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१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

मन्त्र २१ २७५
त्रिसन्ध्यं शक्तितः स्नानं तर्पणं मार्जनं तथा। उपस्थानं पञ्चयज्ञान्कुर्यादामरणान्तिकम् ॥ १३ ॥
सभी को मृत्यु पर्यन्त प्रातः, मध्याह्न एवं सायंकालीन संध्या, स्नान, तर्पण, मार्जन, उपस्थान तथा
पञ्चयज्ञ (देवयज्ञ, पितृयज्ञ, नृयज्ञ या अतिथि यज्ञ, भूतयज्ञ एवं ब्रह्मयज्ञ) अवश्य ही करना चाहिए ॥ १३ ॥
दशभिः प्रणवैः सप्तव्याहृतिभिश्चतुष्पदा। गायत्रीजप यज्ञश्च त्रिसन्ध्यं शिरसा सह ॥ १४॥
दश प्रणव (ॐकार) तथा सात व्याहृतियों (भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यम्) के सहित चार पाद
युक्त एवं सिर (आपोज्योती इत्यादि) युक्त गायत्री का जप एवं यज्ञ त्रिकाल सन्ध्या के साथ करना चाहिए ॥ १४ ॥
योगयज्ञः सदैकाग्र्यभक्त्या सेवा हरेर्गुरोः। अहिंसा तु तपोयज्ञो वाङ्मनःकायकर्मभिः ॥१५॥
एकाग्रचित्त होकर भक्ति भाव से योग, यज्ञ भगवान् (विष्णु) तथा गुरु की सेवा और मन, वाणी एवं
कर्म के द्वारा हिंसारहित तप रूपी यज्ञ सतत करते रहना चाहिए ॥ १५ ॥
नानोपनिषदभ्यासः स्वाध्यायो यज्ञ ईरितः। ओमित्यात्मानमव्यग्रो ब्रह्मण्यग्नौ जुहोति यत् ॥ १६ ॥
समस्त उपनिषदों का अभ्यास (पाठ) स्वाध्याय यज्ञ कहा गया है।'ॐ' इस प्रकार उच्चारण करते हुए
ब्रह्मरूपी अग्नि में ही आत्मा की आहुति दी जाती है अर्थात् आत्मा को ब्रह्म में विलीन किया जाता है ॥ १६ ॥
ज्ञानयज्ञः स विज्ञेयः सर्वयज्ञोत्तमोत्तमः। ज्ञानदण्डा ज्ञानशिखा ज्ञानयज्ञोपवीतिनः ॥ १७ ॥
वह (ॐकार ही) सभी श्रेष्ठ यज्ञों से भी उत्तम ज्ञानयज्ञ कहा गया है। इन सभी का ज्ञान ही दण्ड है,
ज्ञान ही शिखा है और ज्ञान ही इनका यज्ञोपवीत है ॥ १७ ॥
शिखा ज्ञानमयी यस्य उपवीतं च तन्मयम्। ब्राह्मण्यं सकलं तस्य इति वेदानुशासनम् ॥ १८
जिसकी शिखा (चोटी) एवं यज्ञोपवीत ज्ञानमय होता है। उसकी समस्त वस्तुयें ब्रह्मरूप ही हैं, ऐसा
वेद का अनुशासन (आदेश है) ॥ १८ ॥
अथ खलु सोम्यैते परिव्राजका यथा प्रादुर्भवन्ति तथा भवन्ति। कामक्रोधलोभमो-
हदम्भदर्पासूयाममत्वांहकारादींस्तितीर्य मानावमानौ निन्दास्तुती च वर्जयित्वा वृक्ष इव तिष्ठा-
सेत्। छिद्यमानो न ब्रूयात्। तदेवं विद्वांस इहैवामृता भवन्ति। तदेतदृचाभ्युक्तम्। बन्धुपुत्रमनुमो-
दयित्वानवेक्ष्यमाणो द्वन्द्वसहः प्रशान्तः। प्राचीमुदीचीं वा निर्वर्तयंश्चरेत ॥ १९ ॥
हे प्रिय सोम्य ! ये परिव्राजक जिस प्रकार प्रादुर्भूत होते हैं, वह बतला दिया गया है। ये संन्यासी काम,
क्रोध, लोभ, मोह, दम्भ, दर्प (घमण्ड), असूया (दूसरे के गुणों में दोष निकालना), ममता, अहंकार आदि
को पार करके, मान-अपमान, निन्दा-प्रशंसा को देखकर वृक्षवत् अविचल रहते हैं, काटे जाने (कष्ट पड़ने) पर
भी कुछ बोलते नहीं। इस प्रकार से विद्वज्जन इस लोक में ही अमृत-जीवनमुक्त हो जाते हैं। इस सन्दर्भ में यह
ऋचा द्रष्टव्य है-'भाई, पुत्रादि का पालन-पोषण करने के पश्चात् फिर कभी उनकी ओर नहीं देखे। दुःखादि
सहते हुए पूर्व एवं उत्तर दिशाओं में अपने-अपने स्वरूप का अनुसंधान करते हुए भ्रमण करे॥ १९॥
पात्री दण्डी युगमात्रावलोकी शिखी मुण्डी चोपवीती कुटुम्बी।
यात्रामात्रं प्रतिगृह्णन्मनुष्यात् अयाचितं याचितं वोत भैक्षं ॥ २० ॥
पात्र एवं दण्ड धारण करते हुए युग (दो-जीवात्मा-परमात्मा) मात्र के दर्शन करने वाले, विशाल जटा-
वाले या मुण्डन किये हुए मस्तक वाले, उपवीत ही जिसका कुटुम्ब है, ऐसे संन्यासी को केवल अपने प्राणयात्रा
के लिए मनुष्यों से भिक्षा माँगकर या बिना माँगे ही भिक्षा ग्रहण करते हुए निरन्तर विचरण करना चाहिए ॥ २० ॥
मृद्वार्बलाबूफलं तन्तुपर्णपात्रं तत्तथा यथा तु लब्धम्।
क्षाणं क्षामं तृणं कन्थाजिने च पर्णमाच्छादनं स्यादहतं वा विमुक्तः ॥ २१ ॥

२७६ शाट्यायनायापानषद्
मिट्टी, लकड़ी की तुम्बी, श्रीफल, तन्तु ग्रथित या पत्तों से निर्मित पात्र जिस तरह का भी मिले, ग्रहण
कर लेना चाहिए। चटाई, वृक्षों की छाल या सूखी घास से बनी कथरी, अजिन (कृष्णमृग चर्म) तथा जो पत्ते
कीड़ों द्वारा खाये न गये हों, ऐसे श्रेष्ठ पत्तों के द्वारा बनाई गयी ओढ़नी-उत्तरीय को धारण करना चाहिए॥ २१ ॥
ऋतुसन्धौ मुण्डयेन्मुण्डमात्रं नाधो नाक्षं जातु शिखां न वापयेत्। चतुरो मासान्ध्रुवशीलतः
स्यात्स यावत्सुप्तोऽन्तरात्मा पुरुषो विश्वरूपः ॥ २२ ॥
हंस (संन्यासी) की ऋतु सन्धि के समय क्षौर कर्म अर्थात् मुण्डन कराना चाहिए, किन्तु कुटीचक (यह
भी संन्यासियों का एक भेद है) शिखा (जटा) को कभी न कटाये। जब विश्वरूप विराट् पुरुष भगवान् नारायण
शयन करते हैं, तब तक चार मास (चौमासा) एक ही स्थान पर स्थिर चित्त से निवास करे॥ २२ ॥
अन्यांनथाष्टौ पुनरुत्थितेऽस्मिन्स्व कर्मलिप्सुर्विहरेद्वा वसेद्वा। देवाग्न्यगारे तरुमूले गुहायां
वसेदसङ्गोऽलक्षितशीलवृत्तः। अनिन्धनो ज्योतिरिवोपशान्तो न चोद्विजेदुद्विजयेच्च कुत्र ॥२३॥
इस प्रकार अन्य (श्रवण, ध्यान एवं समाधि आदि की) अवस्थाओं को प्राप्त करने का इच्छुक संन्यासी
स्वकर्म करते हुए एक स्थान पर ही निवास हेतु रह जाये अथवा उसे अन्यत्र आश्रय प्राप्त कर लेना चाहिए।
अपना निवास किसी देवालय में वृक्ष के मूल (जड़) के समीप में अथवा गुफा में कर लेना चाहिए तथा वहाँ
निःसंग एवं सर्वथा अलक्षित (जन संसर्ग से दूर रहकर) बिना काष्ठ को अग्नि के समान शान्त चित्त होकर रहे।
किसी को भी देखकर क्षुभित न हो, सभी में आत्मबुद्धि कर लेनी चाहिए॥ २३ ॥
आत्मानं चेद्विजानीयादयमस्मीति पूरुषः। किमिच्छन्कस्य कामाय शरीरमनुसंज्वरेत् ॥ २४ ॥
यदि पुरुष अपनी आत्मा को ब्रह्म रूप में जान ले, तो फिर वह क्या चाहता हुआ किस इच्छा से शरीर
का पोषण अथवा शोषण करे ? अर्थात् उसे नहीं करना चाहिए॥ २४॥
तमेव धीरो विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः। नानुध्यायाद्बहूञ्छब्दान्वाचो विग्लापनं हि तत् ॥२५ ॥
धैर्यवान् ब्राह्मण उस अविनाशी परब्रह्म को पहचान कर, उसी (ब्रह्म) में बुद्धि को स्थिर करे।
अधिकाधिक शब्दाडम्बर में नहीं पड़ना चाहिए; क्योंकि यह सब वाणी का दुरुपयोग है॥ २५ ॥
बाल्येनैव हि तिष्ठासेन्निर्विद्य ब्रह्मवेदनम्। ब्रह्मविद्यां च बाल्यं च निर्विद्य मुनिरात्मवान्॥२६ ॥
वैराग्ययुक्त होकर ही स्थिर रहने की इच्छा करनी चाहिए। ब्रह्म के अतिरिक्त और कुछ नहीं है, ऐसा दृढ़
निश्चय कर ब्रह्म को पहचान एवं वैराग्य को भली-भाँति समझकर आत्माराम होकर सर्वत्र आत्मदर्शन करे॥
यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः। अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते ॥
जब हृदय में रहने वाली समस्त कामनाएँ शान्त हो जाती हैं, तब यह मरणधर्मा होता हुआ भी मृत्युहीन
होकर ब्रह्मानन्द का रसास्वादन करता है॥ २७॥
अथ खलु सोम्येदं परिव्राज्यं नैष्ठिकमात्मधर्मं यो विजहाति स वीरहा भवति। स
ब्रह्महा भवति। स भ्रूणहा भवति। स महापातकी भवति। य हमां वैष्णवीं निष्ठां परित्यजति।
स स्तेनो भवति। गुरुतल्पगो भवति। समित्रध्रुग्भवति। स कृतघ्नो भवति। स सर्वस्मा
ल्लोकात्प्रच्युतो भवति। तदेतदृचाभ्युक्तम्। स्तेनः सुरापो गुरुतल्पगामी मित्रध्रुगेते निष्कृतेर्यान्ति
शुद्धिम्। व्यक्तमव्यक्तं वा विधृतं विष्णुलिङ्गं त्यजन्न शुध्येदखिलैरात्मभासा ॥ २८ ॥
हे प्रिय सोम्य! जो अपने इस नैष्ठिक संन्यासियों के धर्म को छोड़ देता है, वह पुरुषत्वनाशक, ब्रह्मघाती,

