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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 477, कुल 572 में से

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पृष्ठ 477

CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri
सरस्वतीरहस्योपनिषत्
ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमा-
विरावीर्म एधि वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे माप्रहासीरनेना-
धीतेनाहोरात्रात्संदधाम्यृतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि ।
तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु माम् । अवतु वक्तारमवतु
वक्तारम् । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।
शान्तिपाठ—ॐ मेरी वाणी मन में स्थिर हो, मन वाणी में स्थिर
हो, हे स्वयं प्रकाश आत्मा ! मेरे सम्मुख तुम प्रकट होओ । हे वाणी
और मन ! तुम दोनों मेरे वेद ज्ञान के आधार हो, इसलिये मेरे
वेदाभ्यास का नाश न करो । इस वेदाभ्यास ही मैं रात्रि-दिन व्यतीत
करता हूँ । मैं ऋत भाषण करूँगा, सत्य भाषण करूँगा, मेरी रक्षा
करो, वक्ता की रक्षा करो, मेरी रक्षा करो, वक्ता की रक्षा करो,
वक्ता की रक्षा करो । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।
ऋषयो ह वै भगवन्तमाश्वलायनं संपूज्य पप्रच्छु—
केनोपायेन तज्ज्ञानं तत्पदार्थविभासकम् ।
यदुपासनया तत्त्वं जानासि भगवन् वद ॥१॥
सरस्वतीदशश्लोक्या संऋचा बीजमिश्रया ।
स्तुत्वा जप्त्वा परां सिद्धमलभं मुनिपुंगवाः ॥२॥
ऋषय ऊचुः—
कथं सारस्वतप्राप्तिः केन ध्यानेन सुव्रत ।
महासरस्वती येन तुष्टा भगवती वद ॥३॥