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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 218, कुल 572 में से

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पृष्ठ 218

२१० ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत्
को खींचना प्रत्याहार कहा जाता है। पैर का अँगूठा, एड़ी जांघ का
मध्यभाग उरु का मध्य, गुदा का मूल, हृदय, उपस्थ, देह का मध्य,
नाभि, कण्ठ, कोहनी, तालु-मूल, नासिका का मूल, आंखों का मण्डल
भौंहों का मध्य, ललाट, मस्तक का मूल, घुटने का मूल, हाथों का
मूल स्थान—ये सब इस पञ्चभौतिक देह के मर्म स्थल हैं
॥ १२६--१३२ ॥
मनसो धारणं यत्तुयुक्तस्य च यमादिभिः ।
धारणा सा च संसारसागरोत्तारकारणम् ॥१३३
आजानुपदपर्यन्तं पृथिवीस्थानमिष्यते ।
पीतला चतुरस्त्रा च वसुधा वज्रलाञ्छिता ॥१३४
स्मर्त्तव्या पञ्चघटिका तत्रारोप्य प्रभञ्जनम् ।
आजानुकटिपर्यन्तमपां स्थानं प्रकीर्तितम् ॥१३५
अर्धचन्द्रसमाकारं श्वेतमजुंनलाञ्छितम् ।
स्मर्त्तव्यमम्भः श्वसनमारोप्य दशनाडिका ॥१३६
आदेहमध्यकट्यन्तमग्निस्यानमुदाहृतम् ।
तत्र सिन्दूरवर्णोऽग्निर्ज्वलनं दश पञ्च च ॥१३७
स्मर्त्तव्या घटिका प्राणं कृत्या कुम्भे तथेरितम् ।
नाभेरुपरि नासान्तं वायुस्थानं तु तत्र वै ॥१३८
वेदिकाकारबद्ध श्रो बलवान्भूतमारुतः ।
स्मर्तव्यः कुम्भकेनैव प्राणमारोप्य मारुतम् ॥१३९
घटिकाविंशतिस्तस्माद् घ्राणाद्ब्रह्मबिलावधि ।
व्योमस्थानं नभस्तत्र भिन्नाञ्जनसमप्रभम् ॥१४०
यमादि द्वारा मन का जो धारण करना है वही धारणा है
जिससे मनुष्य संसार-सागर को पार करने में समर्थ होता है
॥१३३॥ घुटनों से पैर तक पृथ्वी-स्थान कहा जाता है, पीतवर्ण की