मन्त्र ३५ २७७
गर्भघाती तथा महापातकी (के सदृश) होता है। जो (संन्यासी) इस वैष्णवी निष्ठा को त्याग देता है, वह चोर
होता है। गुरुपत्नीगामी, मित्रद्रोही एवं कृतघ्न हो जाता है तथा समस्त लोकों से भ्रष्ट होकर अधोगति को प्राप्त
होता है। इस सन्दर्भ में ये ऋचाएं हैं-चोर, शराबी, गुरुपत्नीगामी, एवं मित्रद्रोही ये प्रायश्चित्त से शुद्ध हो जाते
हैं; किन्तु व्यक्त एवं अव्यक्त स्वरूप विष्णु लिङ्ग (अनुशासन सूत्रों) को छोड़ने पर संन्यासी किसी भी तरह से
पवित्र नहीं हो सकता है ॥ २८ ॥
त्यक्त्वा विष्णोर्लिङ्गमन्तर्बहिर्वा यः स्वाश्रमं सेवतेऽनाश्रमं वा। प्रत्यापत्तिं भजते
वातिमूढो नैषां गतिः कल्पकोट्यापि दृष्टा ॥ २९ ॥
अन्तः तथा बाह्य विष्णु लिङ्ग को छोड़कर जो संन्यासी अपने आश्रम में ही निवास करता है अथवा
आश्रम का त्याग कर देता है, वह प्रतिपल विपत्तियों से घिरा रहता है, ऐसे व्यक्तियों की सद्गति अनन्तकाल
तक भी देखने में नहीं आती ॥ २९ ॥
त्यक्त्वा सर्वाश्रमान्धीरो वसेन्मोक्षाश्रमे चिरम्। मोक्षाश्रमात्परिभ्रष्टो न गतिस्तस्य विद्यते ॥३०॥
धैर्यवान् पुरुष समस्त आश्रमों का परित्याग करके मोक्षरूपी आश्रम में दीर्घकाल तक निवास करे। यदि
मोक्ष-आश्रम से भी भ्रष्ट हो जाये, तो फिर उसको कहीं पर भी ठौर नहीं है ॥ ३० ॥
पारिव्राज्यं गृहीत्वा तु यः स्वधर्मे न तिष्ठति । तमारूढच्युतं विद्यादिति वेदानुशासनम् ॥ ३१ ॥
जो (पुरुष) संन्यास-आश्रम को ग्रहण करके अपने धर्म में स्थिर नहीं रहता, ऐसे (पुरुष) को आरूढ़
च्युत (पातकी) समझना चाहिए, क्योंकि वह (पुरुष) संन्यास आश्रम में आकर के भी पातकी हो चुका है,
ऐसा वेद का अनुशासन (आदेश) है ॥ ३१ ॥
अथ खलु सोम्येमं सनातनमात्मधर्मं वैष्णवीं निष्ठां लब्ध्वा यस्तामदूषयन्वर्तते स वशी
भवति। स पुण्यश्लोको भवति। स लोकज्ञो भवति। स वेदान्तज्ञो भवति। स ब्रह्मज्ञो भवति।
स सर्वज्ञो भवति। स स्वराड् भवति। स परं ब्रह्म भगवन्तमाप्नोति। स पितृन्संबन्धिनो
बान्धवान्सुहृदो मित्राणि च भवादुत्तारयति ॥ ३२ ॥
हे प्रिय सोम्य ! जो पुरुष इस सनातन आत्मधर्म, विष्णु से सम्बन्धित निष्ठा को प्राप्त करके उसको प्रदूषित
न करता हुआ प्रतिष्ठित रहता है, वह जितेन्द्रिय होता है। वह विशाल कीर्ति एवं लोकतत्त्व का ज्ञाता होता है।
वह ब्रह्मवेत्ता होता है, वह सर्वज्ञ होता है। वह स्वयं प्रकाश स्वरूप होता हुआ परब्रह्म को प्राप्त करता है। वह
अपने पितरों, सम्बन्धियों, बन्धुओं, मित्रों तथा समस्त प्रेमी-सम्बन्धियों को संसार-सागर से तार देता है ॥३२ ॥
तदेतदृचाभ्युक्तम् । शतं कुलानां प्रथमं बभूव तथा पराणां त्रिशतं समग्रम्। एते भवन्ति
सुकृतस्य लोके येषां कुले संन्यसतीह विद्वान् ॥ ३३॥
जो विद्वान् इस संन्यास-धर्म को ग्रहण करता है, उसके कुल में सौ पीढ़ी पूर्व तथा तीन सौ पीढ़ी बाद
तक जन्म लेने वालों का उद्धार हो जाता है। ऐसे श्रेष्ठ कृत्य करने वाले विद्वान् संन्यासी कभी-कभी ही इस
लोक में प्रकट होकर इसे कृतार्थ करते हैं ॥ ३३ ॥
त्रिंशत्परांस्त्रिंशदपरांस्त्रिंशच्च परतः परान् । उत्तारयति धर्मिष्ठः परिव्राडिति वै श्रुतिः ॥ ३४॥
विद्वान् धर्मिष्ठ संन्यासी तीस पर (बाद की), तीस अपर (पूर्व की) एवं तीस पर से भी पर(बाद से बाद
की) पीढ़ियों-पूर्वजों को तार देता है, ऐसा श्रुति का वचन है ॥ ३४ ॥
संन्यस्तमिति यो ब्रूयात्कण्ठस्थप्राणवानपि। तारिताः पितरस्तेन इति वेदानुशासनम् ॥ ३५ ॥

२७८ शाट्यायनीयोपनिषद्
प्राणों के कण्ठगत (मृत्यु के समीप) होने पर भी जो इस प्रकार कह दे कि 'मैंने संन्यास ले लिया है',
तो ऐसा समझना चाहिए कि उसने पितरों को तार दिया, ऐसी वेद की आज्ञा (अनुशासन) है॥ ३५॥
अथ खलु सोम्येमं सनातनमात्मधर्मं वैष्णवीं निष्ठां नासमाप्य प्रब्रूयात्। नानूचानाय
नानात्मविदे नावीतरागाय नाविशुद्धाय नानुपसन्नाय नाप्रयतमानसायेति ह स्माहुः।
तदेतदृचाभ्युक्तम्। विद्या ह वै ब्राह्मणमाजगाम गोपाय मां शेवधिष्टेऽहमस्मि। असूयकायानुजवे
शठाय मा मा ब्रूया वीर्यवती तथा स्याम्॥ ३६॥
हे प्रिय सौम्य ! विद्वान् पुरुष को चाहिए कि वह इस सनातन आत्मनिरूपक धर्म को विष्णु सम्बन्धी
निष्ठा को सम्यक् रूप से निर्वाह किये (स्वयं आचरण किये) बिना उपदिष्ट न करे। इसके साथ ही जो वेदान्त
का ज्ञानी न हो, आत्मबोध युक्त न हो, वीतराग न हो, शुद्धचित्त, विनीत एवं जिज्ञासु न हो, ऐसे पुरुष को इसका
उपदेश नहीं करना चाहिए। इस बात को पोषण प्रदान करने वाली ऋचाएँ ये हैं-ब्रह्मविद्या ब्राह्मण के समीप
में आयी एवं बोली-हे ब्रह्मन् ! मेरी रक्षा करो, मैं ही तुम्हारी निधि हूँ। मुझे दूसरों के गुणों में दोष देखने वाले
कुटिल, धूर्त, मूर्ख पुरुष को उपदिष्ट मत करो। ऐसा करने पर मैं प्रभावशालिनी न रह सकूँगी ॥ ३६॥
यमेवैष विद्याच्छुचिमप्रमत्तं मेधाविनं ब्रह्मचर्योपपन्नम्।
अस्मा इमामुपसन्नाय सम्यक् परीक्ष्य दद्याद्वैष्णवीमात्मनिष्ठाम् ॥ ३७॥
जिसे पवित्र, अभिमानशून्य, सावधान, मेधावी एवं ब्रह्मचारी समझे, ऐसे समीप में आये हुए उस जिज्ञासु
की भली-भाँति परीक्षा करके इस आत्मतत्त्व बोधिका वैष्णवी विद्या का उपदेश करना चाहिए ॥ ३७॥
अध्यापिता ये गुरुं नाद्रियन्ते विप्रा वाचा मनसा कर्मणा वा।
यथैव तेन न गुरुर्भोजनीयस्तथैव चान्नं न भुनक्ति श्रुतं तत्॥ ३८॥
शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात् भी जो (पुरुष) मन, वाणी तथा कर्म से अपने गुरुजनों का आदर नहीं करते,
ऐसे लोगों के अन्न को कल्याण की इच्छा रखने वाले ग्रहण नहीं करते तथा गुरु भी उसके अन्न को स्वीकार
नहीं करते। ठीक वैसे ही यति भी उस कृतघ्न के घर का अन्न ग्रहण न करे, ऐसा श्रुति का कथन है॥
गुरुरेव परो धर्मो गुरुरेव परा गतिः। एकाक्षरप्रदातारं यो गुरुं नाभिनन्दति। तस्य श्रुतं
तपो ज्ञानं स्रवत्यामघटाम्बुवत्॥ ३९॥
गुरु ही परम धर्म है, गुरु ही परम गति है। ज्ञान प्रदाता गुरु को जो पुरुष आदृत नहीं करता अर्थात्
उनका सम्मान हीं करता, उस पुरुष का पढ़ा हुआ (उसकी शिक्षा), उसकी तपस्या, उसका ज्ञान धीरे-धीरे
उसी प्रकार क्षीण होकर समाप्त हो जाता है, जिस प्रकार कच्चे घड़े से जल ॥ ३९॥
यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ। स ब्रह्मवित्परं प्रेयादिति वेदानुशासनम् इत्युपनिषत् ॥
जिस पुरुष की देवताओं में परम भक्ति होती है एवं जैसे देवताओं में वैसे ही गुरु में भी उसकी परम
भक्ति होती है। ऐसा (पुरुष) ब्रह्मज्ञानी परम पद की प्राप्ति करता है, ऐसा वेदानुशासन है, वेद की आज्ञा
(आदेश) है। इस प्रकार यह उपनिषद् (विद्या) पूर्ण हुई ॥ ४० ॥
ॐ पूर्णमदः ........... इति शान्तिः ॥
॥ इति शाट्यायनीयोपनिषत्समाप्ता ॥

॥ शाण्डिल्योपनिषद् ॥
यह उपनिषद् अथर्ववेद से सम्बद्ध है। इसमें 'योगविद्या' का समग्र वर्णन महर्षि शाण्डिल्य और मुनि
अथर्वा के प्रश्नोत्तर रूप में प्रस्तुत है। इसमें कुल तीन अध्याय हैं। प्रथम अध्याय ११ खण्डों वाला विस्तृत है।
जिसका शुभारम्भ शाण्डिल्य ऋषि के आत्मतत्त्व की प्राप्ति के उपाय स्वरूप अष्टाङ्गयोग के प्रश्न से हुआ है।
महामुनि अथर्वा इसके उत्तर में अष्टांगयोग का विशद वर्णन करते हैं। यम-नियम को दस-दस बताते हुए
पातंजलयोग से इसकी विशिष्टता सिद्ध कर देते हैं। नाड़ी शोधन की प्रक्रिया का विशेष रूप से उल्लेख करते हैं,
जिससे प्राण-जय किया जा सके और अनेकानेक सिद्धियों का अधिकारी बना जा सके।
दूसरे अध्याय में ऋषि शाण्डिल्य ने महामुनि अथर्वा से ब्रह्म विद्या का रहस्य पूछा है, जिसके उत्तर में
महामुनि ने ब्रह्म का सर्वव्यापी स्वरूप, उसकी अनिर्वचनीयता, उसका लोकोत्तर रूप बताते हुए कहा कि 'वह
ब्रह्म तुम्हीं हो, उसे ज्ञान के द्वारा जानो'। तीसरे अध्याय में ऋषि शाण्डिल्य ने पुनः प्रश्न किया कि जो ब्रह्म एक,
अक्षर, निष्क्रिय, शिव, सत्तामात्र एवं आत्म स्वरूप है, उससे जगत् का निर्माण, पोषण एवं संहार किस प्रकार
हो सकता है ? इसके उत्तर में महामुनि ने ब्रह्म का सकल, निष्कल एवं सकल-निष्कल भेद बताते हुए कहा
कि ब्रह्म के सकल-निष्कल रूप से उसके संकल्प मात्र से सृष्टि का प्राकट्य, विकास और विलय होता रहता
है। अन्त में ब्रह्म, आत्मा, महेश्वर एवं दत्तात्रेय शब्द का निर्वचन प्रस्तुत करते हुए आदि देवपुरुष दत्तात्रेय का
सतत ध्यान करते रहने की बात कही और यह भी कहा कि इसी ध्यान से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त होकर
परम कल्याण (मोक्ष) का अधिकारी बन जाता है।
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ भद्रं कर्णेभिः..........इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य-अथर्वशिर उपनिषद्)
॥ प्रथमोऽध्यायः ॥
शाण्डिल्यो ह वा अथर्वाणं पप्रच्छात्मलाभोपायभूतमष्टाङ्गयोगमनुब्रूहीति। स
होवाचाथर्वा यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोऽष्टाङ्गानि। तत्र दश यमाः।
तथा नियमाः। आसनान्यष्टौ। त्रयः प्राणायामाः। पञ्च प्रत्याहाराः। तथा धारणा। द्विप्रकारं
ध्यानम्। समाधिस्त्वेकरूपः। तत्राहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यदयार्जवक्षमाधृतिमितहारशौचानि
चेति यमा दश। तत्राहिंसा नाम मनोवाक्कायकर्मभिः सर्वभूतेषु सर्वदाऽक्लेशजननम्। सत्यं
नाम मनोवाक्कायकर्मभिर्भूतहितयथार्थाभिभाषणम्। अस्तेयं नाम मनोवाक्कायकर्मभिः
परद्रव्येषु निःस्पृहता। ब्रह्मचर्य नाम सर्वावस्थासु मनोवाक्कायकर्मभिः सर्वत्र मैथुनत्यागः।
दया नाम सर्वभूतेषु सर्वत्रानुग्रहः। आर्जवं नाम मनोवाक्कायकर्मणां विहिताविहितेषु जनेषु
प्रवृत्तौ निवृत्तौ वा एकरूपत्वम्। क्षमा नाम प्रियाप्रियेषु सर्वेषु ताडनपूजनेषु सहनम्।
धृतिर्नामार्थहानौ स्वेष्टबन्धुवियोगे तत्प्राप्तौ सर्वत्र चेतःस्थापनम्। मिताहारो नाम
चतुर्थांशावशेषकसुस्निग्धमधुराहारः। शौचं नाम द्विविधं बाह्यमान्तरं चेति। तत्र मृज्जलाभ्यां
बाह्यम्। मनःशुद्धिरान्तरम्। तदध्यात्मविद्यया लभ्यम्॥१॥

