१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 67, कुल 414 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय २ मन्त्र ५ ६१
अथातो दैवः स्मरो यस्य प्रियो बुभूषेद्यस्यै वा एषां वै तेषामेवैकस्मिन्पर्वण्य-
ग्निमुपसमाधायतैतयावृतैता आज्याहुतीर्जुहोति वाचं ते मयि जुहोम्यसौ स्वाहा। प्राणं ते मयि
जुहोम्यसौ स्वाहा। चक्षुस्ते मयि जुहोम्यसौ स्वाहा। श्रोत्रं ते मयि जुहोम्यसौ स्वाहा। मनस्ते
मयि जुहोम्यसौ स्वाहा। प्रज्ञां ते मयि जुहोम्यसौ स्वाहेत्यथ धूमगन्धं प्रजिघ्राय्याज्यलेपेनाङ्गान्यनु
विमृज्य वाचंयमोऽभिप्रव्रज्य संस्पर्शं जिगमिषेदपि वाताद्वा संभाषणमाणस्तिष्ठेत्प्रियो हैव भवति
स्मरन्ति हैवास्य ॥ ४ ॥
अब इसके पश्चात् वाणी आदि देवों के द्वारा सिद्ध होने वाले अभीष्ट की पूर्ति का प्रकार बताया गया है।
यदि उपासक किसी का आत्मीय बनने की इच्छा करे, तो उसे किसी का भी प्रिय होने से पूर्व 'वाक्' आदि
देवों का आत्मीय-प्रिय बनना चाहिए। किसी एक शुभ पर्व के दिन पूर्वोक्त नियमानुसार शुभ तिथि एवं शुभ
मुहूर्त में पहले कहे हुए के अनुसार ही अग्नि की स्थापना, (वेदी का) परिसमूहन (संस्कार करना), कुशों का
बिछाना, वेदी आदि का अभिषेक, घृत का उत्पवन (शोधन) आदि करके 'वाचं ते मयि.......... स्वाहा'
आदि मंत्रों से घृताहुतियाँ समर्पित करे। मंत्रों के अर्थ इस प्रकार हैं-मैं तुम्हारी वागिन्द्रिय का अपने में हवन
करता हूँ, मेरा अभीष्ट कार्य सिद्ध हो जाये, इस भाव से यह आहुति समर्पित है। मैं अपने अभीष्ट की पूर्ति के
लिए आपके प्राण, चक्षु, श्रोत्र एवं मन आदि इन्द्रियों तथा आपकी प्रज्ञा को भी अपने में हवन करता हूँ। इस
भाव से ये विशेष घृताहुतियाँ आपके लिए समर्पित हैं।
इन आहुतियों के पश्चात् होम-धूम की गन्ध को घ्राणेन्द्रिय के द्वारा ग्रहण कर होमावशिष्ट घृत का अपने
अंगों पर लेपन करके मौन रहते हुए अमुक व्यक्ति के पास जाए अथवा ऐसे स्थान पर खड़ा होकर कहे कि
जहाँ वायु के सहयोग से उसके शब्द इच्छित व्यक्ति के कानों में सुनाई पड़ें, तो निश्चय ही वह उस (व्यक्ति)
का प्रिय हो जाता है। इतना ही नहीं बल्कि उस जगह से हट जाने पर वहाँ के निवासी उसको सदैव स्मरण
करते रहते हैं ॥४॥
अथातः सांयमनं प्रातर्दनमान्तरमग्निहोत्रमिति चाचक्षते यावद्वै पुरुषो भाषते न
तावत्प्राणितुं शक्नोति प्राणं तदा वाचि जुहोति। यावद्वै पुरुषः प्राणिति न तावद्भाषितुं शक्नोति
वाचं तदा प्राणे जुहोति। एते अनन्ते अमृताहुती जाग्रच्च स्वप्नंश्च संततमव्यवच्छिन्नं जुहोत्यथ
या अन्या आहुतयोऽन्तवत्यस्ताः कर्ममय्यो हि भवन्त्येतद्ध वै पूर्वे विद्वांसोऽग्निहोत्रं न
जुहवांचक्रुः ॥ ५ ॥
आध्यात्मिक अग्निहोत्र-
अब दिवोदास के पुत्र प्रतर्दन के द्वारा किया गया अनुष्ठान, 'प्रातर्दन' नाम से प्रख्यात और संयम से पूर्ण
होने से 'सांयमन' कहलाने वाले अग्निहोत्र के सम्बन्ध में बतलाते हैं। निश्चय ही व्यक्ति मुख से जब तक कुछ
बोलता रहता है, तब तक वह पूर्ण रूप से श्वास नहीं ग्रहण कर पाता। उस समय वह प्राण का वाणीरूप अग्नि
में हवन कर देता है। ये वाणी एवं प्राणरूप दो आहुतियाँ कभी अन्त न होने वाली तथा अमृत स्वरूप हैं। जाग्रत्
एवं स्वप्नकाल में भी प्राणी सदैव अविच्छिन्न रूप से इन आहुतियों को होमता रहता है। इसके अतिरिक्त वाणी
एवं प्राणरूप आहुतियों से भिन्न जो अन्य दूसरी द्रव्यमयी आहुतियाँ हैं, वे कर्म द्वारा ही गतिमान् रहती हैं। यह
प्रसिद्ध है कि इस रहस्य को जानने वाले प्राचीनकालीन विद्वान् केवल कर्ममय अग्निहोत्र का अनुष्ठान सम्पन्न
नहीं करते थे ॥ ५ ॥