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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 208, कुल 572 में से

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पृष्ठ 208

२०० ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत्
सव्येतरश्रुत्यवधि पायु मूलावम्बुसा ।
अधोगता शुभा नाडी मेढ्रान्तावधिरायता ॥७२
अन्य प्राणियों का मध्य भाग नाभि के मध्य में होता है। प्राण
और अपान से संयुक्त सुषुम्ना नाड़ी देह में चार प्रकार से प्रकाशित
होती है ॥६६॥ कन्द के मध्य भाग में जो सुषुम्ना-नाड़ी स्थित है,
वह पद्मसूत्र के समान अत्यन्त सूक्ष्म है और सीधी ऊपर की तरफ गई
है॥६७॥ ब्रह्मरन्ध्र तक जाने वाली यह "वैष्णवी ब्रह्मनाड़ी" विद्युत
के समान प्रकाशयुक्त और निर्वाण प्राप्त करने वाली है ॥६८॥
उसके अगल-बगल में इड़ा और पिंगला नाड़ियाँ स्थित हैं। इड़ा कन्द
से निकलकर बांये नासापुट तक गई है और पिङ्गला दांये नासापुट
तक। गान्धारी और हस्तजिह्वा दो अन्य नाड़ियां भी वहां हैं जो उनके
आगे-पीछे बांयी और दांयी आंख तक गई हैं। पूषा और यशस्विनी
दो नाड़ियां गुदा मूल से निकलकर दांये और बांये कान तक गई
हैं। अलम्बुसा नाम की नाड़ी मेढ़ स्थान के अन्त तक नीचे की
ओर गई हैं ॥६६—७२॥
पादांगुष्ठावधिः कन्दादधोयाता च कौशिकी ।
दशप्रकारभूतास्ताः कथिताः कन्दसंभवाः ॥७३
तन्मूला बहवो नाड्यः स्थूलाः सूक्ष्माश्च नाडिकाः ।
द्वासप्ततिसहस्राणि स्थूलाः सूक्ष्मश्च नाड्यः ॥७४
संख्यातुं नैव शक्यन्ते स्थूलमूलाः पृथग्विधाः ।
यथाऽश्वत्थदले सूक्ष्माः स्थूलाश्च विततास्तथा ॥७५
प्राणापानौ समानश्च उदानो व्यान एव च ।
नागः कूर्मश्च कृकरो देवदत्तो धनंजयः ॥७६
चरन्ति दशनाडीषु दश प्राणादिवायवः ।
प्राणादिपञ्चकं तेषु प्रधानं तत्र च द्वयम् ॥७७