१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
अध्याय २ मन्त्र २६ ३०९
अध्याय २ मन्त्र २६ ३०९
दो प्रकार के होते हैं-(क) देवलोक, स्वर्ग, विदेह और प्रकृतिलय का आनन्द (ख) दिव्य गन्ध-रस आदि, अणिमा-
गरिमा-महिमा आदि सिद्धियाँ। वैराग्य संन्यासी उक्त दोनों प्रकार के विषयों से विरक्त होता है।]
शास्त्रज्ञानात्यापपुण्यलोकानुभवश्रवणात्प्रपञ्चोपरतो देहवासनां शास्त्रवासनां
लोकवासनां त्यक्त्वा वमनान्नमिव प्रवृत्तिं सर्वं हेयं मत्वा साधनचतुष्टयसंपन्नो यः संन्यस्यति
स एव ज्ञानसंन्यासी ॥ २० ॥
शास्त्रों का ज्ञान पाकर, पाप-पुण्य और सांसारिक अनुभवों को सुनकर, प्रपञ्च से परे (उपराम)
होकर, शरीर वासना (पुत्रैषणा, वित्तैषणा, लोकैषणा), शास्त्र वासना (शास्त्रों पर अत्यधिक निर्भर करना),
लोक वासना (लौकिक व्यवहारों की प्रमुखता) का परित्याग करके, समस्त प्रकार की सांसारिक प्रवृत्तियों
को वमन किये हुए अन्न की भाँति मान करके, साधन चतुष्टय (विवेक, वैराग्य, षट्सम्पत्ति और मुमुक्षुत्व) से
सम्पन्न होकर जो संन्यास धर्म को स्वीकार करता है, 'उसे ज्ञान संन्यासी' कहा गया है ॥ २० ॥
क्रमेण सर्वमभ्यस्य सर्वमनुभूय ज्ञानवैराग्याभ्यां स्वरूपानुसंधानेन देहमात्रावशिष्टः
संन्यस्य जातरूपधरो भवति स ज्ञानवैराग्यसंन्यासी ॥ २१ ॥
क्रमानुसार सभी का अभ्यास करके, सभी अनुभव लेकर, ज्ञान एवं वैराग्य के तत्त्व को अच्छी तरह से
जान करके, देह मात्र अवशिष्ट मानकर जो संन्यास-धर्म को ग्रहण करता है, 'वह ज्ञान वैराग्य संन्यासी'
कहलाता है ॥ २१ ॥
ब्रह्मचर्यं समाप्य गृही भूत्वा वानप्रस्थाश्रममेत्य वैराग्याभावेऽप्याश्रमक्रमानुसारेण यः
संन्यस्यति स कर्मसंन्यासी ॥ २२ ॥
ब्रह्मचर्य, गृहस्थ एवं वानप्रस्थ- इन तीनों आश्रमों का पालन करने के पश्चात् वैराग्य (की दृढ़ स्थिति)
न होने पर भी नियमानुसार संन्यास ग्रहण करना चाहिए, यह लक्षण 'कर्म-संन्यासी' के कहे गये हैं ॥ २२ ॥
स संन्यासः षड्विधो भवति कुटीचकबहूदकहंस। परमहंसतुरीयातीतावधूताश्चेति ॥ २३ ॥
इस संन्यास के छः भेद हैं- कुटीचक, बहूदक, हंस, परमहंस, तुरीयातीत तथा अवधूत ॥ २३ ॥
कुटीचकः शिखायज्ञोपवीती दण्डकमण्डलुधरः कौपीनशाटीकन्थाधरः पितृमातृगुर्वारा-
धनपरः पिठरखनित्रशिक्यादिमात्रसाधनपर एकत्रान्नादनपरः श्वेतोर्ध्वपुण्ड्रधारी त्रिदण्डः ॥ २४ ॥
कुटीचक संन्यासी शिखा (चोटी) एवं यज्ञोपवीत को अपने शरीर में धारण किये रहता है। इसके
अतिरिक्त वह दण्ड, कमण्डलु, कौपीन (लँगोटी), चादर, कंथा (कथरी) को ग्रहण करने वाला, माता-पिता
तथा गुरु की आराधना करने वाला; बटलोई, कुदाली और छीका मात्र अपने पास रखने वाला तथा एक ही
जगह पर भोजन करने वाला, ऊपर की ओर श्वेत त्रिपुण्ड्र मस्तक में धारण करने वाला और त्रिदण्ड भी धारण
करने वाला होता है ॥ २४ ॥
बहूदकः शिखादिकन्थाधरस्त्रिपुण्ड्रधारी । कुटीचकवत्सर्वसमो इ मधुकरवृत्त्याष्टकवलाशी ॥ २५
बहूदक संन्यासी शिखा आदि, कंथा (कथरी) त्रिपुण्ड्र को धारण करने वाला तथा सभी तरह से कुटी-
चक की भाँति मधुकरी (भिक्षा) की वृत्ति वाला होता है, वह केवल आठ ग्रास भोजन ग्रहण करता है ॥ २५ ॥
हंसो जटाधारी त्रिपुण्ड्रोर्ध्वपुण्ड्रधारी। असंक्लृप्तमाधुकरान्नाशी कौपीनखण्डतुण्डधारी ॥२६
'हंस' नामक संन्यासी जटाधारी (लम्बे केशों वाला,) त्रिपुण्ड्र एवं ऊर्ध्व पुण्ड्र को धारण करने वाला,
