१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२१२ ] [त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत्
ध्यान करे, जिससे योगी मुक्ति को प्राप्त करने में समर्थ होता है।
जल वाले अंश में नारायण का ध्यान करे, अग्नि के अंश में
प्रद्युम्न का, वायु-अंश में संकर्षण का और आकाश वाले अंश में
परमात्मा वासुदेव का ध्यान करे ॥ १४१-१४३ ॥ जो सदैव इस
अभ्यास को करता रहता है उसको परमात्मा का साक्षात्कार शीघ्र
ही हो जाता है। पहले योगासन पर बैठकर हृदय-प्रदेश में हृदय
को स्थिति करते हुये नासाग्र पर दृष्टि को स्थिर करे, जिह्वा को
तालु में लगावे, ऊपर और नीचे के दांतों का स्पर्श न होने दे, शरीर
को ऊँचा करके समाहित होकर बैठे और शुद्ध आत्मबुद्धि से
इन्द्रियों का संयम करता हुआ भगवान् वासुदेव का चिन्तन करे
॥ १४४-१४६ ॥
स्वरूपव्याप्तरूपस्य ध्यानं कैवल्यसिद्धिदम् ।
याममात्रं वासुदेवं चिन्तयेत्कुम्भकेन यः ॥१४७
सप्तजन्मार्जितं पापं तस्य नश्यति योगिनः ।
नाभिकन्दात्समारभ्य यावद्धृदयगोचरम् ॥१४८
जाग्रद्वृत्तिं विजानीयात्कण्ठस्थं स्वप्नवर्तनम् ।
सुषुप्तं तालुमध्यस्थं तुर्यं भ्रूमध्यसंस्थितम् ॥१४६
तुर्यातीतं परं ब्रह्म ब्रह्मरन्ध्रे तु लक्षयेत् ।
जाग्रद्वृत्तिं समारभ्य यावद्ब्रह्मबिलान्तरम् ॥१५०
तत्रात्माऽयं तुरीयः स्यात् तुर्यान्ते विष्णुरुच्यते ।
ध्यानेनैव समायुक्तो व्योम्नि चात्यन्तनिर्मले ॥१५१
सूर्यकोटिद्युतिधरं नित्योदितमधोक्षजम् ।
हृदयाम्बुरुहासीनं ध्यायेद्वा विश्वरूपिणम् ॥१५२
इस प्रकार अपने भीतर व्याप्त परमात्मा के स्वरूप का ध्यान
करने से कैवल्य की प्राप्ति होती है। इस प्रकार एक प्रहर तक