१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ३ मन्त्र ३ ७९
करती हैं, ऐसा प्रतर्दन ने निवेदन किया। इस तरह से उन देवों में श्रेष्ठ इन्द्र ने कहा-यह बात ऐसी ही है।
'समस्त प्राण एक होते हुए भी जो अन्य पाँच प्राण हैं, वे निःश्रेयस अर्थात् परम कल्याण स्वरूप हैं निश्चय ही
यही बात है ॥ २ ॥'
जीवति वागपेतो मूकान्हि पश्यामो जीवति चक्षुरपेतोऽन्धान्हि पश्यामो जीवति श्रोत्रापेतो
बधिरान्हि पश्यामो जीवति मनोपेतो बालान्हि पश्यामो जीवति बाहुच्छिन्नो जीवत्यूरुच्छिन्न
इति। एवं हि पश्याम इति। अथ खलु प्राण एव प्रज्ञात्मेदं शरीरं परिगृह्योत्थापयति।
तस्मादेतदेवोऽथ्मुपासीत। यो वै प्राणः सा प्रज्ञा या वा प्रज्ञा स प्राणः। सह ह्येतावस्मिञ्शरीरे
वसतः सहोत्क्रामतस्तस्यैषैव दृष्टिः। एतद्विज्ञानम्। यत्रैतत्पुरुषः सुप्तः स्वप्नं न कंचन
पश्यत्यथास्मिन्प्राण एवैकधा भवति। तदैनं वाक्सर्वैर्नामभिः सहाप्येति चक्षुः सर्वै रूपैः सहाप्येति
श्रोत्रं सर्वैः शब्दैः सहाप्येति मनः सर्वैर्ध्यानैः सहाप्येति। स यदा प्रतिबुध्यते। यथाग्नेर्ज्वलतः
सर्वा दिशो विस्फुलिङ्गा विप्रतिष्ठेरन्नेवमेवैतस्मादात्मनः प्राणा यथायतनं विप्रतिष्ठन्ते प्राणेभ्यो
देवा देवेभ्यो लोकाः। तस्यैवैव सिद्धिः एतद्विज्ञानम्। यत्रैतत्पुरुष आर्तो मरिष्यन्नाबल्यं न्येत्य
संमोहं न्येति तदाहुः। उदक्रमीच्चित्तम्। न श्रृणोति न पश्यति न वाचा वदति न
ध्यायत्यथास्मिन्प्राण एवैकधा भवति तदैनं वाक्सर्वैर्नामभिः सहाप्येति चक्षुः सर्वै रूपैः सहाप्येति
श्रोत्रं सर्वैः शब्दैः सहाप्येति मनः सर्वैर्ध्यानैः सहाप्येति यदा प्रतिबुध्यते यथाग्नेर्ज्वलतो विस्फुलिङ्गा
विप्रतिष्ठेरन्नेवमेवैतस्मादात्मनः प्राणा याथायतनं विप्रतिष्ठन्ते प्राणेभ्यो देवा देवेभ्यो लोकाः ॥३॥
'वागिन्द्रिय से रहित होने पर भी व्यक्ति जीवित बना रहता है, क्योंकि गूँगों को प्रत्यक्ष ही देखा जाता है।
नेत्रों से रहित होने पर भी व्यक्ति जीवन धारण किये रहता है, क्योंकि अंधों को प्रायः देखते ही हैं। श्रोत्रेन्द्रिय
हीन व्यक्ति भी जीवित ही रहता है, क्योंकि बधिरों को प्रायः ही देखा जाता है। मनः शक्ति से रहित होने पर
भी जीवन धारण किया जा सकता है, क्योंकि प्रायः ही छोटे बालकों को जीवित देखते हैं। प्राण के रहते, अंग-
भंग हो जाने पर भी जीवन बना रहता है, किन्तु प्राण के रहित होने पर तो एक क्षण भी जीवन धारण करना
असम्भव है। क्रिया शक्ति का बोध कराने वाला प्राण ही ज्ञान में प्रवृत्ति कराने वाले ज्ञान से युक्त आत्मा है।
यही प्रज्ञात्मा इस शरीर को सभी तरफ से आबद्ध करके भिन्न-भिन्न क्रियायें कराता रहता है। अतः इस प्राण
की ही 'उक्थ' रूप से उपासना करनी चाहिए। निश्चय ही जो प्रसिद्ध प्राण है, वही प्राण है या फिर जो प्रज्ञा
कही गई है, वही प्राण है; क्योंकि प्रज्ञा एवं प्राण दोनों साथ-साथ ही इस शरीर में निवास करते हैं तथा जीवात्मा
के साथ मिलकर एक साथ ही इस शरीर से उत्क्रमण करते अर्थात् बाहर निकलते हैं। इस प्राणमय परब्रह्म का
यही दर्शन (ज्ञान) है और यही विज्ञान है; क्योंकि सुषुप्त अवस्था में जब सोया हुआ मनुष्य किसी भी तरह के
स्वप्न नहीं देखता, उस समय शब्द सभी नामों के साथ, नेत्र रूपानुभूति सहित, कान शब्दों सहित और मन,
चिन्तन सहित मुख्य प्राण में ही समाहित हो जाते हैं। वह मनुष्य जब जाग्रत् अवस्था को प्राप्त होता है, तब उस
समय जैसे जलती हुई अग्नि से सभी दिशाओं की ओर चिनगारियाँ निकलती हैं, वैसे ही इस प्राण स्वरूप
आत्मा से सभी वाणी आदि प्राण बाहर निकल कर अपने-अपने उचित स्थान की ओर गमन कर जाते हैं।
तत्पश्चात् उन प्राणों से उनके अधिष्ठाता अग्नि आदि देवगण प्रादुर्भूत होते हैं तथा उन देवों से लोक एवं नामादि
विषय उत्पन्न होते हैं।
इस प्राणरूप आत्मा की सिद्धि का वर्णन आगे किया जा रहा है। यही विज्ञान है कि जिस अवस्था में