१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
अध्याय १ खण्ड ४ मन्त्र १३ २८५
अध्याय १ खण्ड ४ मन्त्र १३ २८५
प्राणापानसमानोदानव्याना नागकूर्मकृकरदेवदत्तधनञ्जया एते दश वायवः सर्वासु नाडीषु
चरन्ति ॥ १२ ॥
प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, नाग, कूर्म, कृकर, देवदत्त एवं धनञ्जय- ये दस तरह के वायु इन
समस्त नाड़ी-संस्थानों में विचरण करते रहते हैं ॥ १२ ॥
आस्यनासिकाकण्ठनाभिपादाङ्गुष्ठद्वयकुण्डल्यधश्चोर्ध्वभागेषु प्राणः संचरति। श्रोत्राक्षि-
कटिगुल्फघ्राणगलस्फिगद्देशेषु व्यानः संचरति। गुदमेढ्रोरुजानूदरवृषणकटिजङ्घानाभिगु-
दाग्न्यगारेष्वपानः संचरति। सर्वसंधिस्थ उदानः। पादहस्तयोरपि सर्वगात्रेषु सर्वव्यापी समानः।
भुक्तान्नरसादिकं गात्रेऽग्निना सह व्यापयन्द्विसप्ततिसहस्रेषु नाडीमार्गेषु चरन्समानवायुरग्निना
सह साङ्गोपाङ्गकलेवरं व्याप्नोति। नागादिवायवः पञ्च त्वगस्थ्यादिसंभवाः। तुन्दस्थं जलमन्नं
च रसादिषु समीरितं तुन्दमध्यगतः प्राणस्तानि पृथक्कुर्यात्। अग्नेरुपरि जलं स्थाप्य जलोपर्य-
न्नादीनि संस्थाप्य स्वयमपानं संप्राप्य तेनैव सह मारुतः प्रयाति देहमध्यगतं ज्वलनम्। वायुना
पालितो वह्निरपानेन शनैर्देहमध्ये ज्वलति। ज्वलनो ज्वालाभिः प्राणेन कोष्ठमध्यगतं जलमत्यु-
ष्णमकरोत्। जलोपरि समर्पितव्यञ्जनसंयुक्तमन्नं वह्निसंयुक्तवारिणा पक्वमकरोत्। तेन
स्वेदमूत्रजलरक्तवीर्यरूपरसपुरीषादिकं प्राणः पृथक्कुर्यात्। समानवायुना सह सर्वासु नाडीषु
रसं व्यापयञ्छ्वासरूपेण देहे वायुश्चरति। नवभिर्व्योमरन्ध्रैः शरीरस्य वायवः कुर्वन्ति
विण्मूत्रादिविसर्जनम्। निश्वासोच्छ्वासकासश्च प्राणकर्मोच्यते। विण्मूत्रादिविसर्जनमपानवा-
युकर्म। हानोपादानचेष्टादि व्यानकर्म। देहस्योन्नयनादिकमुदानकर्म। शरीरपोषणादिकं
समानकर्म। उद्गारादि नागकर्म। निमीलनादि कूर्मकर्म। क्षुत्करणं कृकरकर्म। तन्द्रा देवदत्त-
कर्म। श्लेष्मादि धनञ्जयकर्म ॥ १३ ॥
मुख, नासिका, गला, नाभि, पैर के दोनों अँगूठे तथा कुण्डलिनी के नीचे एवं ऊर्ध्व के भागों में प्राणतत्त्व
विचरण करता रहता है। कर्णेन्द्रिय, नेत्र, कमर, गुल्फ, नासिका, गला एवं कूल्हे के क्षेत्रों में व्यान भ्रमण करता
रहता है। गुदा, लिंग, जानु, पेट, वृषण, कटि प्रदेश, नाभि और अग्निसंस्थान में अपान संव्यास रहता है। समस्त
संधि अर्थात् जोड़ के संस्थानों में उदान सतत विचरण करता रहता है। पैर, हाथ एवं अन्य सभी अंग-अवयवों
में समान संव्यास रहता है। खाये हुए अन्न के रस को शरीर की अग्नि के साथ संव्यास करके समान वायु बहत्तर
हजार नाड़ियों के मार्ग में विचरण करता रहता है एवं अग्नि के साथ सांगोपांग शरीर में विद्यमान रहता है। नाग
आदि पाँच प्रकार की वायु त्वचा, अस्थि आदि में प्रतिष्ठित रहते हैं। उदर में रहने वाले जल तथा अन्न को रस
आदि के रूप में ले जाकर पेट में रहने वाला प्राण-वायु पृथक्-पृथक् करता है। आग के ऊपर जल रखकर
तथा जल के ऊपर अन्न आदि प्रतिष्ठित कर स्वयं अपान के पास पहुँचकर वायु तत्त्व इसी अपान के साथ शरीर
में स्थित अग्नि की ओर गमन करता है। अपान वायु से रक्षित अग्नि शरीर के मध्य में मन्द-मन्द प्रज्वलित रहता
है। यह अग्नि अपनी ज्वाला एवं प्राण-वायु के द्वारा कोठे के मध्य में स्थित रहने वाले जल को खूब गर्म करता
है और उस पानी के ऊपर रखे शाक-दाल के सहित अन्न को प्राणवायु, अग्नियुक्त जल के द्वारा पकाता अर्थात्
पचाता है तथा उसी में से पसीना, मूत्र, खून, वीर्य, रस, विष्ठा (मल) आदि को पृथक्-पृथक् करता है।
तदनन्तर समान वायु के साथ-साथ समस्त नाड़ियों में रस को प्रसारित करता हुआ प्राण-वायु श्वास के रूप में
