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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

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पृष्ठ 126

उपदेश ३ मन्त्र १३ १३०
परेणैवात्मनश्चापि परस्यैवात्मना तथा। अभयं समवाप्नोति स परिव्राडिति स्मृतिः ॥२॥
जो दूसरों से न भयभीत होता है और न ही स्वयं दूसरों को भयभीत करता है, वही वस्तुतः परिव्राजक
है, ऐसा स्मृतियों का कथन है ॥ २ ॥
षण्ढोऽथ विकलोऽप्यन्धो बालकश्चापि पातकी। पतितश्च परद्वारी वैखानसहरद्विजौ ॥ ३ ॥
चक्री लिङ्गी च पाषण्डी शिपिविष्टोऽप्यनग्निकः। द्वित्रिवारेण संन्यस्तो भृतकाध्यापकोऽपि च।
एते नार्हन्ति संन्यासमातुरेण विना क्रमम् ॥ ४॥
नपुंसक, विकलाङ्ग, अन्धे, बालक, पातकी, पतित, परस्त्रीरत, वैखानस, हरद्विज (शिवभक्त), कुचक्र
रचने वाले, लिङ्गी (वेषधारी), पाखण्डी, शिपिविष्ट, अयाज्ञिक, वेतनभोगी शिक्षक तथा दो-तीन बार संन्यास
ले चुकने वाले ये सभी आतुर संन्यास लेने योग्य हो सकते हैं, क्रमशः संन्यास लेने योग्य नहीं ॥ ३-४ ॥
आतुरकालः कथमार्यसम्मतः। प्राणस्योत्क्रमणासन्नकालस्त्वातुरसंज्ञकः। नेतरस्त्वातुरः
कालो मुक्तिमार्गप्रवर्तकः ॥ ५ ॥ आतुरेऽपि च संन्यासे तत्तन्मन्त्रपुरःसरम्। मन्त्रावृत्तिं च कृत्वैव
संन्यसेद्विधिवद्बुधः ॥ ६ ॥ आतुरेऽपि क्रमे वापि प्रैषभेदो न कुत्रचित्। न मन्त्रं कर्मरहितं कर्म
मन्त्रमपेक्षते ॥ ७ ॥ अकर्म मन्त्ररहितं नातो मन्त्रं परित्यजेत्। मन्त्रं विना कर्म कुर्याद्भस्मन्या-
हुतिवद्भवेत् ॥ ८ ॥ विध्युक्तकर्म संक्षेपात्संन्यासस्त्वातुरःस्मृतः। तस्मादातुरसंन्यासे
मन्त्रावृत्तिविधिर्मुने ॥ ९ ॥
(नारद का प्रश्न) आतुर संन्यास का कौन सा समय विद्वज्जनों द्वारा माना गया है? (ब्रह्मा का उत्तर-)
प्राणों के निकलने का समय जब अत्यन्त निकट हो, तभी आतुर संन्यास लेने का उचित समय माना गया है।
इसके अतिरिक्त अन्य कोई समय उचित नहीं है। आतुर संन्यास यदि ठीक समय पर सम्पन्न हो जाये, तो वह
मुक्ति प्रदायक होता है। आतुर संन्यास ग्रहण में भी विद्वान् पुरुष शास्त्र विहित मन्त्रों का विधिवत् उच्चारण करके
ही संन्यास ग्रहण करे। आतुर संन्यास और क्रम संन्यास के विधान में प्रायः कोई भेद नहीं है। प्रत्येक मन्त्र कर्म
से ही सम्बन्धित होता है और कर्म मन्त्र द्वारा प्रेरित होता है। मन्त्र के बिना किया गया कोई भी कर्म वस्तुतः कर्म
नहीं है। अस्तु, मन्त्र का कभी परित्याग नहीं करना चाहिए। मन्त्ररहित किया गया कोई भी कर्म भस्म (राख)
में छोड़ी हुई आहुति के समान व्यर्थ होता है। हे मुने! शास्त्र वर्णित कर्म के संक्षेप में करने से आतुर संन्यास की
विधि पूर्ण होती है। इसलिए इस (प्रक्रिया) में मन्त्रों का बारम्बार उच्चारण शास्त्र सम्मत एवं उचित है ॥ ५-९ ॥
आहिताग्निविरक्तश्चेद्देशान्तरगतो यदि। प्राजापत्येष्टिमप्स्वेव निर्वृत्यैवाथ संन्यसेत् ॥ १० ॥
मनसा वाथ विध्युक्तमन्त्रावृत्त्याथ वा जले। श्रुत्यनुष्ठानमार्गेण कर्मानुष्ठानमेव वा। समाप्य
संन्यसेद्विद्वान्नो चेत्पातित्यमाप्नुयात् ॥ ११ ॥
यदि अग्निहोत्र सम्पन्न करने वाला पुरुष किसी अन्य देश में गया हो और वहाँ उसे वैराग्य उत्पन्न हो जाए,
तो जल में प्राजापत्य इष्टि सम्पन्न करके संन्यास ग्रहण कर ले। यह प्राजापत्य याग केवल मन से करे अथवा
शास्त्र विहित मन्त्रों के उच्चारण पूर्वक अथवा वेदोक्त विधान से कर्मानुष्ठान पूर्वक सम्पन्न करे। यह सब करके
ही विद्वान् पुरुष संन्यास ले, अन्यथा वह अपने धर्म से च्युत हो जाता है ॥ १०-११॥
यदा मनसि संजातं वैतृष्ण्यं सर्ववस्तुषु। तदा संन्यासमिच्छेत पतितः स्याद्विपर्यये ॥१२॥
विरक्तः प्रव्रजेद्धीमान्सरक्तस्तु गृहे वसेत् । सरागो नरकं याति प्रव्रजन्हि द्विजाधमः ॥१३॥