२८० शाण्डिल्योपनिषद्
महर्षि शाण्डिल्य अथर्वा मुनि से पूछते हैं कि 'हे मुने ! आत्मतत्त्व की प्राप्ति के उपाय स्वरूप अष्टाङ्ग योग
का वर्णन करने की कृपा करें।' ऐसा सुनकर उन अथर्वा मुनि ने कहा-हे महर्षे ! यम, नियम, आसन, प्राणायाम,
प्रत्याहार, धारणा, ध्यान एवं समाधि-ये ही योग के आठ अंग कहे गये हैं। 'यम' एवं 'नियम' की संख्या दस-
दस है, 'आसन' आठ प्रकार के हैं, 'प्राणायाम' की संख्या तीन है, 'प्रत्याहार' एवं 'धारणा' दोनों के पाँच-
पाँच भेद हैं, 'ध्यान' दो प्रकार के होते हैं तथा 'समाधि' का एक ही भेद है। इसमें यम के दस भेद इस प्रकार
हैं-अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, दया, सरलता, क्षमा, धैर्य, अल्प-आहार ग्रहण करना तथा पवित्रता।
अहिंसा का तात्पर्य है-मन, वचन, शरीर एवं अपने कार्य के द्वारा किसी भी प्राणी को कभी भी दुःख न देना।
सत्य का अर्थ है कि मन, वचन, शरीर एवं कर्म से जो हितकारी हो, वही वाणीं प्राणियों के समक्ष बोलना।
अस्तेय अर्थात् मन, वचन, शरीर एवं अपने कार्य के द्वारा दूसरों के धन-साधनों के प्रति निस्पृह रहना। ब्रह्मचर्य
का तात्पर्य है कि सभी अवस्थाओं में मन, वचन, शरीर एवं कर्म के द्वारा सभी तरह के मैथुन (असंयम) का
परित्याग करना। दया अर्थात् समस्त प्राणियों पर सदैव अपना अनुग्रह बनाये रखना। आर्जव अर्थात् मन,
वचन, शरीर एवं कर्म से लोगों के द्वारा उचित अथवा अनुचित व्यवहार करने अथवा न करने पर भी समभाव
बनाये रखना। क्षमा का तात्पर्य है-सदैव प्रिय-अप्रिय, पूजा अथवा ताड़ना आदि का बर्ताव किया जाए, तब भी
उसे सहन करना। धृति अर्थात् धन हानि हो, अपने इष्ट-मित्रों का वियोग अथवा संयोग हो, हर स्थिति में चित्त
को स्थिर रखना। अल्पाहार अर्थात् पेट में चौथा भाग खाली रहे, इस प्रकार अपने आहार में श्रेष्ठ घी, दुग्ध वाले
मधुर पदार्थों का समावेश रखना। शौच का तात्पर्य है-बाह्य एवं अन्तः दोनों प्रकार की शुद्धि रखना। मिट्टी तथा
जल के द्वारा बाहर की पवित्रता होती है तथा मन की शुद्धि आन्तरिक है जो अध्यात्म विद्या से होती है ॥ १ ॥
॥ द्वितीयः खण्डः ॥
तपःसन्तोषास्तिक्यदानेश्वरपूजनसिद्धान्तश्रवणह्रीमतिजपव्रतानि दश नियमाः। तत्र
तपो नाम विध्युक्तकृच्छ्रचान्द्रायणादिभिः शरीरशोषणम्। संतोषो नाम यदृच्छालाभसंतुष्टिः।
आस्तिक्यं नाम वेदोक्तधर्माधर्मेषु विश्वासः। दानं नाम न्यायार्जितस्य धनधान्यादेः श्रद्धया-
र्थिभ्यः प्रदानम्। ईश्वरपूजनं नाम प्रसन्नस्वभावेन यथाशक्ति विष्णुरुद्रादिपूजनम्। सिद्धान्तश्र-
वणं नाम वेदान्तार्थविचारः। ह्रीर्नाम वेदलोकिकमार्गकुत्सितकर्मणि लज्जा। मतिर्नाम वेदवि-
हितकर्ममार्गेषु श्रद्धा। जपो नाम विधि वदुपदिष्टवेदाविरुद्धमन्त्राभ्यासः। तद्द्विविधं वाचिकं
मानसं चेति। मानसं तु मनसा ध्यानयुक्तम्। वाचिकं द्विविधमुच्चैरूपांशुभेदेन। उच्चैरुच्चारणं
यथोक्तफलम्। उपांशु सहस्रगुणम्। मानसं कोटिगुणम्। व्रतं नाम वेदोक्तविधिनिषेधानुष्ठा-
ननैयत्यम् ॥ १ ॥
तप, संतोष, आस्तिकता, दान, ईश्वर-पूजन, सिद्धान्त-श्रवण, ह्री (लज्जा), मति, जप तथा व्रत-ये दस
प्रकार के भेद 'नियम' के कहे गये हैं। इसमें तप का तात्पर्य यह है कि विधिपूर्वक कृच्छ्र चान्द्रायण आदि से
शरीर को सुखाना। संतोष अर्थात् दैव की इच्छा से जो भी कुछ प्राप्त हो जाए, उस पर संतोष रखना। आस्तिक्य
का भाव यह है कि वेद द्वारा कहे हुए धर्म और अधर्म में विश्वास रखना। नीति पूर्वक प्राप्त हुए धन-धान्य
आदि को श्रद्धापूर्वक गरीबों को देना ही दान कहा जाता है। ईश्वर-पूजन प्रसन्न स्वभाव से यथोचित मात्रा में
विष्णु, रुद्र आदि का पूजन-अर्चन करना। सिद्धान्त श्रवण अर्थात् वेदान्त के अर्थ का चिन्तन करना। ही अर्थात्
वेद मार्ग में तथा लोकमार्ग में नीच माने जाने वाले कृत्य के करने में लज्जा का अनुभव होना। मति अर्थात्

अध्याय १ खण्ड ३ मन्त्र ८ २८१

अध्याय १ खण्ड ३ मन्त्र ८ २८१
वेदोक्त कर्म में श्रद्धा का उत्पन्न होना। जप का तात्पर्य यह है कि विधिपूर्वक गुरु ने जिस वैदिक मन्त्र का
उपदेश दिया है, उसका अभ्यास करना। जप का अभ्यास दो तरह से होता है- वाचिक और मानसिक।
मानसिक-जप मन के द्वारा ध्यान युक्त होने से होता है तथा वाचिक दो प्रकार से होता है-१. उच्चारण पूर्वक
से तथा २. उपांशु (फुसफुसाहट) रूप में उच्चारण पूर्वक जप का यथोक्त फल होता है। उपांशु का उससे
सहस्रगुना फल प्राप्त होता है तथा मानसिक जप करने का फल तो करोड़ गुना मिलता है। व्रत का तात्पर्य वेद
के द्वारा कहे हुए विधि-निषेध का नियमित आचरण करना है ॥ १ ॥

॥ तृतीयः खण्डः ॥
स्वस्तिकगोमुखपद्मवीरसिंहभद्रमुक्तमयूराख्यान्यासनान्यष्टौ। स्वस्तिकं नाम जान्वोरन्तरे
सम्यक्कृत्वा पादतले उभे। ऋजुकायः समासीनः स्वस्तिकं तत्प्रचक्षते ॥ १ ॥
स्वस्तिक, गोमुख, पद्म, वीर, सिंह, भद्र, मुक्त तथा मयूर नाम वाले ये आठ प्रकार के आसन कहे गये
हैं-इस (स्वस्तिक आसन) में पैर के दोनों तलवों को दोनों जानुओं (घुटनों) के बीच में बराबर रखकर सीधा
तनकर बैठना पड़ता है। इस क्रिया को ही स्वस्तिकासन कहा जाता है ॥ १॥
सव्ये दक्षिणगुल्फं तु पृष्ठपार्श्वे नियोजयेत्। दक्षिणेऽपि तथा सव्यं गोमुखं गोमुखं यथा ॥२
पीठ के बायीं ओर दाहिना गुल्फ एवं दायीं तरफ बायाँ गुल्फ (टखना) जोड़कर गोमुख के सदृश बैठना
ही गोमुखासन है ॥ १ ॥
अङ्गुष्ठेन निबध्नीयाद्धस्ताभ्यां व्युत्क्रमेण च।
ऊर्वोरुपरि शाण्डिल्य कृत्वा पादतले उभे।
पद्मासनं भवेदेतत्सर्वेषामपि पूजितम् ॥३॥
हे शाण्डिल्य ! दोनों जंघाओं के ऊपर दोनों पैरों के तलवों को रखकर दोनों हाथों से दोनों पैरों के अँगूठों
को उल्टी रीति से पकड़कर रखना ही सर्वमान्य पद्मासन कहलाता है ॥ ३ ॥
एकं पादमथैकस्मिन्विन्यस्योरुणि संस्थितः। इतरस्मिंस्तथा चोरुं वीरासनमुदीरितम् ॥ ४ ॥
एक जाँघ को एक पैर से तथा दूसरी जाँघ को दूसरे पैर से जोड़कर बैठने को वीरासन कहते हैं ॥ ४॥
दक्षिणं सव्यगुल्फेन दक्षिणेन तथेतरम्। हस्तौ च जान्वोः संस्थाप्य स्वाङ्गुलीश्च प्रसार्य च ॥५॥
व्यात्तवक्त्रो निरीक्षेत नासाग्रं सुसमाहितः। सिंहासनं भवेदेतत्पूजितं योगिभिः सदा॥ ६ ॥
दाहिने टखने के साथ बायाँ टखना तथा बायें टखने के साथ दायें टखने को लगाकर बैठ जाना और दोनों
हाथों को दोनों जानुओं (घुटनों) पर रखकर अँगुलियों को फैलाकर रखना चाहिए। तत्पश्चात् ठीक तरह से
एकाग्र होकर मुँह फैलाकर घ्राणेन्द्रिय के अग्रभाग पर दृष्टि स्थिर करनी चाहिए। इसको ही सिंहासन कहते
हैं और योगीजन सदैव इस आसन की प्रशंसा करते हैं ॥ ५-६ ॥
योनिं वामेन संपीड्य मेढ्रादुपरि दक्षिणम्। भ्रूमध्ये च मनोलक्ष्यं सिद्धासनमिदं भवेत् ॥ ७ ॥
गुदा क्षेत्र को बायें पैर से दबाकर दायें पैर को लिङ्ग के ऊपर स्थिर करना; तत्पश्चात् भौंहों के बीच में
लक्ष्य स्थिर करना ही सिद्धासन कहा जाता है ॥ ७ ॥
गुल्फौ तु वृषणस्याधः सीवन्याः पार्श्वयोः क्षिपेत्। पादपार्श्वे तु पाणिभ्यां दृढं बद्ध्वा
सुनिश्चलम्। भद्रासनं भवेदेतत्सर्वव्याधिविषापहम् ॥ ८॥

२८२ शाण्डिल्योपनिषद्

लिङ्ग के नीचे की ओर सीवनी प्रदेश में दोनों टखनों को स्थिर करने तथा हाथों से पैरों के दोनों पार्श्वों
को मजबूती से पकड़कर निश्चलतापूर्वक बैठना ही भद्रासन कहलाता है, जो सभी तरह के रोग एवं विष आदि
को विनष्ट करने वाला है ॥ ८ ॥
संपीड्य सीविनीं सूक्ष्मां गुल्फेनैव तु सव्यतः। सव्यं दक्षिणगुल्फेन मुक्तासनमुदीरितम्॥ ९॥
सूक्ष्म सीवनी प्रदेश को बायें टखने के द्वारा दबा करके दाहिने गुल्फ (टखने) से बायें टखने को दबा
करके (बैठना) ही मुक्तासन कहलाता है ॥ ९ ॥
अवष्टभ्य धरां सम्यक्तलाभ्यां तु करद्वयोः। हस्तयोः कूर्परौ चापि स्थापयेन्नाभिपार्श्वयोः ॥१०॥
समुन्नतशिरः पादो दण्डवद्व्योम्नि संस्थितः। मयूरासनमेतत्तु सर्वपापप्रणाशनम्॥ ११॥
दोनों हाथ की हथेलियों को भूमि से सटाकर स्थिर करना और हाथ की कोहनियों से नाभि के दोनों ओर
दबा करके बैठना चाहिए। तदनन्तर मस्तक और पैरों को ऊर्ध्व की ओर उठाकर लकड़ी की तरह से आकाश
में अधर स्थिर रखना ही मयूरासन कहलाता है। यह आसन सभी तरह के पापों का विनाश करने वाला है॥
शरीरान्तर्गताः सर्वे रोगा विनश्यन्ति। विषाणि जीर्यन्ते ॥ १२॥
इन आसनों के करने से शरीर के अन्दर विद्यमान रहने वाले सभी तरह के रोग विनष्ट हो जाते हैं तथा
सभी प्रकार के विष स्वयं ही समाप्त हो जाते हैं ॥ १२ ॥
येन केनासनेन सुखधारणं भवत्यशक्तस्तत्समाचरेत् ॥ १३ ॥
जो (मनुष्य) अशक्त हो, उसे जिस किसी आसन से सुख मिले, वही आसन करना चाहिए ॥ १३ ॥
येनासनं विजितं जगतत्रयं तेन विजितं भवति ॥ १४॥
जिसने इन सभी आसनों को जीत लिया है, उसने तीनों लोक जीत लिये हैं, ऐसा समझना चाहिए ॥ १४॥
यमनियमासनाभ्यासयुक्तः पुरुषः प्राणायामं चरेत् । तेन नाड्यः शुद्धा भवन्ति ॥ १५ ॥
यम, नियम एवं आसन से पूर्णरूपेण सम्पन्न होने के पश्चात् मनुष्य को प्राणायाम का अभ्यास करना
चाहिए। इसके अभ्यास से नाड़ियों की शुद्धि हो जाती है ॥ १५ ॥॥
॥ चतुर्थः खण्डः ॥
अथ हैनमथर्वाणं शाण्डिल्यः पप्रच्छ केनोपायेन नाड्यः शुद्धाः स्युः । नाड्यः कतिसंख्या-
काः । तासामुत्पत्तिः कीदृशी। तासु कति वायवस्तिष्ठन्ति । तेषां कानि स्थानानि। तत्कर्माणि
कानि। देहे यानि यानि विज्ञातव्यानि तत्सर्वं मे ब्रूहीति ॥ १ ॥
तत्पश्चात् महात्मा शाण्डिल्य ने अथर्वा मुनि से पूछा-किस उपाय से नाड़ियाँ शुद्ध होती हैं ? नाड़ियों की
संख्या कितनी होती है ? उनकी उत्पत्ति किस तरह से हुई ? उसमें कितने प्रकार के वायु रहते हैं ? उनका स्थान
कौन सा है ? उनके कार्य क्या-क्या होते हैं ? इस शरीर में जो भी कुछ जानने के लिए आवश्यक है, वह सभी
कुछ आप मुझे बताने की कृपा करें ॥ १ ॥
स होवाचाथर्वा । अथेद्ं शरीरं षण्णवत्यङ्गुलात्मकं भवति। शरीरात्प्राणो द्वादशाङ्गुला-
धिको भवति ॥ २॥ शरीरस्थं प्राणमग्निना सह योगाभ्यासेन समं न्यूनं वा यः करोति स
योगिपुङ्गवो भवति ॥ ३॥
तदनन्तर उन अथर्वा ऋषि ने कहा कि यह शरीर छियानबे (९६) अंगुल का प्रमाण स्वरूप है। यह

