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१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

अध्याय १ खण्ड ६ मन्त्र ५ २८७

अध्याय १ खण्ड ६ मन्त्र ५ २८७
खींचकर उसे पेट के अन्दर रहने वाले, ज्वालाओं से युक्त, रेफ और बिन्दु सहित अग्नि मण्डल से संयुक्त करने
का ध्यान (चिन्तन) करना चाहिए तथा इसके बाद पिंगला नाड़ी द्वारा अन्दर की वायु को बाहर निकालना
चाहिए। तदनन्तर पिंगला से वायु भरकर अन्तःकुम्भक करके इड़ा नाड़ी से उसे बाहर निकालना चाहिए॥ २॥
त्रिचतुस्त्रिचतुःसप्तत्रिचतुर्मासपर्यन्तं त्रिसंधिषु तदन्तरालेषु च षट्कृत्व आचरेन्नाडीशु-
द्धिर्भवति। ततः शरीरे लघुदीप्तिवह्निवृद्धिनादाभिव्यक्तिर्भवति॥ ३-४॥
इस तरह से ४३ दिन (त्रिचतुः=४३), तीन, चार या सात मास (त्रि चतुः सप्त) अथवा एक वर्ष (त्रिचतुः
३x४=१२ मास) पर्यन्त त्रिकाल सन्ध्या के साथ तीन-तीन अथवा चार-चार बार तथा उनके मध्य में छः बार
तक अभ्यास करना चाहिए। इस अभ्यास से नाड़ी की शुद्धि हो जाती है। तदनन्तर इस अभ्यास से शरीर में
हल्कापन, चेहरे में चमक (कान्ति), अग्नि की अभिवृद्धि तथा नाद श्रवण होने लगता है॥ ३-४॥
॥ षष्ठः खण्डः ॥
प्राणापानसमायोगः प्राणायामो भवति। रेचकपूरककुम्भकभेदेन स त्रिविधः। ते
वर्णात्मकाः। तस्मात्प्रणव एव प्राणायामः॥ १-२॥
प्राण तथा अपान को एकत्रित कर देना ही प्राणायाम होता है। रेचक, पूरक तथा कुम्भक के भेद से
प्राणायाम तीन तरह का होता है। वे रेचक, पूरक, कुम्भक (प्राणायाम) वर्ण के स्वरूप से युक्त हैं इस कारण
प्रणव ही प्राणायाम कहलाता है॥ १-२॥
पद्माद्यासनस्थः पुमान्नासाग्रे शशभृद्बिम्बज्योत्स्नाजालवितानिताकारमूर्ती रक्ताङ्गी हंस-
वाहिनी दण्डहस्ता बाला गायत्री भवति। उकारमूर्तिः श्वेताङ्गी तार्क्ष्यवाहिनी युवती चक्रहस्ता
सावित्री भवति। मकारमूर्तिः कृष्णाङ्गी वृषभवाहिनी वृद्धा त्रिशूलधारिणी सरस्वती
भवति॥३॥ अकारादित्रयाणां सर्वकारणमेकाक्षरं परंज्योतिः प्रणवं भवतीति॥ ४॥
पद्म आदि किसी भी आसन पर आसीन होकर पुरुष को ध्यान करना चाहिए- 'नासिका' के अग्रभाग
पर चन्द्रमण्डल की ज्योत्स्ना से आवृत, लाल रंग के अंगवाली, हंस पर आसीन, अपने हाथ में दण्ड को धारण
किये हुए, बालरूप, 'अ' कार मूर्ति से युक्त 'गायत्री' हैं। 'उ' कार मूर्ति सावित्री श्वेत-शुभ्र अंग से युक्त, गरुड़
के आसन पर प्रतिष्ठित युवावस्था से युक्त, अपने हाथ में चक्र धारण किये हुए हैं। इसी तरह से 'म' कार मूर्ति
सरस्वती कृष्णांगी, वृषभ पर आसीन, वृद्धावस्था को प्राप्त, अपने हाथ में त्रिशूल को धारण किये हुए हैं। इस
प्रकार 'अ' कार आदि तीनों वर्णों का सम्मिलित रूप 'ॐ' है तथा वह सम्पूर्ण का कारण एकाक्षर स्वरूप परम
ज्योति है। ऐसा चिन्तन करना चाहिए॥ ३-४॥
ध्यायेत् इडया बाह्याद्वायुमापूर्य षोडशमात्राभिरकारं चिन्तयन्पूरितं वायुं चतुःषष्टिमात्राभिः
कुम्भयित्वोकारं ध्यायन्पूरितं पिङ्गलया द्वात्रिंशन्मात्रया मकारमूर्तिंध्यानेनैवं क्रमेण पुनः-
पुनः कुर्यात्॥ ५॥
इस ध्यान के पश्चात् पुनः इड़ा नाड़ी के द्वारा बाहर की वायु सोलह मात्रा में खींचे तथा उस समय 'अ'
कार का ध्यान करना चाहिए। इसके बाद इसी वायु को चौंसठ मात्रा में अन्तःकुम्भक करे तथा उस समय 'उ'
कार का ध्यान करना चाहिए तथा उसके पश्चात् पिंगला नाड़ी के द्वारा बत्तीस मात्राओं से संयुक्त उस अन्दर भरी
हुई वायु को बाहर निष्कासित करे । उस समय 'म' कार मूर्ति का ध्यान करना चाहिए। इसी प्रकार से यह
क्रिया निरन्तर बार-बार करते रहना चाहिए॥ ५॥

॥ सप्तमः खण्डः ॥

२८८ शाण्डिल्योपनिषद्
॥ सप्तमः खण्डः ॥
अथासनदृढो योगी वशी मितहिताशनः सुषुम्नानाडीस्थमलशोधार्थं योगी बद्धपद्मासनो
वायुं चन्द्रेणापूर्य यथाशक्ति कुम्भयित्वा सूर्येण रेचयित्वा पुनः सूर्येणापूर्य कुम्भयित्वा
चन्द्रेण विरेच्य यया त्यजेत्तया संपूर्य धारयेत्। तदेते श्लोका भवन्तिप्राणं प्रागिडया पिबेन्नियमितं
भूयोऽन्यया रेचयेत्पीत्वा पिङ्गलया समीरणमथो बद्ध्वा त्यजेद्वामया। सूर्याचन्द्रमसोरनेन
विधिनाऽभ्यासं सदा तन्वतां शुद्धा नाडिगणा भवन्ति यमिनां मासत्रयादूर्ध्वतः॥ १ ॥
इसके पश्चात् आसन के दृढ़ हो जाने पर योगी अपनी इन्द्रियों को वश में करके, दूसरों का हित चाहते
हुए, स्वल्पाहार पर रहते हुए, सुषुम्ना नाड़ी में स्थित मल को शुष्क करने के लिए निरन्तर योगाभ्यास करता
रहे। उस समय बद्धपद्मासन पर आरूढ़ हो, चन्द्र नाड़ी के द्वारा वायु को भरकर शक्ति के अनुसार कुम्भक
करने के बाद सूर्य नाड़ी के द्वारा रेचक करना चाहिए। तदनन्तर सूर्यनाड़ी से पूरक करके कुम्भक करे तथा चन्द्र
नाड़ी से रेचक करना चाहिए। इस प्रकार जिस नाड़ी के द्वारा रेचक करे, उसी नाड़ी से पुनः पूरक करने के
बाद कुम्भक करना चाहिए। इस भाव को प्रकट करने वाले निम्न प्रकार के श्लोक वर्णित किये गये हैं-
“सर्वप्रथम इड़ा नाड़ी के द्वारा प्राण को अन्दर भरकर कुम्भक करे तथा दूसरी पिंगला नाड़ी से रेचक करे।
तत्पश्चात् पुनः पिंगला से पूरक करके कुम्भक करते हुए इड़ा नाड़ी से रेचक करना चाहिए। इस प्रक्रिया से सूर्य
और चन्द्र नाड़ी के द्वारा प्राणायाम का प्रतिदिन निरन्तर अभ्यास करने से योगी की सभी नाड़ियाँ तीन मास में
ही पूर्ण शुद्ध हो जाती हैं॥ १॥
प्रातर्मध्यन्दिने सायमर्धरात्रे तु कुम्भकान्। शनैरशीतिपर्यन्तं चतुर्वारं समभ्यसेत् ॥ २ ॥
प्रातःकाल, मध्याह्नकाल, सायंकाल तथा मध्य रात्रि में इसी तरह से चार बार मन्द-मन्द गति से अस्सी
मात्राओं तक कुम्भक का अभ्यास करना चाहिए॥ २॥
कनीयसि भवेत्स्वेदः कम्पो भवति मध्यमे। उत्तिष्ठत्युत्तमे प्राणरोधे पद्मासनं भवेत् ॥ ३ ॥
कनिष्ठ प्राणायाम के करते समय शरीर में पसीना आ जाता है, मध्यम स्तर का प्राणायाम करने में शरीर
में कँप-कँपी छूटती है और श्रेष्ठ प्राणायाम में पद्मासन में अवस्थित योगी अपने आसन से उठ जाता है॥ ३॥
जलेन श्रमजातेन गात्रमर्दनमाचरेत्। दृढता लघुता चापि तस्य गात्रस्य जायते ॥ ४ ॥
प्राणायाम करते समय श्रम के कारण शरीर में से जो पसीना निकल आता है, उस पसीने को शरीर में
मसल लेना चाहिए, क्योंकि इससे योगी का शरीर अत्यधिक मजबूत और हल्का हो जाता है॥ ४॥
अभ्यासकाले प्रथमं शस्तं क्षीराज्यभोजनम्। ततोऽभ्यासे स्थिरीभूते न तावन्नियमग्रहः ॥ ५॥
प्राणायाम का अभ्यास करते समय प्रारम्भिक अवस्था में दुग्ध एवं घृत के भोजन को ही अत्यधिक श्रेष्ठ
बतलाया गया है। तत्पश्चात् जब अभ्यास स्थिर हो जाता है, तब किसी नियम की आवश्यकता नहीं रहती ॥ ५॥
यथा सिंहो गजो व्याघ्रो भवेद्वश्यः शनैः शनैः। तथैव सेवितो वायुरन्यथा हन्ति साधकम् ॥ ६ ॥
जिस प्रकार शनैः-शनैः सिंह, गज और व्याघ्र आदि को वश में कर लिया जाता है, उसी प्रकार वायु भी
प्राणायाम के अभ्यास से धीरे-धीरे वश में आ जाती है; लेकिन इसके विपरीत नियम से चलने पर यानी
जल्दबाजी करने से वायु योगी का विनाश कर देती है॥ ६॥
युक्तंयुक्तं त्यजेद्वायुं युक्तंयुक्तं च पूरयेत्। युक्तंयुक्तं च बध्नीयादेवं सिद्धिमवाप्नुयात् ॥ ७॥

