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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 358, कुल 414 में से

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पृष्ठ 358

तैजस ३६६ परिशिष्ट
१२५. तैजस - द्र०-ज्ञानखण्ड ।
१२६. त्रय शरीर - द्र०-ज्ञानखण्ड।
१२७. त्रिगुणातीत-निर्गुण - द्र०-ज्ञानखण्ड-निर्गुण-सगुण।
१२८. त्रिदण्ड-त्रिपुण्ड् - संन्यासाश्रम में अनेक प्रकार के संन्यासी होते हैं। उनकी कई शाखाएँ हैं, जिनके अनुसार उनके
चिह्न भी पृथक्-पृथक् होते हैं। जैसे कुछ संन्यासी एक दण्ड और कुछ त्रिदण्ड धारण करते हैं। इसी प्रकार कुछ त्रिपुण्ड्र,
कुछ ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करते हैं। प्रख्यात संस्कृत शब्दकोश 'शब्द कल्पद्रुम' में त्रिदण्ड के सम्बन्ध में उल्लेख है- 'त्रिदण्डं
चतुरङ्गुलगोबालवेष्टनादन्योन्यसम्बन्धं अस्त्यस्येति' (श०क०खं० २ पृ० ६५६) अर्थात् त्रिदण्ड यतियों का वह चिह्न
है, जिसमें चार-चार अङ्गुल के तीन दण्ड एक दूसरे में बँधे रहते हैं। यह तो त्रिदण्ड का स्थूल स्वरूप हुआ। इसके धारण
करने के मूल में भाव यह है कि त्रिदण्डधारी-त्रिदण्डी यतियों के कायदण्ड, मनोदण्ड और वाग्दण्ड बुद्धि में स्थापित रहते
हैं अर्थात् ये (त्रिदण्डी) ज्ञानशक्ति से मन, वचन और कर्म को नियन्त्रित रखते हैं- वाग्दण्डोऽथ मनोदण्डः कायदण्डस्तथैव
च। यस्यैते निहिता बुद्धौ त्रिदण्डीति स उच्यते (श०क० खं०२, पृ० ६५६)। हिन्दूधर्म कोश के अनुसार त्रिदण्डी
संन्यासी श्री वैष्णव संन्यासी कहे जाते हैं, जो शैव दशनामी संन्यासियों से भिन्न हैं। इनमें केवल ब्राह्मण वर्णोत्पन्न ही
ग्रहण किए जाते हैं, वे ही त्रिदण्ड धारण कर सकते हैं। नारद परिव्राजकोपनिषद् में उपनिषद्कार ने यतिचर्या का विवेचन
करते हुए लिखा है कि यति को सतत सर्वभूतहितरत रहते हुए शान्त, त्रिदण्डी तथा कमण्डलुधारी होकर आत्मा में रमण
करते हुए परिव्रज्या करनी चाहिए और एकाकी ही विचरण करना चाहिए, उसे मात्र भिक्षा के लिए ही ग्राम में प्रवेश
करना चाहिए, अन्य कार्यों के लिए नहीं- सर्वभूतहितः शान्तस्त्रिदण्डी सकमण्डलुः। एकारामः परिव्रज्य भिक्षार्थं
ग्राममाविशेत् (ना०परि०३.५५)। काया, मन और वाणी को नियन्त्रित रखने वाले त्रिदण्डी को महायति की संज्ञा देते हुए
उपनिषद् भाष्यकार ब्रह्मयोगी ने श्रुति का एक श्लोक उद्धृत किया है-वाग्दण्डः कायदण्डश्च मनोदण्डश्च ते त्रयः।
यस्यैते नियता दण्डाः स त्रिदण्डी महायतिः (ना०परि० ३.५४.६२ ब्रह्म० भा०)। शैव सम्प्रदाय का धार्मिक चिह्न
त्रिपुण्ड्र है, जो भृकुटी (भौंहों) के ऊपर मस्तक के एक सिरे से दूसरे तक भस्म की तीन आड़ी रेखाओं के द्वारा अंकित