अध्याय १ खण्ड ४ मन्त्र ९ | २८३

अध्याय १ खण्ड ४ मन्त्र ९ | २८३
प्राण-शरीर की अपेक्षा बारह अंगुल और अधिक होता है। इस शरीर में उपस्थित रहने वाले प्राण को योग के
अभ्यास द्वारा जो भी मनुष्य अग्नि के साथ सम अवस्था में स्थिर करता है या फिर उससे भी कम करता है, वह
श्रेष्ठ योगी कहलाता है॥ २-३॥
देहमध्ये शिखिस्थानं त्रिकोणं तप्तजाम्बूनदप्रभं मनुष्याणाम्। चतुष्पदां चतुरश्रम्। विहङ्गानां
वृत्ताकारम्। तन्मध्ये शुभा तन्वी पावकी शिखा तिष्ठति॥ ४॥
मनुष्यों की देह में अग्नि का स्थान त्रिकोण की भाँति तप्तस्वर्ण के सदृश प्रकाश युक्त होता है। चौपायों का
आयताकार तथा पक्षियों का गोलाकार होता है। इस अग्नि स्थान में क्षीणकाय, शुभ अग्निशिखा रहती है॥ ४॥
गुदाद्द्व्यङ्गुलादूर्ध्वं मेढ्राद्द्व्यङ्गुलादधो देहमध्यं मनुष्याणां भवति। चतुष्पदां हृन्मध्यम्।
विहगानां तुन्दमध्यम्। देहमध्यं नवाङ्गुलं चतुरङ्गुलमुत्सेधायतमण्डाकृति॥ ५॥
गुदामार्ग से दो अङ्गुल ऊर्ध्व की ओर तथा लिङ्ग से दो अङ्गुल नीचे की ओर मनुष्य के शरीर का
मध्यस्थल होता है। चौपायों के हृदय का मध्य एवं पक्षियों के पेट का मध्य ही उनके शरीरों के बीच का मध्य
स्थल होता है। शरीर का वह बीच का भाग नौ अंगुल ऊँचा तथा चार अंगुल विस्तार वाला होता है। उसकी
आकृति अण्डे के सदृश होती है॥ ५॥
तन्मध्ये नाभिः। तत्र द्वादशारयुतं चक्रम्। तच्चक्रमध्ये पुण्यपापप्रचोदितो जीवोभ्रमति॥६
तन्तुपञ्जरमध्यस्थलूतिका यथा भ्रमति तथा चासौ तत्र प्राणश्चरति। देहेऽस्मिञ्जीवः प्राणारूढो
भवेत्॥ ७॥
उसके मध्य में नाभि है तथा उसमें बारह अरों से युक्त चक्र स्थित है। उस चक्र के मध्य में पुण्य-पाप
से प्रेरणा प्राप्त करता हुआ जीव यत्र-तत्र भ्रमण करता रहता है। जिस प्रकार से मकड़ी अपने द्वारा निर्मित तन्तु
(जाल) के अन्दर भ्रमण करती रहती है, उसी तरह से यह जीव भी वहीं पर विचरण करता रहता है। इस देह
में जीव प्राण के ऊपर सतत आरूढ़ रहता है॥ ६-७॥
नाभेस्तिर्यगध ऊर्ध्वं कुण्डलिनीस्थानम्। अष्टप्रकृतिरूपाऽष्टधा कुण्डलीकृता कुण्ड-
लिनी शक्तिर्भवति। यथावद्वायुसंचारं जलान्नादीनि परितः स्कन्धपार्श्वेषु निरुध्यैनं मुखेनैव
समावेष्ट्य ब्रह्मरन्ध्रं योगकाले चापानेनाग्निना च स्फुरति। हृदयाकाशे महोज्ज्वला ज्ञानरूपा
भवति॥ ८॥
नाभि के समीप नीचे एवं ऊपर की ओर कुण्डलिनी का क्षेत्र स्थित है। कुण्डलिनी शक्ति आठ प्रकार की
प्रकृति से युक्त एवं आठ कुण्डली (घुमाव) बनाये हुए है। यह शक्ति योग की अवस्था में वायु के संचार को
यथावत् करके जल एवं अन्न आदि को चारों ओर से कन्धों के पार्श्व में स्थिर करके पुनः मुख से लेकर ब्रह्मरन्ध्र
तक अपान तथा अग्नि के द्वारा जाग्रत् होती है। यह स्फुरणयुक्ता शक्ति हृदयाकाश में महान् उज्ज्वल एवं ज्ञानरूपा
होती है॥ ८॥
मध्यस्थकुण्डलिनीमाश्रित्य मुख्या नाड्यश्चतुर्दश भवन्ति। इडा पिङ्गला सुषुम्ना सरस्वती
वारुणी पूषा हस्तिजिह्वा यशस्विनी विश्वोदरी कुहूः शङ्खिनी पयस्विनी अलम्बुसा गान्धारीति
नाड्यश्चतुर्दश भवन्ति॥ ९॥
कुण्डलिनी का आश्रय प्राप्त करके मध्य में स्थित रहने वाली चौदह मुख्य नाड़ियाँ हैं। ये क्रमशः इड़ा,

२८४ शाण्डिल्योपनिषद्
पिंगला, सुषुम्ना, सरस्वती, वारुणी, पूषा, हस्तजिह्वा, यशस्विनी, विश्वोदरी, कुहू, शंखिनी, पयस्विनी, अलंबुसा
एवं गान्धारी नामवाली हैं ॥ ९ ॥
तत्र सुषुम्ना विश्वधारिणी मोक्षमार्गेति चाचक्षते । गुदस्य पृष्ठभागे वीणादण्डाश्रिता
मूर्धपर्यन्तं ब्रह्मरन्ध्रे विज्ञेया व्यक्ता सूक्ष्मा वैष्णवी भवति ॥ १० ॥
इन समस्त नाड़ियों में सुषुम्ना नाड़ी विश्व को धारण करने में समर्थ तथा मोक्षमार्ग को प्रदान करने वाली
है, ऐसा योगीजन कहते हैं। गुदा के पृष्ठ भाग में वह नाड़ी मेरुदण्ड के आश्रित रहती है तथा मस्तक में ब्रह्मरन्ध्र
तक पहुँचती है। यह स्पष्ट, सूक्ष्म एवं वैष्णवी रूपा होती है ॥ १० ॥
सुषुम्नायाः सव्यभागे इडा तिष्ठति। दक्षिणभागे पिङ्गला। इडायां चन्द्रश्चरति । पिङ्गलायां
रविः । तमोरूपश्चन्द्रः । रजोरूपो रविः । विषभागो रविः । अमृतभागश्चन्द्रमाः । तावेव सर्वकालं
धत्तः । सुषुम्ना कालभोक्त्री भवति । सुषुम्नापृष्ठपार्श्वयोः सरस्वतीकुहू भवतः । यशस्विनी-
कुहूमध्ये वारुणी प्रतिष्ठिता भवति । पूषासरस्वतीमध्ये पयस्विनी भवति । गान्धारीसरस्वतीमध्ये
यशस्विनी भवति । कन्दमध्येऽलम्बुसा भवति । सुषुम्नापूर्वभागे मेढ्रान्तं कुहूर्भवति । कुण्ड-
लिन्या अधश्चोर्ध्वं वारुणी सर्वगामिनी भवति । यशस्विनी सौम्या च पादाङ्गुष्ठान्तमिष्यते ।
पिङ्गला चोर्ध्वगा याम्यनासान्तं भवति । पिङ्गलायाः पृष्ठतो याम्यनेत्रान्तं पूषा भवति । याम्यक-
र्णान्तं यशस्विनी भवति । जिह्वाया ऊर्ध्वान्तं सरस्वती भवति । आसव्यकर्णान्तमूर्ध्वगा शङ्खिनी
भवति । इडापृष्ठभागात्सव्यनेत्रान्तगा गान्धारी भवति । पायुमूलादधोध्र्वगाऽलम्बुसा भवति ।
एतासु चतुर्दशसु नाडीष्वन्या नाड्यः संभवन्ति । तास्वन्यास्तास्वन्या भवन्तीति विज्ञेयाः ।
यथाऽश्वत्थादिपत्रं सिराभिर्व्याप्तमेवं शरीरं नाडीभिर्व्याप्तम् ॥ ११ ॥
इस सुषुम्ना नाड़ी के बायीं ओर इड़ा नामक नाड़ी है तथा दायीं ओर पिंगला नाड़ी स्थित है। इड़ा में
चन्द्रमा चलायमान रहता है और पिंगला में सूर्य विचरण करता है। चन्द्रमा तमोगुण के स्वरूप वाला एवं सूर्य
रजोगुण के स्वरूप से युक्त है। चन्द्रमा अमृत का क्षेत्र है तथा सूर्य विष का प्रभाग है। ये दोनों सम्पूर्ण काल को
धारण करते हैं। सुषुम्ना नाड़ी काल का उपभोग करने वाली है। सुषुम्ना के पृष्ठ भाग की तरफ सरस्वती नाड़ी
विद्यमान है तथा उसके बगल के क्षेत्र में कुहू नाड़ी स्थित है। यशस्विनी एवं कुहू के मध्य में वारुणी नाड़ी
प्रतिष्ठित है। पूषा और सरस्वती के मध्य में पयस्विनी नाड़ी स्थित है। गान्धारी और सरस्वती के मध्य में
यशस्विनी नाड़ी विद्यमान है। कन्द के बीच में अलम्बुसा नाड़ी है। सुषुम्ना नाड़ी के पूर्व भाग में लिंग क्षेत्र तक
कुहू नाड़ी फैली हुई है। कुण्डलिनी के नीचे एवं ऊपर की ओर वारुणी नाड़ी चारों तरफ गयी हुई है।
यशस्विनी और सौम्या पैर के अँगूठे तक फैली हुई है। पिङ्गला नाड़ी ऊपर की तरफ चलकर के दायीं नासिका
तक पहुँचती है। पिंगला के पृष्ठ भाग की तरफ से दायीं आँख तक पूषा नाड़ी फैली हुई है। दायें कान तक
यशस्विनी स्थित है। जिह्वा के ऊपरी भाग तक सरस्वती नाड़ी प्रतिष्ठित है। बायें कान तक ऊपर की ओर गमन
करती हुई शंखिनी नाड़ी स्थित है। इड़ा नाड़ी के पृष्ठ भाग की ओर से बायें नेत्र तक गमन करने वाली गांधारी
नाड़ी कहलाती है। गुदा क्षेत्र के मूल से नीचे-ऊपर की ओर जाने वाली अलम्बुसा नाड़ी कहलाती है। इन
चौदह प्रकार की नाड़ियों में अन्य और दूसरी नाड़ियाँ भी स्थित हैं। उन नाड़ियों के अन्दर भी अन्य इस प्रकार
की बहुत सी नाड़ियाँ हैं। जिस प्रकार से पीपल आदि के पत्ते शिराओं (केशों) से संव्याप्त होते हैं,उसी तरह
शरीर भी तरह-तरह की नाड़ियों से संव्याप्त है ॥११ ॥

