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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

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पृष्ठ 355

परिशिष्ट ३६३ चातुर्मास्य
......आत्मानं प्रार्थयन्ते (आश्रमो० २)। शालीनवृत्तिगृहस्थ उन्हें कहा जाता है, जो स्वयं तो यज्ञादि कृत्य सम्पन्न करते
हैं; पर दूसरों की वह क्रिया सम्पन्न नहीं कराते। स्वयं तो अध्ययन करते हैं, पर कराते नहीं; इसी प्रकार स्वयं दान देते हैं,
पर दूसरों से दान-दक्षिणा ग्रहण नहीं करते। इस प्रकार सौ वर्ष यज्ञादि सम्पन्न करते हुए आत्म साधना करते हैं। यायावर
गृहस्थ वे हैं, जो स्वयं तो यज्ञादि करते ही हैं, दूसरों की भी कराते हैं; स्वयं भी अध्ययन करते हैं व दूसरों को भी तथा
स्वयं (श्रेष्ठ कार्यों के निमित्त) दानादि ग्रहण करते हैं और लोकोपयोगी कार्यों के लिए दूसरों को भी दान देते हुए सौ वर्ष
तक यज्ञीय जीवन जीकर आत्म प्रार्थना (आत्मा की साधना) करते हैं-यायावरा यजन्तो याजयन्तोऽधीयाना नाध्यापयन्तो
ददतो न प्रतिगृह्णन्तः शतसंवत्सराभिः क्रियाभिर्यजन्त आत्मानं प्रार्थयन्ते (आश्रमो०२)।
घोर संन्यासिक गृहस्थ उन्हें कहा जाता है, जो पवित्र जल द्वारा दैनिक कृत्य सम्पन्न करते हुए, उञ्छवृत्ति (खेतों
में अवशिष्ट अनाज द्वारा आजीविका चलाना) अपनाकर अकिञ्चनवत् अपना निर्वाह करते हुए, सौ वर्ष तक यज्ञीय
जीवन जीते हुए आत्म साधना करते हैं- घोरसंन्यासिका उद्धृतपरिपूताभिरद्भिः कार्यं कुर्वन्तः प्रतिदिवसमाहतोञ्छ-
वृत्तिमुपयुञ्जानाः शतसंवत्सराभिः क्रियाभिर्यजन्त आत्मानं प्रार्थयन्ते (आश्रमो० २)। इस प्रकार स्थिति भेद से
गृहस्थों के ये चार प्रकार होते हैं।
१००. घोर संन्यासिक — द्र०- गृहस्थ।
१०१. चतुर्दश भुवन— सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में चौदह भुवन माने गये हैं, जिन्हें चतुर्दश भुवन भी कहा गया है। संस्कृत हिन्दी
कोश पृ० ७४५ में इसकी पुष्टि इन शब्दों में की गई है- इह हि भुवनान्यन्ये धीराश्चतुर्दश भुञ्जते (भर्तृ०३.२३)। चतुर्दश
भुवन से तात्पर्य चौदह लोकों से है। चौदह लोकों में से सात लोक ऊपर हैं एवं सात लोक नीचे हैं। ऊपर के लोकों
की ऊर्ध्व लोक अथवा स्वर्गलोक कहते हैं। नीचे के लोकों की अधोलोक अथवा पाताल लोक कहते हैं। हि०वि० कोश
में सात स्वर्ग अथवा ऊर्ध्वलोक इस प्रकार हैं- भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः और सत्यम्। अधोलोक अर्थात्
पाताल लोक इस प्रकार हैं- अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल और पाताल।
भारतीय संस्कृति कोश के अनुसार अतल लोक वह है, जिसकी मिट्टी कृष्णवर्णा हैं तथा जहाँ मय दानव का पुत्र
अपनी माया की सृष्टि रचते हुए निवास कर रहा है। वितल लोक में शंकर और पार्वती का निवास बताया गया है। सुतल
लोक में राजा बलि रहते हैं, यहाँ की मिट्टी रक्तवर्णा है। तलातल लोक में दानवराज मय का निवास है, यहाँ की मिट्टी
पीतवर्णा है। महातल लोक में काद्रवेय सर्पों का निवास स्थल है, जहाँ की मिट्टी मीठी बतायी जाती है। रसातल लोक
में ऐसे दैत्य-दानव आदि निवास करते हैं, जो देवराज इन्द्र से भयभीत रहते हैं। यहाँ की मिट्टी पथरीली है। पाताल लोक
वासुकि सहित विशालकाय सर्पों का निवास स्थल है, जहाँ की भूमि स्वर्णमयी है। इस प्रकार नीचे के ये सात लोक हैं।
उपनिषदों में इहलोक और परलोक दो ही लोक माने गये हैं, जबकि वेदादि में पृथिवी, अन्तरिक्ष और द्युलोक
ये तीन लोक वर्णित हैं।
१०२. चरु — 'चरु' शब्द वैदिक काल से ही प्रचलित है। प्राचीन काल में यज्ञीय पदार्थों (हविष्यान्न) की निर्मित करने के
पात्र विशेष के रूप में सम्भवतः कड़ाही के रूप में इसका प्रयोग किया जाता था। ऋग्वेद और अथर्ववेद में चरु का कई
बार उल्लेख हुआ है। यथा-स नो वृषन्नमुं चरुं सत्रादावन्नपा वृधि। अस्मभ्यमप्रतिष्कुतः (ऋ० १.७.६)।
इस प्रकार अथर्ववेद में भी चरु का वर्णन इन शब्दों में संप्राप्य है- उत्क्रामातः परि चेदतमस्तस्ताञ्च्छरोरधि नाकं
तृतीयम् (अथर्व० ९.५.६)। पात्र विशेष के रूप में 'चरु' शब्द का इतना प्रयोग हुआ कि बाद में उसमें पकाये जाने वाले
हविष्यान्न को ही 'चरु' कहने लगे और हविष्यान्न के अर्थ में ही चरु शब्द रूढ़ हो गया। इसीलिए हिन्दी विश्वकोश में
इस शब्द की व्युत्पत्ति में लिखा है-चर्यते भक्ष्यतेऽग्न्यादिभिः । यद्वा चरति होमादिकम् अर्थात् हव्यान्न अथवा होम के
लिए पाक किया जाने वाला अन्न। चरु (विशिष्ट प्रकार का हविष्यान्न), जिसमें तण्डुल (चावल) की प्रमुखता रहती है,
के निर्माण की विधि बहुत लम्बी हैं. जिसका सम्पूर्ण उल्लेख स्थानाभाव के कारण यहाँ सम्भव नहीं हैं। इसे कात्यायन श्रौत
सूत्र ४.१.६.७ में देखा जा सकता है। 'श्रौत पदार्थ निर्वचनम्' नामक ग्रन्थ में भी चरु का उल्लेख पक्व तण्डुल के रूप में
मिलता है- ते च परिपक्कास्तण्डुलाः चरुपदवाच्याः (श्रौ०प०नि० पृ० १९)। उपनिषद् ग्रन्थों में भी चरु का वर्णन
आया है। कठरुद्रोपनिषद् के संन्यास प्रकरण में चरु का उल्लेख द्रष्टव्य है- द्वादशरात्रस्यान्तेऽग्नये वैश्वानराय प्रजापतये
च प्राजापत्यं चरुं, वैष्णवं त्रिकपालं अग्निम् (कठरुद्रो० ३)।
१०३. चातुर्मास्य — द्र०-ज्ञानखण्ड -चातुर्मास्य-आग्रयण।