१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय २ मन्त्र ११ ७३
(दुग्ध) निहित है, उसे मैं जानता हूँ। अपने को मैं उसका पूर्ण ज्ञाता मानता हूँ। इस सत्य के प्रभाव से मैं कभी
पुत्र से सम्बन्धित शोक से न रोऊँ अर्थात् मुझे पुत्र का शोक कभी भी न झेलना पड़े। इस तरह की प्रार्थना करने
से साधक के संतान की मृत्यु नहीं होती ॥ १० ॥
अथ प्रोष्यायन्पुत्रस्य मूर्धानमभिमृशेत्। अङ्गादङ्गात्संभवसि हृदयादधिजायसे। आत्मा त्वं
पुत्र माविथ स जीव शरदः शतमसाविति नामास्य गृह्णाति। अश्मा भव परशुर्भव हिरण्यमस्तृतं
भव तेजो वै पुत्रनामासि स जीव शरदः शतमसाविति नामास्य गृह्णाति येन प्रजापतिः प्रजाः
पर्यगृह्णादरिष्ट्यै तेन त्वा परिगृह्णाम्यसाविति नामास्य गृह्णात्यथास्य दक्षिणे कर्णे जपत्यस्मै प्रयन्धि
मघवन्नृजीषिन्निन्द्रे श्रेष्ठानि द्रविणानि धेहीति सव्ये मा च्छित्था मा व्यथिष्ठाः शतं शरद आयुषो
जीव पुत्र ते नाम्ना मूर्धानमवजिघ्राम्यसाविति त्रिर्मूर्धानमवजिघ्रेद्गवां त्वा हिंकारेणाभि हिं करोमीति
त्रिर्मूर्धानमभि हिं कुर्यात् ॥ ११ ॥
(इसके पश्चात् अब दूसरी उपासना का वर्णन करते हैं-) परदेश में रहकर, वहाँ से वापस आया हुआ
व्यक्ति अपने पुत्र के मस्तक का स्पर्श करते हुए निम्न मन्त्र को पढ़े 'अङ्गादङ्गात्सम्भवसि........शरदः शतम्
असौ।' (मंत्रार्थ-) 'अमुक नाम से युक्त हे पुत्र ! तुम नरक से पार करने वाले हो। तुम मेरे अंग-प्रत्यङ्ग से
उत्पन्न हुए हो। मेरे हृदय से तुम्हारा प्राकट्य हुआ है। तुम स्वयं मेरे ही आत्म स्वरूप हो। तुमने ही हमारी
(हमारे वंश की) रक्षा की है। हे पुत्र ! तुम शतायु हो'। यहाँ 'असौ' की जगह पर पुत्र के नाम का उच्चारण
करना चाहिए और साथ ही नामोच्चारण के समय निम्न मंत्र का पाठ करना चाहिए "अश्मा भव....... शतम्
असौ" (इसका भावार्थ इस प्रकार है-) "हे वत्स ! तुम पत्थर, कुठार एवं बिछा हुआ सुवर्ण बनो अर्थात्
तुम्हारा शरीर पत्थर की तरह सुगठित, बलवान्, स्वस्थ एवं नीरोग बने। तुम कुठार के सदृश शत्रुओं का दमन
करने वाले तथा सुवर्ण राशि की तरह सभी के प्रिय बनो। समस्त अंग-अवयवों का सारभूत, संसार-वृक्ष का
बीजरूप जो दिव्य तेज है, हे पुत्र ! वह तेज तुम्हीं हो, तुम सौ वर्षों तक जीवित रहो" यहाँ पर फिर से 'असौ'
के स्थान पर पुत्र का नाम लेना चाहिए और साथ ही निम्न मंत्र का पाठ भी करना चाहिए-'येन प्रजापतिः ........
......परिगृह्णामि असौ।' (प्रस्तुत मंत्र का भावार्थ इस प्रकार है-) "हे पुत्र ! प्रजापति ब्रह्मा जी अपनी सृष्टि को
नष्ट न होने देने के लिए उसे जिस तेज से युक्त करके अनुगृहीत करते हैं, उसी तेज से तुम भी युक्त हो। हे
पुत्र ! मैं तुम्हें सभी तरफ से स्वीकार करता हूँ।" तत्पश्चात् यहाँ भी 'असौ' के स्थान पर पुत्र का ही नाम
उच्चारण करे तथा पुत्र के दाहिने कान में नीचे लिखे मंत्र का पाठ करे-'अस्मै प्रयन्धि..........द्रविणानि धेहि।'
(मन्त्रार्थ इस प्रकार है-) हे मघवन्! आप सरल भाव का आश्रय लेकर इस पुत्र को संरक्षण प्रदान करें। पुनः
इसी मंत्र को बायें कान में जपे। तत्पश्चात् पुत्र के मस्तक को सूँघे तथा इस मन्त्र का पाठ करे- 'मा च्छित्था मा
........मूर्धानमवजिघ्रामि असौ। (इस मन्त्र का भावार्थ इस प्रकार है-) हे पुत्र ! संतान परम्परा का उच्छेद न
करना। मन, वाणी एवं शरीर से तुम्हें कभी कष्ट न हो। तुम सैकड़ों वर्षों तक जीवित रहो। मैं तुम्हारा अमुक
नाम से प्रख्यात पिता तुम्हारा नाम लेकर तुम्हारे मस्तक को सूँघ रहा हूँ।' (यहाँ पर असौ के स्थान पर पिता को
अपना नाम लेना चाहिए।) इस मन्त्र पाठ के बाद तीन बार पुत्र का मस्तक सूँघे, तत्पश्चात् निम्न मंत्र को
पढ़कर मस्तक के सभी तरफ तीन बार हिंकार (हिं शब्द का उच्चारण) करे। 'गवां त्वा' ........ हिंकरोमि।'
हे वत्स ! गौएँ जिस तरह से अपने बछड़े को बुलाने के लिए रँभाती हैं, वैसे ही प्रेमपूर्वक मैं भी तुम्हारे लिए
हिंकार करता हूँ अर्थात् हिंकार द्वारा तुम्हें बुलाता हूँ ॥ ११ ॥