अध्याय १ खण्ड ४ मन्त्र १३ २८५

अध्याय १ खण्ड ४ मन्त्र १३ २८५
प्राणापानसमानोदानव्याना नागकूर्मकृकरदेवदत्तधनञ्जया एते दश वायवः सर्वासु नाडीषु
चरन्ति ॥ १२ ॥
प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, नाग, कूर्म, कृकर, देवदत्त एवं धनञ्जय- ये दस तरह के वायु इन
समस्त नाड़ी-संस्थानों में विचरण करते रहते हैं ॥ १२ ॥
आस्यनासिकाकण्ठनाभिपादाङ्गुष्ठद्वयकुण्डल्यधश्चोर्ध्वभागेषु प्राणः संचरति। श्रोत्राक्षि-
कटिगुल्फघ्राणगलस्फिगद्देशेषु व्यानः संचरति। गुदमेढ्रोरुजानूदरवृषणकटिजङ्घानाभिगु-
दाग्न्यगारेष्वपानः संचरति। सर्वसंधिस्थ उदानः। पादहस्तयोरपि सर्वगात्रेषु सर्वव्यापी समानः।
भुक्तान्नरसादिकं गात्रेऽग्निना सह व्यापयन्द्विसप्ततिसहस्रेषु नाडीमार्गेषु चरन्समानवायुरग्निना
सह साङ्गोपाङ्गकलेवरं व्याप्नोति। नागादिवायवः पञ्च त्वगस्थ्यादिसंभवाः। तुन्दस्थं जलमन्नं
च रसादिषु समीरितं तुन्दमध्यगतः प्राणस्तानि पृथक्कुर्यात्। अग्नेरुपरि जलं स्थाप्य जलोपर्य-
न्नादीनि संस्थाप्य स्वयमपानं संप्राप्य तेनैव सह मारुतः प्रयाति देहमध्यगतं ज्वलनम्। वायुना
पालितो वह्निरपानेन शनैर्देहमध्ये ज्वलति। ज्वलनो ज्वालाभिः प्राणेन कोष्ठमध्यगतं जलमत्यु-
ष्णमकरोत्। जलोपरि समर्पितव्यञ्जनसंयुक्तमन्नं वह्निसंयुक्तवारिणा पक्वमकरोत्। तेन
स्वेदमूत्रजलरक्तवीर्यरूपरसपुरीषादिकं प्राणः पृथक्कुर्यात्। समानवायुना सह सर्वासु नाडीषु
रसं व्यापयञ्छ्वासरूपेण देहे वायुश्चरति। नवभिर्व्योमरन्ध्रैः शरीरस्य वायवः कुर्वन्ति
विण्मूत्रादिविसर्जनम्। निश्वासोच्छ्वासकासश्च प्राणकर्मोच्यते। विण्मूत्रादिविसर्जनमपानवा-
युकर्म। हानोपादानचेष्टादि व्यानकर्म। देहस्योन्नयनादिकमुदानकर्म। शरीरपोषणादिकं
समानकर्म। उद्गारादि नागकर्म। निमीलनादि कूर्मकर्म। क्षुत्करणं कृकरकर्म। तन्द्रा देवदत्त-
कर्म। श्लेष्मादि धनञ्जयकर्म ॥ १३ ॥
मुख, नासिका, गला, नाभि, पैर के दोनों अँगूठे तथा कुण्डलिनी के नीचे एवं ऊर्ध्व के भागों में प्राणतत्त्व
विचरण करता रहता है। कर्णेन्द्रिय, नेत्र, कमर, गुल्फ, नासिका, गला एवं कूल्हे के क्षेत्रों में व्यान भ्रमण करता
रहता है। गुदा, लिंग, जानु, पेट, वृषण, कटि प्रदेश, नाभि और अग्निसंस्थान में अपान संव्यास रहता है। समस्त
संधि अर्थात् जोड़ के संस्थानों में उदान सतत विचरण करता रहता है। पैर, हाथ एवं अन्य सभी अंग-अवयवों
में समान संव्यास रहता है। खाये हुए अन्न के रस को शरीर की अग्नि के साथ संव्यास करके समान वायु बहत्तर
हजार नाड़ियों के मार्ग में विचरण करता रहता है एवं अग्नि के साथ सांगोपांग शरीर में विद्यमान रहता है। नाग
आदि पाँच प्रकार की वायु त्वचा, अस्थि आदि में प्रतिष्ठित रहते हैं। उदर में रहने वाले जल तथा अन्न को रस
आदि के रूप में ले जाकर पेट में रहने वाला प्राण-वायु पृथक्-पृथक् करता है। आग के ऊपर जल रखकर
तथा जल के ऊपर अन्न आदि प्रतिष्ठित कर स्वयं अपान के पास पहुँचकर वायु तत्त्व इसी अपान के साथ शरीर
में स्थित अग्नि की ओर गमन करता है। अपान वायु से रक्षित अग्नि शरीर के मध्य में मन्द-मन्द प्रज्वलित रहता
है। यह अग्नि अपनी ज्वाला एवं प्राण-वायु के द्वारा कोठे के मध्य में स्थित रहने वाले जल को खूब गर्म करता
है और उस पानी के ऊपर रखे शाक-दाल के सहित अन्न को प्राणवायु, अग्नियुक्त जल के द्वारा पकाता अर्थात्
पचाता है तथा उसी में से पसीना, मूत्र, खून, वीर्य, रस, विष्ठा (मल) आदि को पृथक्-पृथक् करता है।
तदनन्तर समान वायु के साथ-साथ समस्त नाड़ियों में रस को प्रसारित करता हुआ प्राण-वायु श्वास के रूप में

२८६ शाण्डिल्योपनिषद्

शरीर में विचरण करता रहता है। शरीर के नौ व्योमरन्ध्रों (घटाकाश के छिद्रों) के द्वारा वायु, मल, मूत्र आदि
को बाहर निष्कासित करता है। श्वासोच्छ्वास तथा खाँसी यह दोनों ही प्राण तत्त्व के कर्म कहलाते हैं। मल-
मूत्र का बहिर्गमन कराना अपान वायु का कार्य कहलाता है। त्याग करना एवं स्वीकार करना आदि चेष्टाएँ व्यान
का कार्य कहलाती हैं, शरीर का उन्नयन उदान का कार्य कहलाता है। शरीर को पोषण प्रदान करना समान का
कार्य कहलाता है। डकार आदि नाग का कार्य है। पलक झपकाना कूर्म का कार्य है, भूख लगना कृकर का
कार्य है। आलस्य देवदत्त का कार्य है तथा कफ आदि का उत्पन्न करना धनञ्जय का कार्य कहलाता है ॥१३॥
एवं नाडीस्थानं वायुस्थानं तत्कर्म च सम्यग्ज्ञात्वा नाडीसंशोधनं कुर्यात्॥ १४॥
इस तरह से नाड़ी-संस्थान, वायु-संस्थान एवं उन सभी के कार्यों को ठीक तरह से जान-समझ कर नाड़ी
को शुद्ध करना चाहिए॥ १४॥
॥ पंचमः खण्डः ॥
यमनियमयुतः पुरुषः सर्वसङ्गविवर्जितः कृतविद्यः सत्यधर्मरतो जितक्रोधो
गुरुशुश्रूषानिरतः पितृमातृविधेयः स्वाश्रमोक्तसदाचारविद्वच्छिक्षितः फलमूलोदकान्वितं
तपोवनं प्राप्य रम्यदेशे ब्रह्मघोषसमन्विते स्वधर्मनिरतब्रह्मवित्समावृते फलमूलपुष्पवारिभिः
सुसंपूर्णे देवायतने नदीतीरे ग्रामे नगरे वापि सुशोभनमठं नात्युच्चनीचायतमलपद्वारं
गोमयादिलिप्तं सर्वरक्षासमन्वितं कृत्वा तत्र वेदान्तश्रवणं कुर्वन्द्योगं समारभेत् ॥ १॥
जिस पुरुष ने विद्या का अभ्यास किया हो, उसको यम-नियम से युक्त होकर सभी तरह की संगति का
परित्याग करके सत्य रूपी धर्म में आरूढ़ होना चाहिए। क्रोध को वश में रखना, गुरु की सेवा शुश्रूषा में सतत
लगे रहना, माता-पिता के आश्रित (संरक्षण में) रहना तथा पुनः अपने आश्रम में बताये गये श्रेष्ठ आचरण को
समझने वाले के समीप में शिक्षा पाकर के फल, मूल तथा जलयुक्त तपोवन में जाना चाहिए। वहाँ जाकर सुरम्य
प्रदेश में ब्रह्मघोष से युक्त, अपने धर्म में परायण ब्रह्मवेत्ताओं के सान्निध्य में तथा फल-मूल, पुष्प एवं जल
आदि से परिपूर्ण किसी भी देव-स्थल में या नदी के तट पर किसी गाँव या शहर में अनुपम श्रेष्ठ मठ बनाना
चाहिए। वह स्थान न तो बहुत ऊँचा हो और न ही अत्यन्त नीचा ही हो, न तो बहुत लम्बा तथा न ही अति
चौड़ा ही हो। छोटे दरवाजे वाला, गोमय आदि से लीपा हुआ एवं पूर्णरूपेण सुरक्षित होना चाहिए। वहाँ
वेदान्त का श्रवण करते हुए पुरुष को निरन्तर योगाभ्यास आदि आरम्भ कर देना चाहिए॥१॥
आदौ विनायकं संपूज्य स्वेष्टदेवतां नत्वा पूर्वोक्तासने स्थित्वा प्राङ्मुख उदङ्मुखो वापि
मृद्वासनेषु जितासनगतो विद्वान्समग्रीवशिरोनासाग्रदृग्भ्रूमध्ये शशभृद्विम्बं पश्यन्नेत्राभ्याममृतं
पिबेत्। द्वादशमात्रया इडया वायुमापूर्योदरे स्थितं ज्वालावलीयुतं रेफबिन्दुयुक्तमग्निमण्डलयुतं
ध्यायेद्रेचयेत्पिङ्गलया। पुनः पिङ्गलयाऽऽपूर्य कुम्भित्वा रेचयेदिडया ॥ २ ॥
देवों में प्रथम पूज्य गणपति का पूजन करने के पश्चात् अपने इष्टदेव को नमन-वंदन करके पूर्व में कहे
गये आसन पर बैठना चाहिए। उस समय पूर्व अथवा उत्तर दिशा की तरफ मुख रखना और सुकोमल आसन
पर आसीन होकर के आसन को जय (सिद्ध) करना चाहिए। तत्पश्चात् विद्वान् पुरुष को गर्दन और मस्तक को
सीधा रखकर नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि रखनी चाहिए। दोनों भौंहों के मध्य चन्द्रमण्डल को देखना तथा
दोनों नेत्रों से अमृत तत्त्व का पान करना चाहिए। इसके बाद बारह मात्राओं से इड़ा नाड़ी के माध्यम से वायु

