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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

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पृष्ठ 53

मंत्र २१ ५५
न मे देहेन संबन्धो मेघेनेव विहायसः । अतः कुतो मे तद्धर्मा जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिषु ॥ १५ ॥
मेरा इस शरीर से उसी तरह का सम्बन्ध नहीं है, जैसे-आकाश का मेघ से कोई भी सम्बन्ध नहीं रहता।
अतः इस शरीर के जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति आदि अवस्थाओं में मेरा (जीवात्मा का) क्या सम्बन्ध है? ॥ १५ ॥
आकाशवत्कल्पविदूरगोऽहमादित्यवद्भास्यविलक्षणोऽहम् ।
अहार्यवन्नित्यविनिश्चलोऽहमम्भोधिषत्पारविवर्जितोऽहम् ॥१६ ॥
मैं (जीवात्मा) आकाश की भाँति कल्पना से परे अर्थात् ऊपर हूँ, सूर्य के सदृश अन्य सुनहले आकर्षक
पदार्थों से पृथक् हूँ, पर्वत की तरह सतत स्थिर रहता हूँ तथा समुद्र की तरह अपार हूँ ॥ १६ ॥
नारायणोऽहं नरकान्तकोऽहं पुरान्तकोऽहं पुरुषोऽहमीशः ।
अखण्डबोधोऽहमशेषसाक्षी निरीश्वरोऽहं निरहं च निर्ममः ॥ १७ ॥
मैं ही नारायण हूँ। नरकान्तक (नरकासुर का वध करने वाले), पुरान्तक (त्रिपुरासुर का वध करने
वाले), पुरुष तथा ईश्वर भी मैं ही हूँ। मैं ही अखण्ड बोध स्वरूप, समस्त प्राणियों का साक्षी, ईश्वररहित (मेरे
ऊपर नियन्त्रण करने वाला कोई नहीं), अहंकाररहित तथा ममतारहित हूँ ॥ १७ ॥
तदभ्यासेन प्राणापानौ संयम्य तत्र श्लोका भवन्ति । वृषणापानयोर्मध्ये पाणी आस्थाय
संश्रयेत् । संदश्य शनकैर्जिह्वां यवमात्रे विनिर्गताम् ॥ १८ ॥
अब प्राण एवं अपान के अभ्यास के विषय में वर्णन करते हैं। वृषण तथा गुदा के बीच में दोनों हाथों को
रखे। दाँतों से जिह्वा को शनैः-शनैः दबाते हुए एक जौ के बराबर बाहर निकाले ॥ १८ ॥
माषमात्रां तथा दृष्टिं श्रोत्रे स्थाप्य तथा भुवि । श्रवणे नासिके गन्धा यतः स्वं न च संश्रयेत् ॥
माष मात्र (उड़द के बराबर) लक्ष्य को अनुसंधान करके दृष्टि को श्रोत्र और पृथ्वी पर स्थिर करे।
जिससे श्रवण (शब्द) और नासिका में गन्ध न स्थापित हो सके ॥ १९ ॥
आगे के मंत्र क्र० २०, २१, २२ में सभी तन्मात्राओं को रुद्ध करके हृदय के तप से उत्पन्न नाद के माध्यम से
आत्म-चेतना को ब्राह्मी चेतना के साथ संयुक्त करने की साधना का संकेत है। उसके लिए देहस्थ सभी तन्मात्राओं को
संयमित करने की स्वानुभूत प्रक्रिया का संकेत ऋषि ने मंत्र क्र० १८, १९ में किया है। इसमें स्थूल और सूक्ष्म क्रियाओं
का संयोग है। शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध इन पाँचों तन्मात्राओं को बाहरी संवेदना से असम्बद्ध करके ही अन्तः अनुभूति
में उतरा जा सकता है। ध्यान में नेत्र बन्द करने से अग्नि की तन्मात्रा 'रूप' के बाह्य संकेत बद्ध हो जाते हैं। मंत्र १८ के
अनुसार-संयम, धारणा, ध्यान, समाधि से स्पर्श एवं रस की तन्मात्राएं अन्तर्मुखी होती हैं। मंत्र १९ में पृथ्वी और श्रोत्र
पर दृष्टि स्थिर करने के लिए उड़द के बराबर लक्ष्य का अनुसंधान करने को कहा गया है। वह बिन्दु कहीं नासिका मूल
और कर्णमूलों के मध्य मस्तिष्क में ही हो सकता है, जहाँ गंध और शब्द का अनुभव करने वाले संवेदन कोष (सैंसिग
सैल) स्थित हों, वहाँ अन्तः दृष्टि- ध्यान केन्द्रित करने से नासिकारंध्रों में प्रवेश करने वाली गंध तथा कर्णरंध्रों से प्रवेश
करने वाले शब्द-अन्तःक्षेत्र की तन्मात्राओं में स्थापित नहीं हो सकते। इस प्रकार बहिर्जगत् से सभी तन्मात्राओं को
असम्बद्ध करके ही अन्तःस्थिति-ब्राह्मीचेतना की प्रभावी अनुभूति संभव होती है—
अथ शैवपदं यत्र तद्ब्रह्म ब्रह्म तत्परम् । तदभ्यासेन लभ्येत पूर्वजन्मार्जितात्मनाम् ॥ २० ॥
जो ब्रह्म का चिंतन करता है, वही स्वयं ब्रह्म रूप हो जाता है तथा वही शिव है। उस (अविनाशी ब्रह्म)
को पूर्व जन्म में किये हुए पुण्य कर्मों के फलस्वरूप अभ्यास द्वारा ही प्राप्त किया जाता है ॥ २० ॥
संभूतैर्वायुसंश्रावैर्हृदयं तप उच्यते । ऊर्ध्वं प्रपद्यते देहाद्भित्त्वा मूर्धानमव्ययम् ॥ २१ ॥
वायु के नाद का प्रकट होना ही हृदय का तप कहा जाता है, वह शरीर को भेदकर ऊर्ध्व की ओर गमन
करता हुआ मूर्धा को प्राप्त कर लेता है ॥ २१ ॥