अध्याय १ खण्ड ७ मन्त्र १३ २८९

अध्याय १ खण्ड ७ मन्त्र १३ २८९
अतः जिस प्रकार से ठीक बने, वैसे ही रेचक करना चाहिए, जैसे ठीक लगे, वैसे ही पूरक करना तथा
ठीक लगने तक ही कुम्भक करना चाहिए। इस प्रकार का अभ्यास करने से शीघ्र ही सिद्धि प्राप्त हो जाती है ॥७
यथेष्टधारणाद्वायोरनलस्य प्रदीपनम्। नादाभिव्यक्तिरारोग्यं जायते नाडिशोधनात् ॥ ८ ॥
यथेष्ट शक्ति के अनुसार कुम्भक करने से अग्नि प्रज्वलित होती है तथा नाड़ियों के शुद्ध होने से नाद-
श्रवण होता है और शरीर रोगरहित हो जाता है ॥ ८ ॥
विधिवत्प्राणसंयामैर्नाडीचक्रे विशोधिते। सुषुम्नावदनं भित्त्वा सुखाद्विशति मारुतः ॥ ९ ॥
विधि-विधान पूर्वक प्राणायाम करने से योगी के समस्त नाड़ी-समूह शुद्ध हो जाते हैं। तब सुषुम्ना नाड़ी
का मुख भेदन करके वायु सुखपूर्वक उसमें प्रविष्ट हो जाता है ॥९॥
मारुते मध्यसंचारे मनःस्थैर्यं प्रजायते। यो मनः सुस्थिरो भावः सैवावस्था मनोन्मनी ॥ १० ॥
वायु जब बीच में सञ्चरित होती है, तब मन सुस्थिर होता है और जब मन की ठीक तरह से स्थिरता हो
जाती है, तब उसी स्थिरता की मनोन्मनी अवस्था कहा जाता है ॥ १० ॥
पूरकान्ते तु कर्तव्यो बन्धो जालन्धराभिधः। कुम्भकान्ते रेचकादौ कर्तव्यस्तूड्डियाणकः ॥११॥
साधक को पूरक के अन्त में (कुम्भक के समय) जालन्धर नामक बन्ध करना चाहिए तथा कुम्भक के
अन्त एवं रेचक के प्रारंभ में उड्डियान नामक बन्ध करना चाहिए ॥ ११ ॥
अधस्तात्कुञ्चनेनाशु कण्ठसंकोचने कृते। मध्ये पश्चिमतानेन स्यात्प्राणो ब्रह्मनाडिगः ॥ १२ ॥
नीचे की ओर मूलरन्ध्र का संकोचन करने में कण्ठ का संकोचन होता है और बीच के भाग को पश्चिम
(पीछे) की ओर खींचने से प्राणवायु ब्रह्मनाड़ी में निरन्तर गतिमान् होती रहती है ॥ १२ ॥
अपानमूर्ध्वमुत्थाप्य प्राणं कण्ठादधो नयन्। योगी जराविनिर्मुक्तः षोडशो वयसा भवेत् ॥१३
अपान वायु को ऊर्ध्व की तरफ ले जाकर तथा प्राणवायु को कण्ठ से नीचे की ओर लाकर के योगी
साधक वृद्धावस्था से रहित होकर सोलह वर्ष की आयु वाला हो जाता है ॥ १३ ॥
सुखासनस्थो दक्षनाड्या बहिःस्थं पवनं समाकृष्याकेशमानखाग्रं कुम्भयित्वा सव्यनाड्या
रेचयेत्। तेन कपालशोधनं वातनाडीगतसर्वरोगसर्वविनाशनं भवति ॥ १३-१ ॥
योगी सुखासन पर बैठकर दाहिनी नाड़ी के द्वारा बाहर की वायु को अन्दर की ओर खींचकर सिर के
बालों से लेकर पैर के नख की नोंक तक में वायु को रोक कर अर्थात् कुम्भक करके बायीं नाड़ी के द्वारा वायु
को बाहर निकाले अर्थात् रेचक करे। ऐसी क्रिया करने से कपाल की शुद्धि होती है और नाड़ियों में रहने वाले
समस्त रोगों का पूर्णतया विनाश ही हो जाता है ॥ १३-१ ॥
हृदयादिकण्ठपर्यन्तं सस्वनं नासाभ्यां शनैः पवनमाकृष्य यथाशक्ति कुम्भयित्वा इडया
विरेच्य गच्छंस्तिष्ठन्कुर्यात्। तेन श्लेष्महरं जठराग्निवर्धनं भवति ॥ १३-२ ॥
हृदय से लेकर कण्ठ पर्यन्त शब्द के साथ दोनों नासिका छिद्रों के द्वारा धीरे-धीरे वायु को खींचकर शक्ति
के अनुसार कुम्भक करने के बाद इड़ा नाड़ी के द्वारा रेचक करना चाहिए। यह क्रिया चलते हुए तथा खड़े हुए
भी करने ही रहना चाहिए, क्योंकि इस क्रिया से कफ का शमन और जठराग्नि की वृद्धि होती है ॥ १३-२ ॥
वक्त्रेण सीत्कारपूर्वकं वायुं गृहीत्वा यथाशक्ति कुम्भयित्वा नासाभ्यां रेंचयेत्। तेन
क्षुत्तृष्णालस्यनिद्रा न जायन्ते ॥ १३-३ ॥

२९० शाण्डिल्योपनिषद्
मुख के द्वारा सीत्कार अर्थात् सी-सी करते हुए वायु अन्दर भरकर शक्ति के अनुसार कुम्भक करने के
पश्चात् दोनों नासिका छिद्रों द्वारा रेचक की क्रिया करनी चाहिए। इससे भूख-प्यास, आलस्य अथवा निद्रा का
प्रादुर्भाव नहीं होता॥ १३-३॥
जिह्वया वायुं गृहीत्वा यथाशक्ति कुम्भयित्वा नासाभ्यां रेचयेत्। तेन गुल्मप्लीहज्वरपित्त-
क्षुधादीनि नश्यन्ति॥ १३-४॥
जिह्वा द्वारा वायु को अन्दर खींचकर शक्ति के अनुसार कुम्भक करके दोनों नासिका छिद्रों द्वारा रेचक
करना चाहिए। इससे गुल्म (गोला), तिल्ली, ज्वर, पित्त और भूख आदि रोगों का शमन हो जाता है॥ १३-४॥
अथ कुम्भकः। स द्विविधः सहितः केवलश्चेति। रेचकपूरकयुक्तः सहितः। तद्विवर्जितः
केवलः। केवलसिद्धिपर्यन्तं सहितमभ्यसेत् । केवलकुम्भके सिद्धे त्रिषु लोकेषु न तस्य
दुर्लभं भवति। केवलकुम्भकात्कुण्डलिनीबोधो जायते।। १३-५ ॥
अब कुम्भक के सन्दर्भ में कहते हैं, उसके दो भेद हैं- (१) सहित और (२) केवल। रेचक तथा पूरक
से जो संयुक्त हो, उसे सहित और उनसे जो रहित हो, वह केवल है। इसमें से केवल जब तक सिद्ध न हो, तब
तक सहित का अभ्यास करते रहना चाहिए और जब 'केवल' कुम्भक सिद्ध हो जाता है, तब योगी को तीनों
लोकों में कुछ भी दुर्लभ नहीं रहता। केवल कुम्भक के द्वारा ही कुण्डलिनी जाग्रत् हो जाती है॥ १३-५॥
ततः कृशवपुः प्रसन्नवदनो निर्मललोचनोऽभिव्यक्तनादो निर्मुक्तरोगजालो जितबिन्दुः
पट्वग्निर्भवति॥ १३-६॥
इस सिद्धि के पश्चात् योगी-साधक कृश शरीर से युक्त, प्रसन्न मुख वाला, निर्मल नेत्रों से सम्पन्न, नाद
श्रवण करने वाला, समस्त रोगों से रहित, बिन्दु को जय करने वाला (ब्रह्मचर्यसिद्ध) तथा प्रज्वलित जठराग्नि
से युक्त हो जाता है॥१३-६॥
अन्तर्लक्ष्यं बहिर्दृष्टिर्निमेषोन्मेषवर्जिता। एषा सा वैष्णवी मुद्रा सर्वतन्त्रेषु गोपिता॥ १४॥
अन्तःकरण में लक्ष्य निहित हो तथा बाह्य की दृष्टि निमेष-उन्मेष अर्थात् पलक झपकने से विहीन हो,
यही वैष्णवी मुद्रा है तथा इसे ही समस्त तन्त्र-शास्त्रों में गुप्त रहस्य के रूप में मान्यता प्राप्त है॥ १४॥
अन्तर्लक्ष्यविलीनचित्तपवनो योगी सदा वर्तते दृष्ट्या निश्चलतारया बहिरधः
पश्यन्नपश्यन्नपि। मुद्रेयं खलु खेचरी भवति सा लक्ष्यैकताना शिवा शून्याशून्यविवर्जितं
स्फुरति सा तत्त्वं पदं वैष्णवी॥ १५॥
अन्तर्लक्ष्य में जिस योगी का चित्त और पवन विलय को प्राप्त हो गया हो, वह योगी साधक सतत निश्चल
नेत्रों द्वारा बाहर की ओर नीचे की तरफ देखता हो, किन्तु इसके अतिरिक्त और कुछ न देखता हो, यही खेचरी
मुद्रा है। यह केवल लक्ष्य में ही एकतान एवं मङ्गलमयी होने के कारण वैष्णवी मुद्रा भी कही जाती है। उसमें
शून्य एवं अशून्य रहित परमतत्त्व अविनाशी पद रूप में प्रकाशित होता रहता है॥ १५॥
अर्धोन्मीलितलोचनः स्थिरमना नासाग्रदत्तेक्षणश्चन्द्रार्कावपि लीनतामुपनयन्निष्यन्द-
भावोत्तरम्। ज्योतीरूपमशेषबाह्यरहितं देदीप्यमानं परं तत्त्वं तत्परमस्ति वस्तुविषयं शाण्डिल्य
विद्धीह तत्॥ १६॥
अर्ध उन्मीलित नेत्रों से युक्त, एकाग्र मनवाला तथा नासिका के अग्रभाग पर स्थित दृष्टि से सम्पन्न योगी

अध्याय १ खण्ड ७ मन्त्र २४ २९१

अध्याय १ खण्ड ७ मन्त्र २४ २९१
अचल भाव को पाने के पश्चात् सूर्य एवं चन्द्र नाड़ी को भी विलय करा देता है। इस समय ज्योति रूप समस्त
बाहरी विषयों से विहीन एवं दीप्तिमान् जो तत्त्व प्रकाशित हो रहा है, वही परम वस्तु के रूप में उसका विषय
होता है। हे शाण्डिल्य ! इस प्रकार तुम्हें जानना चाहिए ॥ १६ ॥
तारं ज्योतिषि संयोज्य किंचिदुन्नमयन्भ्रुवौ । पूर्वाभ्यासस्य मार्गोऽयमुन्मनीकारकः
क्षणात् ॥ १७॥ तस्मात्खेचरीमुद्रामभ्यसेत् । तत उन्मनी भवति । ततो योगनिद्रा भवति ।
लब्धयोगनिद्रस्य योगिनः कालो नास्ति । ॥ १७.१॥
योगी साधक दोनों नेत्रों की पुतलियों को ज्योति से जोड़कर दोनों भौंहों को कुछ ऊँचा रखता है। यह
साधक के प्रारम्भिक अभ्यास का मार्ग है और इससे क्षणमात्र में ही 'उन्मनी' स्थिति प्राप्त हो जाती है। इसलिए
साधक को खेचरी मुद्रा का अभ्यास करना चाहिए, उससे वह उन्मनी दशा को प्राप्त करता है, फिर उसे योग-
निद्रा की प्राप्ति हो जाती है। जिस साधक को योग-निद्रा की प्राप्ति हो, वह योगी फिर काल के वश में नहीं
होता ॥ १७-१७.१ ॥
शक्तिमध्ये मनः कृत्वा शक्तिं मानसमध्यगाम् ।
मनसा मन आलोक्य शाण्डिल्य त्वं सुखी भव ॥ १८ ॥
इस कारण हे शाण्डिल्य ! शक्ति के बीच में मन को केन्द्रित करो। शक्ति को मन के अन्दर गतिशील
रखकर तुम मन के द्वारा मन को ही देखो तथा सुखी-समुन्नत जीवन व्यतीत करो ॥ १८ ॥
खमध्ये कुरु चात्मानमात्ममध्ये च खं कुरु । सर्वं च खमयं कृत्वा न किंचिदपि चिन्तय ॥
ऐसे ही (चैतन्य) आकाश के बीच में आत्मा को स्थित करके तथा आत्मा के मध्य में (चैतन्य) आकाश
को प्रतिष्ठित देखना चाहिए। इसके पश्चात् सभी को (चैतन्य) आकाशमय करके, ऐसा ध्यान करें कि इसके
अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं ॥ १९ ॥
बाह्यचिन्ता न कर्तव्या तथैवान्तरचिन्तिका। सर्वचिन्तां परित्यज्य चिन्मात्रपरमो भव ॥ २० ॥
योगी को बाह्यजगत् की चिन्ता नहीं करनी चाहिए, उसी प्रकार अपने भीतर की भी चिन्ता नहीं करनी
चाहिए। इस तरह समस्त प्रकार को चिन्ताओं का परित्याग करके मात्र चैतन्य स्वरूप हो जाना चाहिए ॥ २० ॥
कर्पूरमनले यद्वत्सैन्धवं सलिले यथा । तथा च लीयमानं सन्मनस्तत्त्वे विलीयते ॥ २१ ॥
जिस तरह से कपूर अग्नि में तथा नमक जल में विलीन हो जाता है, उसी तरह से ध्यानस्थ हुए योगी का
मन परम तत्त्व में विलीन हो जाता है ॥ २१ ॥
ज्ञेयं सर्वप्रतीतं च तज्ज्ञानं मन उच्यते । ज्ञानं ज्ञेयं समं नष्टं नान्यः पन्था द्वितीयकः ॥ २२ ॥
जो भी कुछ जानने योग्य है और जो प्रतीत होता है, उसका जो ज्ञान है, उसे ही मन कहते हैं। ज्ञान एवं
ज्ञेय सभी कुछ एक ही साथ विनष्ट हो गया है, इसके अतिरिक्त अन्य कोई भी पथ नहीं है ॥ २२ ॥
ज्ञेयवस्तुपरित्यागाद्विलयं याति मानसम् । मानसे विलयं याते कैवल्यमवशिष्यते ॥ २३ ॥
ज्ञेय वस्तु का परित्याग कर देने से मन विलीनता को प्राप्त हो जाता है और जब मन विलीनता को प्राप्त
हो जाता है, तब कैवल्य ही कैवल्य शेष रह जाता है ॥ २३ ॥
द्वौ क्रमौ चित्तनाशस्य योगो ज्ञानं मुनीश्वर । योगस्तद्वृत्तिरोधो हि ज्ञानं सम्यगवेक्षणम् ॥ २४ ॥
हे मुनीश्वर ! चित्त को विनष्ट करने के दो प्रमुख मार्ग हैं- १. योग और २. ज्ञान। योग अर्थात् चित्त को
वृत्तियों का शमन करना तथा ज्ञान अर्थात् वस्तु के तत्त्व को यथार्थ रूप में देखना ॥ २४ ॥