अध्याय १ खण्ड ६ मन्त्र ५ २८७

अध्याय १ खण्ड ६ मन्त्र ५ २८७
खींचकर उसे पेट के अन्दर रहने वाले, ज्वालाओं से युक्त, रेफ और बिन्दु सहित अग्नि मण्डल से संयुक्त करने
का ध्यान (चिन्तन) करना चाहिए तथा इसके बाद पिंगला नाड़ी द्वारा अन्दर की वायु को बाहर निकालना
चाहिए। तदनन्तर पिंगला से वायु भरकर अन्तःकुम्भक करके इड़ा नाड़ी से उसे बाहर निकालना चाहिए॥ २॥
त्रिचतुस्त्रिचतुःसप्तत्रिचतुर्मासपर्यन्तं त्रिसंधिषु तदन्तरालेषु च षट्कृत्व आचरेन्नाडीशु-
द्धिर्भवति। ततः शरीरे लघुदीप्तिवह्निवृद्धिनादाभिव्यक्तिर्भवति॥ ३-४॥
इस तरह से ४३ दिन (त्रिचतुः=४३), तीन, चार या सात मास (त्रि चतुः सप्त) अथवा एक वर्ष (त्रिचतुः
३x४=१२ मास) पर्यन्त त्रिकाल सन्ध्या के साथ तीन-तीन अथवा चार-चार बार तथा उनके मध्य में छः बार
तक अभ्यास करना चाहिए। इस अभ्यास से नाड़ी की शुद्धि हो जाती है। तदनन्तर इस अभ्यास से शरीर में
हल्कापन, चेहरे में चमक (कान्ति), अग्नि की अभिवृद्धि तथा नाद श्रवण होने लगता है॥ ३-४॥
॥ षष्ठः खण्डः ॥
प्राणापानसमायोगः प्राणायामो भवति। रेचकपूरककुम्भकभेदेन स त्रिविधः। ते
वर्णात्मकाः। तस्मात्प्रणव एव प्राणायामः॥ १-२॥
प्राण तथा अपान को एकत्रित कर देना ही प्राणायाम होता है। रेचक, पूरक तथा कुम्भक के भेद से
प्राणायाम तीन तरह का होता है। वे रेचक, पूरक, कुम्भक (प्राणायाम) वर्ण के स्वरूप से युक्त हैं इस कारण
प्रणव ही प्राणायाम कहलाता है॥ १-२॥
पद्माद्यासनस्थः पुमान्नासाग्रे शशभृद्बिम्बज्योत्स्नाजालवितानिताकारमूर्ती रक्ताङ्गी हंस-
वाहिनी दण्डहस्ता बाला गायत्री भवति। उकारमूर्तिः श्वेताङ्गी तार्क्ष्यवाहिनी युवती चक्रहस्ता
सावित्री भवति। मकारमूर्तिः कृष्णाङ्गी वृषभवाहिनी वृद्धा त्रिशूलधारिणी सरस्वती
भवति॥३॥ अकारादित्रयाणां सर्वकारणमेकाक्षरं परंज्योतिः प्रणवं भवतीति॥ ४॥
पद्म आदि किसी भी आसन पर आसीन होकर पुरुष को ध्यान करना चाहिए- 'नासिका' के अग्रभाग
पर चन्द्रमण्डल की ज्योत्स्ना से आवृत, लाल रंग के अंगवाली, हंस पर आसीन, अपने हाथ में दण्ड को धारण
किये हुए, बालरूप, 'अ' कार मूर्ति से युक्त 'गायत्री' हैं। 'उ' कार मूर्ति सावित्री श्वेत-शुभ्र अंग से युक्त, गरुड़
के आसन पर प्रतिष्ठित युवावस्था से युक्त, अपने हाथ में चक्र धारण किये हुए हैं। इसी तरह से 'म' कार मूर्ति
सरस्वती कृष्णांगी, वृषभ पर आसीन, वृद्धावस्था को प्राप्त, अपने हाथ में त्रिशूल को धारण किये हुए हैं। इस
प्रकार 'अ' कार आदि तीनों वर्णों का सम्मिलित रूप 'ॐ' है तथा वह सम्पूर्ण का कारण एकाक्षर स्वरूप परम
ज्योति है। ऐसा चिन्तन करना चाहिए॥ ३-४॥
ध्यायेत् इडया बाह्याद्वायुमापूर्य षोडशमात्राभिरकारं चिन्तयन्पूरितं वायुं चतुःषष्टिमात्राभिः
कुम्भयित्वोकारं ध्यायन्पूरितं पिङ्गलया द्वात्रिंशन्मात्रया मकारमूर्तिंध्यानेनैवं क्रमेण पुनः-
पुनः कुर्यात्॥ ५॥
इस ध्यान के पश्चात् पुनः इड़ा नाड़ी के द्वारा बाहर की वायु सोलह मात्रा में खींचे तथा उस समय 'अ'
कार का ध्यान करना चाहिए। इसके बाद इसी वायु को चौंसठ मात्रा में अन्तःकुम्भक करे तथा उस समय 'उ'
कार का ध्यान करना चाहिए तथा उसके पश्चात् पिंगला नाड़ी के द्वारा बत्तीस मात्राओं से संयुक्त उस अन्दर भरी
हुई वायु को बाहर निष्कासित करे । उस समय 'म' कार मूर्ति का ध्यान करना चाहिए। इसी प्रकार से यह
क्रिया निरन्तर बार-बार करते रहना चाहिए॥ ५॥

॥ सप्तमः खण्डः ॥

२८८ शाण्डिल्योपनिषद्
॥ सप्तमः खण्डः ॥
अथासनदृढो योगी वशी मितहिताशनः सुषुम्नानाडीस्थमलशोधार्थं योगी बद्धपद्मासनो
वायुं चन्द्रेणापूर्य यथाशक्ति कुम्भयित्वा सूर्येण रेचयित्वा पुनः सूर्येणापूर्य कुम्भयित्वा
चन्द्रेण विरेच्य यया त्यजेत्तया संपूर्य धारयेत्। तदेते श्लोका भवन्तिप्राणं प्रागिडया पिबेन्नियमितं
भूयोऽन्यया रेचयेत्पीत्वा पिङ्गलया समीरणमथो बद्ध्वा त्यजेद्वामया। सूर्याचन्द्रमसोरनेन
विधिनाऽभ्यासं सदा तन्वतां शुद्धा नाडिगणा भवन्ति यमिनां मासत्रयादूर्ध्वतः॥ १ ॥
इसके पश्चात् आसन के दृढ़ हो जाने पर योगी अपनी इन्द्रियों को वश में करके, दूसरों का हित चाहते
हुए, स्वल्पाहार पर रहते हुए, सुषुम्ना नाड़ी में स्थित मल को शुष्क करने के लिए निरन्तर योगाभ्यास करता
रहे। उस समय बद्धपद्मासन पर आरूढ़ हो, चन्द्र नाड़ी के द्वारा वायु को भरकर शक्ति के अनुसार कुम्भक
करने के बाद सूर्य नाड़ी के द्वारा रेचक करना चाहिए। तदनन्तर सूर्यनाड़ी से पूरक करके कुम्भक करे तथा चन्द्र
नाड़ी से रेचक करना चाहिए। इस प्रकार जिस नाड़ी के द्वारा रेचक करे, उसी नाड़ी से पुनः पूरक करने के
बाद कुम्भक करना चाहिए। इस भाव को प्रकट करने वाले निम्न प्रकार के श्लोक वर्णित किये गये हैं-
“सर्वप्रथम इड़ा नाड़ी के द्वारा प्राण को अन्दर भरकर कुम्भक करे तथा दूसरी पिंगला नाड़ी से रेचक करे।
तत्पश्चात् पुनः पिंगला से पूरक करके कुम्भक करते हुए इड़ा नाड़ी से रेचक करना चाहिए। इस प्रक्रिया से सूर्य
और चन्द्र नाड़ी के द्वारा प्राणायाम का प्रतिदिन निरन्तर अभ्यास करने से योगी की सभी नाड़ियाँ तीन मास में
ही पूर्ण शुद्ध हो जाती हैं॥ १॥
प्रातर्मध्यन्दिने सायमर्धरात्रे तु कुम्भकान्। शनैरशीतिपर्यन्तं चतुर्वारं समभ्यसेत् ॥ २ ॥
प्रातःकाल, मध्याह्नकाल, सायंकाल तथा मध्य रात्रि में इसी तरह से चार बार मन्द-मन्द गति से अस्सी
मात्राओं तक कुम्भक का अभ्यास करना चाहिए॥ २॥
कनीयसि भवेत्स्वेदः कम्पो भवति मध्यमे। उत्तिष्ठत्युत्तमे प्राणरोधे पद्मासनं भवेत् ॥ ३ ॥
कनिष्ठ प्राणायाम के करते समय शरीर में पसीना आ जाता है, मध्यम स्तर का प्राणायाम करने में शरीर
में कँप-कँपी छूटती है और श्रेष्ठ प्राणायाम में पद्मासन में अवस्थित योगी अपने आसन से उठ जाता है॥ ३॥
जलेन श्रमजातेन गात्रमर्दनमाचरेत्। दृढता लघुता चापि तस्य गात्रस्य जायते ॥ ४ ॥
प्राणायाम करते समय श्रम के कारण शरीर में से जो पसीना निकल आता है, उस पसीने को शरीर में
मसल लेना चाहिए, क्योंकि इससे योगी का शरीर अत्यधिक मजबूत और हल्का हो जाता है॥ ४॥
अभ्यासकाले प्रथमं शस्तं क्षीराज्यभोजनम्। ततोऽभ्यासे स्थिरीभूते न तावन्नियमग्रहः ॥ ५॥
प्राणायाम का अभ्यास करते समय प्रारम्भिक अवस्था में दुग्ध एवं घृत के भोजन को ही अत्यधिक श्रेष्ठ
बतलाया गया है। तत्पश्चात् जब अभ्यास स्थिर हो जाता है, तब किसी नियम की आवश्यकता नहीं रहती ॥ ५॥
यथा सिंहो गजो व्याघ्रो भवेद्वश्यः शनैः शनैः। तथैव सेवितो वायुरन्यथा हन्ति साधकम् ॥ ६ ॥
जिस प्रकार शनैः-शनैः सिंह, गज और व्याघ्र आदि को वश में कर लिया जाता है, उसी प्रकार वायु भी
प्राणायाम के अभ्यास से धीरे-धीरे वश में आ जाती है; लेकिन इसके विपरीत नियम से चलने पर यानी
जल्दबाजी करने से वायु योगी का विनाश कर देती है॥ ६॥
युक्तंयुक्तं त्यजेद्वायुं युक्तंयुक्तं च पूरयेत्। युक्तंयुक्तं च बध्नीयादेवं सिद्धिमवाप्नुयात् ॥ ७॥

अध्याय १ खण्ड ७ मन्त्र १३ २८९

अध्याय १ खण्ड ७ मन्त्र १३ २८९
अतः जिस प्रकार से ठीक बने, वैसे ही रेचक करना चाहिए, जैसे ठीक लगे, वैसे ही पूरक करना तथा
ठीक लगने तक ही कुम्भक करना चाहिए। इस प्रकार का अभ्यास करने से शीघ्र ही सिद्धि प्राप्त हो जाती है ॥७
यथेष्टधारणाद्वायोरनलस्य प्रदीपनम्। नादाभिव्यक्तिरारोग्यं जायते नाडिशोधनात् ॥ ८ ॥
यथेष्ट शक्ति के अनुसार कुम्भक करने से अग्नि प्रज्वलित होती है तथा नाड़ियों के शुद्ध होने से नाद-
श्रवण होता है और शरीर रोगरहित हो जाता है ॥ ८ ॥
विधिवत्प्राणसंयामैर्नाडीचक्रे विशोधिते। सुषुम्नावदनं भित्त्वा सुखाद्विशति मारुतः ॥ ९ ॥
विधि-विधान पूर्वक प्राणायाम करने से योगी के समस्त नाड़ी-समूह शुद्ध हो जाते हैं। तब सुषुम्ना नाड़ी
का मुख भेदन करके वायु सुखपूर्वक उसमें प्रविष्ट हो जाता है ॥९॥
मारुते मध्यसंचारे मनःस्थैर्यं प्रजायते। यो मनः सुस्थिरो भावः सैवावस्था मनोन्मनी ॥ १० ॥
वायु जब बीच में सञ्चरित होती है, तब मन सुस्थिर होता है और जब मन की ठीक तरह से स्थिरता हो
जाती है, तब उसी स्थिरता की मनोन्मनी अवस्था कहा जाता है ॥ १० ॥
पूरकान्ते तु कर्तव्यो बन्धो जालन्धराभिधः। कुम्भकान्ते रेचकादौ कर्तव्यस्तूड्डियाणकः ॥११॥
साधक को पूरक के अन्त में (कुम्भक के समय) जालन्धर नामक बन्ध करना चाहिए तथा कुम्भक के
अन्त एवं रेचक के प्रारंभ में उड्डियान नामक बन्ध करना चाहिए ॥ ११ ॥
अधस्तात्कुञ्चनेनाशु कण्ठसंकोचने कृते। मध्ये पश्चिमतानेन स्यात्प्राणो ब्रह्मनाडिगः ॥ १२ ॥
नीचे की ओर मूलरन्ध्र का संकोचन करने में कण्ठ का संकोचन होता है और बीच के भाग को पश्चिम
(पीछे) की ओर खींचने से प्राणवायु ब्रह्मनाड़ी में निरन्तर गतिमान् होती रहती है ॥ १२ ॥
अपानमूर्ध्वमुत्थाप्य प्राणं कण्ठादधो नयन्। योगी जराविनिर्मुक्तः षोडशो वयसा भवेत् ॥१३
अपान वायु को ऊर्ध्व की तरफ ले जाकर तथा प्राणवायु को कण्ठ से नीचे की ओर लाकर के योगी
साधक वृद्धावस्था से रहित होकर सोलह वर्ष की आयु वाला हो जाता है ॥ १३ ॥
सुखासनस्थो दक्षनाड्या बहिःस्थं पवनं समाकृष्याकेशमानखाग्रं कुम्भयित्वा सव्यनाड्या
रेचयेत्। तेन कपालशोधनं वातनाडीगतसर्वरोगसर्वविनाशनं भवति ॥ १३-१ ॥
योगी सुखासन पर बैठकर दाहिनी नाड़ी के द्वारा बाहर की वायु को अन्दर की ओर खींचकर सिर के
बालों से लेकर पैर के नख की नोंक तक में वायु को रोक कर अर्थात् कुम्भक करके बायीं नाड़ी के द्वारा वायु
को बाहर निकाले अर्थात् रेचक करे। ऐसी क्रिया करने से कपाल की शुद्धि होती है और नाड़ियों में रहने वाले
समस्त रोगों का पूर्णतया विनाश ही हो जाता है ॥ १३-१ ॥
हृदयादिकण्ठपर्यन्तं सस्वनं नासाभ्यां शनैः पवनमाकृष्य यथाशक्ति कुम्भयित्वा इडया
विरेच्य गच्छंस्तिष्ठन्कुर्यात्। तेन श्लेष्महरं जठराग्निवर्धनं भवति ॥ १३-२ ॥
हृदय से लेकर कण्ठ पर्यन्त शब्द के साथ दोनों नासिका छिद्रों के द्वारा धीरे-धीरे वायु को खींचकर शक्ति
के अनुसार कुम्भक करने के बाद इड़ा नाड़ी के द्वारा रेचक करना चाहिए। यह क्रिया चलते हुए तथा खड़े हुए
भी करने ही रहना चाहिए, क्योंकि इस क्रिया से कफ का शमन और जठराग्नि की वृद्धि होती है ॥ १३-२ ॥
वक्त्रेण सीत्कारपूर्वकं वायुं गृहीत्वा यथाशक्ति कुम्भयित्वा नासाभ्यां रेंचयेत्। तेन
क्षुत्तृष्णालस्यनिद्रा न जायन्ते ॥ १३-३ ॥

