१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसावित्र्युपनिषत् ] [ ४६७
इस सावित्री देवी को जो स्त्री और पुरुष गृहस्थ धर्म का पालन करते
हुए समझते हैं वे मृत्यु से छूट जाते हैं अर्थात् पुनः जन्म नहीं लेते
॥ १०–१३ ॥
बलातिबलयोर्विराट् पुरुष ऋषिः । गायत्री छन्द । गायत्री
देवता । अकारोकारमकारा बीजाद्याः । क्षुधाऽऽदिनिरसने विनि-
योगः । क्लामित्यादि षडङ्गम् । ध्यानम्—
अमृतकरतलाग्रौ सर्वसंजीवनाढ्या-
वघहरणसुदक्षो वेदसारे मयूखे ।
प्रणवमयविकारौ भास्कराकारदेहौ
सततमनुभवेऽहं तौ बलातिबलान्तौ ॥
ओ३म् ह्रीं बले महादेवि ह्रीं महाबले क्लीं चतुर्विधपुरु-
षार्थसिद्धिप्रदे तत्सवितुर्व्वरदात्मिके ह्रीं वरेण्यं भर्गो देवस्त वर-
दात्मिके अतिबले सर्वदयामूर्ते बले सर्वक्षुच्छ्रमोपनाशिनी धीमहि
धियो यो नजर्ति प्रचुर्या या प्रचोदयात्मिके प्रणवशिरस्कात्मिके
हुं फट् स्वाहाः ॥ १४ ॥
एवं विद्वान् कृतकृत्यो भवति सावित्र्या एव सलोकतां
जयतीत्युपनिषत् ॥ १५ ॥
बलि अतिबलि नाम की दो विद्याओं के ऋषि विराट पुरुष हैं
और उनका छन्द और देवता गायत्री हैं । उसका 'अ'कार बीज है और
'उ'कार शक्ति । उनका 'म'कार कीलक है । भूख की निवृत्ति के लिए
इसका विनियोग है । क्लीं के माध्यम से इनका षडङ्गन्यास करना
चाहिए । ॐ क्लीं हृदयाय नमः, ॐ क्लीं शिरसे स्वाहा, ॐ क्लीं शिखायै
वषट्, ॐ क्लीं कवचाय हुम, ॐ क्लीं नेत्रयाय वौषट्, ॐ क्लीं अस्त्राय
फट् ।' अब ध्यान का वर्णन किया जाता है । मैं उन बला अतिबला