२९२ शाण्डिल्योपनिषद
तस्मिन्निरोधिते नूनमुपशान्तं मनो भवेत्। मनः स्पन्दोपशान्त्यायं संसारः प्रविलीयते॥ २५॥
मन को जब अपने वश में कर लिया जाता है, तब वह निश्चित ही शान्त हो जाता है। मन की चंचलता
के शान्त होते ही इस संसार का विलय हो जाता है॥ २५॥
सूर्यालोकपरिस्पन्दशान्तौ व्यवहृतिर्यथा। शास्त्रसज्जनसंपर्कवैराग्याभ्यासयोगतः॥ २६॥
जिस प्रकार सूर्य की गति (आलोक) शान्त हो जाने पर संसार का व्यवहार शान्त हो जाता है, वैसे ही
शास्त्रों एवं सज्जनों की संगति से वैराग्य के अभ्यास का योग हो जाने से भी संसार शान्त हो जाता है॥ २६॥
अनास्थायां कृतास्थायां पूर्वं संसारवृत्तिषु। यथाभिवाञ्छितध्यानाच्चिरमेकतयोहितात् ॥ २७॥
एकतत्त्वदृढाभ्यासात्प्राणस्पन्दो निरुध्यते । पूरकाद्यनिलायामाद्दृढाभ्यासादखेदजात् ॥ २८ ॥
एकान्तध्यानयोगाच्च मनःस्पन्दो निरुध्यते । ओङ्कारोच्चारणप्रान्तशब्दतत्त्वानुभावनातू।
सुषुप्ते संविदा ज्ञाते प्राणस्पन्दो निरुध्यते ॥ २९॥
सर्वप्रथम सांसारिक वृत्तियों के प्रति अनास्था उत्पन्न की जाए, तत्पश्चात् लम्बे समय तक ध्यान एवं एक
तत्त्व का दृढ़ अभ्यास हो जाने से प्राण का स्पन्दन बन्द हो जाता है अर्थात् प्राणवायु को अपने वश में कर लिया
जाता है। इसी प्रकार बिना श्रम के अधिक देर तक श्वास खींचते हुए पूरक आदि वायु के दृढ़ अभ्यास तथा
एकान्त चिन्तन करने से मन की गति पूर्णतया बन्द हो जाती है (मन वश में हो जाता है)। तदनन्तर ॐकार
के उच्चारण के बाद शब्द तत्त्व की अनुभूति होने से सद्ज्ञान द्वारा सुषुप्ति का रूप जान लिया जाता है, तब प्राण
की गति रुक जाती है अर्थात् प्राण तत्त्व को अपने वश में कर लिया जाता है॥ २७-२९॥
तालुमूलगतां यत्नाज्जिह्वयाक्रम्य घण्टिकाम्। ऊर्ध्वरन्ध्रं गते प्राणे प्राणस्पन्दो निरुध्यते॥ ३०॥
तालु के मूल में स्थित रहने वाली ग्रन्थि को जब सतर्कतापूर्वक जिह्वा द्वारा दबाया जाता है, तब प्राणवायु
ऊपर के छिद्र में आ जाता है और तभी प्राणगति अवरुद्ध (अपने वश में) हो जाती है॥ ३०॥
प्राणे गलितसंवित्तौ तालूर्ध्वं द्वादशान्तगे। अभ्यासाद्ध्वंरन्ध्रेण प्राणस्पन्दो निरुध्यते ॥ ३१ ॥
तालु से ऊर्ध्व की ओर बारह अंगुल दूर तक गमन करने वाला प्राण गलित (चेष्टा-शून्य ) हो जाता है,
तब अभ्यास मात्र से ही ऊपर के छिद्र द्वारा प्राण का स्पन्दन अवरुद्ध किया जाता है॥ ३१॥
द्वादशाङ्गुलपर्यन्ते नासाग्रे विमलेऽम्बरे। संविद्दृशि प्रशाम्यन्त्यां प्राणस्पन्दो निरुध्यते ॥ ३२ ॥
नासिका के अग्रभाग के सामने द्वादश अंगुल की दूरी पर पवित्र आकाश में ज्ञान-दृष्टि जब अत्यन्त शान्त
हो जाती है, तभी प्राणों का स्पन्दन अवरुद्ध हो जाता है॥ ३२॥
भ्रूमध्ये तारकालोकशान्तावन्तमुपागते । चेतनैकतने बद्धे प्राणस्पन्दो निरुध्यते ॥ ३३ ॥
भौंहों के मध्य में तारक ब्रह्म के साक्षात्कार होने पर शान्ति के मिल जाने से जगत् व्यापार बन्द होने लगते
हैं तथा मानसिक संकल्प विराम लेते हैं, तभी प्राणगति अवरुद्ध हो जाती है ॥ ३३ ॥
ओमित्येव यदुद्भूतं ज्ञानं ज्ञेयात्मकं शिवम् । असंस्पृष्टविकल्पांशं प्राणस्पन्दो निरुध्यते ॥३४
केवल प्रणव के स्वरूप में ही प्रादुर्भूत जो ज्ञानज्ञेय रूप तथा मंगलमय बनकर प्रकट होता है तथा जिसमें
विकल्प के अंश का स्पर्श भी नहीं रहता, तभी प्राण की गति अवरुद्ध हो जाती है॥ ३४॥
चिरकालं हृदेकान्तव्योमसंवेदनान्मुने । अवासनमनोध्यानात्प्राणस्पन्दो निरुध्यते ॥ ३५ ॥
हे मुने ! चिरकाल तक हृदय प्रदेश में एकान्त आकाश की अनुभूति होने से वासना विहीन मन ध्यान-मग्न
होने लगता है। इससे प्राण का स्पन्दन अवरुद्ध हो जाता है॥ ३५॥

अध्याय १ खण्ड ७ मन्त्र ४१ २९३

अध्याय १ खण्ड ७ मन्त्र ४१ २९३
एभिः क्रमैस्तथान्यैश्च नानासंकल्पकल्पितैः । नानादेशिकवक्त्रस्थैः प्राणस्पन्दो निरुध्यते ॥३६
इस प्रकार क्रमानुसार अन्य अनेक गुरुओं के अमृत वचनों-उपदेशों का अनुसरण करके भाँति-भाँति के
संकल्पों की कल्पना के माध्यम से प्राण का स्पन्दन अवरुद्ध हो जाता है ॥ ३६-क॥
आकुञ्चनेन कुण्डलिन्याः कवाटमुद्घाट्य मोक्षद्वारं विभेदयेत् ॥ ३६-ख॥
योगी साधक कुण्डलिनी को संकुचित करके (ऊपर खींचकर) किवाड़ को खोलकर मुक्ति का द्वार
प्रशस्त करे ॥ ३६-ख ॥
येन मार्गेण गन्तव्यं तद्द्वारं मुखेनाच्छाद्य प्रसुप्ता ।
कुण्डलिनी कुटिलाकारा सर्पवद्वेष्टिता भवति ॥ ३६-ग॥
जिस मार्ग से गमन करना होता है, उसी मार्ग का द्वार मुख से आच्छादित करके कुण्डलिनी शयन करती
है। वह तिर्यक् स्वरूप वाली सर्प की भाँति लिपटी हुई है ॥ ३६-ग ॥
सा शक्तिर्येन चालिता स्यात्स तु मुक्तो भवति । सा कुण्डलिनी कण्ठोर्ध्वभागे सुप्ता चेद्योगिनां
मुक्तये भवति । बन्धनायाधो मूढानाम् ॥ ३६-घ ॥
इस कुण्डलिनी महाशक्ति को जो योगी निरन्तर संचालित करता है, वह मुक्ति को प्राप्त कर लेता है। वह
कुण्डलिनी साधक के कण्ठ में ऊर्ध्व भाग की तरफ यदि शयन करती हुई हो, तो वह योगियों को मुक्ति प्रदान
कर देने वाली होती है, किन्तु यदि वह कण्ठ के नीचे शयन करती हो, तो ज्ञानरहित साधकों के लिए
बन्धनकारी सिद्ध होती है ॥ ३६-घ ॥
इडादिमार्गद्वयं विहाय सुषुम्नामार्गेणागच्छेद्विष्णोः परमं पदम् ॥ ३६-ङ ॥
इड़ा आदि दोनों मार्गों का परित्याग करके सुषुम्ना के रास्ते उसका आगमन होता है, क्योंकि वही विष्णु
का परम पद है ॥ ३६-ङ ॥
मरुदभ्यसनं सर्वं मनोयुक्तं समभ्यसेत् । इतरत्र न कर्तव्या मनोवृत्तिर्मनीषिणा ॥ ३७ ॥
वायु (प्राणायाम) का संपूर्ण अभ्यास मन के साथ ही होना चाहिए। इस अवसर पर ज्ञानी पुरुष को मन
की वृत्ति को अन्यत्र संयुक्त नहीं होने देना चाहिए ॥ ३७ ॥
दिवा न पूजयेद्विष्णुं रात्रौ नैव प्रपूजयेत् । सततं पूजयेद्विष्णुं दिवारात्रं न पूजयेत् ॥ ३८ ॥
यहाँ पर यह बात नहीं है कि अमुक दिन विष्णु का पूजन नहीं करना चाहिए अथवा अमुक रात्रि को
विष्णु को न पूजना चाहिए, बल्कि सदा ही विष्णु की पूजा करते रहना चाहिए। केवल रात्रि में अथवा दिन
में ही न पूजना चाहिए ॥ ३८ ॥
सुषिरो ज्ञानजनकः पञ्चस्रोतः समन्वितः । तिष्ठते खेचरी मुद्रा त्वं हि शाण्डिल्य तां भज ॥३९
हे शाण्डिल्य ! पाँच इन्द्रियों के प्रवाह वाला हृदय रूप रिक्त (आकाश) स्थान ज्ञान को प्रादुर्भूत करने
वाला है तथा वहीं खेचरी मुद्रा स्थित रहती है। अतः आप उसी का सेवन करें ॥ ३९ ॥
सव्यदक्षिणनाडीस्थो मध्ये चरति मारुतः । तिष्ठते खेचरी मुद्रा तस्मिन्स्थाने न संशयः ॥ ४०
बायीं एवं दाहिनी नाड़ी में स्थित होकर मध्य में वायु का संचरण होता रहता है तथा उस स्थान में खेचरी
मुद्रा प्रतिष्ठित रहती है, इसमें किसी भी तरह का संशय नहीं है ॥ ४० ॥
इडापिङ्गलयोर्मध्ये शून्यं चैवानिलं ग्रसेत् । तिष्ठन्ती खेचरी मुद्रा तत्र सत्यं प्रतिष्ठितम् ॥ ४१ ॥

