१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ३ मन्त्र ८ ९९
'उच्च' अर्थात् ऊँचे स्वर से किये जाने वाले जप की अपेक्षा 'उपांशु' अर्थात् फुसफुसाकर किया गया
जप सहस्रगुना श्रेष्ठ कहा गया है। इसी तरह उपांशु की अपेक्षा मानसिक जप सहस्रगुना अधिक उत्तम कहा
गया है। उच्च स्वर से सम्पन्न किया गया जप सभी लोगों को भली-भाँति फल प्रदान करने वाला होता है, किन्तु
यदि उस मन्त्र को निम्न स्तर के व्यक्तियों ने श्रवण कर लिया, तो वह व्यर्थ हो जाता है॥ १५-१६॥
॥ तृतीयः खण्डः ॥
स्वस्तिकं गोमुखं पद्मं वीरसिंहासने तथा। भद्रं मुक्तासनं चैव मयूरासनमेव च ॥१॥
सुखासनसमाख्यं च नवमं मुनिपुङ्गव । जानूर्वोरन्तरे कृत्वा सम्यक् पादतले उभे ॥२॥
समग्रीवशिरःकायः स्वस्तिकं नित्यमभ्यसेत् । सव्ये दक्षिणगुल्फं तु पृष्ठपार्श्वे नियोजयेत् ॥३॥
दक्षिणेऽपि तथा सव्यं गोमुखं तत्प्रचक्षते । अङ्गुष्ठावधि गृह्णीयाद्धस्ताभ्यां व्युत्क्रमेण तु ॥४॥
ऊर्वोरुपरि विप्रेन्द्र कृत्वा पादतलद्वयम् । पद्मासनं भवेत्प्राज्ञ सर्वरोगभयापहम् ॥५॥
हे मुनिश्रेष्ठ ! आसन नौ प्रकार के कहे गये हैं-स्वस्तिक आसन, गोमुख आसन, पद्मासन, वीरासन,
सिंहासन, मुक्तासन, भद्रासन, मयूरासन तथा सुखासन । घुटनों एवं जाँघों के मध्य में अपने दोनों पैरों को भली-
भाँति रखकर ग्रीवा, मस्तिष्क एवं शरीर को समान भाव से बनाये रखना ही स्वस्तिक आसन कहा जाता है;
इस आसन का प्रतिदिन अभ्यास करने का प्रयास करना चाहिए। दाहिने पैर के टखने को बायीं ओर के पीछे
भाग तक तथा बायें पैर के टखने को दाहिनी ओर के पीछे भाग तक ले जाये, इसी को गोमुखासन कहते हैं।
हे विप्र ! दोनों पैरों को दोनों जाँघों पर रखकर उनके अँगुठों को दोनों हाथों से पीठ के पृष्ठ भाग से पकड़ ले।
इसी को पद्मासन कहा जाता है। यह आसन सभी तरह के रोगों का भय हटाने वाला है॥ १-५॥
दक्षिणेतरपादं तु दक्षिणोरुणि विन्यसेत् । ऋजुकायः समासीनो वीरासनमुदाहृतम् ॥ ६॥
बायें पैर को दाहिनी जाँघ के ऊपर रखे तथा शरीर को सीधा करके बैठे, यही वीरासन है ॥ ६ ॥
गुल्फौ च वृषणस्याधः सीवन्याः पार्श्वयोः क्षिपेत् । दक्षिणं सव्यगुल्फेन दक्षिणेन तथेतरत् ॥
हस्तौ जानौ समास्थाप्य स्वाङ्गुलींश्च प्रसार्य च ! व्यक्तवक्त्रो निरीक्षेत नासाग्रं सुसमाहितः ॥
सिंहासनं भवेदेतत् पूजितं योगिभिःसदा ॥ ६.१-३॥
दोनों टखनों को अण्डकोष के नीचे सीवनी के दोनों पार्श्वों में ले जाकर उन्हें इस तरह से रखे कि बायें
टखने से सीवनी का दक्षिण पार्श्व और दक्षिण टखने से सीवनी का बायाँ पार्श्व सटा रहे। तदनन्तर दोनों हाथों
को घुटनों पर रखकर अँगुलियों को फैला दे। मुँह खोलकर एकाग्रचित्त हो घ्राणेन्द्रिय के अग्रभाग पर दृष्टि
स्थिर रखे यही सिंहासन है ॥ ६-१ से ३॥
गुल्फौ तु वृषणस्याधः सीवन्याः पार्श्वयोः क्षिपेत् । पार्श्वपादौ च पाणिभ्यां दृढं बद्ध्वा
सुनिश्चलम्। भद्रासनं भवेदेतद्विषरोगविनाशनम् ॥७॥
दोनों टखनों को अण्डकोष के नीचे सीवनी के दोनों पार्श्वभागों में लगाकर रखे तथा दोनों हाथों से
पार्श्वभाग एवं पैरों को दृढ़तापूर्वक बाँध करके एकाग्रतापूर्वक बैठे, इस स्थिति को भद्रासन कहते हैं। यह
समस्त विषयुक्त रोगों का शमन करने वाला है॥ ७॥
निपीड्य सीवनीं सूक्ष्मं दक्षिणेतरगुल्फ़तः। वामं याम्येन गुल्फेन मुक्तासनमिदं भवेत् ॥ ८ ॥