१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट ३८३ मन्त्रयोग, लययोग, राजयोग
में ही भूमि से ऊपर उठने लगता है। इसके पश्चात् और भी अतिमानुषी चेष्टाएँ होने लगती हैं; पर इन्हें किसी के समक्ष
प्रदर्शन न करने का स्पष्ट निर्देश है- केवले कुम्भके सिद्धे ...... न दर्शयेच्च सामर्थ्यं दर्शनं वीर्यवत्तरम् (यो० त० ५०-
५६)। शरीर वृत्तियों में और भी अनेक परिवर्तन होने पर भूचर सिद्धि हो जाती है। इसके प्राप्त हो जाने पर सभी भूचरों
(पृथ्वी पर चलने वाले) जीवों पर विजय प्राप्त हो जाती है। व्याघ्र, शरभ, गवय (नीलग्राय), सिंह आदि योगी के हस्त
ताडन मात्र से हो मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं। शरीर अनंग (कामदेव) के समान सुन्दर हो जाता है-येन भूचरसिद्धिः
स्याद्भूचराणां जये क्षमः । व्याघ्रो वा शरभो वाऽपि गजो गवय एव वा ।। सिंहो वा योगिना तेन प्रियन्ते हस्तताडिताः ।
कन्दर्पस्य यथारूपं तथा स्यादपि योगिनः (यो०त० ५९-६०)।
इस सिद्धि में अपेक्षित नैष्ठिक ब्रह्मचर्य धारण करने से शरीर सुगन्धित रहने लगता है, जिससे काम सम्बन्धी
अनेक विघ्न आते हैं। अतः स्त्रियों का चिन्तन नहीं करना चाहिए और एकान्त स्थल में प्लुत मात्रा में (ॐ के उच्चारण
में जितना समय लगता है, उससे तिगुने समय में) प्रणव (ॐ) का जप करना चाहिए, इससे पूर्वार्जित पापों का शमन
होता है-वर्जयित्वा स्त्रियां संगं........ प्रणवं प्लुतमात्रया। जपेत्पूर्वार्जितानां तु पापानां नाशहेतवे (यो०त० ६२-६३)।
२३३. भूमा - कोशग्रन्थों में भूमा शब्द का अर्थ है- भारी परिमाण, प्राचुर्य, यथेष्टता बड़ी संख्या आदि । दौलत, पृथ्वी, प्रदेश,
प्राणी आदि अर्थों में भी भूमा शब्द का प्रयोग मिलता है। उपनिषदों में भूमा शब्द ब्रह्म (ईश्वर) की एक विशेषता के रूप
में प्रतिपादित है। छान्दोग्योपनिषद् में ईश्वर को भूमा (निरतिशय) कहते हुए उसे सुख कहा गया है-यो वै भूमा तत्सुखं
नाल्पे सुखमस्ति भूमैव सुखं भूमा त्वेव विजिज्ञासितव्य इति भूमा भगवो विजिज्ञास इति (छान्दो० ७.२३.१) अर्थात्
सुनिश्चित रूप से भूमा (आधिक्य, निरतिशयत्व) ही सुख है। अल्प में सुख नहीं है। भूमा ही विशिष्टतः जानने योग्य है।
भूमा का लक्षण क्या है ? यह बताते हुए उपनिषद्कार ने लिखा है- (किं लक्षणोऽसौ भूमेत्याह) यत्र नान्यत्पश्यति
नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमाऽथ ... महिम्रीति (छान्दो० ७.२४.१) अर्थात् जहाँ कुछ अन्य नहीं देखता, कुछ
अन्य श्रवण नहीं करता तथा न ही कुछ जानता है, वही भूमा है; किन्तु जहाँ कुछ और देखता, सुनता व जानता है वह
अल्प है; क्योंकि जो अल्प है, वह मरणधर्मा और जो भूमा (निरतिशय) है, वह अमृत है। वह भूमा कहाँ प्रतिष्ठित है,
इसके उत्तर में कहा गया है वह भूमा अपनी महिमा में प्रतिष्ठित है। वस्तुतः वह अपनी महिमा में भी प्रतिष्ठित नहीं है;
क्योंकि संसार में गौ, अश्वादि को भी महिमा कहते हैं; वह भूमा इनमें प्रतिष्ठित नहीं है, वह तो निरालम्ब अर्थात् अवल-
म्बन रहित है। वह भूमा नीचे-ऊपर, बायें-दायें,आगे-पीछे सभी ओर है। उसी भूमा में (व्यक्तिभाव से) अहंकारवश इस
प्रकार कहा जाता कि मैं ही ऊपर-नीचे, दायें-बायें और सब ओर हूँ-स एवाधस्तात्स उपरिष्टात्स ...ऽहमुत्तरतोऽहमेवेद
१९सर्वमिति (छान्दो० ७.२५.१)। जिसका विभाजन न हो सके, जिसकी सीमा न हो या जो अन्तर रहित हो ऐसा भूमा
है और ऐसे अखण्ड आनन्द को भूमानन्द कहा गया है। तेजोबिन्दूपनिषद् में उपनिषदकार ने ब्रह्मसाक्षात्कार हो जाने पर
अथवा ब्रह्म से एकीभूत हो जाने पर आत्म स्वरूप का वर्णन करते हुए एक साधक का कथन इन शब्दों में उद्धृत किया
है-नित्यशेषस्वरूपोऽस्मि सर्वातीतोऽस्म्यहं सदा। रूपातीतस्वरूपोऽस्मि परमाकाश विग्रहः । भूमानन्दस्वरूपोऽस्मि
भाषाहीनोऽस्म्यहं सदा । सर्वाधिष्ठानरूपोऽस्मि सर्वदा चिद्धनोस्म्यहम् (ते०बि०३.१२-१३)।
इसी रूप में आत्मबोधोपनिषद् में भी आत्मबोध प्राप्त व्यक्ति अपने को भूमा स्वरूप बताता है .........परमानन्द
घनोऽहं परमानन्दैकभूमरूपोऽहं (आत्मबोधो० २.८)। शतपथ ब्राह्मण में श्री को ही भूमा कहा गया है-श्रीर्वै भूमा
(श०ब्रा० ३.१.१.१२)। इसी प्रकार तैत्तिरीय ब्राह्मण में पुष्टि को भूमा की संज्ञा प्रदान की गई है- पुष्टिवैं भूमा (तैत्ति०ब्रा०
३.९.८.३)। भूमा स्थिति प्राप्त कर लेने वाले साधु-सन्तों को भी कई लोग भूमा कहने लगते हैं।
२३४. भ्रुकुटि - द्र०-त्रिदण्ड-त्रिपुण्ड्र।
२३५. मन- द्र०-ज्ञानखण्ड-मानस।
२३६. मनन - द्र०-निदिध्यासन ।
२३७. मन्त्रयोग, लययोग, राजयोग - भारतीय दर्शन में विभिन्न प्रकार के योगों का वर्णन मिलता है। योग का सामान्य
अर्थ जोड़ना, मिलाना, संयोग संबंधी, संगति, ध्यान, युक्ति और चित्तवृत्ति निरोध आदि है। व्यावहारिक दृष्टि से योग के
कई प्रकार हैं, जैसे- मन्त्रयोग, लययोग, हठयोग, राजयोग आदि। योगतत्त्वोपनिषद् में इनका उल्लेख इन शब्दों में हुआ है-
योगो हि बहुधा ब्रह्मन् भिद्यते व्यवहारतः। मन्त्रयोगो लयश्चैव हठोऽसौ राजयोगकः (यो०त० १९)। ये सभी