१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 228, कुल 414 में से
संदर्भ में पढ़ें२३६ मण्डलब्राह्मणोपनिषद्
जिसे जाग्रदवस्था और निद्रावस्था में भी अन्तर्ज्ञान बना रहता है, वह ब्रह्मविद् होता है ॥ २ ॥
सुषुप्तिसमाध्योर्मनोलयाविशेषेऽपि महदस्त्युभयोर्भेदस्तमसि लीनत्वान्मुक्तिहेतुत्वा-
भावाच्च ॥ ३ ॥
सुषुप्ति और समाधि की स्थिति में मनोलय समान होने पर भी दोनों में महान् भेद है। सुषुप्ति में मन
अज्ञान में लय हो जाता है, जिससे मुक्ति की स्थिति नहीं बनती ॥ ३ ॥
समाधौ मृदिततमोविकारस्य तदाकाराकारिताखण्डाकारवृत्त्यात्मकसाक्षिचैतन्ये
प्रपञ्चलयः संपद्यते प्रपञ्चस्य मनःकल्पितत्वात् ॥ ४ ॥
समाधि अवस्था में तमोविकार विनष्ट हो जाता है, जिसके कारण तदाकार और अखण्डाकार बने हुए
वृत्ति रूप साक्षिचैतन्य में प्रपञ्च का विलय हो जाता है; क्योंकि प्रपञ्च मनःकल्पित होता है ॥ ४ ॥
ततो भेदाभावात् कदाचिद्बहिर्गतेऽपि मिथ्यात्वभानात्। सकृद्विभातसदानन्दानुभवै-
कगोचरो ब्रह्मवित्तदैव भवति ॥ ५ ॥
तत्पश्चात् भेद के अभाव में समाधि से बाहर आने पर भी प्रपञ्च के मिथ्यात्व का बोध बना रहता है।
एक बार सदानन्द का अनुभव हो जाने से वही प्रमुख विषय हो जाता है। इस प्रकार ब्रह्म को जानने वाला
(ब्रह्मविद्) ब्रह्म ही हो जाता है ॥ ५ ॥
यस्य संकल्पनाशः स्यात्तस्य मुक्तिः करे स्थिता।
तस्माद्भावाभावौ परित्यज्य परमात्मध्यानेन मुक्तो भवति ॥ ६ ॥
जिसके संकल्प विनष्ट हो गये हैं, उसी के हाथ में मुक्ति है। इसलिए (वह साधक) भाव और अभाव
का परित्याग करके परमात्मा का ध्यान करने से मुक्त हो जाता है ॥ ६ ॥
पुनःपुनः सर्वावस्थासु ज्ञानज्ञेयौ ध्यानध्येयौ लक्ष्यालक्ष्ये दृश्यादृश्ये चोहापोहादि
परित्यज्य जीवन्मुक्तो भवेत्। य एवं वेद ॥ ७॥
इस प्रकार समस्त अवस्थाओं में बारम्बार ज्ञान और ज्ञेय, ध्यान और ध्येय, लक्ष्य और अलक्ष्य, दृश्य
और अदृश्य तथा ऊहापोह आदि का परित्याग करके मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है। जो इस प्रकार जानता है
(वह ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है) ॥ ७ ॥
॥ चतुर्थः खण्डः ॥
पञ्चावस्थाः जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तितुरीयतूरीयातीताः ॥ १ ॥
पाँच अवस्थाएँ होती हैं—जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति, तुरीय और तुरीयातीत ॥ १ ॥
जाग्रति प्रवृत्तो जीवः प्रवृत्तिमार्गासक्तः।
पापफलनरकादि मास्तु शुभकर्मफलस्वर्गमस्त्विति काङ्क्षते ॥ २ ॥
इन पाँच अवस्थाओं में से जाग्रदवस्था में जीव प्रवृत्ति मार्ग में प्रवृत्त होता है, जिससे वह यह आकांक्षा
करता है कि पाप का फल नरक मुझे न प्राप्त हो और शुभ कर्मों का फल स्वर्ग मुझे अवश्य प्राप्त हो ॥ २ ॥
एवं स एव स्वीकृतवैराग्यात्कर्मफलजन्माऽलं ।
संसारबन्धनमलमिति विमुक्त्यभिमुखो निवृत्तिमार्गप्रवृत्तो भवति ॥ ३ ॥