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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 288, कुल 572 में से

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पृष्ठ 288

२८० ] [ ध्यानबिन्दूपनिषत्
ब्रह्मा पूरक इत्युक्तो विष्णुः कुम्भक उच्यते ।
रेचा रुद्र इति प्रोक्तः प्राणायामस्य देवताः ॥२१
इस प्रकार से ॐकार को जो नहीं जानता वह ब्राह्मण नहीं
माना जा सकता। यह प्रणव धनुष है, आत्मा बाण है और ब्रह्म लक्ष्य
है। बाण से सावधानी के साथ तन्मय होकर इस लक्ष्य को बेध करने
और 'अवर' को जान लेने से सब क्रियाओं से निवृत्ति हो जाती है
॥ १४-१५ ॥ ॐकार से देवता हुए, ॐकार से स्वर हुए और
ॐकार से ही तीनों लोक के समस्त चराचर हुये ॥ १६ ॥ इसका ह्रस्व
अंश पापों को हरता है, दीर्घ अव्यय स्वरूप सम्पत्ति को देता है, इस
प्रकार अर्धमात्रा युक्त प्रणव मोक्षदायक है ॥ १७ ॥ तेल की अविच्छिन्न
धार के समान, घण्टा के दीर्घ निनाद के समान नाद के अग्र में वाच्य
रहित प्रणव है, उसे जानने वाला ही वेदज्ञ है ॥ १८ ॥ हृदयरूपी कमल
की कर्णिका में दीपशिखा तुल्य, अंगुष्ठमात्र आकार के ॐकार रूप ईश्वर
का ध्यान करे ॥ १६ ॥ इड़ा ( बांयी नासिका ) से वायु को उदर में
भरे और देह के मध्य में ज्वालामय ॐकार का ध्यान करे। पूरक को
ब्रह्मा और कुम्भक को विष्णु और रेचक को रुद्र कहा गया है, ये तीनों
प्राणायाम के देवता हैं ॥ २०- २१ ॥
आत्मानमरणिं कृत्वा प्रणवं चोत्तरारणिम् ।
ध्याननिर्मथनाभ्यासा देवं पश्येन्निगूढवत् ॥२२
ओंकारध्वनिनादेन वायोः संहरणांतिकम् ।
यावद्वलं समादध्यात्सम्यङ् नादलयावधि ॥२३
गमागमस्थं गमनादिशून्यमोंकारमेकं रविकोटिदीप्तम् ।
पश्यन्ति ये सर्वजनान्तरस्थं हंसात्मकं ते विरजा भवन्ति ॥२४