१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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मेषमारभ्य घटिकाऽष्टयाम दिवसवाररात्रिभेदेन पक्षमासर्त्वयन-
संवत्सरभेदेन मनुष्याणां शतायुःकल्पनया प्रकाशमाना चिरक्षि-
प्रव्यपदेशा निमेषमारभ्य परार्धपर्यन्तं कालचक्रं जगच्चक्रमित्यादि-
प्रकारेण चक्रवत् परिवर्तमाना। सर्वस्यैतस्यैव कालस्य विभाग-
विशेषाः प्रकाशरूपाः कालरूपा भवन्ति ॥ १४ ॥
अग्निरूपा अन्नपानादि प्राणिनां क्षुत्तृष्णाऽऽत्मिका देवानां
मखरूपा वनौषधीनां शीतोष्णरूपा काष्ठेष्वन्तर्बहिश्च नित्यानित्य-
रूपा भवंति ॥ १५ ॥
'वे शक्तिरूपिणी होकर इच्छाशक्ति, क्रियाशक्ति और साक्षात्
शक्ति के रूप में प्रकट होती हैं। उनकी इच्छाशक्ति से युक्त स्वरूप भी
तीन प्रकार का है ॥ ११ ॥ श्रीदेवी, भूदेवी, नीलादेव के रूप में वे
मंगळरूपिणी, प्रभारूपिणी तथा चन्द्र, सूर्य, अग्नि रूप में अत्यन्त तेज-
मयी होती हैं। १२। वे चन्द्ररूपिणी होकर ओषधियों को पुष्ट करती
हैं। वे कल्पवृक्ष, लता, गुल्म, पुष्प, पत्र, फल तथा ओषधियों-महोपधियों
के स्वरूप को प्रकट करने वाली हैं। उसी चन्द्ररूप में देवताओं को
'महस्तोम' यज्ञ का फल देती हैं। अन्न द्वारा प्राणियों को और अमृत
द्वारा देवताओं को वे ही तृप्त करती हैं ॥ १३ ॥
'वे ही सब लोकों को प्रकाशित करती हैं। दिवस, रात्रि, निमेष,
घड़ी, पक्ष, मास, ऋतु, अयन और सम्वत्सर आदि के भेद से मनुष्य को
शतायु प्रदान करती हुई स्वयं प्रकाशित होती हैं। निमेष से परार्ध तक
तथा 'विलम्ब और शीघ्रता के भेद से परिपूर्ण कलाचक्र तथा जगत् चक्रादि
के भेद से काल के सभी अङ्ग-प्रत्यङ्ग उन्हीं के स्वरूप है। इसीलिए वे
प्रकाशस्वरूपा और कालस्वरूपा हैं ॥ १४ ॥
'वे अग्निरूप वाली होकर प्राणियों को अन्न-जल आदि के सेवन
एवं पान करने के निमित्त भूख-प्यास रूप से, देवताओं को मुख रूप से,