१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 354, कुल 572 में से
संदर्भ में पढ़ें३४६ ] [ गोपालपूर्वतापिन्युपनिषत्
प्रेरकः । तन्माया चेति सकलं परं ब्रह्मैव तत् । यो ध्यायति
रसति भजति सोऽमृतो भवतीति । ते होचुः । किं तद्रूपं किं रसनं
किमाहो तद्भजनं तत्सर्वं विविदिषतामाख्याहीति । तदुहोवाच
हैरण्यो गोपवेषमभ्रामं कल्पद्रुमाश्रितम् । तदिह श्लोका भवन्ति ॥
सत्पुण्डरीकनयनं मेघाभं वैद्युताम्बरम् । द्विभुजं ज्ञानमुद्राढ्यं
वनमालिनमीश्वरम् ॥ १ ॥ गोपगोपीगवावीतं सुरद्रुमतलाश्रि-
तम् । दिव्यालंकरणोपेतं रत्नपङ्कजमध्यगम् ॥ २ ॥ कालिन्दी-
जलकल्लोलसङ्गिमारुतसेवितम् । चिन्तयञ्चेतसा कृष्णं मुक्तो
भवति संसृतेः ॥ ३ ॥
सच्चिदानन्द स्वरूप परमेश्वर श्रीकृष्ण के नाम में 'कृष' शब्द
सत्ता-वाचक और 'न' शब्द आनन्दबोधक है । यह सच्चिदानन्द स्वरूप
श्रीकृष्ण अनायास ही सब कुछ कर सकने में समर्थ हैं, सब की बुद्धि के
साक्षी और सब के जानने योग्य है । वे सम्पूर्ण विश्व के गुरु हैं । उनके
लिये नमस्कार हो ।
एक समय मुनियों ने ब्रह्माजी से प्रश्न किया कि "भगवन् ! कौन
देवता सर्वश्रेष्ठ है ? मृत्यु किससे भय मानती है ? किसके तत्त्व को भले
प्रकार जान लेने पर सब कुछ जान लिया जाता है ? यह जगत किसकी
प्रेरणा से आवागमन के चक्र में घूमता है ?"
ब्रह्माजी ने मुनियों को उत्तर दिया—"'सर्वश्रेष्ठ देवता श्रीकृष्ण
हैं, वही गोविन्द हैं, उनसे मृत्यु भी भयभीत रहती है । उन गोपीजन-
वल्लभ के तत्व को जो कोई जान लेता है, उसे अनजाना कुछ नहीं
रहता । स्वाहा रूप माया की प्रेरणा से यह सम्पूर्ण जगत आवागमन के
चक्र में पड़ा घूम रहा है ।"