२९४ शाण्डिल्योपनिषद्
इड़ा एवं पिंगला के मध्य में शून्य भाग स्थित है। वहाँ वह वायु को ग्रस लेता है, खेचरी मुद्रा भी वहीं
पर प्रतिष्ठित रहती है एवं वहीं सत्य भी स्थित रहता है॥ ४१॥
सोमसूर्यद्वयोर्मध्ये निरालम्बतले पुनः। संस्थिता व्योमचक्रे सा मुद्रा नाम्ना च खेचरी ॥४२क
चन्द्रमा एवं सूर्य की दोनों नाड़ियों के बीच में आधार-रहित धरातल स्थित है, वहीं व्योम मण्डल में
खेचरी मुद्रा प्रतिष्ठित है॥ ४२-क॥
छेदनचालनदोहैः फलां परां जिह्वां कृत्वा दृष्टिं भ्रूमध्ये स्थाप्य कपालकुहरे जिह्वा
विपरीता यदा भवति तदा खेचरी मुद्रा जायते। जिह्वा चित्तं च खे चरति तेनोर्ध्वजिह्वः
पुमानमृतो भवति ॥ ४२-ख ॥
छेदन, चालन एवं दोहन के द्वारा जिह्वा को ज्यादा से ज्यादा नुकीला बनाकर, भुकुटि के बीच में दृष्टि
स्थिर करके, कपाल के छिद्र में जब जिह्वा विपरीत (उल्टी) होकर गमन करने लगती है, तभी खेचरी मुद्रा
सिद्ध होती है। जिह्वा एवं चित्त दोनों ही कपाल के छिद्र रूपी आकाश में विचरण करते हैं, तभी ऊर्ध्व की ओर
गई हुई जिह्वा वाला पुरुष अमरता को प्राप्त कर लेता है॥ ४२-ख॥
वामपादमूलेन योनिं संपीड्य दक्षिणपादं प्रसार्य तं कराभ्यां धृत्वा नासाभ्यां वायुमापूर्य
कण्ठबन्धं समारोप्योर्ध्वतो वायुं धारयेत्। तेन सर्वक्लेशहानिः। ततः पीयूषमिव विषं जीर्यते।
क्षयगुल्मगुदावर्तजीर्णत्वगादिदोषा नश्यन्ति। एष प्राणजयोपायः सर्वमृत्युपघातकः ॥ ४२ग
बायें पैर की एड़ी से मूलरन्ध्र को दबाकर दाहिना पैर आगे की तरफ फैलाकर उसे दोनों हाथों से
पकड़ना तथा इसके पश्चात् नासिका के दोनों छिद्रों से वायु को भर कर कण्ठबन्ध (जालन्धर बन्ध) लगाना एवं
ऊपर की ओर उठी हुई वायु को स्थिर करना चाहिए। इस क्रिया से समस्त क्लेशों का विनाश हो जाता है।
इसके बाद विष भी अमृत के सदृश पच जाता है। क्षय, गुल्म, गुदावर्त एवं त्वचा के असाध्य एवं पुराने रोग
विनष्ट हो जाते हैं। प्राण को जीतने का यह उपाय मृत्यु को पूर्णरूप से विनष्ट करने वाला है॥ ४२-ग॥
वामपादपार्ष्णियोनिस्थाने नियोज्य दक्षिणचरणं वामोरूपरि संस्थाप्य वायुमापूर्य हृदये चुबुकं
निधाय योनिमाकुञ्च्य मनोमध्ये यथाशक्ति धारयित्वा स्वात्मानं भावयेत्। तेनापरोक्षसिद्धिः ॥
बायें पैर की एड़ी को योनि स्थान के साथ संयुक्त करके, दाहिना पैर बायें पैर पर रखे तथा वायु को अन्दर
भरकर, ठुड्डी को हृदय की तरफ दबाकर योनि स्थान को संकुचित कर मन के मध्य अपनी आत्मा का चिन्तन
करना चाहिए। इस क्रिया से अपरोक्ष सिद्धि की प्राप्ति होती है॥ ४२-घ॥
बाह्यात्प्राणं समाकृष्य पूरयित्वोदरे स्थितम्। नाभिमध्ये च नासाग्रे पादाङ्गुष्ठे च यत्नतः ॥४३॥
धारयेन्मनसा प्राणं सन्ध्याकालेषु वा सदा। सर्वरोगविनिर्मुक्तो भवेद्योगी गतक्लमः ॥ ४४क ॥
बाहर से प्राणवायु को अन्दर की ओर आकृष्ट करके उदर में प्रतिष्ठित करे और वहाँ से उसे नाभि के मध्य
में, नाक के अग्रभाग में तथा पैर के अँगूठे में मन द्वारा प्रयासपूर्वक धारण करे। इस तरह से सन्ध्याकाल में यह
क्रिया सदैव करने वाला योगी साधक समस्त रोगों से मुक्ति पाकर श्रम-रहित हो जाता है॥ ४३-४४-क॥
नासाग्रे वायुविजयं भवति। नाभिमध्ये सर्वरोगविनाशः।
पादाङ्गुष्ठधारणाच्छरीरलघुता भवति ॥ ४४-ख॥
नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि केन्द्रित करने से वायु को वश में किया जा सकता है, नाभि के मध्य में
स्थिर करने से सभी रोगों का नाश होता है तथा पैर के अँगूठे में स्थिर करने से शरीर हल्का हो जाता है॥ ४४ख

अध्याय १ खण्ड ७ मन्त्र ५१ २९५

अध्याय १ खण्ड ७ मन्त्र ५१ २९५
रसनाद्वायुमाकृष्य यः पिबेत्सततं नरः। श्रमदाहौ तु न स्यातां नश्यन्ति व्याधयस्तथा ॥ ४५ ॥
जो मनुष्य जिह्वा द्वारा वायु को खींचकर सतत पान किया करता है, उसे श्रम या दाह नहीं होता तथा
उसके समस्त रोग नष्ट हो जाते हैं ॥ ४५ ॥
सन्ध्ययोर्ब्राह्मणः काले वायुमाकृष्य यः पिबेत्। त्रिमासात्तस्य कल्याणी जायते वाक्
सरस्वती ॥ ४६ ॥
जो ब्राह्मण दोनों सन्ध्याकाल में वायु को अपनी ओर आकृष्ट करके उसको पीता रहता है, उसकी वाणी
में तीन मास में ही कल्याण स्वरूपा माँ सरस्वती प्रकट हो जाती हैं ॥ ४६ ॥
एवं षण्मासाभ्यासात्सर्वरोगनिवृत्तिः। जिह्वया वायुमानीय जिह्वामूले निरोधयेत्। यः
पिबेदमृतं विद्वान्सकलं भद्रमश्रुते ॥ ४७ ॥
इसी तरह से छः मास पर्यन्त अभ्यास करने से समस्त प्रकार के रोगों का शमन हो जाता है। जो विद्वान्
पुरुष जिह्वा द्वारा वायु को ग्रहण करके जिह्वा के मूल में उसे अवरुद्ध करता है, वह अमृत का पान करता है तथा
उसका सब प्रकार से कल्याण ही होता है ॥ ४७ ॥
आत्मन्यात्मानमिडया धारयित्वा भ्रुवोऽन्तरे। विभेद्य त्रिदशाहारं व्याधिस्थोऽपि विमुच्यते ॥
इड़ा नाड़ी के द्वारा दोनों भौंहों के मध्य में आत्मा में ही आत्मा (मन) को धारण कर लेने से पुरुष देवों
के आहार का भेदन करता है, इस क्रिया को सम्पन्न करते समय यदि वह रोगी भी होता है, तो समस्त रोगों से
मुक्त हो जाता है ॥ ४८ ॥
नाडीभ्यां वायुमारोप्य नाभौ तुन्दस्य पार्श्वयोः। घटिकैकां वहेद्यस्तु व्याधिभिः स विमुच्यते ॥
(इड़ा एवं पिंगला) दोनों नाड़ियों के द्वारा वायु को नाभि तक खींचकर पेट के दोनों भागों में जो मनुष्य
एक घड़ी तक चलाता रहता है, वह सभी रोगों से छूट जाता है ॥ ४९ ॥
मासमेकं त्रिसन्ध्यं तु जिह्वयारोप्य मारुतम्। विभेद्य त्रिदशाहारं धारयेत्तुन्दमध्यमे ॥ ५० ॥
जो मनुष्य एक मास तक तीनों (प्रातः, मध्याह्न, सायं) काल में जिह्वा द्वारा वायु को अन्दर आकृष्ट करके
उदर के मध्य भाग में अवरुद्ध करता है, वह भी देवताओं के आहार का भेदन करने वाला हो जाता है ॥ ५० ॥
[मनुष्य का आहार तब पचता है जब उसके पाचक रस खाये हुए पदार्थों का भेदन करने में समर्थ होते हैं।
देवताओं के सूक्ष्म आहार मनुष्य के प्रभाव क्षेत्र में रहते हैं, लेकिन सामान्य लोग उसका उपयोग नहीं कर पाते। योगी
अपनी चेतना से उसका भेदन करके उसका लाभ प्राप्त करने की स्थिति में पहुँच जाता है।]
ज्वराः सर्वेऽपि नश्यन्ति विषाणि विविधानि च। मुहूर्तंमपि यो नित्यं नासाग्रे मनसा
सह। सर्वं तरति पाप्मानं तस्य जन्मशतार्जितम् ॥ ५१ ॥
जो पुरुष नित्य मुहूर्त भर के लिए मन के साथ वायु को नासिका के अग्रभाग पर धारण करता है, उसके
सभी तरह के ज्वर विनष्ट हो जाते हैं। विभिन्न प्रकार के विषों का शमन हो जाता है। उसके सैकड़ों जन्म के
पाप पूर्णरूप से छूट जाते हैं ॥ ५१ ॥
तारसंयमात्सकलविषयज्ञानं भवति। नासाग्रे चित्तसंयमादिन्द्रलोकज्ञानम्। तदर्धश्रित-
संयमादग्निलोकज्ञानम्। चक्षुषि चित्तसंयमात्सर्वलोकज्ञानम्। श्रोत्रे चित्तस्य संयमाद्यमलोक-
ज्ञानम्। तत्पार्श्वे संयमान्निर्ऋतिलोकज्ञानम्। पृष्ठभागे संयमाद्वरुणलोकज्ञानम्। वामकर्णे संय-
माद्वायुलोकज्ञानम्। कण्ठे संयमात्सोमलोकज्ञानम्। वामचक्षुषि संयमाच्छिवलोकज्ञानम्।

