१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहे बलिदानियों! तभी आपने माता को जाग्रत किया, प्रेरित किया और माता के हेतु ही ‘मारो फिरंगी को' के रणघोष के साथ
भयावह व विशाल रणभूमि की ओर प्रस्थान किया। आपके ध्वज पर ईश्वर और हिंदुस्तान का पवित्र मंत्र था। संग्राम में आपने
नेक कार्य किया, क्योंकि भले ही आपका रक्तपात होने से बच जाता, लेकिन दासता का दंश कहीं अधिक गहरा होता।
आत्मबलहीन धैर्य की अभिशापित श्रृंखला में एक और कड़ी जुड़ जाती। समस्त विश्व घृणा से हमारे राष्ट्र की ओर उंगली
उठाता और कहता, ‘‘ भारत दासता का अधिकारी है। वह दासता में ही प्रसन्न है, क्योंकि 1857 में भी अपने हित और अपने
सम्मान की रक्षा हेतु वह उठ खड़ा नहीं हुआ।’'
इसीलिए आज के दिवस को ओ हुतात्माओं! आपकी प्रेरणादायी स्मृति को समर्पित करते हैं। आज ही के दिन आपने एक
नवीन ध्वज उठाया था, जिसे ऊंचा रखना है; एक मिशन का उद्घोष को अंगीकार करते हैं; हम आपके ध्वज की उपासना
करते हैं; ‘विदेशी को भगाने’ के उस कठिन मिशन को जारी रखने के लिए हम दृढ़-संकल्प हैं जिसका आपने क्रांतिकारी युद्ध
की पैगंबरी गर्जनाओं के बीच उद्घोष किया था। हां, यह एक क्रांतिकारी युद्ध था, क्योंकि 1857 का संग्राम तब तक नहीं
थमेगा जब तक कि क्रांति न हो जाए, दासता को धूल में न मिला दिया जाए, दासता को धूल में न मिला दिया जाए और
स्वतंत्रता को सिंहासनारूढ़ न कर लिया जाए। जब कभी कोई व्यक्ति अपनी स्वतंत्रता के लिए जाग्रत होता है; जब कभी
स्वतंत्रता का बीज उसके पिता के लहू में अंकुरित होता है और जब कभी एक भी सच्चा पुत्र अपने पिता के रक्त का प्रतिरोध
लेने के लिए जीवित, तब तक ऐसे संग्राम का कभी अंत नहीं हो सकता। क्रांतिकारी युद्ध में कोई विराम नहीं है। स्वतंत्रता
अथवा मृत्यु मिलने पर ही इसका अंत होता है। आपकी स्मृति से प्रेरित हम 1857 में आपके द्वारा आरंभ संग्राम को परिणति
तक ले जाने को कृतसंकल्प हैं। हम अस्त्र-शस्त्रों के बल प्रथम अभियान के युद्धों के रूप में देखते हैं। इनमें मिली पराजय
संग्राम की पराजय नहीं हो सकती है। क्या विश्व यह कहेगा कि भारत ने पराजय को अंतिम पराजय के रूप में स्वीकार कर
लिया है? क्या सन् 1857 में बहाया गया रक्त व्यर्थ का रक्तपात था? क्या भारतभूमि के पुत्रों ने अपने जनकों की शपथ को
मिथ्या सिद्ध कर दिया? नहीं, हिंदुस्तान की सौगंध, नहीं। भारतीय राष्ट्र की ऐतिहासिक निरंतरता भंग नहीं हुई है। 10 मई,
1857 को समाप्त नहीं हो गया और न ही यह तब तक समाप्त होगा जब तक कि ऐसी कोई 10 मई नहीं आती है, जो हमारे
संकल्प के साकार होने की साक्षी हो; जो हमारे सुंदर भारत के शीर्ष पर विजय का जगमगाता मुकुट अथवा
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