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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 222, कुल 414 में से

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पृष्ठ 222

२३० मण्डलब्राह्मणोपनिषद्
गुरु भक्ति, सत्य मार्ग में अनुरक्ति, यथालाभ-सन्तोष, एकान्त निवास, अनासक्ति, मनोनिवृत्ति, फल की
इच्छा न करना और वैराग्य भाव-ये सभी नियम हैं ॥ ४ ॥
सुखासनवृत्तिश्चिरवासश्चैवमासननियमो भवति ॥ ५ ॥
सुखासन वृत्ति (सुखपूर्वक एक वृत्ति में दीर्घकाल तक स्थित रहना) और चिरनिवास (बिना प्रयास के
चिरकाल तक एक स्थिति में रहना) - ये आसन के नियम हैं ॥ ५ ॥
पूरककुम्भकरेचकैः षोडशचतुःषष्टिद्वात्रिंशत्संख्यया यथाक्रमं प्राणायामः ॥ ६ ॥
षोडश मात्राओं द्वारा पूरक, चौंसठ मात्राओं द्वारा कुम्भक और बत्तीस मात्राओं द्वारा रेचक करने को
प्राणायाम कहते हैं ॥ ६ ॥
विषयेभ्य इन्द्रियार्थेभ्यो मनोनिरोधनं प्रत्याहारः ॥ ७ ॥
इन्द्रियों के विषयों से मन का निरोध करना प्रत्याहार कहलाता है ॥ ७ ॥
विषयव्यावर्तनपूर्वकं चैतन्ये चेतःस्थापनं धारणं भवति ॥ ८ ॥
विषयों से निरोधित मन को चैतन्य सत्ता में स्थित करना धारणा है ॥ ८ ॥
सर्वशरीरेषु चैतन्यैकतानता ध्यानम् ॥ ९ ॥ ध्यानविस्मृतिः समाधिः ॥ १० ॥
सभी शरीरों में एक ही चैतन्य तत्त्व विद्यमान है, इसी एकतानता (निरन्तर चिन्तन) को ध्यान कहा गया
है और ध्यान को भी विस्मृत कर देना (भूल जाना) समाधि है ॥ ९-१० ॥
एवं सूक्ष्माङ्गानि । य एवं वेद स मुक्तिभागभवति ॥ ११ ॥
इस प्रकार ये सभी सूक्ष्म अङ्ग हैं, जो इन्हें इस प्रकार जानता है, वह मुक्ति का अधिकारी होता है ॥११ ॥
॥ द्वितीयः खण्डः ॥
देहस्य पञ्च दोषा भवन्ति कामक्रोधनिःश्वासभयनिद्राः ॥ १ ॥
इस शरीर के काम, क्रोध, निःश्वास (श्वासावरोध), भय और निद्रा (अज्ञान-निद्रा) - ये पाँच दोष होते हैं ॥१
तन्निरासस्तु निःसंकल्पक्षमाल्पाहाराप्रमादतातत्त्वसेवनम् ॥ २ ॥
संकल्परहित होना, क्षमाशील होना, अल्पाहार करना, निर्भय होना और तत्त्व चिन्तन करना, ये उपर्युक्त
(शरीर के ) दोषों को दूर करने के साधन हैं ॥ २ ॥
निद्राभयसरीसृपं हिंसादितरङ्गं तृष्णावर्तं दारपङ्कं संसारवार्धिं तरीतुं सूक्ष्ममार्गमवलम्ब्य
सत्त्वादिगुणानतिक्रम्य तारकमवलोकयेत् ॥ ३ ॥
निद्रा (अज्ञान-निद्रा) और भय सर्प हैं, हिंसा आदि तरंगें हैं, तृष्णा भँवर है, स्त्री पङ्क है (स्त्री के प्रति
भोग्याभाव कीचड़ है) - ऐसे संसार रूपी सागर से पार जाने के लिए सूक्ष्म मार्ग का अवलम्बन लेकर सत्त्व
आदि गुणों से परे (ऊपर) होकर तारक ब्रह्म का दर्शन करना चाहिए (उसका ध्यान करना चाहिए) ॥ ३ ॥
भ्रूमध्ये सच्चिदानन्दतेजःकूटरूपं तारकं ब्रह्म ॥ ४ ॥
दोनों भौंहों के मध्य में सच्चिदानन्द स्वरूप, तेजः-सम्पन्न, कूट रूप तारक ब्रह्म का निवास है ॥ ४ ॥
तदुपायं लक्ष्यत्रयावलोकनम् ॥ ५ ॥
उस (तारक ब्रह्म) की प्राप्ति के उपायों में लक्ष्यत्रय का अवलोकन करना चाहिए ॥ ५ ॥