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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 348, कुल 572 में से

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पृष्ठ 348

३४० ] [ रामपूर्वतापिन्युपनिषत्
और शक्ति आदि से सम्पन्न 'हुम्' बारह बीज-मन्त्र हैं । अब श्रीराम
विषयक माला-मन्त्र को कहेंगे । इसमें प्रथम प्रणव, फिर नमः, निद्रा,
स्मृति, मेद और कामिका है जो रुद्र से युक्त है, फिर अमर से अलंकृत
अग्नि और मेधा कामिका है जो रुद्र से युक्त है, फिर अमर से अलंकृत
अग्नि और मेधा है । फिर अक्रूर से युक्त दीर्घ कला है । फिर ह्लादिनी
है और इसके बाद मानदा कला से विभूषित दीर्घ कला है, फिर क्षुधा
है । यहाँ तक कि 'ॐ नमो भगवते रघुनन्दनाय' बन गया । इसके
पश्चात् क्रोधिनी, अमोघा और मेधा से युक्त विश्व है । फिर दीर्घा है,
ज्वालिनी सूक्ष्म से संयुक्त है ; फिर प्रतिष्ठा से युक्त प्रणवकला है ।
फिर ह्लादिनी और त्वक् है । यहां तक 'रक्षोघ्नविशदाय' की पूर्ति हुई ।
फिर क्ष्वेल, प्रीति, अमर, ज्योति, अग्नि से युक्त तीक्ष्णा, अनुस्वार से
युक्त श्वेता, फिर कामिका, व, द और अनन्त से युक्त न, दीर्घ स्वर
युक्त वायु, सूक्ष्म इकार युक्त विष, कामिका, कामिका में रुद्र, स्थिरा
और ए की मात्रा युक्त स है । इससे 'मधुरप्रसन्नवदनायामिततेजसे' बन
गया । फिर तापिनी, दीर्घ भू, अनिल से 'बलाय' बना । फिर अनन्तग
अनल, नारायणात्मक मकार और प्राण से 'रामाय' सिद्ध हुआ,
विद्यामय अम्भस्, पीता, रति, ए की मात्रा युक्त व है, इससे विष्णवे
बना । अन्त में नमः और प्रणव है । यह संतालीस अक्षरों वाला राज्या-
भिषिक्त श्रीराम से सम्बन्धित माला-मन्त्र है । सगुण होते हुए भी
यह साधकों के तीनों गुणों को नष्ट करने वाला है । यह मन्त्र पूर्वोक्त
क्रम-पूर्वक ही लिखा जाना चाहिये । उपरोक्त मन्त्र सर्वात्मक है । इसे
प्राचीन कालीन विद्वानों ने बताया और अनेक ऋषि मुनियों ने इसके
द्वारा साधना की है । इसके सेवन करने वाले साधकों को आरोग्य की
प्राप्ति तथा आयु वृद्धि होती है और अन्त में वे इस संसार के बन्धनों
से मुक्त हो जाते हैं । यह साधन पुत्रहीनों को पुत्र प्राप्त कराने वाला