१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 413, कुल 572 में से
संदर्भ में पढ़ेंदक्षिणामूर्त्युपनिषत् ] [ ४०५
प्रथम तारं अर्थात् 'ॐ' 'ब्लू' नमः' उच्चारण करके माया अर्थात्
ह्रीं वाग्भव अर्थात् ऐं तथा दक्षिणा पद को कहकर पुनः 'मूर्तये' तथा
'ज्ञानंदेहि' और अन्त में 'अग्नि की स्त्री' अर्थात् 'स्वाहा' शब्द का
उच्चारण करें अर्थात् 'ॐ' ब्लू नमो ह्रीं ऐं दक्षिणा मूर्तये ज्ञानं देहि
स्वाहा' इस अठारह अक्षर वाले मनु मन्त्र का उच्चारण करे । यह सब
मन्त्रों में अत्यन्त गोपनीय है । ११-१२ । (ध्यान) भस्म से जिनका
सारा शरीर सफेद हो रहा है तथा जो कि चन्द्रमा के टुकड़े को धारण
किये हैं एवं जो करकमल में ज्ञानमुद्रा (अभयदान की मुद्रा) रुद्राक्ष
माला, वीणा एवं पुस्तक को धारण किये हैं तथा जो कि योगियों के
पास रहने वाले पट्ट से (लकड़ी का बना हुआ भुजाटेकने का) सुशोभित
हैं। एवं जो कि व्यास पीठ पर विराजमान हैं तथा श्रेष्ठ श्रेष्ठ मुनिजन
जिनकी सेवा सुश्रूषा में लगे हैं और जो प्रसन्न मुख सर्पों से शोभित तथा
व्याघ्र चर्म को धारण किये हैं ऐसे दक्षिणामूर्ति भगवान हमारी निरन्तर
रक्षा करें । १३ । (मन्त्र द्वारा न्यास) प्रथम ओं, ह्रीं, श्रीं, कहे पुनः
'साम्ब शिवाय' पुनः 'तुभ्यं' अन्त में स्वाहा—यह बारह अक्षर वाला
मनुमन्त्र है । १४ । ध्यानः— जिन्होंने हाथों में वीणा, पुस्तक तथा रुद्राक्ष
माला धारण कर रखी है एवं (एक हाथ अभदान की मुद्रा में हमेशा
ही रहता है) तथा जिसके गले की शोभा काले घने बादल के समान है ।
और जो श्रेष्ठों में भी श्रेष्ठ हैं सर्प जिनके शरीर पर लपलपा रहे हैं एवं
जो शुकदेव आदि मुनियों द्वारा सेवित किये जा रहे हैं और जो कि
बरगद के नीचे ( वास किये ) विराजमान हैं ऐसे भगवान की मैं स्तुति
करता हूँ । १५ ।
विष्णु ऋषिरनुष्टुप् छन्दः । देवता दक्षिणाऽऽस्यः । मन्त्रेणन्यासः ।
तारं नमो भगवते तुभ्यं वटपदं ततः ।
मूलेति पदमुच्चार्य वासिने पद मुद्धरेत् ॥१६
वागीशाय पदं पश्चान्महाज्ञानपदं ततः ।