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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 363, कुल 572 में से

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पृष्ठ 363

कृष्णोपनिषत्

ॐ भद्रं कर्णेभिःशृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।।
स्थिरैरङ्गै स्तुष्टुः वांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ।। स्वस्ति न
इन्द्रो वृद्धश्रवाः ।। स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ।। स्वस्ति नस्ता-
र्क्ष्यो अरिष्टनेमिः ।। स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ।। ॐ शान्तिः,
शान्तिः, शान्तिः ।
'हे पूज्य देवो ! हम कानों से कल्याण सुनें, आँखों से कल्याण
को देखें । सुदृढ़ अङ्गों तथा देह के द्वारा तुम्हारी स्तुति करते रहें और
देवताओं ने हमारे लिये जो आयुष्य नियत कर दिया है उसे भोगें ।
महान कीर्ति वाला इन्द्र हमारा कल्याण करे, सब को जानने वाले पूषा
देव हमारा कल्याण करें जिसकी गति रोकी न जा सके ऐसे गरुड़देव
हमारा कल्याण करें और वृहस्पति हमारा कल्याण करें ! ॐ शांति,
शांति, शांति ॥

हरिः ॐ श्रीमहाविष्णुं सच्चिदानन्दलक्षणं रामचन्द्रं
दृष्ट्वा सर्वाङ्गसुन्दरं मुनयो वनवासिनो विस्मिता बभूवुः । तं
होचुर्नोऽवद्यमवतारान्वै गण्यन्ते आलिङ्गामो भवन्तमिति । भवा-
न्तरे कृष्णावतारे यूयं गोपिका भूत्वा मामालिङ्गथ अन्ये येऽव-
तारास्ते हि गोपा न स्त्रीश्च नो कुरु ।

अन्योन्यविग्रहं धार्यं तवाङ्गस्पर्शनादिह ।
शश्वत्स्पर्शयितास्माकं गृह्लीमोऽवतानवयम् ॥१॥
रुद्रादीनां वचः श्रुत्वा प्रोवाच भगवान्स्वयम् ।