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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 248, कुल 572 में से

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पृष्ठ 248

२४० ] [ प्राणाग्निहोत्रोपनिषत्
आदि दर्जनों के ज्ञान के संसार की निवृत्ति ( संसार से निवृत्ति )
पराङ्मुखता ( मोक्ष प्राप्ति ) हो जाती है ॥ १ ॥ बाह्य प्राणाग्नि-
होत्र की विधि अपनी-अपनी विधि के अनुसार पृथ्वी में बनाई वेदिका में
शाकयुक्त अन्न रख कर 'या ओषधय' या फलिनी......जीवला नया-
रिशां......'इन तीन तथा' अन्नपते अन्नस्य......यदन्नमग्नि......इन
दो से अभिमन्त्रित करे ॥ २ ॥ अब क्रमशः वह उपर्युक्त तीन व दो
ऋचायें लिखी जाती हैं—जो सोम देवता प्रधान शतवीर्यं बहुशाखा वाली
वृहस्पति प्रसूत ओषधियां हैं वह हमें पापमुक्त करदें ॥ ३ ॥ जो फल-
युक्त, फलहीन, पुष्पहीन, अथवा पुष्प ( फूल ) युक्त वृहस्पति प्रसूत
( उत्पन्न ) ओषधियां हैं, वह हमें पापमुक्त करदें ॥ ४ ॥ इन दो
मन्त्रों तथा 'जीवला......रक्षांसि चातयान्'—इस तीसरे मन्त्र द्वारा
एवं......अन्नपते......द्विपदे चतुष्पदे यदंग्निना......ईशानाय स्वाहा,
इन दो मन्त्रों से अभिषेक करना चाहिये । अर्थात् क्रमशः दिये इन पांच
मन्त्रों से उस पिण्ड पर जलाभिषेक करना चाहिये ॥ ५ ॥
अन्नेपतेऽन्नस्य नो धेह्यनमीवस्य शुष्मिणः ।
प्रप्रदातारं तारिष ऊर्जं नो धेहि द्विपदे चतुष्पदे ॥६
यदन्नमग्निर्बहुधा विरुदं रुद्रैः
प्रजाधं यदि वा पिशाचैः ।
सर्वं तदीशानो अभयं कृणोतु
शिवमीशानाय स्वाहा ॥७
अन्तश्चरसि भूतेषु गुहायां विश्वतोमुखः ।
त्वं तज्ञस्त्वं ब्रह्मा त्वं रुद्रस्त्वं विष्णुस्त्वं वषट्कार आपो
ज्योती रसोऽमृतं ब्रह्म भूर्भुवः सुवर्रों नमः ॥८
आपः पुनन्तु पृथिवीं पूता पुनातु माम् ।
पुनन्तु ब्रह्मणस्पतिर्ब्रह्मा पूता पुनातु माम् ॥