२९६ शाण्डिल्योपनिषद्
मूर्ध्नि संयमाद्ब्रह्मलोकज्ञानम्। पादाधोभागे संयमादतललोकज्ञानम्। पादे संयमाद्वितललोक-
ज्ञानम्। पादसन्थौ संयमान्नितललोकज्ञानम्। जङ्घे संयमात्सुतललोकज्ञानम्। जानौ संयमान्म-
हातललोकज्ञानम्। ऊरौ चित्तसंयमाद्रसातललोकज्ञानम्। कटौ चित्तसंयमात्तलात-
ललोकज्ञानम्। नाभौ चित्तसंयमाद्भूलोकज्ञानम्। कुक्षौ संयमाद्भुवर्लोकज्ञानम्। हृदि चित्तस्य
संयमात्स्वर्लोकज्ञानम्। हृदयोर्ध्वभागे चित्तसंयमान्महर्लोकज्ञानम्। कण्ठे चित्तसंयमाज्जनो-
लोकज्ञानम्। भ्रूमध्ये चित्तसंयमात्तपोलोकज्ञानम्। मूर्ध्नि चित्तसंयमात्सत्यलोकज्ञानम्।
धर्माधर्मसंयमादतीतानागतज्ञानम्। तत्तज्जन्तुध्वनौ चित्तसंयमात्सर्वजन्तुरुतज्ञानम्।
संचितकर्मणि चित्तसंयमात्पूर्वजातिज्ञानम्। परचित्ते चित्तसंयमात्परचित्तज्ञानम्। कायरूपे
चित्तसंयमादन्यादृश्यरूपम्। बले चित्तसंयमाद्धनुमदादिबलम्। सूर्ये चित्तसंयमाद्भुवनज्ञानम्।
चन्द्रे चित्तसंयमात्ताराव्यूहज्ञानम्। ध्रुवे तद्गतिदर्शनम्। स्वार्थसंयमात्पुरुषज्ञानम्। नाभिचक्रे
कायव्यूहज्ञानम्। कण्ठकूपे क्षुत्पिपासानिवृत्तिः। कूर्मनाड्यां स्थैर्यम्। तारे सिद्धदर्शनम्।
कायाकाशसंयमादाकाशगमनम्। तत्तत्स्थाने संयमात्तत्तत्सिद्धयो भवन्ति॥ ५२ ॥
आँख की पुतली पर संयम करने से सभी प्रकार के विषयों का ज्ञान प्राप्त होता है, नासिका के अग्रभाग
पर चित्त का संयम करने से इन्द्रलोक का ज्ञान प्राप्त होता है। उसके नीचे चित्त का संयम करने से अग्निलोक
का ज्ञान प्राप्त होता है। नेत्र में चित्त का संयम करने से सभी लोकों का ज्ञान प्राप्त होता है। श्रोत्र में संयम करने
से यम लोक का ज्ञान प्राप्त होता है। उसके बगल में चित्त का संयम करने से राक्षसों के लोक का ज्ञान होता
है। पीठ के भाग में संयम करने से वरुण लोक का ज्ञान होता है। बायें कान में चित्त का संयम करने पर वायु
लोक का ज्ञान होता है। कण्ठ में संयम करने से चन्द्रलोक का ज्ञान होता है। बाँयीं आँख में संयम करने से
शिवलोक का ज्ञान प्राप्त होता है। मस्तक में संयम करने से ब्रह्मलोक का ज्ञान होता है, पैर के नीचे (तलवे)
में संयम करने से अतल लोक का ज्ञान होता है। पैर (पंजे) में संयम करने से वितल लोक का ज्ञान होता है।
पैर के जोड़ (टखने) में चित्त का संयम करने से नितल लोक का ज्ञान होता है। पैर की जंघा (पिंडली) में
संयम करने से सुतल लोक का ज्ञान होता है। जानु (घुटने) में संयम करने से महातल लोक का ज्ञान प्राप्त
होता है, ऊरु (जाँघ) में संयम करने से रसातल का ज्ञान होता है। कमर में संयम करने से तलातल लोक का
ज्ञान होता है, नाभि में चित्त का संयम करने से भूलोक का ज्ञान होता है। पेट में संयम करने से भुवः लोक का
ज्ञान होता है। हृदय में चित्त का संयम रखने से स्वः लोक का ज्ञान प्राप्त होता है, हृदय के ऊर्ध्व भाग में चित्त
का संयम करने से महः लोक का ज्ञान प्राप्त होता है। कण्ठ में संयम करने से जनः लोक का ज्ञान प्राप्त हो जाता
है। भौंहों के मध्य में संयम करने से तपःलोक का ज्ञान प्राप्त होता है। मस्तक में चित्त का संयम करने से
सत्यलोक का ज्ञान प्राप्त होता है। धर्म तथा अधर्म में संयम करने से भूत-भविष्यत् का ज्ञान हो जाता है। विभिन्न
प्राणियों की आवाज में संयम करने से उनकी बोली का ज्ञान होता है। सञ्चित कर्म में संयम करने से पूर्व जन्म
का ज्ञान होता है। दूसरे लोगों के चित्त में संयम रखने से दूसरे के चित्त का ज्ञान होता है। शरीर के रूप में संयम
करने से दूसरे का-सा रूप हो जाता है, बल में संयम करने से हनुमान् आदि के जैसा बल प्राप्त हो जाता है।
सूर्य में संयम करने से समस्त भुवनों का ज्ञान हो जाता है। चन्द्र में संयम करने से समस्त तारामण्डलों का ज्ञान
हो जाता है, ध्रुव में संयम करने से उसकी गति का दर्शन होता है। स्वार्थ में संयम करने से पुरुष का ज्ञान होता
है। नाभिचक्र में संयम करने से शरीर व्यूह का ज्ञान होता है। कण्ठ कूप में संयम करने से भूख-प्यास समाप्त

अध्याय १ खण्ड ९ मन्त्र १ २९७

अध्याय १ खण्ड ९ मन्त्र १ २९७
हो जाती है। कूर्म नाड़ी में संयम करने से स्थिरता आती है। तारा में संयम करने से सिद्ध दर्शन होता है तथा
शरीर के आकाश में संयम करने से मनुष्य आकाश में गमन कर सकता है। इस तरह से भिन्न-भिन्न स्थानों में
संयम करने से उस स्थान में स्थित विभिन्न प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं॥ ५२ ॥
[ यहाँ संयम का अर्थ अपने चित्त के माध्यम से स्थान विशेष में स्थित दिव्य चेतन धारा के साथ तादात्म्य स्थापित
कर लेना। तादात्म्य की स्थिति में उस चेतना विशेष के साथ जुड़े सारे तथ्य चित्त की अनुभूति में सहज ही आने लगते
हैं। योगदर्शन में धारणा, ध्यान और समाधि की एकत्र स्थिति को 'संयम' कहा जाता है।]
॥ अष्टमः खण्डः ॥
अथ प्रत्याहारः। स पञ्चविधः विषयेषु विचरतामिन्द्रियाणां बलादाहरणं प्रत्याहारः।
यद्यत्पश्यति तत्सर्वमात्मेति प्रत्याहारः। नित्यविहितकर्मफलत्यागः प्रत्याहारः।
सर्वविषयपराङ्मुखत्वं प्रत्याहारः। अष्टादशसु मर्मस्थानेषु क्रमाद्धारणं प्रत्याहारः॥ १॥
अब प्रत्याहार का वर्णन करते हैं। वह पाँच प्रकार का है। विषयों में विचरण करती हुई इन्द्रियों को
बलपूर्वक अपनी ओर आकृष्ट कर लेने (इन्द्रियाँ बाह्य भोगों में रस लेने की अभ्यस्त होती हैं, उन्हें बाह्य
उपकरण में से हटाकर अन्तःकरण की रसानुभूति से जोड़ लेने) को प्रत्याहार कहा जाता है। जो-जो दिखाई
देता है, वह सब आत्मा है, ऐसा समझना चाहिए, (आँख, नाक, कान आदि विभिन्न अवयवों की अनुभूति
वास्तव में आत्मा के ही कारण है। इसका बोध होना) यही प्रत्याहार है। नित्य किये गये कर्मों के फल का
परित्याग (कर्म के फल में रस लेने की अपेक्षा कर्म करने में ही रस एवं सार्थकता की अनुभूति होने पर फल
की कामना न रहना) ही प्रत्याहार है। समस्त प्रकार की विषय-वासनाओं से रहित होना (अन्तःस्थिति उच्च
रसों की अनुभूति के आधार पर विषयों के रस की कामना न रहना), यह प्रत्याहार है। अट्ठारह मर्म-स्थलों
(आगे कहे गये) में क्रमशः धारणा करना (उन स्थानों पर स्थित चेतन दिव्य प्रवाहों के साथ चित्त का तादात्म्य
स्थापित करके दिव्यानुभूति प्राप्त करना), यही प्रत्याहार है॥ १॥
पादाङ्गुष्ठगुल्फजङ्घाजानूरुपायुमेढ्रनाभिहृदयकण्ठकूपतालुनासाक्षिभूमध्यललाटमूर्ध्नि
स्थानानि। तेषु क्रमादारोहावरोहक्रमेण प्रत्याहरेत्॥ २॥
पैर का अँगूठा, गुल्फ (टखने), जंघा (पिंडली), जानु (घुटने), ऊरु (जाँघ), गुदा, लिङ्ग, नाभि, हृदय,
गले का छिद्र, तालु, नासिका, आँख, भौंहों के बीच का भाग, ललाट एवं सिर-इन सभी स्थलों में उतार-
चढ़ाव के क्रम से प्रत्याहार करना चाहिए॥ २॥
॥ नवमः खण्डः ॥
अथ धारणा। सा त्रिविधा आत्मनि मनोधारणं दहराकाशे बाह्याकाशधारणं
पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशेषु पञ्चमूर्तिधारणं चेति॥ १॥
अब धारणा को स्पष्ट करते हैं। यह तीन प्रकार की होती है। अपनी अन्तरात्मा में मन की धारणा करना,
दहरा (हृदय) आकाश में बाह्याकाश की धारणा करना तथा पृथ्वी, जल, तेज, वायु एवं आकाश में पाँच
मूर्तियों की धारणा करनी चाहिए। ये ही तीन प्रकार हैं॥ १॥

॥ दशमः खण्डः ॥

२९८ शााण्डिल्योपनिषद
॥ दशमः खण्डः ॥
अथ ध्यानम्। तद्विविधं सगुणं निर्गुणं चेति। सगुणं मूर्तिध्यानम्। निर्गुणमात्मया-
थात्म्यम्॥ १॥
अब इसके बाद ध्यान को बतलाते हैं-यह दो प्रकार का होता है, प्रथम-निर्गुण एवं द्वितीय-सगुण। मूर्ति
का चिन्तन करना सगुण कहलाता है तथा आत्मा के स्वरूप का ध्यान करना निर्गुण कहलाता है॥ १॥
॥ एकादशः खण्डः ॥
अथ समाधिः। जीवात्मपरमात्मैक्यावस्था त्रिपुटीरहिता परमानन्दस्वरूपा
शुद्धचैतन्यात्मिका भवति॥ १॥
अब इसके अनन्तर समाधि का वर्णन करते हैं। जीवात्मा एवं परमात्मा की ऐक्यावस्था, (ज्ञान, ज्ञेय तथा
ज्ञाता) की त्रिपुटीविहीन,परमानन्द के रूप से युक्त एवं शुद्ध चैतन्यमय अवस्था ही समाधि कहलाती है॥१॥
॥ द्वितीयोऽध्यायः॥
अथ ह शाण्डिल्यो ह वै ब्रह्मर्षिश्चतुर्षु वेदेषु ब्रह्मविद्यामलभमानः किं नामेत्यथर्वाणं
भगवन्तमुपसन्नः पप्रच्छाधीहि भगवन् ब्रह्मविद्यां येन श्रेयोऽवाप्स्यामीति॥ १॥
तदनन्तर ब्रह्मर्षि शाण्डिल्य ने चारों वेदों में (चारों वेदों का अध्ययन करने पर भी) ब्रह्म विद्या को प्राप्त
न कर पाने से भगवान् अथर्वा की शरण में पहुँचकर प्रश्न किया- 'हे भगवन्! आप हमें ब्रह्म विद्या का अध्ययन
कराएँ, जिससे कि मुझे कल्याण की प्राप्ति हो'॥ २॥
स होवाचाथर्वा शाण्डिल्य सत्यं विज्ञानमनन्तं ब्रह्म। ॥ २॥
तत्पश्चात् अथर्वा मुनि ने कहना प्रारम्भ किया "हे शाण्डिल्य! ब्रह्म, सत्य, विज्ञान एवं अनन्त रूपों में
संव्यास है॥ २॥
यस्मिन्निदमोतं च प्रोतं च। यस्मिन्निदं सं च विचैति सर्वं यस्मिन्विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं
भवति। तदपाणिपादमचक्षुःश्रोत्रमजिह्वमशरीरमग्राह्यमनिर्देश्यम्॥ ३॥
जिसमें यह सभी कुछ ओत-प्रोत है। जिसमें यह प्रादुर्भूत होता है तथा अस्त भी होता है,उसी तरह से
जिसको समझ लेने से यह सभी कुछ समझ लिया जाता है,वह हाथ-पैर से विहीन,नेत्रों से रहित,कार्य
विहीन,जिह्वा रहित, शरीर विहीन, स्वीकार न किये जाने योग्य तथा स्पष्ट रूप से बताये न जा सकने योग्य.है ॥३
यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह। यत्केवलं ज्ञानगम्यम्। प्रज्ञा च यस्मात्प्रसृता
पुराणी। यदेकमद्वितीयम्। आकाशवत्सर्वगतं सुसूक्ष्मं निरञ्जनं निष्क्रियं सन्मात्रं चिदानन्दैकरसं
शिवं प्रशान्तममृतं तत्परं च ब्रह्म। तत्त्वमसि तज्ज्ञानेन हि विजानीहि॥ ४॥
जिसे प्राप्त किये बिना वाणी एवं मन पीछे की ओर वापस हो जाते हैं। जो मात्र ज्ञान से ही पाया जा सकता
है, जिससे प्राचीन प्रज्ञा का प्रचार-प्रसार हुआ है, जो अनुपम एवं अद्वितीय है, आकाश के सदृश सर्वत्र व्याप्त
रहने वाले, अति सूक्ष्म, निरञ्जन, क्रियाविहीन, एकमात्र सत्य स्वरूप, चेतना से सम्पन्न, आनन्द स्वरूप,

