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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 51, कुल 572 में से

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है कि सच्चा गुरु वही है। जो शिष्य की समस्याओं का समा-
धान कर सके। देखिये:-
गृणाति उपदिशति धर्ममिति गुरुः
"जो धर्म का उपदेश करे उन्हें गुरु कहते हैं।"
गिरत्यज्ञान मिति गुरुः
"जो अज्ञान को दूर करें, वे गुरु है।"
अविद्या हृदय ग्रन्थि बन्ध मोक्षो यतो भवेत्।
तयेव गुरुरित्यार्गु रु शब्देन योगिनः।
—शङ्कराचार्य
"जो हृदय की अज्ञान ग्रन्थि को खोलें उन्हें गुरु कहते
हैं।"
निषेकादीनि कर्माणि यः करोति यथाविधि।
संभावयति चान्नेन स विप्रो गुरु रुच्यते।
—मनु २।१४२
"जो स्वयं कर्तव्य कर्मों में संलग्न हो और दूसरों को भी
वैसी ही प्रेरणा दे ऐसे ब्राह्मण को गुरु कहते हैं।"
आत्मा को अपने ही विचारों और तर्कों से प्राप्त नहीं
किया जा सकता, इसके लिये सुयोग्य मार्गदर्शक गुरु का होना
कितना आवश्यक है, इस सम्बन्ध में 'महोपनिषद् में'
वर्णित शुकदेव जी का प्रसंग और कठोपनिषद् का प्रमाण
मननीय है--
नैषा तर्केण मतिरापनेया, प्रोक्तान्येनैव सुज्ञानाय श्रेष्ठ।
कठ १।२।६
"यह आत्म-बुद्धि तर्क से नहीं मिलती। हे श्रेष्ठ, दूसरे
के द्वारा कही जाने पर ही यह अच्छी तरह जानी जाती है।"