१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 117, कुल 414 में से
संदर्भ में पढ़ेंमन्त्र २० १२१
पैप्पलादि द्वारा पूछे जाने पर जाबालि ने कहा-मैं सम्पूर्ण तत्त्व कहता हूँ। स्वयं पशुपति ही अहंकार युक्त
होकर संसारी जीव हो जाता है। वही पशु है। सर्वज्ञ और पञ्च कृत्यों से सम्पन्न, सर्वेश्वर ईश ही पशुपति है।
पैप्पलादि ने पुनः प्रश्न किया-पशु कौन है ? जाबालि ने कहा-जीव को ही पशु कहा गया है। जीवों के पति होने
के कारण उन्हें पशुपति कहते हैं। उन्होंने फिर पूछा-जीव पशु किस तरह है ? और (पशुपति) उनके पति
कैसे हैं? महर्षि जाबालि ने उत्तर दिया-जिस प्रकार घास का सेवन करने वाले, विवेक हीन, किसी अन्य के
दास, कृषि आदि कार्यों में नियोजित अनेक प्रकार के दुःखों को सहन करने वाले, अपने स्वामी के बन्धन में
बँधे हुए गौ आदि पशु होते हैं (उसी प्रकार ये जीव भी ईश्वर के बन्धन में बँधे रहते हैं)। जैसे-उन पशुओं के
स्वामी (कोई मनुष्य) होते हैं उसी प्रकार समस्त जीवों के स्वामी (पति) सर्वज्ञ, ईश्वर-पशुपति होते हैं।
पैप्पलादि ने पुनः पूछा- वह ज्ञान किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है ? जाबालि ने कहा-विभूति धारण के
द्वारा उस ज्ञान को प्राप्त किया जा सकता है। पैप्पलादि ने पूछा-उसे धारण करने की विधि क्या है ? उसे कहाँ-
कहाँ धारण करना चाहिए ? ॥ ११-१८ ॥
पुनः स तमुवाच सद्योजातादिपञ्चब्रह्ममन्त्रैर्भस्म संगृह्याग्निरिति भस्मेत्यनेनाभिमन्त्र्य
मानस्तोक इति समुद्धृत्य जलेन संसृज्य त्र्यायुषमिति शिरोललाटवक्षःस्कन्धेष्विति
तिसृभिस्त्र्यायुषैस्त्र्यम्बकैस्तिस्रो रेखाः प्रकुर्वीत। व्रतमेतच्छांभवं सर्वेषु वेदेषु वेदवादिभिरुक्तं
भवति। तत्समाचरेन्मुमुक्षुर्न पुनर्भावाय ॥ १९ ॥
ऋषि जाबालि ने कहा- 'सद्योजात' आदि पाँच ब्रह्म मन्त्रों से भस्म का संग्रह करे, फिर 'अग्निरिति' इस
मन्त्र से उसे अभिमन्त्रित करे, 'मानस्तोक' (यजु० १६.१६) इस मंत्र से उसे उठाये, तत्पश्चात् उसे जल से
गीला करके 'त्र्यायुषम्' (यजु० ३.६२) इस मंत्र से सिर, ललाट, वक्षस्थल, कन्धों पर धारण करे। इसके बाद
तीन त्र्यायुष और तीन त्र्यम्बक (यजु० ३.६०) मन्त्रों से तीन रेखायें खींचे। वेदों में यह शाम्भव व्रत वेदवादियों
के द्वारा बतलाया गया है। इसका (इस व्रत का) आचरण करने वाले मुमुक्षु का पुनर्जन्म नहीं होता ॥ १९ ॥
[ यहाँ जिन मन्त्रों का संक्षिप्तांश दिया है, उनमें जो मन्त्र यजुर्वेद के हैं, उनके सन्दर्भ दे दिये गये हैं। शेष के मन्त्र
इस प्रकार हैं- सद्योजातादि पाँच मन्त्र- ॐ सद्योजातं प्रपद्यामि सद्योजाताय वै नमो नमः। भवेभवे नाति भवे भवस्व मां
भवोद्भवाय नमः ॥ १ ॥ वामदेवाय नमो ज्येष्ठाय नमः। श्रेष्ठाय नमो रुद्राय नमः। कालाय नमः कल विकरणाय नमो बल
विकरणाय नमः ॥ २ ॥ बलाय नमो बल प्रमथनाय नमः। सर्वभूतदमनाय नमो मनोन्मनाय नमः ॥ ३ ॥ अघोरेभ्योऽथ
घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः सर्वेभ्यः सर्व शर्वेभ्यो नमस्तेऽअस्तु रुद्ररूपेभ्यः ॥ ४ ॥ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि। तन्नो
रुद्रः प्रचोदयात् ॥५ ॥ (रुद्राष्टाध्यायी) अग्निरिति-ॐ अग्निरिति भस्म। वायुरिति भस्म। जलमिति भस्म। स्थलमिति भस्म।
व्योमेति भस्म। सर्व ः ह वा इदं भस्म। मन एतानि चक्षूंषि भस्मानि इति ॥ (आह्निक सूत्रावलिः पृ. ६५)]
अथ सनत्कुमारः प्रमाणं पृच्छति । त्रिपुण्ड्रधारणस्य
त्रिधा रेखा आललाटादाचक्षुषोराभ्रुवोर्मध्यतश्च ॥ २० ॥
प्रमाण के विषय में पूछने पर सनत्कुमार ने बताया कि त्रिपुण्ड्र धारण करने के लिए तीन आड़ी रेखायें
सम्पूर्ण ललाट के मध्य, भौंहों और नेत्रों तक खींचे ॥ २० ॥
याऽस्य प्रथमा रेखा सा गार्हपत्यश्चाकारो रजो भूर्लोकः स्वात्मा क्रियाशक्तिः ऋग्वेदः
प्रातःसवनं प्रजापतिर्देवो देवतेति। याऽस्य द्वितीया रेखा सा दक्षिणाग्निरूकारः
सत्त्वमन्तरिक्षमन्तरात्मा चेच्छाशक्तिर्यजुर्वेदो माध्यन्दिनसवनं विष्णुर्देवो देवतेति। याऽस्य