१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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किंतु हे गरिमामय हुतात्माओ! अपने पुत्रों के इस पावन संग्राम में सहायता करो। अपनी प्रेरक उपस्थिति से हमारी सहायता
करो। अनगिनत क्षुद्र स्वार्थों से विदीर्ण होकर हम भारत माता की महान् एकता को कभी भी साकार नहीं कर सकेंगे। हमारे
कर्णों में वह मंत्र उच्चरित करो, जिसके जादू से आपने एकता के रहस्य को प्राप्त कर लिया था। बताओ कि किस प्रकार
फिरंगी शासन छिन्न-भिन्न हो गया था और हिंदुओं-मुसलमानों की आम सहमति से स्वदेशी सिंहासन स्थापित हो गए थे।
किस प्रकार मातृभूमि के उच्चतर प्रेम ने जाति और नस्लों के अंतर को दूर कर दिया था। किस प्रकार पूज्य और पूजनीय
बहादुरशाह ने समस्त भारतवर्ष में गौ वध को प्रतिबंधित कर दिया था। किस प्रकार दिल्ली के सम्राट् को तोप-गर्जना की
प्रथम सलामी के पश्चात् श्रीमंत नाना साहब ने द्वितीय सलामी को अपने लिए आरक्षित कर लिया था। किस प्रकार आपने
मातृभूमि के ध्वज तले संगठित होकर समस्त विश्व को अचंभित कर दिया था और अपने शत्रुओं को भी यह कहने के लिए
बाध्य कर दिया था कि इतिहासकारों व प्रशासकों को भारतीय सैन्य-क्रांति द्वारा सिखाए गए अनेक पाठों में कोई भी इस
चेतावनी से अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं है-“अब ऐसी क्रांति संभव है, जिसमें ब्राह्मण व शुद्र तथा हिंदू-मुसलमान सभी हमारे विरूद्ध
एक साथ संगठित हों और यह मानना सुरक्षित नहीं है कि हमारे आधिपत्य की शांति व स्थिरता बहुत सीमा तक उस महाद्वीप
पर निर्भर है, जिसमें विभिन्न धर्मोंवाली विभिन्न जातियां निवास करती हैं, क्योंकि वे एक-दूसरे को समझती हैं और एक-दूसरे
की गतिविधियों का सम्मान करती हैं और उनमें शामिल होती हैं। सैनिक विद्रोह हमें स्मरण कराता है कि हमारा शासन एक
पतली पर्पटी पर आधारित है, जो सामाजिक परिवर्तनों और क्रांतियों की भीषण ज्वालाओं के द्वारा कभी भी विदीर्ण हो सकता
है।‘' 1 हमारे कर्णों में धर्म और देशभक्ति ऐसे गठबंधन की कुलीनता का मंत्र उच्चरित करो; वह सच्चा धर्म, जो सर्वदा
देशभक्ति का पक्षधर है; वह सच्ची देशभक्ति, जो धर्म की स्वतंत्रता को सुरक्षित करती है। हमें वह अत्युत्तम ऊर्जा प्रदान करो,
वह साहस व गोपनीयता प्रदान करो, जिसके बल पर आपने शक्तिशाली ज्वालामुखी को संगठित किया; हमें उस ज्वालामुखीय
लावा के दर्शन कराओ, जो पतली व हरी पर्पटी के नीचे दबा है, जिस पर शत्रु को झूठी सुरक्षा के भ्रम में रखा जा सकता है।
हमें बताओ कि किस प्रकार भारत के भयावह विरोध की प्रतीक चपाती गांव-गांव और घाटी-घाटी घूमी थी, जिसने राष्ट्र की
समूची प्रज्ञा को अपने संदेश की अस्पष्टता से प्रज्वलित कर दिया था। तत्पश्चात् हमें श्रवण करने दें उस दहाड़ती हुई
गर्जना का, जिसके साथ ज्वालामुखी अंततः फूट पड़ा था अपने समस्त ध्वंसकारी बल के साथ और जो अपने रक्त-तत्व लावा
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1 जॉर्ज विलियम फॉरेस्ट, स्टेट पेपर्स (अनेक श्रृंखलाएं)।