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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 33, कुल 572 में से

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पृष्ठ 33

थे। किसी के पुण्यात्मा होने की एक कसौटी यह भी थी कि
लोग उसका अन्न ग्रहण करते हैं या नहीं।
अथर्ववेद ८।६। २५ में कहा गया है:—
सर्वौ वा एष जग्ध पाप्मा यस्यान्रमश्नन्ति ।
‘अर्थात्, वही व्यक्ति पुण्यात्मा है जिसका अन्न दूसरे
खाते हैं।”
आज भी पुरानी वह प्रथा देहाती क्षेत्रों में किसी रूप में
प्रचलित है कि जिसके आचरण अनुचित समझे जायें, उसके
यहाँ का अन्न जल ग्रहण न किया जाय। जातिच्युत होने में
यही दण्ड मुख्य होता है।
वाल्मीकि रामायण में अन्तःकरण को देवता के रूप में
प्रस्तुत करते हुए इसी प्रकार का प्रतिफल किया गया है,
लिखा है:—
“यदन्न पुरुषो भवति तदन्ना स्तस्य देवताः ।”
“अर्थात् मनुष्य जैसा अन्न खाता है वैसा ही उसके देवता
खाते हैं।”
कुधान्य खाकर साधना करने से साधक का इष्ट भी भ्रष्ट
हो जाता है और उससे जिस प्रतिफल की आशा की गई थी,
वह प्रायः नहीं ही प्राप्त होता ।
प्राण और उसका निग्रह
ब्रह्म की उपासना में प्राण साधना का अत्यधिक महत्व
है। आत्मा ईश्वर का अंश होने से साक्षी, दृष्टा और निर्लिप्त
है। उसकी शक्ति प्राण है और इस प्राण-शक्ति के आधार पर
ही जीव का सारा जीवनक्रम संचालित होता है। जैसे निर्लिप्त
ब्रह्म की क्रिया-शक्ति माया या प्रकृति है, उसी प्रकार जीव की
सक्रियता प्राण-शक्ति में सन्निहित है।