अध्याय ३ खण्ड १ मन्त्र ५ २९९

अध्याय ३ खण्ड १ मन्त्र ५ २९९
एकरस से सम्पन्न, मंगलमय, अत्यन्त शांत एवं अमर है, वही परम् अविनाशी ब्रह्म है। वही तुम हो। ज्ञान के
द्वारा तुम उसे जानो ॥ ४॥
य एको देव आत्मशक्तिप्रधानः सर्वज्ञः सर्वेश्वरः सर्वभूतान्तरात्मा सर्वभूताधिवासः
सर्वभूतनिगूढो भूतयोनिर्यौगैकगम्यः । यश्च विश्वं सृजति विश्वं बिभर्ति विश्वं भुङ्क्ते स आत्मा।
आत्मनि तं तं लोकं विजानीहि ॥ ५ ॥
जो एक ही देव आत्मा की शक्ति के रूप में प्रमुख, सब प्रकार से ज्ञान सम्पन्न, सर्वेश्वर, समस्त प्राणियों
की अन्तरात्मा, सभी प्राणियों में निवास करने वाले, सब प्राणियों में छिपे हुए, सभी प्राणियों का मूल उत्पत्ति
स्थान, केवल योग के द्वारा ही जाने जा सकने योग्य है, जो विश्व की सृष्टि, पालन एवं विलय स्वयं करता है,
वही आत्मा है। तुम आत्मा में ही उन सबको स्थित जानो ॥ ५ ॥
मा शोचीरात्मविज्ञानी शोकस्यान्तं गमिष्यसि ॥ ६ ॥
तुम शोक बिल्कुल न करो। आत्मा का विशिष्ट ज्ञान पाकर के तुम शोक का अन्त कर सकोगे ॥ ६ ॥
॥ तृतीयोऽध्यायः ॥
॥ प्रथमः खण्डः ॥
अथ हैनं शाण्डिल्योऽथर्वाणं पप्रच्छ यदेकमक्षरं निष्क्रियं शिवं सन्मात्रं परंब्रह्म ।
तस्मात्कथमिदं विश्वं जायते कथं स्थीयते कथमस्मिंल्लीयते । तन्मे संशयं छेत्तुमर्हसीति ॥१ ॥
इस प्रकार अथर्वा मुनि से जानकारी प्राप्त करने के पश्चात् महात्मा शाण्डिल्य ने पुनः प्रश्न किया- हे
भगवन् ! जो परब्रह्म एकाक्षर, क्रिया विहीन, मङ्गलमय, सत्ता मात्र एवं आत्म स्वरूप है, उससे यह जगत् किस
प्रकार से प्रादुर्भूत होता है ? किस प्रकार वह प्रतिष्ठित होता है तथा किस तरह से उसमें विलीन हो जाता है ?
मेरी यह शंका दूर करना अत्यन्त आवश्यक है ॥ १ ॥
स होवाचाथर्वा सत्यं शाण्डिल्य परब्रह्म निष्क्रियमक्षरमिति । अथाप्यस्यारूपस्य
ब्रह्मणस्त्रीणि रूपाणि भवन्ति सकलं निष्कलं सकलनिष्कलं चेति ॥२-३॥
ऐसा सुनकर अथर्वा मुनि ने कहा- हे शाण्डिल्य ! यह सत्य है कि परब्रह्म निष्क्रिय एवं अक्षर रूप है, तब
भी इस अविनाशी परब्रह्म के तीन स्वरूप-सकल, निष्कल एवं सकल-निष्कल हैं ॥ २-३ ॥
यत्तत्सत्यं विज्ञानमानन्दं निष्क्रियं निरञ्जनं सर्वगतं सुसूक्ष्मं सर्वतोमुखमनिर्देश्य-ममृतमस्ति
तदिदं निष्कलं रूपम् ॥ ४॥
जो सत्यरूप, विज्ञानयुक्त, आनन्दस्वरूप, क्रियारहित, निरञ्जन, सर्वव्यापी, सूक्ष्मातिसूक्ष्म, चतुर्दिक
मुखवाला, अनिर्वचनीय और अमर है, यह ब्रह्म का निष्कल रूप है ॥ ४ ॥
अथास्य या सहजास्त्यविद्या मूलप्रकृतिर्माया लोहितशुक्लकृष्णा । तया सहायवान्
देवः कृष्णपिङ्गलो महेश्वर ईष्टे । तदिदमस्य सकलं रूपम् ॥ ५ ॥
इसके पश्चात् अब इस परब्रह्म की जो सहज अविद्या, मूल प्रकृति और माया शक्ति है, वह लाल, श्वेत
एवं कृष्ण रंग से युक्त है। उस (माया) की सहायता प्राप्त करके यह देव कृष्ण एवं पीत रंग से युक्त होकर सभी
का ईश्वर और नियन्ता होता है। यह इस ब्रह्म का 'सकल' रूप है ॥ ५ ॥

३०० शाण्डिल्योपनिषद्
अथैष ज्ञानमयेन तपसा चीयमानोऽकामयत बहुस्यां प्रजायेयेति। अथैतस्मात्तप्यमा-
नात्सत्यकामात्रीण्यक्षराण्यजायन्त। तिस्रो व्याहृतयस्त्रिपदा गायत्री त्रयो वेदास्त्रयो देवास्त्रयो
वर्णास्त्रयोऽग्नयश्च जायन्ते। योऽसौ देवो भगवान्सर्वैश्वर्यसंपन्नः सर्वव्यापी सर्वभूतानां हृदये
संनिविष्टो मायावी मायया क्रीडति स ब्रह्मा स विष्णुः स रुद्रः स इन्द्रः स सर्वे देवाः सर्वाणि
भूतानि स एव पुरस्तात्स एव पश्चात्स एवोत्तरतः स एव दक्षिणतः स एवाधस्तात्स एवोप-
रिष्टात्स एव सर्वम्। अथास्य देवस्यात्मशक्तेरात्मक्रीडस्य भक्तानुकम्पिनो दत्तात्रेयरूपा सुरूपा
तनूरवासा इन्दीवरदलप्रख्या चतुर्बाहुरघोरापापकाशिनी। तदिदमस्य सकलनिष्कलं रूपम् ॥६॥
तत्पश्चात् इस परब्रह्म ने ज्ञानमय तप से वृद्धि प्राप्त कर इच्छा की कि "मैं विभिन्न रूपों में प्रकट
(प्रादुर्भूत) हो जाऊँ।" तदनन्तर तप प्रारम्भ किया। तभी समस्त कामनाओं से सम्पन्न तीन अक्षर प्रादुर्भूत हुए,
वैसे ही तीन व्याहृतियाँ, तीन पदों वाली गायत्री, तीन वेद, तीन देव, तीन वर्ण एवं तीन अग्नियां उत्पन्न हुईं। जो
यह देव भगवान् होकर समस्त ऐश्वर्यों से सम्पन्न, सर्वत्र व्याप्त रहने वाला, समस्त प्राणियों के हृदय में रहने
वाला, मायावी एवं माया के साथ क्रीड़ा- कल्लोल करता है, वही ब्रह्मा, वही विष्णु, वही रुद्र, वही इन्द्र, वही
समस्त देवताओं एवं सभी भूत-प्राणियों के रूप में है। वही अग्रभाग में, वही पृष्ठभाग में, वही उत्तर की ओर,
वही दक्षिण की ओर, वही नीचे की ओर तथा वही ऊर्ध्व की ओर प्रतिष्ठित है। इस तरह से वही सब कुछ है।
यह देव अपनी शक्ति से क्रीड़ा करने वाला तथा अपने भक्तों के प्रति अनुकम्पा बनाये रखने वाला है। इसका
शरीर दत्तात्रेय रूप, सुन्दर, वस्त्र रहित, कमल की पंखुड़ी के सदृश कोमल, चार भुजाओं से सम्पन्न, भयंकरता
से रहित एवं पापरहित होकर प्रकाश से युक्त है। यही उसका 'सकल-निष्कल' रूप है ॥ ६ ॥
॥ द्वितीयः खण्डः ॥
अथ हैनमथर्वाणं शाण्डिल्यः पप्रच्छ भगवन्सन्मात्रं चिदानन्दैकरसं कस्मादुच्यते परं
ब्रह्मेति। स होवाचाथर्वा यस्माच्च बृहति बृंहयति च सर्वं तस्मादुच्यते परंब्रह्मेति ॥ १-२ ॥
इसके पश्चात् महर्षि शाण्डिल्य ने अथर्वा मुनि से पुनः प्रश्न किया- "हे भगवन् ! मात्र सत्य स्वरूप,
चैतन्य युक्त एवं आनन्दस्वरूप एकरस सम्पन्न यह परब्रह्म क्यों कहा जाता है ?" तब अथर्वा मुनि ने उत्तर
दिया- "हे शाण्डिल्य ! वह ब्रह्म स्वयं वृद्धि को प्राप्त होता है तथा अन्य दूसरों को वृद्धि प्रदान करता है, अतः
इस कारण से वह अविनाशी शाश्वत ब्रह्म कहलाता है ॥ १-२ ॥
अथ कस्मादुच्यते आत्मेति। यस्मात्सर्वमाप्नोति सर्वमादत्ते सर्वमत्ति च तस्मादुच्यते
आत्मेति ॥ ३-४ ॥
इसके अनन्तर 'वह आत्मा क्यों कहा जाता है?' (ऐसा पूछने पर अथर्वा मुनि ने कहा-) वह (ब्रह्म)
सर्वत्र सभी में विद्यमान रहता है, सभी को स्वीकार करता है तथा सभी का भक्षण कर लेता है अर्थात् अपने
में मिला लेता है, इस कारण वह आत्मा कहलाता है ॥ ३-४॥
अथ कस्मादुच्यते महेश्वर इति। यस्मान्महत ईशः शब्दध्वन्या चात्मशक्त्या च महत
ईशते तस्मादुच्यते महेश्वर इति ॥ ५-६ ॥
वह महेश्वर क्यों कहा जाता है? (अथर्वा मुनि ने कहा-) क्योंकि वह शब्द ध्वनि एवं आत्मशक्ति से
बड़ों-बड़ों का नियंत्रण करता है तथा बड़ों-बड़ों का ईश्वर है, इसलिए वह महेश्वर कहलाता है ॥ ५-६॥

अध्याय ३ खण्ड २ मन्त्र १५ ३०१

अध्याय ३ खण्ड २ मन्त्र १५ ३०१
अथ कस्मादुच्यते दत्तात्रेय इति। यस्मात्सुदुश्चरं तपस्तप्यमानायात्रये पुत्रकामायतितरां तुष्टेन
भगवता ज्योतिर्मयेनात्मैव दत्तो यस्माच्चानसूयायामत्रेस्तनयो ऽभवत्तस्मादुच्यते दत्तात्रेय इति ॥
वह दत्तात्रेय क्यों कहा जाता है ? (अथर्वा मुनि ने उत्तर दिया-) क्योंकि अत्यन्त उग्र तपश्चर्या करने के
उपरान्त अत्रि ऋषि ने पुत्र प्राप्ति की कामना की। तदनन्तर उनके ऊपर अत्यधिक प्रसन्न होते हुए ज्योतिष्मान्
भगवान् (शिव) ने स्वयं को ही उन अत्रि ऋषि को पुत्र रूप में प्रदत्त किया और वे स्वयं अत्रि एवं अनसूया
के द्वारा प्रादुर्भूत हुए । इस प्रकार से वे दत्तात्रेय के नाम से प्रसिद्ध हुए ॥ ७-८॥
अथ योऽस्य निरुक्तानि वेद स सर्वं वेद। अथ यो ह वै विद्ययैनं परमुपास्ते सोऽहमिति
स ब्रह्मविद्भवति ॥ ९-१० ॥
इन समस्त अर्थ सहित नामों को जो व्युत्पत्ति सहित समझता है, वह सभी कुछ जानने में समर्थ हो जाता
है। इसके अनन्तर जो (इस आत्म) विद्या के द्वारा इस परमात्म तत्त्व की उपासना करता है, वह "मैं ही
परमात्मा हूँ" इस प्रकार के भाव से ब्रह्म का वर्णन करने वाला (ब्रह्मवेत्ता) बन जाता है ॥ ९-१० ॥
अत्रैते श्लोका भवन्ति। दत्तात्रेयं शिवं शान्तमिन्द्रनीलनिभं प्रभुम्। आत्ममायारतं
देवमवधूतं दिगम्बरम् ॥ ११ ॥ भस्मोद्धूलितसर्वाङ्गं जटाजूटधरं विभुम्। चतुर्बाहुमुदाराङ्गं
प्रफुल्लकमलेक्षणम् ॥ १२ ॥ ज्ञानयोगनिधिं विश्वगुरुं योगिजनप्रियम्। भक्तानुकम्पिनं
सर्वसाक्षिणं सिद्धसेवितम् ॥ १३ ॥ एवं यः सततं ध्यायेद्देवदेवं सनातनम् । स मुक्तः सर्वपापेभ्यो
निःश्रेयसमवाप्नुयात् ॥ १४ ॥ इत्यों सत्यमित्युपनिषद् ॥ १५ ॥
यहाँ पर ये निम्न श्लोक कहे गये हैं— "मंगल स्वरूप वाले, शान्तरूप वाले, इन्द्रनीलमणि के समान
श्याम, आत्ममाया के साथ रमण करने वाले, अवधूत, नग्न शरीर वाले, भस्म लगे हुए शरीर वाले, जटाजूट
धारण किये हुए, सर्वत्र व्याप्त रहने वाले, चार भुजाओं से युक्त, उदार अंग वाले, प्रफुल्ल कमल के समान नेत्र
वाले, ज्ञानयोग के भण्डार, सम्पूर्ण विश्व के गुरु, योगी जनों के प्रिय, अपने भक्तजनों पर दया करने वाले,
सबके साक्षी एवं सिद्धजनों द्वारा सेवित प्रभु दत्तात्रेय देव शाश्वत, सनातन पुरुष हैं तथा देवों के भी देव अर्थात्
आदिदेव हैं। इस तरह से जो पुरुष निरन्तर सदा ही उन (देवपुरुष) का ध्यान करता रहता है, वह समस्त पापों
से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त करता है। इति ॐ सत्यम् अर्थात् यही सत्य है। इस प्रकार से यह उपनिषद्
(रहस्यमयी विद्या) पूर्ण हुई ॥ ११-१५ ॥"
ॐ भद्रं कर्णेभिः ............. इति शान्तिः ॥
॥ इति शाण्डिल्योपनिषत्समाप्ता ॥