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शरीर में विचरण करता रहता है। शरीर के नौ व्योमरन्ध्रों (घटाकाश के छिद्रों) के द्वारा वायु, मल, मूत्र आदि
को बाहर निष्कासित करता है। श्वासोच्छ्वास तथा खाँसी यह दोनों ही प्राण तत्त्व के कर्म कहलाते हैं। मल-
मूत्र का बहिर्गमन कराना अपान वायु का कार्य कहलाता है। त्याग करना एवं स्वीकार करना आदि चेष्टाएँ व्यान
का कार्य कहलाती हैं, शरीर का उन्नयन उदान का कार्य कहलाता है। शरीर को पोषण प्रदान करना समान का
कार्य कहलाता है। डकार आदि नाग का कार्य है। पलक झपकाना कूर्म का कार्य है, भूख लगना कृकर का
कार्य है। आलस्य देवदत्त का कार्य है तथा कफ आदि का उत्पन्न करना धनञ्जय का कार्य कहलाता है ॥१३॥
एवं नाडीस्थानं वायुस्थानं तत्कर्म च सम्यग्ज्ञात्वा नाडीसंशोधनं कुर्यात्॥ १४॥
इस तरह से नाड़ी-संस्थान, वायु-संस्थान एवं उन सभी के कार्यों को ठीक तरह से जान-समझ कर नाड़ी
को शुद्ध करना चाहिए॥ १४॥
॥ पंचमः खण्डः ॥
यमनियमयुतः पुरुषः सर्वसङ्गविवर्जितः कृतविद्यः सत्यधर्मरतो जितक्रोधो
गुरुशुश्रूषानिरतः पितृमातृविधेयः स्वाश्रमोक्तसदाचारविद्वच्छिक्षितः फलमूलोदकान्वितं
तपोवनं प्राप्य रम्यदेशे ब्रह्मघोषसमन्विते स्वधर्मनिरतब्रह्मवित्समावृते फलमूलपुष्पवारिभिः
सुसंपूर्णे देवायतने नदीतीरे ग्रामे नगरे वापि सुशोभनमठं नात्युच्चनीचायतमलपद्वारं
गोमयादिलिप्तं सर्वरक्षासमन्वितं कृत्वा तत्र वेदान्तश्रवणं कुर्वन्द्योगं समारभेत् ॥ १॥
जिस पुरुष ने विद्या का अभ्यास किया हो, उसको यम-नियम से युक्त होकर सभी तरह की संगति का
परित्याग करके सत्य रूपी धर्म में आरूढ़ होना चाहिए। क्रोध को वश में रखना, गुरु की सेवा शुश्रूषा में सतत
लगे रहना, माता-पिता के आश्रित (संरक्षण में) रहना तथा पुनः अपने आश्रम में बताये गये श्रेष्ठ आचरण को
समझने वाले के समीप में शिक्षा पाकर के फल, मूल तथा जलयुक्त तपोवन में जाना चाहिए। वहाँ जाकर सुरम्य
प्रदेश में ब्रह्मघोष से युक्त, अपने धर्म में परायण ब्रह्मवेत्ताओं के सान्निध्य में तथा फल-मूल, पुष्प एवं जल
आदि से परिपूर्ण किसी भी देव-स्थल में या नदी के तट पर किसी गाँव या शहर में अनुपम श्रेष्ठ मठ बनाना
चाहिए। वह स्थान न तो बहुत ऊँचा हो और न ही अत्यन्त नीचा ही हो, न तो बहुत लम्बा तथा न ही अति
चौड़ा ही हो। छोटे दरवाजे वाला, गोमय आदि से लीपा हुआ एवं पूर्णरूपेण सुरक्षित होना चाहिए। वहाँ
वेदान्त का श्रवण करते हुए पुरुष को निरन्तर योगाभ्यास आदि आरम्भ कर देना चाहिए॥१॥
आदौ विनायकं संपूज्य स्वेष्टदेवतां नत्वा पूर्वोक्तासने स्थित्वा प्राङ्मुख उदङ्मुखो वापि
मृद्वासनेषु जितासनगतो विद्वान्समग्रीवशिरोनासाग्रदृग्भ्रूमध्ये शशभृद्विम्बं पश्यन्नेत्राभ्याममृतं
पिबेत्। द्वादशमात्रया इडया वायुमापूर्योदरे स्थितं ज्वालावलीयुतं रेफबिन्दुयुक्तमग्निमण्डलयुतं
ध्यायेद्रेचयेत्पिङ्गलया। पुनः पिङ्गलयाऽऽपूर्य कुम्भित्वा रेचयेदिडया ॥ २ ॥
देवों में प्रथम पूज्य गणपति का पूजन करने के पश्चात् अपने इष्टदेव को नमन-वंदन करके पूर्व में कहे
गये आसन पर बैठना चाहिए। उस समय पूर्व अथवा उत्तर दिशा की तरफ मुख रखना और सुकोमल आसन
पर आसीन होकर के आसन को जय (सिद्ध) करना चाहिए। तत्पश्चात् विद्वान् पुरुष को गर्दन और मस्तक को
सीधा रखकर नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि रखनी चाहिए। दोनों भौंहों के मध्य चन्द्रमण्डल को देखना तथा
दोनों नेत्रों से अमृत तत्त्व का पान करना चाहिए। इसके बाद बारह मात्राओं से इड़ा नाड़ी के माध्यम से वायु