१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 38, कुल 505 में से
संदर्भ में पढ़ें॥ एकाक्षरोपनिषद् ॥
कृष्ण यजुर्वेद से सम्बद्ध इस उपनिषद् में ऋषि एक ही अक्षर (अविनाशी) परमात्मा को अन्तरिक्ष में
प्रवाहित सोम, सुषुम्ना में संचरित प्राण तथा पूरे विश्व में संचरित जीवन तत्त्व के रूप में अनुभव करते हैं। उन्हें ही
विघ्ननाशक अरिष्टनेमि से लेकर कुमार कार्तिकेय के रूप में सक्रिय देखते हैं। उसी परमात्म तत्त्व को इन्द्र, रुद्र,
सूर्य आदि की विशेषताओं के रूप में तीनों गुणों, चारों वेदों तथा चराचर जगत् में संव्याप्त देखते हुए, साधकों को
उसी एक मात्र अविनाशी की उपासना द्वारा अविद्याजन्य भ्रमों का उच्छेदन करके जीवन मुक्त-ज्योति स्वरूप हो
जाने का उपदेश दिया गया है।
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ सह नाववतु .......... इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य- अमृतनादोपनिषद)
एकाक्षरं त्वक्षरेऽत्रास्ति सोमे सुषुम्नायां चेह दृढी स एकः ।
त्वं विश्वभूर्भूतपतिः पुराणः पर्जन्य एको भुवनस्य गोप्ता ॥ १ ॥
हे भगवन् ! आप अक्षर (अर्थात् शाश्वत), सोम, परब्रह्म के रूप में तथा सुषुम्ना (मार्ग से सहस्त्रार
चक्र) में अपनी सत्ता सहित प्रतिष्ठित एक ही अविनाशी तत्त्व एकाक्षर में स्थित रहते हैं। आप ही विश्व के
कारणरूप, प्राणिमात्र के स्वामी, पुराण पुरुष एवं सभी रूपों में विद्यमान हैं। (आप ही) पर्जन्य (वर्षा
आदि) के द्वारा सभी लोकों की रक्षा करने वाले हैं ॥ १ ॥
विश्वे निमग्नपदवीः कवीनां त्वं जातवेदो भुवनस्य नाथः ।
अजातमग्रे स हिरण्यरेता यज्ञस्त्वमेवैकविभुः पुराणः ॥ २ ॥
(हे सर्वशक्तिमान् !) आप ही समस्त विश्व-वसुधा के कण-कण में जीवनी शक्ति के
रूप में विद्यमान हैं। आप कवियों (मन्त्रद्रष्टा ऋषियों) के आश्रयभूत हैं, समस्त लोकों की
रक्षा करने वाले हैं। आप ही हिरण्यरेता (अग्नि) रूप और यज्ञ रूप भी हैं। आप ही एक मात्र
विराट् एवं पूर्ण पुरुष हैं ॥ २ ॥
[सृष्टि के संकल्प का बीज जब ब्रह्म के तेजस् में पकता है, तब उसे हिरण्यगर्भ कहते हैं तथा जब
परब्रह्म संकल्प-बीज का आधान करता है, तो उसे हिरण्यरेता कहते हैं।]
प्राणः प्रसूतिर्भुवनस्य योनिर्व्याप्तं त्वया एकपदेन विश्वम् ।
त्वं विश्वभूर्योनिपारः स्वगर्भे कुमार एको विशिखः सुधन्वा ॥ ३ ॥
जिस प्रकार माला के प्रत्येक दाने (मनके) में सूत्र (धागा) रहता है, उसी प्रकार आप ही
प्रमुख (सूत्र) रूप से समस्त विश्व में प्राण रूप में संव्याप्त एवं उसके उत्पत्ति के कारण स्वरूप हैं। आपने
ही समस्त विश्व को एक पग से माप लिया है, अतः आप ही इस विश्व संरचना के उत्पत्ति स्थल भी हैं।
आप ही प्राण रूप में सर्वत्र व्याप्त (विष्णु की तरह) संसार के रक्षक रूप तथा श्रेष्ठ धनुष को धारण करने
वाले कुमार (कार्तिकेय) स्वरूप हैं ॥ ३ ॥