अनजान स्थान पर माँगकर भोजन करने वाला तथा कौपीन (लँगोटी) मात्र धारण करने वाला होता है ॥ २६
३१० संन्यासोपनिषद्
परमहंसः शिखायज्ञोपवीतरहितः पञ्चगृहेषु करपात्री एककौपीनधारी।
शाटीमेकामेकं वैणवं दण्डमेकशाटीधरो वा भस्मोद्धूलनपरः सर्वत्यागी ।। २७ ।।
'परमहंस' संन्यासी शिखा-यज्ञोपवीत से विहीन पाँच घरों से हाथ रूपी पात्र में भिक्षा प्राप्त करने वाला,
एक लँगोटी, एक चादर तथा एक बाँस का दण्ड अपने पास में रखने वाला होता है अथवा शरीर पर भस्म
धारण कर एक चादर ही अपने पास रखता है और सभी कुछ का परित्याग कर देता है ॥ २७ ॥
तुरीयातीतो गोमुखवृत्त्या फलाहारी अन्नाहारी ।
चेद्गृहत्रये देहमात्रावशिष्टो दिगम्बरः कुणपवच्छरीरवृत्तिकः ॥ २८ ॥
'तुरीयातीत' संन्यासी सब कुछ त्याग देने वाला, गोमुख वृत्ति वाला, तीन गृहों से फल अथवा अन्न की
भिक्षा लेने वाला, अपना शरीर नग्न रखने वाला अर्थात् बिना वस्त्रादि के शरीर को रखने वाला होता है। वह
अपने शरीर को मरे हुए की भाँति जान करके किसी तरह जीवन निर्वाह करता है ॥ २८ ॥
अवधूतस्त्वनियमः पतिताभिशस्तवर्जनपूर्वकं सर्ववर्णेष्वजगरवृत्त्याहारपरः स्वरूपा-
नुसंधानपरः ॥ २९ ॥ जगत्तावदिदं नाहं सवृक्षतृणपर्वतम् । यद्बाह्यं जडमत्यन्तं तत्स्यां कथमहं
विभुः । कालेनाल्पेन विलयी देहो नाहमचेतनः ॥ ३० ॥
'अवधूत' नामक संन्यासी किसी भी तरह का नियम नहीं मानता। पतित और निन्दित के अतिरिक्त
समस्त जातियों में अजगर वृत्ति से आहार प्राप्त करने वाला होता है। वह अपने स्वरूप की खोज में ही सतत
लगा रहता है। यह जो वृक्ष, घास-पात, पर्वत आदि सम्पूर्ण विश्व है, वह मेरे से अलग है। जो कुछ बाह्य जगत्
में दृष्टिगोचर हो रहा है, वह अत्यन्त जड़ है। मैं किस तरह उसमें स्थित रह सकता हूँ; क्योंकि मैं विराट् हूँ,
काल के द्वारा कल्पित एवं जल्दी ही विलय होने वाला भी मैं नहीं हूँ ॥ २९-३० ॥
जडया कर्णशष्कुल्या कल्पमानक्षणस्थया । शून्याकृतिः शून्यभवः शब्दो नाहमचेतनः ।।३१ ॥
मैं (संन्यासी) वह जड़ शब्द रूप नहीं हूँ; जो कि क्षण-मात्र ही ठहरता है। शून्य आकृति एवं स्वरूप
से युक्त अचेतन भी मैं नहीं हूँ ॥ ३१ ॥
त्वचा क्षणविनाशिन्या प्राप्योऽप्राप्योऽयमन्यथा । चित्रसादोपलब्धात्मा स्पर्शो नाहमचेतनः ॥३२
इस प्रकार क्षण भर में नष्ट होने वाली एवं बनने-बिगड़ने वाली त्वचा भी मुझसे अलग है। मैं वह जड़
(अचेतन) स्पर्श नहीं हूँ, जो कि चैतन्यता के प्रभाव से आत्मानुभूति प्राप्त करता है ॥ ३२ ॥
लब्धात्मा जिह्वया तुच्छो लोलया लोलसत्तया । स्वल्पस्पन्दो द्रव्यनिष्ठो रसो नाहमचेतनः ॥३३ ॥
चंचलता से युक्त मन एवं मन से युक्त जिह्वा द्वारा द्रव्य से उत्पन्न तुच्छ स्पन्दन शक्ति भी मैं नहीं हूँ ॥ ३३
दृश्यदर्शनयोर्लीनं क्षयि क्षणविनाशिनोः। केवले द्रष्टरि क्षीणं रूपं नाहमचेतनः ॥ ३४ ॥
इसी तरह से दृश्य एवं दर्शन के विलीन हो जाने से विनष्ट हो जाने वाला अचेतन जड़ अनुभव भी मैं
नहीं हूँ, मैं तो केवल द्रष्टा मात्र हूँ ॥ ३४ ॥
नास्या गन्धजडया क्षयिण्या परिकल्पितः । पेलवोऽनियताकारो गन्धो नाहमचेतनः ॥ ३५ ॥
गन्ध भी जड़ पदार्थ से युक्त तथा घ्राणेन्द्रिय के द्वारा परिकल्पित है, ऐसी तुच्छ जड़-गन्ध भी मैं नहीं हूँ ॥
निर्ममोऽमननः शान्तो गतपञ्चेन्द्रियभ्रमः । शुद्धचेतन एवाहं कलाकलनवर्जितः ॥ ३६ ॥
मैं (संन्यासी) पञ्च इन्द्रियों के भ्रम से विहीन, मनन रहित, शान्त स्वरूप से युक्त तथा मलिनता रहित
शुद्ध चैतन्य मात्र हूँ। ॥ ३६ ॥