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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

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परिशिष्ट ३८१. ब्रह्मचारी
को दूर करने के कारण ही इसे जालन्धर बन्ध कहते हैं। जालन्धर बन्ध के सन्दर्भ में विवेक मार्तण्ड में उल्लेख है-
जालन्धरे कृते बन्धे कण्ठसंकोचलक्षणे । न पीयूषं पतत्यग्नौ न च वायुः प्रकुप्यति (वि० मार्त० ६७) ।
महाबन्ध प्रायः पूर्वोक्त तीनों बन्धों का सम्मिलित स्वरूप होता है। योग तत्त्व उपनिषद् (११२-११४) में उल्लेख
है- पाणिर्वामस्य पादस्य.....उभयत्रैवमभ्यसेत् । महावेध में मूलबन्धपूर्वक पद्मासन से बैठकर प्राण और अपान वायु
को नाभि प्रदेश पर एक करके, दोनों हाथ तानकर नितम्बों से मिलाते हुए भूमि पर जमाकर नितम्बों को आसन के साथ
ही उठाकर बार-बार भूमि पर ताड़ित किया जाता है। इससे प्राण सुषुम्ना में प्रविष्ट होकर कुण्डलिनी का जागरण होता है।
२०१. बन्धन—द्र०-ज्ञानखण्ड ।
२१०. बहूदक—द्र०-अवधूत ।
२११. बिन्दु—सामान्यतः बिन्दु शब्द जल कण, बूंद के अर्थ में प्रयुक्त होता है। हाथी के मस्तक पर शोभा हेतु लगाई जाने
वाली बिन्दी के अर्थ में तथा मनुष्यों द्वारा भी दोनों भौहों के बीच लगाये जाने वाले गोल तिलक के अर्थ में भी बिन्दु
या विन्दु शब्द प्रयुक्त होता है। रेखा गणित में भी नियत स्थान पर जिसका विभाग न हो सके, उसे बिन्दु कहते हैं। शब्दों
के ऊपर अनुस्वार रूप में लगने वाली बिन्दी को भी बिन्दु कहते हैं। ब्रह्मचर्य प्रकरण में वीर्य के अर्थ में भी बिन्दु का
प्रयोग किया जाता है- एवं संरक्षयेद्विन्दुं मृत्युं जयति योगवित्। मरणं बिन्दुपातेन जीवनं बिन्दु धारणात् (हठ०प्र०
३.८८) अर्थात् बिन्दु (वीर्य) का संरक्षण करने वाला योग तत्त्व का ज्ञाता मृत्यु को जीत लेता है, क्योंकि बिन्दु धारण ही
जीवन तथा बिन्दु पतन ही मरण है। इसकी महत्ता यहाँ तक बतायी गयी है कि बिन्दुधारण से शरीर में सुगन्धि उत्पन्न हो
जाती है तथा जिसके शरीर में वीर्य (बिन्दु) है, उसे मृत्यु का भय कहाँ-सुगन्धो योगिनो देहे जायते बिन्दुधारणात्।
यावद्विन्दुः स्थिरो देहे तावत्कालभयं कुतः (हठ०प्र० ३.८९)।
श्रीमद्भागवत और शारदा तिलक में उल्लेख है कि सच्चिदानन्द विभव परमेश्वर से शक्ति, शक्ति से नाद और नाद
से बिन्दु का प्रादुर्भाव हुआ है-सच्चिदानन्दविभवात् सकलात् परमेश्वरात् । आसीच्छक्तिस्ततो नादो नादाद्विन्दुसमुद्भवः ॥
हिन्दी विश्वकोश खं० २९ पृष्ठ ४२६ में कुज्जिका तन्त्र में वर्णित बिन्दु को सर्वप्रथम उत्पन्न होने वाला (अर्थात् ब्रह्म) माना
गया है-आसीद्विन्दुस्ततो नादो नादाच्छक्तिः समुद्भवा । क्रियासार नामक ग्रन्थ में बिन्दु को शिवात्मक (कल्याणकारी)
और बीज को शक्त्यात्मक माना गया है। इन दोनों के संयोग से ही नाद और नाद से त्रिशक्ति उत्पन्न हुई है- बिन्दुः
शिवात्मकस्तत्र बीजं शक्त्यात्मकं स्मृतम्। तयोः ....जातास्त्रिशक्तयः ॥ (हि०वि० को०खं०२१ पृ० ४२६) नाद से
बिन्दु का घनिष्ठ सम्बन्ध होने के कारण ही प्रायः नाद और बिन्दु शब्दों का उल्लेख एक साथ ही मिलता है। मण्डल
ब्राह्मण उपनिषद् में उस परब्रह्म को नाद बिन्दु-कलातीत और अखण्डमण्डलाकार कहा गया है-
तन्नादबिन्दुकलातीतमखण्डमण्डलम् (मं० ब्रा०उ० २.१.४) । योगशिखोपनिषद् में नाद को ही बिन्दु और बिन्दु को
ही चित्त कहा गया है, अर्थात् तीनों एक ही तत्त्व हैं-यो वै नादः स वै बिन्दुस्तद्वै चित्तं प्रकीर्तितम्। नादो बिन्दुश्च चित्तं
च त्रिभिरेक्यं प्रसाधयेत् (यो०शि० ६.७२)। इसी प्रकार (बिन्दु की) उत्पत्ति, स्थिति और कारण वाला मन ही बिन्दु है;
क्योंकि मन से बिन्दु उसी प्रकार उत्पन्न होता है, जिस प्रकार दूध से घृत-मन एव हि बिन्दुश्च उत्पत्तिस्थिति कारणम्।
मनसोत्पद्यते बिन्दुर्यथा क्षीरं घृतात्मकम् (यो०शि० ६.७३)। इस प्रकार बिन्दु शब्द के अनेक अर्थ हैं। योग और ध्यान
सन्दर्भों में यह ब्रह्म, चित्त, मन आदि अर्थों में प्रयुक्त होता है।
२१२. बृहन् (बृहत्)-द्र०-ब्रह्मचारी।
२१३. बोध-द्र०-ज्ञानखण्ड-बोध-प्रतिबोध।
२१४. ब्रह्म-द्र०-ज्ञानखण्ड-ब्रह्म-परब्रह्म।
२१५. ब्रह्मचर्य-द्र०-यम।
२१६. ब्रह्मचारी- भारतीय आश्रम व्यवस्था के अन्तर्गत जीवन को चार भागों में बाँटा गया है। इन चारों भागों की अवधि
को ही चार आश्रम कहते हैं, जो इस प्रकार हैं- ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास। आर्ष मान्यता के आधार पर
प्रत्येक आश्रम की अवधि २५ वर्ष मानी गई है; क्योंकि ऋषियों की परिकल्पना थी कि जीवन १०० वर्ष का होता है।
प्रथम आश्रम ब्रह्मचर्य कहलाता है। ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले को ब्रह्मचारी कहते हैं। 'ब्रह्मचर्य' शब्द का विस्तृत
विवेचन इसी खण्ड के परिभाषा कोश, परिशिष्ट में 'यम' शब्द के अन्तर्गत किया जा चुका है। ब्रह्मचारी की परिभाषा इस