यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
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Read in context३२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
न तो ऐसा ही है कि मैं अर्थात् सद्गुरु किसी काल में नहीं था अथवा
तू अनुरागी अधिकारी अथवा ‘जनाधिपाः’– राजा लोग अर्थात् राजसी वृत्ति
में पाया जानेवाला अहं नहीं था और न ऐसा ही है कि आगे हम सब नहीं रहेंगे।
सद्गुरु सदैव रहता है, अनुरागी सदैव रहते हैं। यहाँ योगेश्वर ने योग की
अनादिता पर प्रकाश डालते हुए भविष्य में भी उसकी विद्यमानता पर बल
दिया। मरनेवालों के लिये शोक न करने के लिये कारण बताते हुए उन्होंने
कहा-
देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति।।१३।।
जैसे जीवात्मा की इस देह में कुमार, युवा और वृद्ध अवस्था होती है,
वैसे ही अन्य-अन्य शरीरों की प्राप्ति में धीर पुरुष मोहित नहीं होता है। कभी
आप बालक थे, शनैः-शनैः युवा हुए, तब आप मर तो नहीं गये? पुनः वृद्ध
हुए। पुरुष एक ही है, उसी प्रकार लेशमात्र भी दरार नये देह की प्राप्ति पर नहीं
पड़ती। कलेवर का यह परिवर्तन तब तक चलेगा, जब तक परिवर्तन से परे
की वस्तु नहीं मिल जाती।
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत।।१४।।
हे कुन्तीपुत्र! सुख, दुःख, सर्दी और गर्मी को देनेवाले इन्द्रियों और
विषयों के संयोग तो अनित्य हैं, क्षणभंगुर हैं। अतः भरतवंशी अर्जुन! तू इनका
त्याग कर। अर्जुन इन्द्रिय और विषय के संयोगजन्य सुख का स्मरण करके ही
विकल था। कुलधर्म, कुलगुरुओं की पूज्यता इत्यादि इन्द्रियों के लगाव के
अन्तर्गत हैं। ये क्षणिक हैं, झूठे हैं, नाशवान् हैं। विषयों का संयोग न सदैव
मिलेगा और न सदैव इन्द्रियों में क्षमता ही रहेगी। अतः अर्जुन! तू इनका त्याग
कर, सहन कर। क्यों? क्या हिमालय की लड़ाई थी जो अर्जुन सर्दी सहन
करता अथवा क्या यह रेगिस्तान की लड़ाई है जहाँ अर्जुन गर्मी सहन करे?
‘कुरुक्षेत्र’ जैसा कि लोग बाहर बताते हैं, समशीतोष्ण स्थली है। कुल अठारह
दिन तो लड़ाई हुई, इतने में कहाँ जाड़ा-गर्मी बीत गया? वस्तुतः सर्दी-गर्मी,