॥ शारारकापानषद् ॥
यह उपनिषद् कृष्ण यजुर्वेद से सम्बद्ध है। इसमें कुल २० मन्त्र हैं, जिसमें सृष्टि प्रक्रिया का विशद
वर्णन है। सर्वप्रथम शरीर में विद्यमान पंचतत्त्वों का परिचय कराया गया है। इसके बाद पंच ज्ञानेन्द्रियों,
पंचकर्मेन्द्रियों, पंच तन्मात्राओं आदि का उत्पत्ति-क्रम वर्णित है। अन्तःकरण चतुष्टय तथा उनका शरीर में
स्थान कहाँ है? इसका भी उल्लेख है। इसी प्रकार अन्य अनेक तत्त्वों का क्रमशः उद्भव और विकास वर्णित
है। आगे चल कर सत, रज, तम-तीनों गुणों का स्वरूप और विभाग का वर्णन किया गया है। अन्त में १७ तत्त्वों
वाले सूक्ष्म शरीर, २४ तत्त्वों वाली प्रकृति तथा पुरुष को लेकर २५ तत्त्व वाले पूरे विश्वब्रह्मांड का स्वरूप
प्रतिपादित हुआ है। तत्त्वबोध की दृष्टि से इस उपनिषद् का विशेष महत्त्वपूर्ण स्थान कहा जा सकता है।
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ सह नाववतु ............ इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य-अवधूतोपनिषद)
ॐ अथातः पृथिव्यादिमहाभूतानां समवायं शरीरम्। यत्कठिनं सा पृथिवी यद्द्रवं
तदापो यदुष्णं तत्तेजो यत्संचरति स वायुर्यत्सुषिरं तदाकाशम्॥ १ ॥
पृथ्वी आदि पंचमहाभूतों का समुच्चय ही यह शरीर है। इस शरीर में जो ठोस पदार्थ हैं, वह पृथ्वी तत्त्व
है। जो द्रव पदार्थ हैं, वह जल तत्त्व है। जो ऊष्मा है, वही अग्नि तत्त्व है। जो सतत गतिशील है, वह वायु तत्त्व
है और जो सुषिर (पोला-छिद्रयुक्त) है, वह ही आकाश तत्त्व है ॥ १ ॥
श्रोत्रादीनि ज्ञानेन्द्रियाणि। श्रोत्रमाकाशे वायौ त्वगग्नौ चक्षुरप्सु जिह्वा पृथिव्यां घ्राणमिति।
एवमिन्द्रियाणां यथाक्रमेण शब्दस्पर्शरूपरसगन्धाश्चेति विषयाः पृथिव्यादिमहाभूतेषु
क्रमेणोत्पन्नाः ॥ २ ॥
श्रोत्रादि पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। आकाश तत्त्व में श्रोत्र, वायु तत्त्व में त्वचा, अग्नि (तेज) तत्त्व में नेत्र, जल
तत्त्व में जिह्वा तथा पृथिवी तत्त्व में घ्राणेन्द्रिय विद्यमान है। इन सभी इन्द्रियों के विषय क्रमशः शब्द, स्पर्श,
रूप, रस और गन्ध हैं, वे सभी पृथिवी आदि महाभूतों से प्रादुर्भूत हुए हैं ॥ २ ॥
वाक्पाणिपादपायूपस्थाख्यानि कर्मेन्द्रियाणि। तेषां क्रमेण वचनादानगमनविस-
र्गानन्दाश्चैते विषयाः पृथिव्यादिमहाभूतेषु क्रमेणोत्पन्नाः ॥ ३ ॥
वाक्, हस्त, पाद, गुदा एवं उपस्थ (जननेन्द्रिय)-कर्मेन्द्रियाँ कही गयी हैं। इन सभी इन्द्रियों के विषय
क्रम से वचन, आदान-प्रदान, गमन, विसर्जन और आनन्द हैं, जो पृथ्वी आदि महाभूतों से ही प्रकट होते हैं ॥
मनोबुद्धिरहंकारश्चित्तमित्यन्तःकरणचतुष्टयम्। तेषां क्रमेण संकल्पविकल्पाध्यव-
सायाभिमानावधारणास्वरूपाश्चैते विषयाः। मनःस्थानं गलान्तं बुद्धेर्वदनमहंकारस्य हृदयं
चित्तस्य नाभिरिति ॥ ४ ॥
मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार- इन चारों को अन्तःकरण (चतुष्टय) कहा गया है। इनके विषय
क्रमशः इस प्रकार हैं-१. संकल्प-विकल्प, २. निश्चय, ३. अवधारणा और ४. अभिमान। मन का क्षेत्र गले का
अन्तिम भाग, बुद्धि का स्थान मुख, चित्त का क्षेत्र नाभि और अहंकार का क्षेत्र हृदय बताया गया है ॥ ४ ॥

३०३ शारीरकोपनिषद
अस्थिचर्मनाडीरोममांसाश्चेति पृथिव्यंशाः। मूत्रश्लेष्मरक्तशुक्रस्वेदा अबंशाः। क्षुत्तृष्णा-
लस्यमोहमैथुनान्यग्नेः। प्रचारणविलेखनस्थूलाक्ष्यन्मेषनिमेषादि वायोः। कामक्रोधलोभमोह-
भयान्यॉकाशस्य॥५॥
अस्थि, त्वचा, नाड़ी, रोमकूप तथा मांस- ये सभी पृथ्वी तत्त्व के अंश हैं। मूत्र, कफ, रक्त, शुक्र तथा
स्वेद (पसीना) —जल तत्त्व के अंश हैं। क्षुधा, पिपासा, आलस्य, मोह और मैथुन-अग्नि तत्त्व के अंश हैं।
फैलाना, दौड़ना, गति करना (चलना), उड़ना, पलकों को संचालित करना आदि वायु तत्त्व के अंश हैं और
काम, क्रोध, लोभ, मोह, भय आदि आकाश तत्त्व के अंश हैं॥ ५॥
शब्दस्पर्शरूपरसगन्धाः पृथिवीगुणाः। शब्दस्पर्शरूपरसाश्चापां गुणाः। शब्दस्पर्शरूपा-
ण्यग्निगुणाः। शब्दस्पर्शाविति वायुगुणौ। शब्द एक आकाशस्य ॥ ६॥
शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध- ये सभी पृथिवी तत्त्व के गुण कहे गये हैं। शब्द, स्पर्श, रूप और रस-
ये सभी जल तत्त्व के गुण बताए गये हैं। शब्द, स्पर्श और रूप-ये तीनों अग्नि तत्त्व के गुण कहे गये हैं। शब्द
तथा स्पर्श वायु तत्त्व के गुण बताये गये हैं और आकाश तत्त्व का मात्र एक ही गुण शब्द कहा गया है ॥ ६॥
सात्त्विकराजसतामसलक्षणानि त्रयो गुणाः ॥७॥
सात्त्विक, राजस और तामस इन तीन लक्षणों से युक्त ये तीन गुण कहे गये हैं॥७॥
अहिंसा सत्यमस्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहाः। अक्रोधो गुरुशुश्रूषा शौचं संतोष आर्जवम् ॥ ८॥
अमानित्वमदम्भित्वमास्तिकत्वमहिंस्रता । एते सर्वे गुणाः ज्ञेयाः सात्त्विकस्य विशेषतः ॥ ९ ॥
अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, क्रोध न करना, गुरु की सेवा करना,
शुचिता (पवित्रता), संतोष, सरलता, अमानिता का भाव, दम्भ न करना, आस्तिकता, हिंसा न करना आदि ये
सभी गुण विशेषतया सात्त्विक स्वभाव वाले मनुष्यों के कहे गये हैं॥ ८-९॥
अहं कर्ताऽस्म्यहं भोक्ताऽस्म्यहं वक्ताऽभिमानवान्। एते गुणा राजसस्य प्रोच्यन्ते ब्रह्मवित्तमैः ॥
मैं कर्त्ता हूँ, मैं भोक्ता अर्थात् भोग करने वाला हूँ, मैं वक्ता (बोलने वाला) हूँ-इस तरह के अभिमान
युक्त गुण, राजस स्वभाव वाले मनुष्यों के बताए गए हैं ॥ १०॥
निद्रालस्ये मोहरागौ मैथुनं चौर्यमेव च । एते गुणास्तामसस्य प्रोच्यन्ते ब्रह्मवादिभिः ॥ ११ ॥
निद्रा, आलस्य, मोह, आसक्ति, मैथुन और चौर कृत्य- ये समस्त गुण तामस वृत्ति से युक्त मनुष्यों के
कहे गये हैं॥ ११॥
ऊर्ध्वे सात्त्विको मध्ये राजसोऽधस्तामस इति ॥ १२॥
सर्वश्रेष्ठ ऊर्ध्व पद सात्त्विक गुण को कहा गया है, राजस गुण को मध्यम तथा तामस गुण को अधम
बताया गया है ॥ १२ ॥
सत्यज्ञानं सात्त्विकम् । धर्मज्ञानं राजसम् । तिमिरान्धं तामसमिति ॥ १३ ॥
पूर्णसत्य (ब्रह्म) ज्ञान सात्त्विक है। धर्मज्ञान राजस है और अन्धकार से युक्त अर्थात् तिमिरान्ध
(अधर्ममूढ़ता) ही तामस है ॥ १३॥

यहाँ पृष्ठ का संपूर्ण पाठ पंक्ति-दर-पंक्ति प्रस्तुत है:

