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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 82, कुल 572 में से

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पृष्ठ 82

७४ ] [ योगचूडामणि उपनिषद्
कृत्वा संपुटितौ करौ दृढतरं बद्ध्वाऽथ पद्मासनं
गाढं वक्षसि संनिधाय चुबुकं ध्यानं च तच्चेष्टितम् ।
वारंवारमपानमूर्ध्वमनिलं प्रोच्चरयेत्पूरितं
मुञ्चन्प्राणमुपैति बोधमतुलं शक्तिप्रभावान्नरः ॥४०
कन्द के ऊर्ध्वभाग में कुण्डलिनी शक्ति आठ कुण्डलों में व्यास है
और वह वहीं पर ब्रह्मद्वार को ढककर सदैव स्थित रहती है ॥ ३६ ॥
जिस ब्रह्मद्वार से निष्पाप होकर जाना पड़ता है, उसी द्वार
को मुख से ढककर यह परमेश्वरी शक्ति सोई हुई है ॥ ३७ ॥
वह्नियोग से जागृत होकर मन और प्राण सहित वह सुषुम्ना में होकर
सुई के समान ऊपर की ओर चलती है ॥ ३८ ॥ जैसे घर के द्वार को
कुञ्जी द्वारा खोलते हैं, उसी प्रकार योगी कुण्डलिनी शक्ति द्वारा मोक्ष के
द्वार का भेदन करे ॥ ३६ ॥ हाथों को संपुटित करके, पद्मासन को
दृढ़तापूर्वक लगाकर, ठोड़ी को छाती पर लगाकर, ब्रह्म का ध्यान करते
हुए बारम्बार वायु को ऊपर खींचे और फिर बाहर निकाल दे । इस
प्रकार करने से मनुष्य को विशेष शक्ति का अनुभव होता है ॥४०॥
अंगानां मर्दनं कृत्वा श्रमसंजातवारिणा ।
कट्वम्ललवणत्यागी क्षीरभोजनमाचरेत् ॥४१
ब्रह्मचारी मिताहारी योगी योगपरायणः ।
अब्दादूर्ध्वं भवेत्सिद्धो नात्र कार्या विचारणा ॥४२
सुस्निग्धमधुराहारश्चतुर्थांशावशेषितः ।
भुज्यते शिव संप्रीत्या मिताहारी स उच्यते ॥४३
कन्दोर्ध्वं कुण्डलीशक्तिरष्टधा कुण्डलाकृतिः ।
बन्धनाय च मूढानां योगिनां मोक्षदा सदा ॥४४
Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi