सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 447, कुल 572 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 447

रुद्रहृदयोपनिषत् ] [ ४३६
मात्मा साधक द्वारा चिंतन किये जाने पर अपने निर्मल और निर्गुण
रूप से प्रकाशमान होते हैं। यह शरीर रूपी वृक्ष जीव और ईश्वर रूप
दो पक्षियों को निवास देने वाला है। इनमें जीवरूप पक्षी स्वीकृत कर्मों
का फल भोगता है। परन्तु ईश्वर उसके कर्म-फल भोग के साक्षी स्वरूप
प्रकाशित रहता है, वह कर्म का फल नहीं भोगता। माया के द्वारा ही
जीव और ईश्वर के भेद की कल्पना हुई है। यथार्थ में तो चिन्मय जीव
स्वयं ही साक्षात् ईश्वर है। जीव और ईश्वर में चित् रूप उपाधि
सम्बन्धी आकार भेद के कारण यह विभक्ति परिलक्षित होती है।
वास्तव में उनमें कोई भिन्नता नहीं है। यदि यथार्थ में ही भेद हो तो
दोनों का चित् स्वरूप ही नष्ट हो जायगा। चित् से चित् का भेद
कल्पित किया जाना जड़ रूप उपाधि से ही हुआ है। चिदाकारता से
कोई भेद नहीं हो सकता। भेद-दृष्टि ही जड़ता से उत्पन्न होती है।
चित्त की एकता युक्ति और प्रमाण दोनों के द्वारा ही परिपुष्ट है। अतः
चित् की एकता का ज्ञान हो जाने पर मनुष्य मोह और शोक से मुक्त
हो जाता है और अद्वैत परमानन्द रूप शिवत्व की उसे प्राप्ति होती है।
वह चिद्धन स्वरूप परमात्मा सम्पूर्ण विश्व का परम आश्रय है। ऋषि-
गण परमात्मा मैं ही हूँ' ऐसा मानकर शोक से छूट जाते हैं। जिन
मनुष्यों के दोष नष्ट हो गये हैं, वे ही उस सर्वसाक्षी और स्वयंज्योति
रूप परब्रह्म के दर्शन प्राप्त कर सकते हैं। माया के जाल में फँसे हुए
जीव उसे नहीं देख सकते । जो सिद्ध पुरुष आत्मा के स्वरूप का ऐसा
ज्ञान प्राप्त कर चुके हैं, वे पूर्णता को प्राप्त पुरुष कहीं आते-जाते नहीं।
जैसे परिपूर्ण आकाश कहीं जाता नहीं, वैसे ही आत्म-तत्त्व का ज्ञाता
महात्मा भी कहीं नहीं जाता। जो उस परमब्रह्म का ज्ञाता है, वह
सच्चिदानन्द रूप में स्थित होकर स्वयं ब्रह्म हो जाता है ॥ ३८-५१ ॥
॥ रुद्रहृदयोपनिषत् समाप्त ॥