१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 37, कुल 505 में से
संदर्भ में पढ़ें(इसलिए) सम्भूति (समय के अनुरूप नया सृजन) तथा असम्भूति-विनाश (अवाञ्छनीय को
समाप्त करना) - इन दोनों कलाओं को एक साथ जानो। विनाश की कला से मृत्यु को पार करके
(अनिष्टकारी को नष्ट करके मृत्यु भय से मुक्ति पाकर) तथा सम्भूति (उपयुक्त निर्माण) की कला से
अमृतत्व की प्राप्ति की जाती है ॥ १४॥
हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्।
तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ॥ १५ ॥
सोने के (चमकदार-लुभावने) पात्र से सत्य (आदित्यमण्डलस्थ ब्रह्म) का मुख ढँका हुआ है। हे
पूषन्! मुझ सत्यान्वेषण करने वाले के लिए (आत्मावलोकन के इच्छुक के लिए) उसे (उस आवरण
को) अपावृत करें- हटा दें ॥ १५॥
पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन्समूह। तेजो यत्ते रूपं
कल्याणतमं तत्ते पश्यामि योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि ॥ १६ ॥
हे पूषन् (जगत्पोषक)! हे एकाकी गमन करने वाले!, हे यम (नियन्त्रण करने वाले)!, हे सूर्य
(सर्वप्रेरक)!, हे प्राजापत्य (सृजनशील)! आप अपनी किरणों (चकाचौंध) को हटा लें, आपका जो
अतिशय कल्याणकारी स्वरूप है, उसे मैं देख रहा हूँ (उसका ध्यान कर रहा हूँ)। यह जो पुरुष (आदित्य
मण्डलस्थ ब्रह्म) है, वही मैं हूँ॥ १६॥
वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तः शरीरम् ।
ॐ क्रतो स्मर कृतं स्मर क्रतो स्मर कृतं स्मर ॥ १७॥
यह जीवन (अस्तित्व) वायु-अग्नि आदि (पंचभूतों) तथा अमृत (सनातन आत्मचेतना) के संयोग
से बना है। शरीर तो अन्ततः भस्म हो जाने वाला है। (इसलिए) हे संकल्प कर्ता ! तुम परमात्मा का
स्मरण करो, अपनी सामर्थ्य का स्मरण करो और जो कर्म कर चुके हो, उसका पुनः-पुनः स्मरण करो ॥ १७॥
अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्।
युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नम उक्तिं विधेम ॥ १८ ॥
हे अग्ने (यज्ञ प्रभु) ! आप हमें श्रेष्ठ मार्ग से ऐश्वर्य की ओर ले चलें। हे विश्व के अधिष्ठातादेव ! आप
कर्म मार्गों के श्रेष्ठ ज्ञाता हैं। हमें कुटिल पाप कर्मों से बचाएँ। हम पुनः-पुनः (भूयिष्ठ) नमन करते हुए
आप से विनय करते हैं ॥ १८ ॥
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं ......... इति शान्तिः
॥ इति ईशावास्योपनिषत्समाप्ता ॥