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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 209, कुल 572 में से

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पृष्ठ 209

त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् [ २०१
प्राण एवाथवा ज्येष्ठो जीवात्मानं विभर्ति यः ।
आस्यनासिकयोर्मध्यं हृदयं नाभिमण्डलम् ॥७८
पादांगुष्ठमिति प्राणस्थानानि द्विजसत्तम ।
अपानश्चरति ब्रह्मन् गुदमेढ्रोरुजानुषु ॥७९
समानः सर्वगात्रेषु सर्वव्यापी व्यवस्थितः ।
उदानः सर्वसन्धिस्थः पादयोर्हस्तयोरपि ॥८०
कन्द से पैर के अंगूठे तक कौशिकी नाम वाली नाड़ी गई है ।
इस प्रकार ये दस नाड़ियाँ कन्द से निकली हुई कही गई हैं ॥ ७३ ॥
उनसे निकलने वाली अन्य बहुत सी स्थूल और सूक्ष्म नाड़ियाँ हैं,
जिनकी संख्या सब मिलाकर बहत्तर हजार कही गई है ॥ ७४ ॥ इन
स्थूल और सूक्ष्म नाड़ियों की गिनती कर सकना कठिन है, वे उसी
प्रकार फैली हुई हैं जिस प्रकार पीपल के पत्ते में नसें फैली होती हैं
॥ ७५ ॥ प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, नाग, कूर्म, कृकर,
देवदत्त और धनञ्जय—ये दश वायु भी नाड़ियों में चलते रहते हैं ।
इनमें प्राण आदि प्रथम पाँच मुख्य हैं, अथवा दो (प्राण और अपान)
मुख्य हैं अथवा प्राणवायु ही सबसे मुख्य है जो जीव को धारण किये
रहता है । हे द्विज श्रेष्ठ ! प्राण के मुख्य स्थान पाँच हैं-मुख
नासिका का मध्य भाग, हृदय, नाभि-मण्डल और पैर का अँगूठा
अपान, गुदा, मेढ्र, जङ्घा, और घुटने में चलता है । समान वायु सब
अङ्गों में व्याप्त रहता है और उदान चारों हाथ पैरों और सब संधि
स्थानों में स्थित है ॥७६-८०॥
व्यानः श्रोत्रोरुकट्यां च गुल्फस्कन्धगलेषु च ।
नागादिवायवः पञ्च त्वगस्थ्यादिषु संस्थिताः ॥८१
तुन्दस्थं जलमन्नं च रसादि च समीकृतम् ।
तुन्दमध्यगतः प्राणस्तानि कुर्यात्पृथक्पृथक् ॥८२