोग इस भयंकर क्रांति में सिर हाथ पर लिये लड़ रहे थें फिर उस लड़ाई से उनका क्या हेतु था? स्वयं अवध का नवाब
तो कलकत्ता के किले में बंद था और उसकी प्रजा अंग्रेज इतिहासकारों के कथनानुसार नवाब के शासन से बेहद नाखुश
थी। फिर पंजाब से बंगाल तक केवल राजा या लश्कर के लोग ही नहीं अपितु हर असल हिंदू व्यक्ति अपनी शमशीर ताने
क्यों खड़ा था? सन् 1857 की क्रांति पर लिखा एक लेख किसी हिंदू ने उसी समय इंग्लैंड में प्रकाशिात कराया था। उसमें
वह हिंदू कहता है-"जिन्होंने अवध के नवाब को जन्म से भी कभी नहीं देखा था और न आगे देखने की संभावना थी, ऐसे
कितने ही सरल और दयालु लोग अपनी-अपनी झोंपड़ियों में नवाब पर आ पड़े दुःखों को कहते जार-जार रोते थे, इसकी
कल्पना आपको नहीं हैं। और ऐसे आंसू बह जाने के बाद, जैसे स्वयं पर ही क्रूर प्रहार हो रहे हों, ऐसा मानकर वाजिद अली
शाह के अपमान का बदला लेने की प्रतिज्ञा कितने सिपाही प्रतिदिन कर रहे थे, यह भी आपको ज्ञात नहीं˙ ˙ ˙ ˙।”²
इन सिपाहियों को उससे सहानुभूति क्यों होने लगी और जिन्होंने नवाब को जन्म से नहीं देखा था उनकी आंखें और कंठ क्यों
भर आए? अतः अवध का राज्य हड़पने से विद्रोह नहीं उपजा अपितु इन राज्यों को हड़पने में जिस तत्त्व का हनन हो रहा था
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² यह लेख इंडिया ऑफिस के ग्रंथालय में है। यह लेख अनेक दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण है। इस लेख में से निम्न उद्धरण दिए बगैर रहा नहीं जाता-
“Your (Englishmen’s) conduct has all along been mean and pettifogging. Your accuse our ancient moghul rulers of
despotism. They were despotic to some extent; but on the whole, they knew how to goern an empire&you know
to keep a shop. They has a large mind; you have an ingenious and a crafty one. They could conceive of grand
projects. Despite their faults, they were loved by a grand people like us. They settled in the country and tried to
improve it. Your servants come here only to make money and go home as soon as they have satisfied themselves
on the score. Indeed, in as much as we have come to know you, we have learnt to dispise you. With increasing
knowledge we have known that the Anglo-Saxon race is selfish and gypocritical in the extreme and always
unprincipled in matters of gain!”
यह लेख करीब 25 पृष्ठों का है और दि. 13.10.1857 को प्रकाशित हुआ है।