२९० शाण्डिल्योपनिषद्
मुख के द्वारा सीत्कार अर्थात् सी-सी करते हुए वायु अन्दर भरकर शक्ति के अनुसार कुम्भक करने के
पश्चात् दोनों नासिका छिद्रों द्वारा रेचक की क्रिया करनी चाहिए। इससे भूख-प्यास, आलस्य अथवा निद्रा का
प्रादुर्भाव नहीं होता॥ १३-३॥
जिह्वया वायुं गृहीत्वा यथाशक्ति कुम्भयित्वा नासाभ्यां रेचयेत्। तेन गुल्मप्लीहज्वरपित्त-
क्षुधादीनि नश्यन्ति॥ १३-४॥
जिह्वा द्वारा वायु को अन्दर खींचकर शक्ति के अनुसार कुम्भक करके दोनों नासिका छिद्रों द्वारा रेचक
करना चाहिए। इससे गुल्म (गोला), तिल्ली, ज्वर, पित्त और भूख आदि रोगों का शमन हो जाता है॥ १३-४॥
अथ कुम्भकः। स द्विविधः सहितः केवलश्चेति। रेचकपूरकयुक्तः सहितः। तद्विवर्जितः
केवलः। केवलसिद्धिपर्यन्तं सहितमभ्यसेत् । केवलकुम्भके सिद्धे त्रिषु लोकेषु न तस्य
दुर्लभं भवति। केवलकुम्भकात्कुण्डलिनीबोधो जायते।। १३-५ ॥
अब कुम्भक के सन्दर्भ में कहते हैं, उसके दो भेद हैं- (१) सहित और (२) केवल। रेचक तथा पूरक
से जो संयुक्त हो, उसे सहित और उनसे जो रहित हो, वह केवल है। इसमें से केवल जब तक सिद्ध न हो, तब
तक सहित का अभ्यास करते रहना चाहिए और जब 'केवल' कुम्भक सिद्ध हो जाता है, तब योगी को तीनों
लोकों में कुछ भी दुर्लभ नहीं रहता। केवल कुम्भक के द्वारा ही कुण्डलिनी जाग्रत् हो जाती है॥ १३-५॥
ततः कृशवपुः प्रसन्नवदनो निर्मललोचनोऽभिव्यक्तनादो निर्मुक्तरोगजालो जितबिन्दुः
पट्वग्निर्भवति॥ १३-६॥
इस सिद्धि के पश्चात् योगी-साधक कृश शरीर से युक्त, प्रसन्न मुख वाला, निर्मल नेत्रों से सम्पन्न, नाद
श्रवण करने वाला, समस्त रोगों से रहित, बिन्दु को जय करने वाला (ब्रह्मचर्यसिद्ध) तथा प्रज्वलित जठराग्नि
से युक्त हो जाता है॥१३-६॥
अन्तर्लक्ष्यं बहिर्दृष्टिर्निमेषोन्मेषवर्जिता। एषा सा वैष्णवी मुद्रा सर्वतन्त्रेषु गोपिता॥ १४॥
अन्तःकरण में लक्ष्य निहित हो तथा बाह्य की दृष्टि निमेष-उन्मेष अर्थात् पलक झपकने से विहीन हो,
यही वैष्णवी मुद्रा है तथा इसे ही समस्त तन्त्र-शास्त्रों में गुप्त रहस्य के रूप में मान्यता प्राप्त है॥ १४॥
अन्तर्लक्ष्यविलीनचित्तपवनो योगी सदा वर्तते दृष्ट्या निश्चलतारया बहिरधः
पश्यन्नपश्यन्नपि। मुद्रेयं खलु खेचरी भवति सा लक्ष्यैकताना शिवा शून्याशून्यविवर्जितं
स्फुरति सा तत्त्वं पदं वैष्णवी॥ १५॥
अन्तर्लक्ष्य में जिस योगी का चित्त और पवन विलय को प्राप्त हो गया हो, वह योगी साधक सतत निश्चल
नेत्रों द्वारा बाहर की ओर नीचे की तरफ देखता हो, किन्तु इसके अतिरिक्त और कुछ न देखता हो, यही खेचरी
मुद्रा है। यह केवल लक्ष्य में ही एकतान एवं मङ्गलमयी होने के कारण वैष्णवी मुद्रा भी कही जाती है। उसमें
शून्य एवं अशून्य रहित परमतत्त्व अविनाशी पद रूप में प्रकाशित होता रहता है॥ १५॥
अर्धोन्मीलितलोचनः स्थिरमना नासाग्रदत्तेक्षणश्चन्द्रार्कावपि लीनतामुपनयन्निष्यन्द-
भावोत्तरम्। ज्योतीरूपमशेषबाह्यरहितं देदीप्यमानं परं तत्त्वं तत्परमस्ति वस्तुविषयं शाण्डिल्य
विद्धीह तत्॥ १६॥
अर्ध उन्मीलित नेत्रों से युक्त, एकाग्र मनवाला तथा नासिका के अग्रभाग पर स्थित दृष्टि से सम्पन्न योगी

अध्याय १ खण्ड ७ मन्त्र २४ २९१

अध्याय १ खण्ड ७ मन्त्र २४ २९१
अचल भाव को पाने के पश्चात् सूर्य एवं चन्द्र नाड़ी को भी विलय करा देता है। इस समय ज्योति रूप समस्त
बाहरी विषयों से विहीन एवं दीप्तिमान् जो तत्त्व प्रकाशित हो रहा है, वही परम वस्तु के रूप में उसका विषय
होता है। हे शाण्डिल्य ! इस प्रकार तुम्हें जानना चाहिए ॥ १६ ॥
तारं ज्योतिषि संयोज्य किंचिदुन्नमयन्भ्रुवौ । पूर्वाभ्यासस्य मार्गोऽयमुन्मनीकारकः
क्षणात् ॥ १७॥ तस्मात्खेचरीमुद्रामभ्यसेत् । तत उन्मनी भवति । ततो योगनिद्रा भवति ।
लब्धयोगनिद्रस्य योगिनः कालो नास्ति । ॥ १७.१॥
योगी साधक दोनों नेत्रों की पुतलियों को ज्योति से जोड़कर दोनों भौंहों को कुछ ऊँचा रखता है। यह
साधक के प्रारम्भिक अभ्यास का मार्ग है और इससे क्षणमात्र में ही 'उन्मनी' स्थिति प्राप्त हो जाती है। इसलिए
साधक को खेचरी मुद्रा का अभ्यास करना चाहिए, उससे वह उन्मनी दशा को प्राप्त करता है, फिर उसे योग-
निद्रा की प्राप्ति हो जाती है। जिस साधक को योग-निद्रा की प्राप्ति हो, वह योगी फिर काल के वश में नहीं
होता ॥ १७-१७.१ ॥
शक्तिमध्ये मनः कृत्वा शक्तिं मानसमध्यगाम् ।
मनसा मन आलोक्य शाण्डिल्य त्वं सुखी भव ॥ १८ ॥
इस कारण हे शाण्डिल्य ! शक्ति के बीच में मन को केन्द्रित करो। शक्ति को मन के अन्दर गतिशील
रखकर तुम मन के द्वारा मन को ही देखो तथा सुखी-समुन्नत जीवन व्यतीत करो ॥ १८ ॥
खमध्ये कुरु चात्मानमात्ममध्ये च खं कुरु । सर्वं च खमयं कृत्वा न किंचिदपि चिन्तय ॥
ऐसे ही (चैतन्य) आकाश के बीच में आत्मा को स्थित करके तथा आत्मा के मध्य में (चैतन्य) आकाश
को प्रतिष्ठित देखना चाहिए। इसके पश्चात् सभी को (चैतन्य) आकाशमय करके, ऐसा ध्यान करें कि इसके
अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं ॥ १९ ॥
बाह्यचिन्ता न कर्तव्या तथैवान्तरचिन्तिका। सर्वचिन्तां परित्यज्य चिन्मात्रपरमो भव ॥ २० ॥
योगी को बाह्यजगत् की चिन्ता नहीं करनी चाहिए, उसी प्रकार अपने भीतर की भी चिन्ता नहीं करनी
चाहिए। इस तरह समस्त प्रकार को चिन्ताओं का परित्याग करके मात्र चैतन्य स्वरूप हो जाना चाहिए ॥ २० ॥
कर्पूरमनले यद्वत्सैन्धवं सलिले यथा । तथा च लीयमानं सन्मनस्तत्त्वे विलीयते ॥ २१ ॥
जिस तरह से कपूर अग्नि में तथा नमक जल में विलीन हो जाता है, उसी तरह से ध्यानस्थ हुए योगी का
मन परम तत्त्व में विलीन हो जाता है ॥ २१ ॥
ज्ञेयं सर्वप्रतीतं च तज्ज्ञानं मन उच्यते । ज्ञानं ज्ञेयं समं नष्टं नान्यः पन्था द्वितीयकः ॥ २२ ॥
जो भी कुछ जानने योग्य है और जो प्रतीत होता है, उसका जो ज्ञान है, उसे ही मन कहते हैं। ज्ञान एवं
ज्ञेय सभी कुछ एक ही साथ विनष्ट हो गया है, इसके अतिरिक्त अन्य कोई भी पथ नहीं है ॥ २२ ॥
ज्ञेयवस्तुपरित्यागाद्विलयं याति मानसम् । मानसे विलयं याते कैवल्यमवशिष्यते ॥ २३ ॥
ज्ञेय वस्तु का परित्याग कर देने से मन विलीनता को प्राप्त हो जाता है और जब मन विलीनता को प्राप्त
हो जाता है, तब कैवल्य ही कैवल्य शेष रह जाता है ॥ २३ ॥
द्वौ क्रमौ चित्तनाशस्य योगो ज्ञानं मुनीश्वर । योगस्तद्वृत्तिरोधो हि ज्ञानं सम्यगवेक्षणम् ॥ २४ ॥
हे मुनीश्वर ! चित्त को विनष्ट करने के दो प्रमुख मार्ग हैं- १. योग और २. ज्ञान। योग अर्थात् चित्त को
वृत्तियों का शमन करना तथा ज्ञान अर्थात् वस्तु के तत्त्व को यथार्थ रूप में देखना ॥ २४ ॥

