१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 258, कुल 414 में से
संदर्भ में पढ़ें२६६ योगतत्त्वोपनिषद
धारयेत्पञ्च घटिकाः पृथिवीजयमाप्नुयात्। पृथिवीयोगतो मृत्युर्न भवेदस्य योगिनः ॥ ८७ ॥
इस तरह से पाँच घटी (२ घंटे) तक ध्यान करने से योगी पृथ्वी तत्त्व को जीत लेता है। ऐसे योगी की
पृथ्वी के संयोग (विकार या आघात) से मृत्यु नहीं होती ॥ ८७ ॥
आजानोः पायुपर्यन्तमपां स्थानं प्रकीर्तितम्। आपोऽर्धचन्द्रं शुक्लं च वंबीजं परिकीर्तितम् ॥
वारुणे वायुमारोप्य वकारेण समन्वितम्। स्मरन्नारायणं देवं चतुर्बाहुं किरीटिनम् ॥ ८९ ॥
शुद्धस्फटिकसंकाशं पीतवाससमच्युतम्। धारयेत्पञ्च घटिकाः सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ९० ॥
घुटनों से गुदास्थान तक जल-तत्त्व का क्षेत्र बतलाया गया है। यह जल-तत्त्व अर्द्ध चन्द्र के रूप में
'वं' बीज वाला होता है। इस जल-तत्त्व में वायु को आरोपित करते हुए 'वं' बीज को समन्वित करके
चतुर्भुज, मुकुट धारण किये हुए, पवित्र स्फटिक के सदृश, पीत वस्त्रों से आच्छादित अच्युतदेव श्री नारायण
का पाँच घटी (२ घंटे) तक ध्यान करना चाहिए। इससे सभी पापों से छुटकारा मिल जाता है ॥ ८८-९० ॥
ततो जलाद्भयं नास्ति जले मृत्युर्न विद्यते । आपायोर्हृदयान्तं च वह्निस्थानं प्रकीर्तितम् ॥ ९१ ॥
इसके पश्चात् उस योगी को जल से किसी भी तरह का डर नहीं रहता और न ही जल से उसकी मृत्यु
हो सकती है। जलतत्त्व (गुदा भाग) से हृदय क्षेत्र तक अग्नि का स्थान बताया गया है ॥ ९१ ॥
वह्निस्त्रिकोणं रक्तं च रेफाक्षरसमुद्भवम्। वह्नौ चानिलमारोप्य रेफाक्षरसमुज्ज्वलम् ॥ ९२ ॥
तीन कोणों से युक्त अग्नि, लाल रंग वाला एवं 'र' कार से संयुक्त होता है। अग्नि में वायु को आरोपित
करके उस समुज्ज्वल 'र' कार को समन्वित करना चाहिए ॥ ९२ ॥
त्रियक्षं वरदं रुद्रं तरुणादित्यसंनिभम्। भस्मोद्धूलितसर्वाङ्गं सुप्रसन्नमनुस्मरन् ॥ ९३ ॥
त्रियक्ष (तीन नेत्रों) से युक्त वर प्रदान करने वाले, तरुण आदित्य के सदृश प्रकाशमान तथा समस्त
अङ्गों में भस्म धारण किये हुए भगवान् रुद्र का प्रसन्न मन से सदा ध्यान करना चाहिए ॥ ९३ ॥
धारयेत्पञ्च घटिका वह्निनासौ न दह्यते। न दह्यते शरीरं च प्रविष्टस्याग्निमण्डले ॥ ९४ ॥
पाँच घटी (२ घंटे) तक इस तरह से चिन्तन करने से वह (योगी) अग्नि से नहीं जलाया जा सकता है।
इसके अतिरिक्त प्रखर जलती हुई अग्नि में भी संयोगवश प्रविष्ट कराया जाए, तो भी वह नहीं जलता ॥ ९४ ॥
आहृदयाद्भ्रुवोर्मध्यं वायुस्थानं प्रकीर्तितम् । वायुः षट्कोणकं कृष्णं यकाराक्षरभासुरम् ॥
हृदय क्षेत्र से भृकुटियों तक का स्थान वायु का क्षेत्र कहा गया है, यह षट्कोण के आकार वाला, कृष्ण
वर्ण से युक्त भास्वर 'य' अक्षर वाला होता है ॥ ९५ ॥
मारुतं मरुतां स्थाने यकाराक्षरभासुरम् । धारयत्तत्र सर्वज्ञमीश्वरं विश्वतोमुखम् ॥ ९६ ॥
मरुत् स्थान पर यकार होता है। यहाँ 'य' अक्षर के सहित विश्वतोमुख सर्वज्ञ ईश्वर का सतत चिन्तन करना चाहिए ॥
धारयेत्पञ्च घटिका वायुवद्व्योमगो भवेत् । मरणं न तु वायोश्च भयं भवति योगिनः ॥ ९७ ॥
इस तरह पाँच घटी अर्थात् दो घंटे तक उन विश्वतोमुख भगवान् का ध्यान करने से योगी वायु के सदृश
आकाश में गमन करने वाला हो जाता है। उस महान् योगी को वायु से किसी भी तरह का भय नहीं व्याप्त होता
तथा वह वायु से मृत्यु को भी नहीं प्राप्त होता ॥ ९७ ॥
आभूमध्यात्तु मूर्धान्तमाकाशस्थानमुच्यते । व्योम वृत्तं च धूम्रं च हकाराक्षरभासुरम् ॥ ९८ ॥
भृकुटी के मध्य भाग से लेकर मूर्धा के अन्त तक का आकाश तत्त्व का क्षेत्र कहा गया है। यह
व्योमवृत्त के आकार वाला, धूम्र वर्ण से युक्त तथा 'ह' कार (अक्षर) से प्रकाशित है ॥ ९८ ॥