१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंमन्त्रानुक्रमणिका ४०१
मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण | मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण
अदृश्योऽहम् | ब्र०वि०८५ | अन्योन्यस्याविरोधेन | यो०त० ६६
अद्यजातां यथा नारीम् | ना०परि० ३.६४ | अपकारिणि | याज्ञ० २९
अद्वयब्रह्मरूपेण | आ०बो० २.१४ | अपाणिपादो | कैव० २१
अद्वयानन्द विज्ञान | ब्र०वि० ८९ | अप्राणिपादो जवनो | ना०परि०१.१६
अद्वैत भावना | मैत्रे० २.१० | अपानमूर्ध्वमुत्थाप्य प्रणवेन | जाबा० ६.३३
अद्वैतोऽहम् | ब्र०वि० ८८ | अपानमूर्ध्वमुत्थाप्य प्राणं | शाण्डि० १.७.१३
अधस्तात्कुञ्चनेनाशु | शाण्डि० १.७.१२ | अपानमूर्ध्वमुत्थाप्य योनि | यो०त० १२१
अध्यस्तस्य | अध्या०५८ | अपानाख्यस्य | जा०द० ४.३१
अध्यात्मरतिरासीनो | ना०परि० ३.४४ | अपानान्त्रिषादा | सुबा० २.१
अध्यापिता ये गुरुम् | शाट्या० ३८ | अपानो वर्तते | जा०द० ४.२७
अनन्तकर्म शौचम् | पैङ्ग० ४.२४ | अपापमशठम् | ना०परि० ३.७४
अनन्तानन्द संभोगा | संन्या० २.४० | अपूर्वमपरं | जा०द० ४.६०
अनाख्येयदिदं गुह्यम् | हंस० ३ | अप्रमत्तः कर्म भक्तिज्ञान .. | ना०परि०३.७७
अनात्मकमसत्तुच्छम् | आत्मो० ९ | अप्राणममुखम् | सुबा० ३.२
अनादाविह संसारे | अध्या० ३७ | अभिव्दधृतमर्यादा | ना०परि० ५.३७
अनास्थायाम् | शाण्डि० १.७.२७ | अभयं सर्वभूतेभ्यो | ना०परि० ५.४३
अनाहतस्य शब्दस्य | मं०ब्रा० ५.१४ | अभिपूजितलाभांश्च | ना०परि० ५.३४
अनिन्द्यं वै व्रजेत् | ना०परि० ५.३९ | अभिशस्तं च पतितम् | संन्या० २.९२
अनिर्वाच्यम् | यो०त० ७ | अभेददर्शनम् | मैत्रे० २.२
अनुज्ञाप्य गुरूशैव | ना०परि० ६.३३ | अभ्यासकाले | शाण्डि० १.७.५
अनुभूतिं विना | मैत्रे० २.२२ | अभ्यासान्निर्विकारं | मं०ब्रा० १.२.१३
अनेन ज्ञानमाप्नोति | कैव० २६ | अमानित्व ..... | शारी० ९
अनेन विधिना | ना०परि० ३.५२ | अमावास्या | जा०द० ४.४३
अन्तःकरण प्रतिबिम्बित | पैङ्ग० २.१० | अमरों यः पिबेत् | यो०त० १२८
अन्तःकरणसम्बन्धात् | कं०रु० ४४ | अमुना वासना जाले | अध्या० ३९
अन्तः पूर्णो बहिः | मैत्रे० २.२७ | अमुष्य ब्रह्मभूतत्वाद्व्रह्मणः | आत्म० २६
अन्तर्याम्यहम् | ब्र०वि० ८४ | अमृतत्वं समाप्नोति | क्षुरि० २५
अन्तर्लक्ष्यं | शाण्डि० १.७.१४ | अमृतेन तृप्तस्य | पैङ्ग ४.१३
अन्तर्लक्ष्यं जलज्योतिः | मं०ब्रा० १.३.६ | अयं ते योनिर्ऋत्वियो | ना०परि० ३.७८
अन्तर्लक्ष्य विलीन .... | शाण्डि० १.७.१५ | अयं हृदि स्थितः | पं०ब्र० ४१
अन्तः शरीरे निहितो | अध्या० १ | अयने द्वे च | ब्र०वि० ५५
अन्तः शरीरे... एको | सुबा० ७.१ | अयमेव महाबन्धः | यो०त० ११५
अन्तः शरीरे ...शुद्धः | सुबा० ८.१ | अयमेव महावेधः | यो०त० ११७
अन्तःसङ्ग परित्यागो | ना०परि० ६.४१ | अयाचितं यथालाभम् | ना०परि० ५.३१
अन्तःस्थं मां | जा०द० ४.५८ | अरजस्कोऽतमस्को | ब्र०वि० ८७
अन्तः स्थानीन्द्रियाणि | ना०परि० ३.२६ | अर्धमात्रा परा | ब्र०वि०४०
अन्नपानपरो | संन्या० २.११४ | अर्धोन्मीलितलोचनः | शाण्डि० १.७.१६
अन्यदीये तृणे | जा०द०१.११ | अलभ्यमानस्तनयः | याज्ञ० २४
अन्यानथाष्टौ | शाट्या० २३ | अलम्बुसा | जा०द० ४.८