किया जाता है। हिन्दी विश्वकोश में त्रिपुण्ड्र शब्द का स्वरूप इस प्रकार वर्णित है- त्रयाणां पुण्ड्राणां इक्षुवदाकाराणां
समाहारः अर्थात् ईख के आकार की तीन रेखाओं का समुच्चय त्रिपुण्ड्र है। इसे ललाट के अतिरिक्त वक्षस्थल, भुजाओं
एवं अन्य अंगों पर भी अंकित किया जाता है। नारद परिव्राजकोपनिषद् में बहूदक संन्यासी के लक्षण के सन्दर्भ में
त्रिपुण्ड्र का उल्लेख किया गया है-बहूदकः शिखादि कन्थाधरस्त्रिपुण्ड्रधारी .......कबलाशी (ना०परि० ५.१३)।
रामानन्दी वैष्णव सम्प्रदाय के सन्तों के ऊर्ध्व पुण्ड्र (मस्तक पर ऊपर की ओर खड़ी रेखा) धारण करने का विधान भी
कुछ ग्रन्थों में मिलता है। कुटीचक के लक्षण में भी श्वेत ऊर्ध्वपुण्ड्र और त्रिदण्ड धारण करने का उल्लेख है-एकत्रान्नादनं
परः श्वेतोर्ध्वपुण्ड्रधारी त्रिदण्डः (ना०परि०५.१२)।
१२९. त्रिपाद् ब्रह्म- ब्रह्म की अनेक संज्ञाओं में एक संज्ञा त्रिपाद् ब्रह्म भी है। वेदों, उपनिषदों और पुराणों में सभी जगह
त्रिपाद् ब्रह्म का उल्लेख मिलता है। शब्द कल्पद्रुम के अनुसार इस शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार है-"त्रयः पादा अस्य
संख्या सुपूर्व्वस्य।" जिसके पैरों (पादों या चरणों) की संख्या तीन हो, वह अर्थात् विष्णु भगवान्। पुराणों में उल्लेख है
कि एक बार भगवान् विष्णु ने वामन रूप धारण करके राजा बलि से तीन पग भूमि की याचना की, बलि ने वह देना
स्वीकार कर लिया, तब वामन ने अपना मूल स्वरूप (विराट् स्वरूप) दिखाया। बलि को ऐसा अनुभव हुआ कि पृथिवी
उनके (विराट् भगवान् के) पादद्वय, अन्तरिक्ष मस्तक, सूर्य और चन्द्र दोनों नेत्र हैं आदि। इसे देखकर वे सम्मोहित हो
गये। उस समय भगवान् के एक पाद से बलि की समस्त भूमि (पृथिवी), शरीर से आकाश, भुजाओं से समस्त दिशाएँ
छा गईं। उनके दूसरे पाद में स्वर्ग के सभी लोक आ गये, परन्तु तीसरा पाद रखने की जगह शेष न बचने पर उनने उसे
स्वर्ग लोक से लेकर मर्त्यलोक, जनः लोक, तपः लोक और सत्यलोक में विस्तारित किया। श्रीमद्भागवत में यह प्रकरण
इस प्रकार विवेचित है- "क्षितिं पदैकेन बलेर्विचक्रमे, नभः शरीरेण दिशश्च बाहुभिः। पदं द्वितीयं क्रमतस्त्रिविष्टपं,
न वै तृतीयाय तदीयमण्वपि । उरुक्रमस्याङ्घ्रिरुपर्युपर्यथो, महर्जनाभ्यां तपसः परं गतः" (भा० ८.२०.३३-३४)।
वेद के मत में संसाररहित ब्रह्मस्वरूप पुरुष ही त्रिपाद् ब्रह्म है। उस ब्रह्मरूप पुरुष (त्रिपाद् ब्रह्म) के सन्दर्भ में ऋग्वेद
के पुरुषसूक्त के ऋषि नारायण द्वारा दृष्ट एक ऋचा में तीन पादों का वर्णन इस प्रकार है-त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः
पादोऽस्येहाभवत्पुनः । ततो विष्वङ् व्यक्रामत्साशनानशने अभि (ऋ० १०.९०.४) अर्थात् ऊपर (दिव्यलोक में)