मन्त्र २० ३०४
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तितुरीयमिति चतुर्विधा अवस्थाः। ज्ञानेन्द्रियकर्मेन्द्रियान्तःकरणचतुष्टयं
चतुर्दशकरणयुक्तं जाग्रत्। अन्तःकरणचतुष्टयैरेव संयुक्तः स्वप्नः। चित्तैककरणा सुषुप्तिः।
केवलजीवयुक्तमेव तुरीयमिति ॥ १४॥
जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय- ये चार अवस्थाएँ हैं। जाग्रत् अवस्था में ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय तथा चार
अन्तःकरण मिलकर के चौदह करण (सक्रिय) रहते हैं। स्वप्नावस्था में चार अन्तःकरण संयुक्त रूप से
(सक्रिय) रहते हैं। सुषुप्ति अवस्था में केवल चित्त ही एक करण (सक्रिय) रहता है तथा तुरीयावस्था में
केवल जीवात्मा ही रह जाता है॥ १४॥
उन्मीलितनिमीलितमध्यस्थजीवपरमात्मनोर्मध्ये जीवात्मा क्षेत्रज्ञ इति विज्ञायते ॥१५॥
उन्मीलित (अर्थात् खुले हुए) तथा निमीलित (अर्थात् बन्द नेत्रों) की मध्य स्थिति में जीव और
परमात्मा के बीच में जीवात्मा क्षेत्रज्ञ होता है॥ १५॥
बुद्धिकर्मेन्द्रियप्राणपञ्चकैर्मनसा धिया। शरीरं सप्तदशभिः सुसूक्ष्मं लिङ्गमुच्यते ॥ १६॥
ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय, पाँच प्राण, मन एवं बुद्धि-इन सत्रह का सूक्ष्म स्वरूप लिङ्ग शरीर कहा गया है,
ऐसा जानना चाहिए॥ १६॥
मनो बुद्धिरहंकार खानिलाग्निजलानि भूः। एताः प्रकृतयस्त्वष्टौ विकाराः षोडशापरे ॥ १७॥
मन, बुद्धि, अहंकार, आकाश, वायु, अग्नि, जल तथा पृथिवी ये आठ प्रकृति के विकार कहे गये हैं।
इनके अतिरिक्त सोलह विकार और बताये गये हैं॥ १७॥
श्रोत्रं त्वक्चक्षुषी जिह्वा घ्राणं चैव तु पंचमम्। पायूपस्थौ करौ पादौ वाक्चैव दशमी मता ॥
शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धस्तथैव च। त्रयोविंशतिरेतानि तत्त्वानि प्रकृतानि तु ॥ १९॥
चतुर्विंशतिरव्यक्तं प्रधानं पुरुषः परः इत्युपनिषत् ॥ २०॥
श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, जिह्वा तथा घ्राणेन्द्रिय-ये पाँच विकार तथा गुदा, उपस्थ (जननेन्द्रिय), हाथ, पैर, तथा
वाक्-ये पाँच और शब्द, स्पर्श, रूप, रस एवं गन्ध-ये पाँच, ये सभी तथा उपर्युक्त मन आदि अष्टविकार
मिलकर प्रकृति के (८+५+५+५ = २३) तेईस तत्त्व हुए। चौबीसवाँ अव्यक्त प्रधान (प्रकृति) है, पुरुष उससे
भी परे (कहा गया) है, (इस प्रकार कुल पच्चीस तत्त्वों के समुच्चय वाला यह विश्वब्रह्माण्ड है) यही
(शारीरक) उपनिषद् है ॥१८-२०॥
ॐ सह नाववतु ................ इति शान्तिः ॥
॥ इति शारीरकोपनिषत्समाप्ता ॥

॥ संन्यासोपनिषद् ॥
यह उपनिषद् सामवेद से सम्बद्ध है। इसमें कुल दो अध्याय हैं। प्रथम अध्याय में संन्यास क्या है? कैसे
ग्रहण किया जाता है? उसके लिए कैसा आचार-व्यवहार होना चाहिए आदि का विशद वर्णन है। दूसरा
अध्याय काफी बड़ा है। इसकी शुरुआत साधन चतुष्टय (विवेक, वैराग्य, षट्सम्पत्ति, मुमुक्षुत्व) से की गई
है। संन्यास का अधिकारी कौन है? इसकी विस्तृत गवेषणा की गई है। संन्यासी का भेद बताते हुए १. वैराग्य
संन्यासी २. ज्ञान संन्यासी ३. ज्ञान-वैराग्य संन्यासी और ४. कर्म संन्यासी की विस्तृत व्याख्या की गई है। आगे
चलकर छः प्रकार के संन्यास का क्रम उल्लिखित हुआ है-कुटीचक, बहूदक, हंस, परमहंस, तुरीयातीत और
अवधूत। इसी क्रम में आत्मज्ञान की स्थिति और स्वरूप का भी वर्णन उपनिषद्कार ने कर दिया है। संन्यासी
के लिए आचरण की पवित्रता और भिक्षा में मिले स्वल्प भोजन में ही संतुष्ट होने का विधान बताया गया है।
उसे स्त्री, भोग आदि शारीरिक आनन्द प्राप्ति से दूर रहने का निर्देश है। इस प्रकार आहार-विहार का संयम
बरतते हुए नित्य प्रति आत्म चिन्तन में तल्लीन रहना चाहिए। ॐकार का जप करते रहना चाहिए-इसी से
उसके अन्तःकरण में ब्रह्म का प्रकाश प्रकट होता है और वह मोक्ष प्राप्ति का अधिकारी बनता है।
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ आप्यायन्तु ............इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य-आरुण्युपनिषद् )
॥ प्रथमोऽध्यायः ॥
अथातः संन्यासोपनिषदं व्याख्यास्यामो योऽनुक्रमेण संन्यस्यति स संन्यस्तो भवति।
कोऽयं संन्यास उच्यते। कथं संन्यस्तो भवति। य आत्मानं क्रियाभिर्गुप्तं करोति मातरं पितरं
भार्यां पुत्रान्बन्धूननुमोदयित्वा ये चास्यर्त्विजस्तान्सर्वांश्र्च पूर्ववद्वृणीत्वा वैश्वानरेष्टिं निर्वपेत्स-
र्वस्वं दद्याद्यजमानस्य गा ऋत्विजः सर्वैः पात्रैः समारोप्य यदाहवनीये गार्हपत्ये वान्वाहार्यपचने
सभ्यावसथ्ययोश्च प्राणापानव्यानोदानसमानान्सर्वान्सर्वेषु समारोपयेत्। सशिखान्केशान्विसृज्य
यज्ञोपवीतं छित्त्वा पुत्रं दृष्ट्वा त्वं यज्ञस्त्वं सर्वमित्यनुमन्त्रयेत्। यद्यपुत्रो भवत्यात्मानमेवेमं ध्यात्वा-
ऽनवेक्षमाणः प्राचीमुदीचीं वा दिशं प्रव्रजेच्च। चतुर्षु वर्णेषु भिक्षाचर्यं चरेत्। पाणिपात्रेणाशनं
कुर्यात् औषधवदशनमाचरेत्। औषधवदशनं प्राश्नीयात्। यथालाभमश्रीयात्प्राणसंधारणार्थं
यथा मेदोवृद्धिर्न जायते। कृशो भूत्वा ग्राम एकरात्रं नगरे पञ्चरात्रं चतुरो मासान्वार्षिकान्ग्रामे
वा नगरे वापि वसेत्। पक्षा वै मासो इति द्वौ मासौ वा वसेत् । विशीर्णवस्त्रं वल्कलं वा
प्रतिगृह्णीयान्नान्यत्प्रतिगृह्णीयाद्यद्यशक्तो भवति क्लेशस्तस्तप्यते तप इति। यो वा एवं क्रमेण
संन्यस्यति यो वा एवं पश्यति किमस्य यज्ञोपवीतं कास्य शिखा कथं वास्योपस्पर्शनमिति।
तं होवाचेदमेवास्य तद्यज्ञोपवीतं यदात्मध्यानं विद्या शिखा नीरैः सर्वत्रावस्थितैः कार्यं
निर्वर्तयन्नुदरपात्रेण जलतीरे निकेतनम्। ब्रह्मवादिनो वदन्त्यस्तमित आदित्ये कथं
वास्योपस्पर्शनमिति। तान्होवाच यथाहनि तथा रात्रौ नास्य नक्तं न दिवा तदप्येतदृषिणोक्तम्।
सकृद्दिवा हैवास्मै भवति य एवं विद्वानेतेनात्मानं संधत्ते ॥ १ ॥

३०६ संन्यासोपनिषद्
अब संन्यास उपनिषद् का वर्णन करते हैं। क्रमानुसार नश्वर जगत् का परित्याग कर देने वाला विरक्त
ही संन्यासी होता है। (प्रश्न) संन्यास किसे कहते हैं ? संन्यासी किस तरह का होता है ? (उत्तर) संन्यासी वह
है, जो आत्मा के उत्थान हेतु माता-पिता, स्त्री-पुत्र, बान्धव आदि के द्वारा अनुमोदित पूर्व में कही क्रियाओं का
परित्याग कर देता है; जो हमेशा की तरह ऋत्विजों को नमन-वंदन करने के पश्चात् वैश्वानर यज्ञ सम्पन्न करता
है। इस पुनीत अवसर पर यजमान अपना सभी कुछ दान कर दे तथा ऋत्विज् सम्पूर्ण सामग्री को पात्रों समेत
हवन कर दे। संन्यासी द्वारा आहवनीय, गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि इन तीनों अग्नियों तथा सभ्य (वैदिक कालीन
अग्नि) एवं आवसथ्य (स्मृतिकालीन अग्नि) को प्राण, अपान, व्यान, उदान एवं समान पाँचों वायुओं में
आरोपित करना चाहिए। शिखा (चोटी) सहित सभी केशों का मुण्डन करा देना चाहिए। यज्ञोपवीत को त्याग
दे एवं पुत्र को देखकर इस तरह कहे कि तुम यज्ञ रूप हो, सर्वस्वरूप हो। यदि पुत्र न हो, तो वह अपनी आत्मा
को ही लक्ष्य करके उपदेश देकर पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर गमन कर जाए। चारों वर्णों (ब्राह्मण,
क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र) से भिक्षा स्वीकार करनी चाहिए। हाथ रूपी पात्र में भिक्षा ग्रहण कर भोजन करना
चाहिए। भोजन को औषधि के समान ग्रहण करना चाहिए अर्थात् मात्र प्राण रक्षा की दृष्टि से आहार लेना
चाहिए और जो कुछ प्राप्त हो जाए, वही ग्रहण करना चाहिए, जिससे चर्बी की वृद्धि न हो। इस प्रकार
क्षीणकाय होकर गाँव में एक रात्रि एवं नगर में पाँच रात्रि तक निवास करना चाहिए। चातुर्मास (वर्षा के मास)
में एक ही गाँव अथवा नगर में रुक जाना चाहिए या फिर पक्ष (पखवारा) को ही मास समझकर दो महीने तक
निवास करना चाहिए। फटे वस्त्र अथवा वल्कल वस्त्र ही धारण करना चाहिए, अन्य वस्त्रों को ग्रहण न करे।
इस तरह क्लेश सहना ही तप-तितिक्षा है। जो इस क्रम से संन्यास धारण करता है, उसके लिए यज्ञोपवीत क्या
है ? शिखा क्या है ? आचमन किस तरह का है ? इन सभी का उत्तर इस प्रकार है- आत्मा का ध्यान ही
संन्यासी का यज्ञोपवीत है। विद्या ही उसकी शिखा (चोटी) है। सर्वत्र स्थित जल के लिए उदर (पेट) ही
संन्यासी का पात्र है तथा जलाशय का तट ही उसका आश्रय-स्थल है। इसी प्रकार का ब्रह्मवादी भी होता है।
उसके लिए सूर्य के अस्ताचल की ओर गमन करने पर आचमन किस तरह का है ? इस प्रश्न का उत्तर इस
प्रकार है-उस (संन्यासी) के लिए रात्रि एवं दिन दोनों ही एक जैसे हैं। उसके लिए न रात्रि होती है, न दिन
होता है। जो (संन्यासी अथवा साधक) अपनी आत्मा के अनुसंधान में सतत लगा रहता है, विद्वज्जनों के
अनुसार उसके लिए सदैव दिन ही है ॥ १ ॥
॥ द्वितीयोऽध्यायः ॥
चत्वारिंशत्संस्कारसंपन्नः सर्वतो विरक्तश्चित्तशुद्धिमेत्याशासूयेर्ष्याहंकारं दग्ध्वा
साधनचतुष्टयसंपन्न एव संन्यस्तुमर्हति ॥ १ ॥
चालीस तरह के संस्कारों से सम्पन्न, सभी से पूर्ण रूप से विरक्त, चित्त को परिष्कृत रखने वाला,
आशा, असूया, ईर्ष्या, अहंकार को भस्मीभूत करके चारों साधनों (१) विवेक (नित्यानित्य वस्तु का ज्ञान),
(२) वैराग्य (लौकिक एवं पारलौकिक भोगों की इच्छा का न होना), (३) षट्सम्पत्ति (शम, दम, उपरति,
तितिक्षा, समाधान एवं श्रद्धा), (४) मुमुक्षुत्व (मोक्ष की प्रबल इच्छा) से सम्पन्न ही संन्यास ग्रहण करने का
अधिकारी होता है ॥ १ ॥