१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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जिस प्रकार पंचतत्वों के हेर-फेर से शरीर में विविध
प्रकार के परिवर्तन होते हैं, उसी प्रकार आत्मिक क्षेत्र में प्राण
की स्थिति में हेर-फेर होने से मनोभूमि में महत्वपूर्ण परिवर्तन
होते है। चूंकि अनेक जन्मों के संग्रहीत कुसंस्कारों के कारण
मन में कितनी ही विकृतियां भरी रहती हैं और वे साधक को
पथभ्रष्ट करने के लिये निरन्तर दुरभिसंधि करती रहती हैं।
मन का उच्चाटन, जहाँ घूमना, निर्दिष्ट लक्ष पर स्थिर न
होना आदि विघ्नों के शमन का एक महत्वपूर्ण उपाय प्राणों का
निरोध है। इसी प्रकार जो कुसंस्कार मन को सन्मार्ग पर चलने
से डराते और कुमार्ग की ओर ललचाते हैं, उन्हें नियंत्रित करने
का सुनिश्चित शस्त्र भी प्राण-संयम ही है। सत्संग, स्वाध्याय,
चिन्तन, मनन से कुविचारों को बहुत हद तक शान्त किया जा
सकता है, पर अन्तर्मन के प्रसुप्त क्षेत्र में जो कुसंस्कारों की
ग्रन्थियाँ जमी होती हैं, वे अवसर पाते ही पुनः जाग्रत हो
जाती हैं और सत्संग आदि से संग्रहीत ज्ञान देखते-देखते तिरोहित
हो जाता है।
कई बार ज्ञानी गुरु कहे जाने वाले लोग भी कुमार्ग-
गामी होते देखे गये हैं। इसका कारण यही है कि उसने सद्-
विचारों को सुना समझा तो बहुत था पर प्राण-निग्रह द्वारा
गुप्त मन की संस्कार-ग्रन्थियों का शमन नहीं किया था। फल-
स्वरूप वे अवसर पाते ही सजीव हो उठीं और आँधी-तूफान
जिस प्रकार घास के ढेर को उड़ा ले जाता है, उसी प्रकार
कुसंस्कारों का प्रवाह उस संग्रहीत ज्ञान को उड़ा ले गया।
मनोभूमि को शोधने और चिर संचित कुसंस्कारों का
उन्मूलन करने के लिये प्राणायाम का बड़ा महत्व है। उपनिषदों
में वर्णित साधना विधान में प्राणायाम को प्रमुख स्थान दिया