२९२ शाण्डिल्योपनिषद
तस्मिन्निरोधिते नूनमुपशान्तं मनो भवेत्। मनः स्पन्दोपशान्त्यायं संसारः प्रविलीयते॥ २५॥
मन को जब अपने वश में कर लिया जाता है, तब वह निश्चित ही शान्त हो जाता है। मन की चंचलता
के शान्त होते ही इस संसार का विलय हो जाता है॥ २५॥
सूर्यालोकपरिस्पन्दशान्तौ व्यवहृतिर्यथा। शास्त्रसज्जनसंपर्कवैराग्याभ्यासयोगतः॥ २६॥
जिस प्रकार सूर्य की गति (आलोक) शान्त हो जाने पर संसार का व्यवहार शान्त हो जाता है, वैसे ही
शास्त्रों एवं सज्जनों की संगति से वैराग्य के अभ्यास का योग हो जाने से भी संसार शान्त हो जाता है॥ २६॥
अनास्थायां कृतास्थायां पूर्वं संसारवृत्तिषु। यथाभिवाञ्छितध्यानाच्चिरमेकतयोहितात् ॥ २७॥
एकतत्त्वदृढाभ्यासात्प्राणस्पन्दो निरुध्यते । पूरकाद्यनिलायामाद्दृढाभ्यासादखेदजात् ॥ २८ ॥
एकान्तध्यानयोगाच्च मनःस्पन्दो निरुध्यते । ओङ्कारोच्चारणप्रान्तशब्दतत्त्वानुभावनातू।
सुषुप्ते संविदा ज्ञाते प्राणस्पन्दो निरुध्यते ॥ २९॥
सर्वप्रथम सांसारिक वृत्तियों के प्रति अनास्था उत्पन्न की जाए, तत्पश्चात् लम्बे समय तक ध्यान एवं एक
तत्त्व का दृढ़ अभ्यास हो जाने से प्राण का स्पन्दन बन्द हो जाता है अर्थात् प्राणवायु को अपने वश में कर लिया
जाता है। इसी प्रकार बिना श्रम के अधिक देर तक श्वास खींचते हुए पूरक आदि वायु के दृढ़ अभ्यास तथा
एकान्त चिन्तन करने से मन की गति पूर्णतया बन्द हो जाती है (मन वश में हो जाता है)। तदनन्तर ॐकार
के उच्चारण के बाद शब्द तत्त्व की अनुभूति होने से सद्ज्ञान द्वारा सुषुप्ति का रूप जान लिया जाता है, तब प्राण
की गति रुक जाती है अर्थात् प्राण तत्त्व को अपने वश में कर लिया जाता है॥ २७-२९॥
तालुमूलगतां यत्नाज्जिह्वयाक्रम्य घण्टिकाम्। ऊर्ध्वरन्ध्रं गते प्राणे प्राणस्पन्दो निरुध्यते॥ ३०॥
तालु के मूल में स्थित रहने वाली ग्रन्थि को जब सतर्कतापूर्वक जिह्वा द्वारा दबाया जाता है, तब प्राणवायु
ऊपर के छिद्र में आ जाता है और तभी प्राणगति अवरुद्ध (अपने वश में) हो जाती है॥ ३०॥
प्राणे गलितसंवित्तौ तालूर्ध्वं द्वादशान्तगे। अभ्यासाद्ध्वंरन्ध्रेण प्राणस्पन्दो निरुध्यते ॥ ३१ ॥
तालु से ऊर्ध्व की ओर बारह अंगुल दूर तक गमन करने वाला प्राण गलित (चेष्टा-शून्य ) हो जाता है,
तब अभ्यास मात्र से ही ऊपर के छिद्र द्वारा प्राण का स्पन्दन अवरुद्ध किया जाता है॥ ३१॥
द्वादशाङ्गुलपर्यन्ते नासाग्रे विमलेऽम्बरे। संविद्दृशि प्रशाम्यन्त्यां प्राणस्पन्दो निरुध्यते ॥ ३२ ॥
नासिका के अग्रभाग के सामने द्वादश अंगुल की दूरी पर पवित्र आकाश में ज्ञान-दृष्टि जब अत्यन्त शान्त
हो जाती है, तभी प्राणों का स्पन्दन अवरुद्ध हो जाता है॥ ३२॥
भ्रूमध्ये तारकालोकशान्तावन्तमुपागते । चेतनैकतने बद्धे प्राणस्पन्दो निरुध्यते ॥ ३३ ॥
भौंहों के मध्य में तारक ब्रह्म के साक्षात्कार होने पर शान्ति के मिल जाने से जगत् व्यापार बन्द होने लगते
हैं तथा मानसिक संकल्प विराम लेते हैं, तभी प्राणगति अवरुद्ध हो जाती है ॥ ३३ ॥
ओमित्येव यदुद्भूतं ज्ञानं ज्ञेयात्मकं शिवम् । असंस्पृष्टविकल्पांशं प्राणस्पन्दो निरुध्यते ॥३४
केवल प्रणव के स्वरूप में ही प्रादुर्भूत जो ज्ञानज्ञेय रूप तथा मंगलमय बनकर प्रकट होता है तथा जिसमें
विकल्प के अंश का स्पर्श भी नहीं रहता, तभी प्राण की गति अवरुद्ध हो जाती है॥ ३४॥
चिरकालं हृदेकान्तव्योमसंवेदनान्मुने । अवासनमनोध्यानात्प्राणस्पन्दो निरुध्यते ॥ ३५ ॥
हे मुने ! चिरकाल तक हृदय प्रदेश में एकान्त आकाश की अनुभूति होने से वासना विहीन मन ध्यान-मग्न
होने लगता है। इससे प्राण का स्पन्दन अवरुद्ध हो जाता है॥ ३५॥

अध्याय १ खण्ड ७ मन्त्र ४१ २९३

अध्याय १ खण्ड ७ मन्त्र ४१ २९३
एभिः क्रमैस्तथान्यैश्च नानासंकल्पकल्पितैः । नानादेशिकवक्त्रस्थैः प्राणस्पन्दो निरुध्यते ॥३६
इस प्रकार क्रमानुसार अन्य अनेक गुरुओं के अमृत वचनों-उपदेशों का अनुसरण करके भाँति-भाँति के
संकल्पों की कल्पना के माध्यम से प्राण का स्पन्दन अवरुद्ध हो जाता है ॥ ३६-क॥
आकुञ्चनेन कुण्डलिन्याः कवाटमुद्घाट्य मोक्षद्वारं विभेदयेत् ॥ ३६-ख॥
योगी साधक कुण्डलिनी को संकुचित करके (ऊपर खींचकर) किवाड़ को खोलकर मुक्ति का द्वार
प्रशस्त करे ॥ ३६-ख ॥
येन मार्गेण गन्तव्यं तद्द्वारं मुखेनाच्छाद्य प्रसुप्ता ।
कुण्डलिनी कुटिलाकारा सर्पवद्वेष्टिता भवति ॥ ३६-ग॥
जिस मार्ग से गमन करना होता है, उसी मार्ग का द्वार मुख से आच्छादित करके कुण्डलिनी शयन करती
है। वह तिर्यक् स्वरूप वाली सर्प की भाँति लिपटी हुई है ॥ ३६-ग ॥
सा शक्तिर्येन चालिता स्यात्स तु मुक्तो भवति । सा कुण्डलिनी कण्ठोर्ध्वभागे सुप्ता चेद्योगिनां
मुक्तये भवति । बन्धनायाधो मूढानाम् ॥ ३६-घ ॥
इस कुण्डलिनी महाशक्ति को जो योगी निरन्तर संचालित करता है, वह मुक्ति को प्राप्त कर लेता है। वह
कुण्डलिनी साधक के कण्ठ में ऊर्ध्व भाग की तरफ यदि शयन करती हुई हो, तो वह योगियों को मुक्ति प्रदान
कर देने वाली होती है, किन्तु यदि वह कण्ठ के नीचे शयन करती हो, तो ज्ञानरहित साधकों के लिए
बन्धनकारी सिद्ध होती है ॥ ३६-घ ॥
इडादिमार्गद्वयं विहाय सुषुम्नामार्गेणागच्छेद्विष्णोः परमं पदम् ॥ ३६-ङ ॥
इड़ा आदि दोनों मार्गों का परित्याग करके सुषुम्ना के रास्ते उसका आगमन होता है, क्योंकि वही विष्णु
का परम पद है ॥ ३६-ङ ॥
मरुदभ्यसनं सर्वं मनोयुक्तं समभ्यसेत् । इतरत्र न कर्तव्या मनोवृत्तिर्मनीषिणा ॥ ३७ ॥
वायु (प्राणायाम) का संपूर्ण अभ्यास मन के साथ ही होना चाहिए। इस अवसर पर ज्ञानी पुरुष को मन
की वृत्ति को अन्यत्र संयुक्त नहीं होने देना चाहिए ॥ ३७ ॥
दिवा न पूजयेद्विष्णुं रात्रौ नैव प्रपूजयेत् । सततं पूजयेद्विष्णुं दिवारात्रं न पूजयेत् ॥ ३८ ॥
यहाँ पर यह बात नहीं है कि अमुक दिन विष्णु का पूजन नहीं करना चाहिए अथवा अमुक रात्रि को
विष्णु को न पूजना चाहिए, बल्कि सदा ही विष्णु की पूजा करते रहना चाहिए। केवल रात्रि में अथवा दिन
में ही न पूजना चाहिए ॥ ३८ ॥
सुषिरो ज्ञानजनकः पञ्चस्रोतः समन्वितः । तिष्ठते खेचरी मुद्रा त्वं हि शाण्डिल्य तां भज ॥३९
हे शाण्डिल्य ! पाँच इन्द्रियों के प्रवाह वाला हृदय रूप रिक्त (आकाश) स्थान ज्ञान को प्रादुर्भूत करने
वाला है तथा वहीं खेचरी मुद्रा स्थित रहती है। अतः आप उसी का सेवन करें ॥ ३९ ॥
सव्यदक्षिणनाडीस्थो मध्ये चरति मारुतः । तिष्ठते खेचरी मुद्रा तस्मिन्स्थाने न संशयः ॥ ४०
बायीं एवं दाहिनी नाड़ी में स्थित होकर मध्य में वायु का संचरण होता रहता है तथा उस स्थान में खेचरी
मुद्रा प्रतिष्ठित रहती है, इसमें किसी भी तरह का संशय नहीं है ॥ ४० ॥
इडापिङ्गलयोर्मध्ये शून्यं चैवानिलं ग्रसेत् । तिष्ठन्ती खेचरी मुद्रा तत्र सत्यं प्रतिष्ठितम् ॥ ४१ ॥

२९४ शाण्डिल्योपनिषद्
इड़ा एवं पिंगला के मध्य में शून्य भाग स्थित है। वहाँ वह वायु को ग्रस लेता है, खेचरी मुद्रा भी वहीं
पर प्रतिष्ठित रहती है एवं वहीं सत्य भी स्थित रहता है॥ ४१॥
सोमसूर्यद्वयोर्मध्ये निरालम्बतले पुनः। संस्थिता व्योमचक्रे सा मुद्रा नाम्ना च खेचरी ॥४२क
चन्द्रमा एवं सूर्य की दोनों नाड़ियों के बीच में आधार-रहित धरातल स्थित है, वहीं व्योम मण्डल में
खेचरी मुद्रा प्रतिष्ठित है॥ ४२-क॥
छेदनचालनदोहैः फलां परां जिह्वां कृत्वा दृष्टिं भ्रूमध्ये स्थाप्य कपालकुहरे जिह्वा
विपरीता यदा भवति तदा खेचरी मुद्रा जायते। जिह्वा चित्तं च खे चरति तेनोर्ध्वजिह्वः
पुमानमृतो भवति ॥ ४२-ख ॥
छेदन, चालन एवं दोहन के द्वारा जिह्वा को ज्यादा से ज्यादा नुकीला बनाकर, भुकुटि के बीच में दृष्टि
स्थिर करके, कपाल के छिद्र में जब जिह्वा विपरीत (उल्टी) होकर गमन करने लगती है, तभी खेचरी मुद्रा
सिद्ध होती है। जिह्वा एवं चित्त दोनों ही कपाल के छिद्र रूपी आकाश में विचरण करते हैं, तभी ऊर्ध्व की ओर
गई हुई जिह्वा वाला पुरुष अमरता को प्राप्त कर लेता है॥ ४२-ख॥
वामपादमूलेन योनिं संपीड्य दक्षिणपादं प्रसार्य तं कराभ्यां धृत्वा नासाभ्यां वायुमापूर्य
कण्ठबन्धं समारोप्योर्ध्वतो वायुं धारयेत्। तेन सर्वक्लेशहानिः। ततः पीयूषमिव विषं जीर्यते।
क्षयगुल्मगुदावर्तजीर्णत्वगादिदोषा नश्यन्ति। एष प्राणजयोपायः सर्वमृत्युपघातकः ॥ ४२ग
बायें पैर की एड़ी से मूलरन्ध्र को दबाकर दाहिना पैर आगे की तरफ फैलाकर उसे दोनों हाथों से
पकड़ना तथा इसके पश्चात् नासिका के दोनों छिद्रों से वायु को भर कर कण्ठबन्ध (जालन्धर बन्ध) लगाना एवं
ऊपर की ओर उठी हुई वायु को स्थिर करना चाहिए। इस क्रिया से समस्त क्लेशों का विनाश हो जाता है।
इसके बाद विष भी अमृत के सदृश पच जाता है। क्षय, गुल्म, गुदावर्त एवं त्वचा के असाध्य एवं पुराने रोग
विनष्ट हो जाते हैं। प्राण को जीतने का यह उपाय मृत्यु को पूर्णरूप से विनष्ट करने वाला है॥ ४२-ग॥
वामपादपार्ष्णियोनिस्थाने नियोज्य दक्षिणचरणं वामोरूपरि संस्थाप्य वायुमापूर्य हृदये चुबुकं
निधाय योनिमाकुञ्च्य मनोमध्ये यथाशक्ति धारयित्वा स्वात्मानं भावयेत्। तेनापरोक्षसिद्धिः ॥
बायें पैर की एड़ी को योनि स्थान के साथ संयुक्त करके, दाहिना पैर बायें पैर पर रखे तथा वायु को अन्दर
भरकर, ठुड्डी को हृदय की तरफ दबाकर योनि स्थान को संकुचित कर मन के मध्य अपनी आत्मा का चिन्तन
करना चाहिए। इस क्रिया से अपरोक्ष सिद्धि की प्राप्ति होती है॥ ४२-घ॥
बाह्यात्प्राणं समाकृष्य पूरयित्वोदरे स्थितम्। नाभिमध्ये च नासाग्रे पादाङ्गुष्ठे च यत्नतः ॥४३॥
धारयेन्मनसा प्राणं सन्ध्याकालेषु वा सदा। सर्वरोगविनिर्मुक्तो भवेद्योगी गतक्लमः ॥ ४४क ॥
बाहर से प्राणवायु को अन्दर की ओर आकृष्ट करके उदर में प्रतिष्ठित करे और वहाँ से उसे नाभि के मध्य
में, नाक के अग्रभाग में तथा पैर के अँगूठे में मन द्वारा प्रयासपूर्वक धारण करे। इस तरह से सन्ध्याकाल में यह
क्रिया सदैव करने वाला योगी साधक समस्त रोगों से मुक्ति पाकर श्रम-रहित हो जाता है॥ ४३-४४-क॥
नासाग्रे वायुविजयं भवति। नाभिमध्ये सर्वरोगविनाशः।
पादाङ्गुष्ठधारणाच्छरीरलघुता भवति ॥ ४४-ख॥
नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि केन्द्रित करने से वायु को वश में किया जा सकता है, नाभि के मध्य में
स्थिर करने से सभी रोगों का नाश होता है तथा पैर के अँगूठे में स्थिर करने से शरीर हल्का हो जाता है॥ ४४ख