सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 50, कुल 572 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 50

( ५२ )
“शास्त्र के अध्ययन और गुरु के उपदेश बिना आत्मज्ञान
नहीं होता। अधिकारी जिज्ञासु, शास्त्राध्ययन और सद्गुरु इन
तीनों के संयोग से ही आत्मज्ञान प्रकाश में आता है।
आचार्या द्धै विद्या विहिता साधिष्ठं प्रापत्
“आचार्य के बिना पराशक्ति स्वरूपा ब्रह्म विद्या स्वधि-
ष्ठित होती ही नहीं।”
मन्त्र, साधना विधान, स्वाध्याय और संयम का जैसा
महत्व है वैसा ही गुरु के सहयोग का भी है। उचित मार्ग-
दर्शन से आधी कठिनाई तो स्वयमेव हल हो जाती है। इस
लिये गुरु को भी एक प्रकार से मंत्र एवं देवता ही माना गया
गया है।
यथा घटश्च कलशः कुम्भश्चैकार्थ वाचकाः।
तथा मंत्रो देवता च गुरुश्चैकार्थ वाचकाः।
“जिस प्रकार घट, कलश, कुंभ एक ही वस्तु के कई नाम
हैं, उसी प्रकार मन्त्र, देवता और गुरु एक ही तत्व के नाम हैं।”
पन्थानो बहवः प्रोक्ता मन्त्र शास्त्र मनीषिभिः।
स्वगुरोर्मतयाश्रित्य शुभं कार्यं न चान्यथा॥
“बहुत से मार्ग हैं, अनेक मन्त्र एवं शास्त्र हैं पर अपने
गुरु के मतानुसार मार्गालम्बन करने से ही शुभ होता है।
इसके विपरीत नहीं।”
अनेक कोटि मंत्राणि चित्त व्याकुल कारणम्।
मंत्र गुरोः कृपा प्राप्तमेकं स्यात् सर्वसिद्धिदम्॥
“अगणित मन्त्र तो चित्त की व्याकुलता के कारण ही
सिद्ध होते हैं। गुरु की कृपा से प्राप्त हुआ एक मन्त्र ही सर्व
सिद्धियाँ प्रदान करता है।”
गुरु शब्द की व्याख्या करते हुए शास्त्रकारों ने बताया